Friday, 30 October 2020

इम्युनिटी बढ़ाने का तरीका ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    इम्युनिटी बढ़ाने का तरीका ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

           ये शोध मैंने किया है घर बैठे ही किसी लैब या अस्पताल में नहीं जाना पड़ा ज़रूरत ही नहीं है। मेरी दरियादिली देखिये मैंने अपने शोध को सार्वजनिक करने का काम खुलेआम किया है कोई मुनाफ़ा नहीं कमाना चाहता न ही ज़रा भी घबरा रहा हूं कि कोई खफ़ा हो सकता है। आजकल कितने विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं इम्युनिटी बढ़ाने को कुछ भी बेचने का धंधा होने लगा है। किस किस उत्पाद की बात करें हम्माम में सभी नंगे हैं। मैंने चिंतन किया ध्यान लगाया अपने अध्यन और तजुर्बे को समझा तब जाना कि मेरे ज़िंदा रहने का सबसे बड़ा कारण मेरा विवाहित होना है क्योंकि अधिकांश कुंवारे पुरुष इतनी लंबी आयु तक जीवित रहते देखे नहीं हैं। महिलाएं समझती हैं ये उनकी देखभाल का नतीजा है और हमने बिना किसी सबूत महिलाओं की करवा चौथ से लेकर हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होने तक हर बात को स्वीकार कर कर लिया है। कल किसी महिला ने लिखा था महिलाएं अच्छा पति पाने को उपवास रखती हैं फिर भी उनको मनपसंद जीवनसाथी मिलता नहीं है। हर महिला अपने पति को जीवन भर सुधारती रहती है मगर पूर्णतया ऐसा होता नहीं जबकि पति अधिकांश कहते हैं अपनी पत्नी को तुझसे अच्छी मुझे कोई नहीं मिल सकती थी। ऐसा नहीं कहने वाले पति सुखी जीवन का रहस्य समझने में असफल रहते हैं। जो मिल गया उसी को मुकदर समझ लिया पुरुष की सोच यही होती है खुद अपने बिछाये जाल में फंसे चाहे माता पिता की मर्ज़ी के आगे सर झुकाया क्या फर्क पड़ता है। चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम हर विवाहित अविवाहित को ये सलाह देकर सोचता है अपने जैसा हाल उसका भी होना चाहिए। दोस्त दुश्मनी निभाने को शायद यही करते हैं एहसान जतलाते हैं तेरी शादी मैंने करवाई थी। बेचारा पत्नी के सामने बोल भी नहीं सकता मत करता ये एहसान अच्छा होता। 
 
        शादी करके पछताते हैं तो अब मत पछताना क्योंकि शादी से आपको वो मिला है जो आजकल हर कोई चाहता है इम्युनिटी हासिल करना बढ़ाना ताकि ज़िंदा रहने को बीमारी से लड़ने की ताकत मिल सके। किसी भी रोगाणु से लड़ने की क्षमता उस से लड़कर उसे हराकर मिलती है। पत्नी आपको हर रोज़ कितनी बार लड़ने का अवसर उपलब्ध करवाती है। जानते हैं पत्नी से जीतना मुमकिन नहीं फिर भी हार नहीं मानते हैं कहने को गलती मान भी लेते हैं मगर दिल से कभी नहीं स्वीकार करते। ये भला कैसे कोई कर सकता है कि हर बार गलती पति की और पत्नी हमेशा ही सही हो। ये जंग जारी रहती है और आपको लड़नी पड़ती है लड़ाई चाहो या नहीं भी चाहो लड़ना मज़बूरी है। हम सभी वास्तव में खतरों के खिलाड़ी हैं हम खतरों को खुद अपने पास बुलाते हैं घबराते नहीं हैं खतरों से इक व्यंग्य कवि पत्नी को आफ़त मुसीबत से भी बढ़कर आतंकी बताते थे। खुद ही अपने घर पर बंब फैंकने को कहते थे। 
 
