Monday, 23 November 2020

उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 सुबह भाषण दे रहे थे सरकार जनाब उनकी सरकार ने कमाल कर दिया है। ख़ास लोगों के रहने को ऊंचे ऊंचे महल बनवा दिए हैं। और कई नाम वाले भवन बनवा दिए हैं जाने किस किस को मरने के बाद कितना कुछ दिया है जो उनको जीते हुए शायद नहीं मिला शायद सोचा नहीं चाहा नहीं। बाद मरने के कितना कुछ उनके नाम है। ये खबर उस वास्तविक हालात को ढकने में सफल होती नहीं कि आज भी जीने की सुविधा का अभाव है लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से परेशान हैं सही समय पर ईलाज मिलता नहीं देश अंतरिक्ष में पहुंच गया धरती पर जीने की चाहत किसलिए। बड़े बड़े लोग आसमान में उड़ते हैं छोटी छोटी बातें गरीबी भूख शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य सेवाओं की समाज में होता भेदभाव अन्याय असमानता और बढ़ती खाई अमीर गरीब की बीच की ये व्यर्थ की चिंता करने को फुर्सत नहीं है। आंकड़े भर हैं देश के सामन्य नागरिक सरकारी कागज़ पर लिखने को ज़रूरत हो तभी उपयोग किया जाता है। कोई रात को टीवी शो पर करोड़पति खेलने वालों को नया इतिहास बनाने का कीर्तिमान बना रहे हैं ऐसा घोषित कर रहा था और हर खिलाड़ी को वही जाने क्या क्या नज़र आ रहा था। मुझे कोई समझा रहा था जो झूठ को सच बतला रहा था उसका झूठ सारा का सारा बिक गया था झूठ का धंधा चलता जा रहा था। कोई हंसी हंसी में आपको रुला रहा था किसी महानगरी में ज़हर हर किसी को भा रहा था नशा बढ़ रहा था नशा सा छा रहा था। सुनसान अंधेरी रातों में कोई बंद कमरे में गीत गाकर पुरानी यादों को दोहरा रहा था खुद अपने अश्कों से लगी आग दिल की बुझा रहा था। 
 
कोरा कागज़ रद्दी बन गया है कीबोर्ड पर उंगली चला रहा हूं खुद लिख रहा खुद पढ़ता रहता हूं कौन पढ़ता है किसको पढ़वा रहा हूं। सच की कीमत कुछ भी नहीं है सच अनमोल है सोचकर खुद को बहला रहा हूं। झूठ वाले बाज़ार में खड़ा कबीर कबीर चिल्ला रहा हूं। ख़याली पुलाव बनाकर भरपेट मज़े से खा रहा हूं फ़ाक़ामस्ती फ़कीरी मौज जैसे शब्द रखे हैं समझ नहीं आता ये उलझन क्या है जिसे सुलझा रहा हूं। खुद अपनी अर्थी उठाये चलता जा रहा हर कोई यहां पर नहीं जानते लोग मंज़िल किधर है कौन हमराह रहबर कौन रहजन किसे कहें सोचना है ठहरकर। गुबार छाया हुआ आस्मां में धुंवां ही धुंवां है सूरज किसी और पर मेहरबां है उजाले हैं रातों को और हैं दिन काले नसीब अपना अपना कहीं रेशमी कालीन कहीं पांव पर छाले ही छाले। सदा सुन रहा है ओ ऊपरवाले रहम कभी बदनसीबों पे भी खा ले नहीं ज़िंदगी देता मत दे उठाले पास अपने बुलाले। 
 
बहुत यादें सताने लगी हैं बता दो कैसे उनको भुलाएं सभी अजबनी लोग नहीं अपना कोई आएगा कौन इधर किसको बुलाएं। फिर अपनी ग़ज़ल पहली इक बार दोहराएं , हम अपनी दास्तां किसको सुनाएं , कि अपना मेहरबां किसको बनाएं। ग़ज़ल अगली को लिखकर मिटाएं , नया दोस्त फिर से कोई अब बनाएं , नया ज़ख़्म सीने पर इक और खाएं। ये अगली ग़ज़ल कौन समझेगा , नहीं किसी ने कभी किसी काबिल समझा पागल सबने समझा साईल नहीं समझा। ये ग़ज़ल जाने कैसे कही थी रिमझिम रिमझिम क्या हुई कभी थी नहीं याद आई कभी वो घड़ी थी , भीगा सा मौसम हो और हम हों , भूला हुआ हर ग़म हो और हम हों। हैरानी की बात है कोई नहीं था कोई तसव्वुर में भी नहीं मिला था प्यार इश्क़ मुहब्बत अपनी ज़िंदगी की किताब में ये सबक आया ही नहीं कभी। खुद ही अपने साथ हमने मुहब्बत काश की होती किसी दिन अकेले अकेले सफर तय किया है। ये क्या कह दिया ये क्योंकर लिखा है ये मेरी ज़िंदगी की किताब क्या बस खाली सफ़ा है हर पन्ने पर लगा कोई हाशिया है नहीं लफ़्ज़ कोई किसी ने लिखा है। ये लगता है मैला सा जो इक धब्बा हर जगह है ढलका कोई आंसू इक इक पन्ने पर गिरा है। सोचते रह गए भूल गई लिखनी थी जो कहानी कहां खो गया राजा खो गई उसकी रानी। मुझे काश मिलती बचपन में सबको मिलती जैसे इक दादी इक नानी। मेरी प्यास बुझाता नहीं दरिया का पानी कोई कतरा करता नहीं मेहरबानी। जीवनी उपन्यास नहीं बन पाई लघुकथा तो बन सकती थी , ये भी नहीं हुआ।

2 comments:

Sanjaytanha said...

👍👌स्वास्थ्य सेवाएं वास्तव में बदहाल हैं....लेख की शुरुआत बढ़िया हुई पर बाद का हिस्सा कम असरदार लगा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-11-2020) को   "कैसा जीवन जंजाल प्रिये"   (चर्चा अंक- 3896)    पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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