Sunday, 29 November 2020

छड़ियां दी महफ़िल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

        छड़ियां दी महफ़िल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

गांव जैसा छोटा सा शहर है यहां छड़ियां दी महफ़िल नाम से दोस्ती की क्लब बहुत पुरानी है। छड़े शब्द का अर्थ है अविवाहित लड़के मगर कभी कभी कोई महिला या लड़की भी जान पहचान कर सदस्य बनने में सफल हो जाती है। शादी नहीं करना पहली शर्त है और ये भी कि जो शादी करना ही नहीं चाहते वही उन्हीं को शामिल किया जाता है उनको नहीं जिनकी शादी हुई नहीं मगर करने को व्याकुल हैं या कोई मिला नहीं किसी ने पसंद नहीं किया तो नाकाम आशिक़ अपना ठिकाना ढूंढते फिरते हैं। नियम पालन का ध्यान रखते हैं मगर कभी कभी भूल या गलती हो जाती है जैसा इस बार जो मुखिया बना हुआ है उसने सदस्य बनते समय खुद को अकेला घोषित किया था लेकिन कई साल बाद ये राज़ खुला जब चुनाव लड़ने को आयोग के नियम से घबराकर पत्नी का नाम लिखना पड़ा और शादीशुदा हैं मगर घर और पत्नी को छोड़ दिया था बताना ज़रूरी था। खैर उनको महफ़िल से निकालना मुश्किल था क्योंकि संगठन और उसकी जमापूंजी पर कब्ज़ा उनका पूरी तरह से हो चुका था। आज संगठन की वर्षगांठ है जिस में उन्हीं को मुख्य वक्ता की भूमिका निभानी है। 
 
अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने ये कहकर की कि जैसा हमेशा होता है हमने इस सभा में मन की बात सच सच कहनी होती है। आपका आभार जताना ज़रूरी है कि आपने सदस्य बनते समय बताये गए मेरे झूठ को सही ढंग से स्वीकार किया है और भरोसा किया है कि मुझे अपनी शादी की बात याद ही नहीं रही थी अर्थात ऐसी शादी को शादी नहीं माना जा सकता है। मैंने उस गले पड़े ढोल को कब का उतार कर फैंक दिया था जाने क्यों भूतकाल की वो घटना फिर डरवना ख़्वाब बनकर आ गई। जैसा आपको मालूम है मैंने जीवन भर इसी विषय की पढ़ाई की है मेरा स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय सभी खुद मैं रहा हूं। विवाह या शादी वही लोग करते हैं जिनको किसी से प्यार होता है या जो किसी से प्यार करना चाहते हैं प्यार पाने की चाहत रखते हैं। हम लोग या फिर खुद मैं खुद को छोड़कर किसी और से प्यार कभी नहीं कर सकते हैं। मैंने हमेशा सिर्फ अपने आप से मुहब्बत की है अपनी सूरत से बढ़कर दुनिया की कोई सूरत मुझे नहीं नज़र आती है। 
 
मूर्ख हैं जो लोग समझते हैं कि जिसने शादी नहीं की कोई घर परिवार नहीं उसको धन दौलत या सत्ता की चाहत नहीं होगी। मुझे बहुत कुछ ही नहीं सभी कुछ मेरा हो यही चाहत रहती है। मैंने उन सभी को खराब घोषित करने का काम किया है जिनकी शोहरत और महानता से मुझे जलन रहती रही है। मुझे पता है विवाहित होने पर खुद अपनी इच्छाओं को छोड़ पत्नी बच्चे माता पिता बहन भाई साले सालियां और नाते रिश्तेदारों को खुश रखना होता है। छड़े कभी किसी की खातिर नहीं सोचते हैं और हमको रत्ती भर भी परवाह इस बात की नहीं होती है कि लोग हमारे बारे क्या कहते हैं सोचते हैं। कोई मरे कोई जीवे सुथरा घोल बताशा पीवे ये आदर्श है अपना। आपको अपने छड़े होने पर गर्व होना चाहिए हम लोग कुछ भी नहीं करते हैं तब भी महान समझे जाते हैं। 
 
हम में से कुछ भगवा धारण कर सन्यासी साधु संत बनकर दुनिया को छोड़ने का काम नहीं करते बल्कि दुनिया भर की दौलत अपने लिए जमा करते हैं हर आधुनिक सुख सुविधा का मज़ा जी भरकर उठाते हैं। योगी कहलाते हैं गुरूजी महात्मा जी समझे जाते हैं अपनी धुन में झूमते गाते हैं त्याग की बात है हर पकवान खाते हैं लोग पांव दबाते हैं सब चरणों में चढ़ाते हैं। भूखे नंगे लोग किसलिए डेरे पर आते हैं हमको तो पैसे वाले और सत्ताधारी दिल को भाते हैं। जिनकी चुनवी नैया हम पार लगाते हैं हम पर कोई मुश्किल पड़े तब वही काम आते हैं। हम पापियों को गले लगाते हैं पाप से नफरत करो पापी से नहीं पाप को आदर देते दिलवाते हैं। मुख्य अथिति आखिर तक बैठते हैं उस  रिवायत को  हम नहीं निभाते हैं सबसे पहले खुद अपनी बात कहकर बीच सभा की करवाई छोड़ जल्दी जाने को कहते हैं सवालों से बचकर निकल जाते हैं। ये झूठी बात है कि हम सच से बहुत घबराते हैं हमारे जैसे लोग झूठ को सबसे बड़ा सच बनाते हैं। मंच संचालक ने कहा क्योंकि अब इस महफ़िल में सभी गूंगे और बहरे लोग बचे हैं इसलिए सभा का अंत ख़ामोशी से करते हैं। तालियां।  

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
गुरु नानक देव जयन्ती
और कार्तिक पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।