           मुहब्बत में और जंग में सब जायज़ होता है शादी मुहब्बत भी है और जंग भी ये कमाल का बंधन है अब तो कोई पुरुष और महिला कहीं भी पार्क बाज़ार या सिनेमा हाल से होटल तक लड़ते बहस करते नज़र आएं तो उनके पति पत्नी होने का पक्का सबूत समझा जाता है। वैसे तो दुनिया में महाभारत से लेकर कितनी ही लड़ाईयां किसी महिला के लिए या किसी महिला के कारण हुई हैं। लेकिन पति पत्नी की लड़ाई उन सभी से बड़ी और निरंतर जारी रहने वाली जंग है जिस को लेकर संख्या गिनती सुपर कंप्यूटर भी करने में नाकाम हैं। शादी आपकी सहनशक्ति का इम्तिहान भी है और आपके अदम्य साहस का सबूत भी है। आधुनिक सभ्यता वाले देशों में छोटी छोटी बात पर पति पत्नी अलग हो जाते हैं जबकि भारत में लड़ झगड़ कर भी साथ जीना संग संग मरना की कसम खाई जाती है निभाई जाती है। सात जन्म यही भूल दोहराई जाती है। आपस में लड़ने झगड़ने की ताकत हर दिन आज़माई जाती है कुछ इसी तरह से क्षमता बढ़ाई जाती है। हार जीत खेल की भावना से स्वीकार करते हैं हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं हर बार करते हैं। 
 
        अपनी इम्युनिटी बढ़ाने का ये सबसे बढ़िया तरीका है इस काम के लिए कुछ भी और नहीं चाहिए। बस इक पति बस एक पत्नी होना बहुत है। मुझे डर है कोई इसका गलत मतलब नहीं निकाल ले और सोचने लगे कि दो चार शादी करने से और अधिक फ़ायदा हो सकता है ये बेहद नुकसानदायक साबित हो सकता है क्योंकि एक साथ कितनी बिमारियों से कोई लड़ सकता है। सावधान जिनको पहले कई रोग मधुमेह या हृदय जिगर गुर्दे के होते हैं उनको खतरा बढ़ जाता है। इम्युनिटी बढ़ाने को एक ही काफी है झूठ कहना नाइंसाफी है। विवाह करवाने वाले मेरे शोध का इस्तेमाल नहीं कर सकते ये केवल निजी उपयोग के लिए है इसका वाणिजयक उपयोग करने की अनुमति कदापि नहीं है। चेतावनी आपके विवाह करने या नहीं करने तथा पति पत्नी के लड़ने झगड़ने का निर्णय आपका खुद का होगा और हम इसकी कोई ज़िम्मेदारी अपने पर नहीं लेते हैं। एलोपैथिक दवाओं की तरह इस से भी नुकसान फ़ायदे का गणित आपका होगा। ये काल्पनिक कथा की तरह है जिस का किसी से कोई संबंध नहीं है और अगर आपको लगता है कि ये आपसे संबंधित है तो ये केवल एक इत्तेफ़ाक़ की बात है।

Wednesday, 28 October 2020

मेरे दोस्त दोस्ती और मेरा लेखन ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे दोस्त दोस्ती और मेरा लेखन ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

 ज़िंदगी में इक अच्छा सच्चा दोस्त दुनिया के सबसे बड़े खज़ाने धन दौलत से बढ़कर होता है। मैंने अपने लेखन के बारे पच्चीस तीस साल पहले इक चंडीगढ़ के अख़बार को साक्षात्कार देते समय कहा था कि मेरा लिखना दोस्त की तलाश है। दोस्ती को लेकर बचपन से मेरी सोच यही रही है कुछ लोग समझ नहीं पाते कि भला कोई किसी दोस्त के नहीं रहने पर भी 18 साल बाद हर दिन उसकी बात कैसे कर सकता है। मैंने डॉ बीडी शर्मा को कभी भी भुलाया नहीं है भूलना संभव ही नहीं उसने जो लोग आपकी आत्मा में बस कर आपका हिस्सा बन जाते हैं। कभी साथ लिखने वाले लेखक कहते थे आपको लिखने को दोस्ती विषय क्यों मिलता है। दोस्त दोस्ती शायद कम लोग इसका मतलब समझते हैं। साथ साथ मौज मस्ती करने वाले शाम को मिल बैठ महफ़िल जमाने पीने जाम से जाम टकराने वाले आपके साथ कारोबार धंधा करने वाले कभी मिलकर घूमने जाने वाले वास्तव में दोस्त हों ज़रूरी नहीं। ऐसे रिश्ते दुनियादारी के मतलब और ज़रूरत को बनते बदलते हैं आज साथ हैं कल कोई वास्ता नहीं होता उसको दोस्ती कहना सही नहीं है। कभी ऐसा एहसास हुआ कोई दोस्त आपको याद आया और बिना किसी मतलब आप चले गए उसके पास मिलने या कोई चला आया आपके पास जब आपने सोचा ही था। इक घटना याद आई है कॉलेज में पढ़ते थे मैं किराये पर कमरा लेकर रहता था अकेला ही , जाने क्यों चाय बनाने लगा तो दो कप चाय बनाकर दो कपों में डालकर बैठा था मुझे नहीं पता था दोस्त खिड़की से देख रहा था दो कप चाय डालते और समझा कोई होगा कमरे में साथ जो खिड़की से दिखाई नहीं दे रहा। फिर खुले दरवाज़े से भीतर आकर झांकने लगा कोई भी तो नहीं था , कहने लगा ये चाय दूसरा प्याला किस के लिए बनाया है। मैंने कहा जाने क्यों लग रहा था तुम आने वाले हो यही सोचकर एक नहीं दो कप चाय बना ली है। ये पागलपन दोस्ती होती है मेरी दोस्ती की चाहत हमेशा अधूरी रही है क्योंकि किस्मत में जिन दोस्तों से दिल मिलता उनका साथ अधिक दिन रहता नहीं था। दोस्ती बनी रहती मगर ज़िंदगी और हालात दूरी बनाये रहते मिलते तो लगता ज़िंदगी यही है बिछड़ के भी प्यार और अपनापन घटता नहीं था। कोई समय था चिट्ठी लिखते फिर फोन पर बात होने लगी जब मिल जाते तो लगता कभी बिछड़े ही नहीं। 
 
