Thursday, 12 November 2020

कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया

     कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया 

  उस दुकानदार ने समझा ये साधारण सा दिखता आदमी कहां जानता होगा आधुनिक शब्दों के अर्थ और अपने ज़रूरत की चीज़ को इस्तेमाल करने का तरीका समझ जानकारी। कहने लगा अंकल जी आपको लिख कर दे रहा जब कोई पूछे बस ये दोहरा देना। मैंने विचार ही नहीं किया कि वो जैसा सोच रहा है मैं उतना नासमझ नहीं और इंटरनेट और आधुनिक ज़रूरत की चीज़ों की जितनी जानकारी चाहिए रखता हूं। अच्छा लगा अपने कारोबार को चलाने को ही सही वो युवक शिष्टाचार निभाना और सहायता करना चाहता है। शायद कुछ लोग ऐसे में चुप नहीं रहते बोलते हैं मुझे नासमझ मत समझना आता है ये सब करना और भी बहुत कुछ जो तुम नहीं जानते मगर मैं आसानी से करता हूं। कोई चीज़ समझ नहीं आती तो पूछने में संकोच नहीं करता न इस को लेकर रत्ती भर शर्मिंदगी महसूस होती है कि बहुत कुछ मुझे पता नहीं है। शायद कितना कुछ मुझे पता है उस युवक को क्या खबर जब उसको मेरी पहचान बस उतनी पता है जितनी मेरे आधार कार्ड पर दर्ज है। बहुत बार ऐसा होता है मगर लगता नहीं किसी को कुछ कहना ज़रूरी है न मुझे खराब लगती है किसी की बात बल्कि विचार करता हूं उसको क्या मालूम मेरा परिचय और काम क्या है। 

 जो मुझे जानते हैं सोचते हैं मुझको मुझसे ज़्यादा समझते हैं वास्तव में कभी नहीं समझते कि ये जो कहने को बहुत साफ कहता लिखता है उसके भीतर कितना कुछ कितनी गहराई में छिपा हुआ है जिसे किसी और को बताना दिखलाना तो क्या खुद भी भूल जाना चाहता है भूले से भी मन में लाता नहीं दिल की बात। न जाने कब से उसने दुनिया को अपनी बात समझाना छोड़ दिया है मान लिया है दुनिया को कहां फुर्सत किसी को समझने की लोग हर किसी को परखते हैं जांचते हैं अपनी ज़रूरत के तराज़ू के पलड़े में अपनी खुदगर्ज़ी के बाट से तोलना चाहते हैं। कोई उनको कैसे समझाए कि उसने अपनी खुदी को कभी किसी को बेचना मंज़ूर ही नहीं किया है। खाली जेब होकर भी इस अनमोल दौलत को खोया नहीं है किसी भी हालात में। 

 कोई नहीं जान पाया कि वो कभी औरों के हाथ की कठपुतली बनकर नहीं रह सकता है। सबके बीच सभी के साथ होकर भी खुद अपना संग कायम रखता है अकेला होकर भी खुद अपने साथ होता है। कभी किसी को छोड़ता नहीं मगर किसी से साथ मांगना भी उसकी आदत नहीं है। ऐसे लोग कितना दुःख दर्द कितने ऐसे अनुभव खुद अपने आप से भी छिपाए रखते हैं समझते हैं ये दुनिया वाले चालाक बनते हैं मगर वास्तव में हैं बड़े ही भोले और नादान जो इतना करीब होकर भी उनको देख जान समझ पाते नहीं। कारण यही है कि जब कोई मानता है जो उसको पता है केवल वही वास्तविकता है वो कुछ भी किसी से समझना ज़रूरी नहीं समझता है और हम लोग चाहते हैं कुछ और गहराई से समझना सभी को खुद अपने आप को भी। मैं कोई गहरा समंदर जैसा अपनी गहराई किसी को बता नहीं सकता खामोश नज़र आता अनगिनत तूफ़ान अपने में लिए रहता हूं लोग लहरों की तरह अठखेलियां करते हैं मेरे साथ और मुझे आनंद का अनुभव होता है। जिनको तैरना नहीं आता उनको मेरे किनारे खड़े होकर नज़ारा देखना होता है लेकिन उनको मेरी पहचान उतनी ही होती है जितनी आस्मां के चांद सितारों बादलों और उन परिंदों की होती है जो बिलकुल मुझ जैसे उड़ान भरते भरते किसी पल आंख से ओझल हो जाते हैं।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
रूप-चतुर्दशी और धन्वन्तरि जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Sanjaytanha said...

साफ स्पष्ट लहजा👌👍