Wednesday, 25 November 2020

इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

    इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर ) 

                                      डॉ लोक सेतिया 

हाहाकार मचा हुआ है ऐसे में भी कुछ लोग कोरोना की परवाह नहीं करते समझाने वाले बहुत हैं मगर उनको अपने मन की करनी पसंद है नारद मुनि जी भी मनमानी करते हैं ईश्वर ने अनुमति नहीं दी जाने से रोका भी नहीं समझाया अवश्व। कहा अभी कोई आवश्यकता नहीं है धरती पर जाना अब सुरक्षित नहीं है हर कोई मास्क उपयोग करता है नकाब की तरह जब जहां जैसे ढकना या दिखना होता है चेहरे की असलियत को कभी लगाते कभी भूल जाते सुविधा अनुसार। नारद मुनि को टिक कर रहना मंज़ूर नहीं रहा है। नारद जी आधुनिक युग की चीज़ों को पहले से जानते थे मगर बदले समय में देखने पर पता चला स्मार्ट फोन का महत्व इतना अधिक बढ़ गया है कि केवल उसी से संसार की हर गतिविधि चलती है और इक स्मार्ट फोन हर किसी को घर बैठे जो भी चाहे करने की सुविधा दे सकता है। दफ्तर स्कूल बाज़ार दोस्तों रिश्तेदारों से ख़ुशी और ग़म बांटना हर काम उसी से चलता है किताब अख़बार टीवी सरकार सभी आपकी जेब में हैं बस इंटरनेट होना चाहिए। चार घड़ी बाद नारदजी वापस ठिकाने पर चले आये स्मार्ट फोन हाथ में मीणा की जगह उसकी आवाज़ गूंजती हुई। 
 
सभी देवी देवता उनकी वाणी सुनने को पास चले आये ईश्वर खुद अपने सिंहासन से खड़े हुए नमस्कार अभिवादन आदान प्रदान हुआ और अचरज से देखने लगे। संकेत साफ था नारदजी को अपनी कथा सुनानी थी हर कोई सुनने को व्याकुल था। नारदजी कहने लगे ये अध्याय ईश्वर विधि के रचे विधान में नहीं मिलेगा ये भगवान की बनाई दुनिया से अलग इक और ही संसार है जिसका कोई आर पार कोई सीमा कोई ऊंचाई कोई गहराई का अता पता चलता नहीं है जितना आगे जाओ और अधिक विस्तार होता जाता है उसको सोशल मीडिया की दुनिया कहा जाता है। ईश्वर अल्लाह जीसस वाहेगुरु सभी सोशल मीडिया में समाये हुए हैं कुल डेटा का बेहद छोटा सा हिस्सा सागर में कतरे की तरह। धरती पर जिस दुनिया को मैंने देखा वहां ठहरना मेरे लिए असंभव लगा और मैं बड़ा बेचैन होकर आपके पास चला आया। चार घड़ी में जितना देखा चार युग बीतने पर शायद कभी नहीं दिखाई दिया होगा मुझे इस से पहले। 
 