   दोस्त वह होते हैं जिनको आपको बताना नहीं पड़ता आप खुश हैं या उदास हैं। बिना बताये आपकी दशा समझते हैं आपकी हर भावना जान लेते हैं आपकी ख़ुशी में आपसे बढ़कर खुश होते हैं और आपको उदास देख कर उनकी पलकें भीग जाती हैं। आपको इक दोस्त ऐसा चाहिए होता है जिस के पास जाकर उसके कांधे पर सर रखकर आप रो भी सकते हैं और खुश हैं तो सबसे पहले अपनी ख़ुशी बतला कर ख़ुशी को हज़ार गुणा बढ़ा भी सकते हैं। मैंने हमेशा इक ख़्वाब सजाया है कि कोई इक घर हो जो दोस्ती का मंदिर हो जहां बस दोस्त और दोस्ती की बात हो कोई दुनियादारी की रस्मो रिवाज़ की मतलब की बात नहीं हो। प्यार की अपनत्व की बात हो बेगानापन आस पास नहीं हो ऐसे घर में कोई सुविधा सुख साधन उपलब्ध नहीं होने का कोई फर्क नहीं महसूस हो जन्नत से बढ़कर लगे जो छोटा सा घर दिल में जगह बड़ी बड़ी होनी चाहिए। बड़े ही खुशकिस्मत लोग होते हैं जिनको ज़िंदगी में ऐसे अच्छे दोस्त मिलते हैं। दोस्ती फिल्म आपने देखी है पुरानी श्वेत श्याम उसके गीत क्या लाजवाब थे। कोई जब राह न पाए मेरे संग आये की पग पग दीप जलाए मेरी दोस्ती मेरा प्यार। 
 

 

Monday, 26 October 2020

ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

     ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जगमग रौशनियां क्या खूबसूरत नज़ारे रंग बिरंगे फव्वारे धरती पर चांद सितारे देखने आते हैं कितनी दूर से लोग कितने सारे। सबको भाते हैं दिलकश लाजवाब चमचमाते महल जैसे धार्मिक स्थल वाह-वाह भगवान को तमाशा  लिया बना रे। ईश्वर के दर्शन की प्यास नहीं सपनों सी दुनिया का देखने का लुत्फ़ उठाते हैं भजन फ़िल्मी धुन पर झूमते नाचते गाते हैं। गुरूजी कैसी कैसी लीला रचाते हैं कभी राधा कभी मीरा कभी कान्हा बन जाते है कभी किसी रूप में सजते संवरते हैं हाथी घोड़ा पालकी रथ पर सवारी निकलती है कभी आकाश में विमान से पुष्प बरसाते हैं। ईश्वर खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस सभी एक हैं लेकिन ये कौन हैं जो इनको अलग अलग समझते हैं समझाते हैं उल्टी गंगा को बहाते हैं खुदा के बंदों को क्या सबक पढ़ाते हैं। क्या भगवान धन दौलत शान ओ शौकत दिखलाते हैं ये सब देखकर मन में कितने सवाल आते हैं धर्म की किताब कभी पढ़ी भी है पढ़कर समझी भी या बस कहने को सर झुकाते हैं। भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस जिन लोगों ने दुनिया बनाने वाले विधाता की कल्पना की होगी चिंतन मनन किया होगा उन्होंने ये कदापि नहीं सोचा होगा कि कभी धर्म आस्तिकता को लेकर मानवता को छोड़कर ऐसे आडंबर की बात हर कोई हर तरफ करता मिलेगा। 
 
   हमने संसद बनाई उसको मंदिर कहा जनकल्याण की देश समाज की भलाई संविधान की भावना को महत्व देने को मगर उसका बदला रंग ढंग सत्ता हासिल करने का साधन और अपराधी बाहुबली लुटेरे सत्ता के लोभी नेताओं घोटालेबाज़ों की अय्याशी का अड्डा बन गया है। जनता की सेवा करने को शानदार दफ्तर और बड़ी बड़ी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इमारतें नहीं उस में नियुक्त अधिकारी कर्मचारी वर्ग की निष्ठा और समर्पण ईमानदारी से कर्तव्य पालन होना ज़रूरी है। जिन महान लोगों को हमने आदर्श घोषित किया उनकी ऊंची मूर्तियां शानदार समाधिस्थल की नहीं उनके दिखलाये मार्ग पर चलकर उच्च नैतिक मापदंड कायम रखने की ज़रूरत है। आपने मंदिर को बड़ा करने का काम किया है भगवान से मंदिर का कद बड़ा लगने लगा है। कोई सच समझने समझाने वाला सामने नहीं आता है जो धर्म क्या है ईश्वर की उपसना इंसान और इंसानियत की बात की अवधारणा को स्पष्ट करता। 
 
  जिस समाज में करोड़ों लोग भूखे नंगे बदहाल जीवन जीने को विवश हैं उस में वास्तविक धर्म दीन दुःखी लोगों की सहायता उनको जीने को बुनियादी सुविधाएं शिक्षा रोज़गार स्वस्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना होना चाहिए। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे  बड़े विशाल और सोने चांदी के गहनों से जड़ित सिंघासन ईश्वर की उपासना को आवश्यक कदापि नहीं हैं। हम इन पर जितना धन खर्च करते हैं उतना मानव कल्याण को सोचकर जिनको वास्तव में ज़रूरत है उनकी सहायता करते तो यकीनन देश में कोई भूखा नंगा बदहाल नहीं रहता। आपने  कभी किसी किताब में आकार को लेकर अवश्य पढ़ा होगा अमुक दैत्याकार था अर्थात बड़ा आकार दैत्य का होता है। कितने मंदिर में भगवान देवी देवता किसी शिला या पत्थर की पिंडी की देवी अथवा कोई पांव के निशान या  आंखें आदि अर्चना करने को होते हैं और कितने विश्वास से उनके दर्शन लोग करते हैं। उपासना ईबादत नाम सिमरण जैसे कार्य करने को बड़े बड़े धार्मिक स्थल या मूर्तियों की ज़रूरत होती नहीं है। वास्तविक ध्यान समाधि शांत मन से एकांत में ही संभव है शोर शराबा भीड़ कभी ईश्वर परमात्मा के चिंतन के लिए उचित नहीं हो सकते हैं।  ईश्वर भगवान खुदा में भरोसा आडंबर पूर्वक दिखाने की नहीं अंतर्मन से महसूस करने की बात है। 
 
  हमने हर चीज़ को वास्तविक मकसद छोड़कर भव्यता और दिखावे को शानो शौकत का अवसर समझ लिया है। बचपन से बड़े होने जीने से जीवन के अंत तक हमने जीवन शैली को वास्तविक ज़रूरत से अधिक निरर्थक आडंबरों से भरकर खुद अपने लिए कितनी दुश्वारियां खड़ी कर ली हैं। हमारी कितनी समस्याएं खुद हमने पैदा की हैं इसी तरह बेकार बेमकसद के रंग ढंग रीति रिवाज़ और पुरानी दकियानूसी चीज़ों अंधविश्वास को बढ़ावा देकर। आधुनिक युग और इक्कीसवीं सदी में हम अभी भी गलत कुरीतियों का बोझ ढोने को बाध्य हैं। प्यार करने को ताजमहल बनवाना ज़रूरी नहीं है ये समझना चाहते हैं तो ग़ज़ल फिल्म में साहिर लुधियानवी जी की नज़्म अवश्य पढ़ना और ईश्वर अल्लाह खुदा वाहेगुरु को जानना है तो नानक कबीर को पढ़ना समझना। ईश्वर को पाना है तो आपको खुद अपने भीतर झांकना होगा बाहर कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं है। मेरी इक ग़ज़ल शायद आपको पसंद आएगी पेश है आखिर में। 
 