कोई घर था जिसका मालिक कौन है नज़र नहीं आता मगर उसके आदेश उसके बदलते नियम और पल पल बदलती बिगड़ती उसकी मर्ज़ी की सोच घर में टिकने को हर सदस्य को सूली पर लटकती तलवार के नीचे खुद अपना सर रखने को विवश करती है। परमात्मा की सत्ता को चुनौती दे सकते हैं बिगबॉस को कोई चुनौती नहीं दे सकता है। खेल कितने हैं खिलाड़ी कितने हैं लोग खतरों के खिलाड़ी से अधिक करोड़पति कौन बनेगा खेल खिलवाने वाले को चाहते हैं ऐसा टीवी देखने पर मालूम होता है। ज़िंदगी 15 सवाल का जवाब एक करोड़ 16 वें जैकपॉट सवाल का सात करोड़ को देने से सफल होती है जिस में इक दो नहीं चार चार सहायता के विकल्प भी मिलते हैं। भगवान तेरा ही सहारा है अब इस से बात बनती नहीं है। कोरोना नाम का दैत्य विश्व भर को भयभीत किये है मगर राजनेताओं देशों की सरकारों टीवी चैनल वालों और झूठ का बाज़ार जो लोग हैं जिनको मानव जीवन संवेदना से अधिक महत्वपूर्ण अपने अपने स्वार्थ लगते हैं ऐसे सभी लोग रत्ती भर भी चिंता नहीं करते हैं। पुलिस सरकारी व्यवस्था न्यायपालिका समझते हैं कोरोना उनके सामने घुटने टेकेगा ही इक दिन। बस इक बार कोरोना की वैक्सीन सफल होने का इंतज़ार है उस के बाद मौत को जीतने की जंग शुरू होनी पहला मकसद होगा। कोई किसी भी तरह से मरेगा ही नहीं भगवान की बनाई व्यवस्था नाकाम हो जाएगी। लोग ज़िंदा रहेंगे या मरेंगे ये खुद उनकी मर्ज़ी से होगा जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात होगी। 
 
इतनी बात सुनते ही देवी देवताओं को पसीने छूटने लगे जब विधाता की ही कोई अहमियत बचेगी नहीं तब उनके विभाग के होने नहीं होने का कोई अर्थ बचेगा कैसे। ये समझते ही नारदजी ने चुप्पी साध ली और ऊपर ईश्वर को समस्या पर निर्णय देने हाथ खड़े कर निवेदन कर बैठ गए। ईश्वर को अपनी सत्ता और पद से अधिक अपने द्वारा नियुक्त देवी देवताओं की चिंता को समझते हुए अपनी ख़ामोशी भंग कर सच सच बताना ज़रूरी लगा। बोले कितनी सदियां आपने व्यर्थ अपने गुणगान अपने अपने भक्तजन अपने अपने धार्मिक स्थल निर्मित होने देने पर बर्बाद की हैं जो कार्य आपको सौंपा गया उसको भूलकर धरती की सरकारों अधिकारियों विभागों की तरह ताकत शोहरत और अधिकार सुख सुविधा चढ़ावे की चाह में लगे रहे। उनकी तरह आपकी उपयोगिकता मेरी भगवान होने की ज़रूरत को औपचारिकता बनवा दिया। दिखाने को सभी नतीजा किसी के होने नहीं होने से कुछ फर्क ही नहीं। आपको जो लगता है ये सोशल मीडिया वाली दुनिया बड़ी और लाजवाब है बहुत जल्दी ही उसका भी अंजाम हम और आप से भी खराब होने वाला है। 
 
ये एक काल से दूसरे काल में होने वाले बदलाव का समय है। जैसे लोग मनघड़ंत कथाओं कहानियों को तर्क की कसौटी पर परखने लगे हैं और हम सभी की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं उसी तरह स्मार्ट फोन के बुने जाल और सोशल मीडिया के रचे चक्रव्यूह को लांघकर निकल जाएंगे लोग। विवेकशील शिक्षित समाज खुद इंसान और इंसानियत की खातिर इक वास्तविक समाजिक सभ्यता और मानवधर्म को आधार बनाने वाली व्यवस्था स्थापित करने में कामयाब हो जाएगा। आखिर आदर्श समाज समानता और न्यायपूर्ण मानवीय संवेदना को समझने वाला बन जाएगा , तब आपकी मेरी तथाकथित बड़े बड़े सत्ताधारी नेताओं , धनवान लोगों , उपदेशक समझदारी के ठेकेदार लोगों की कोई जगह बचेगी ही नहीं। आदमी अपनी खुद इक अच्छी दुनिया बना लेगा यही आदमी की पहचान है और ताकत भी।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक सन्देश देता हुआ सुन्दर आलेख।