 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 

           साहिर लुधियानवी की नज़्म यूट्यूब के सौजन्य से आभार सहित।




 
      
 

                        

Sunday, 25 October 2020

दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    मन की बात कोरोना की चर्चा को छोड़कर पहले मतलब की बात करते हैं। किसी भी विषय पर तीन पक्ष हो सकते हैं इक हमारा मत क्या है दूजा उनका मत जो हमसे सहमत नहीं हैं और एक मत सच का होता है। दुनिया वाले हर तथ्य को अपने अपने अलग अलग नज़रिए से देखते हैं अपनी जगह अपनी सुविधा से उचित अनुचित की व्याख्या समझते हैं समझाते भी हैं। कल जो कहते थे तब वो ठीक था आज जो उसके विपरीत कहते हैं आजकल वही ठीक है इसका उदाहरण सत्ता मिलने से पहले और सत्ता मिल जाने के बाद राजनेताओं की बदली सोच और विचारधारा को देखकर समझ सकते हैं। सत्ता खोने वाले भी वास्तविकता को समझ पाते हैं जब चिड़िया खेत को चुग गई होती है। ट्विटर की चिड़िया की भाषा बदलने का यही कारण है। आज ये भूमिका समझाने की ज़रूरत है क्योंकि चाहे जो भी हो आज का दशहरा पर्व रावण का ही है आज राम की कृष्ण की बात नहीं रावण की बात करते हैं। दशहरे में जब पिछले साल से और ऊंचा रावण बनाकर जलाने का उत्सव मनाते हैं तब राम और लक्ष्मण दोनों रावण की परिकर्मा करते हैं उसको आदर देते हैं ये शायद हमने समझा नहीं दस दिन रामलीला देखी सबक लिया नहीं कोई भी। राम जीते रावण हार गया और समाज जीतने वाले की जय बोलता है लिखने वाले विजयी का गुणगान करते हैं। युद्ध सीता माता को लेकर नहीं हुआ था लड़ाई का कारण लक्ष्मण का रावण की बहन की नाक काटना और रावण का राम की पत्नी का अपहरण करना था दोनों ने इक दूजे को अपमानित करने को इक महिला को औज़ार बनाया जो अभी भी किया जाता है। क्या नारी शक्ति की बात अभी भी खोखले स्लोगन तक है या अब महिला का महत्व और आदर बिना किसी पुरुष के नाम के साथ जुड़े भी होता है। महिला क्या खुद इक शख़्सियत बन गई है जिसे पिता भाई पति बेटे के रूप में किसी पुरुष की कोई आवश्यकता नहीं है। रावण को आज इस विषय पर संबोधित करना पड़ा है क्योंकि भगवान राम सीता की अग्निपरीक्षा लेकर भी उस को अपनाते नहीं हैं और उनका उपासक तुलसी साफ कहते हैं ढोल गंवार पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। अर्थात इनको जकड़ कर बंधन में बेड़ियों में कसकर रखना चाहिए इनको ढील देने से ये जाने क्या कर सकते हैं बिगड़ने का डर रहता है। 
 
   रावण जी मंच पर हैं माईक पकड़े और सभी कैमरे उनकी तरफ सीधा लाइव उदघोष की शुरुआत करने को तैयार। हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं अभिवादन सभी का जो जहां हैं मेरा अभिभाषण सुनने को व्यकुल हैं। शायद मुझे इसकी कल्पना नहीं थी कि सदियों बाद मेरा नाम ख्याति और मुझे आदर्श मानने वाले केवल लंका नहीं भारतवर्ष ही नहीं विश्व भर में इस कदर मुझे अपना समझ हर साल मुझे ज़िंदा रखने की कोशिश करते रहेंगे। जैसा कि आपको विदित है ये दुनिया ये समाज बहते पानी की तरह आगे बढ़ता रहता है रुकना थमना विनाश की निशानी होती है इसलिए मुझे आपको सदियों पहले वाले राम रावण के शासन और समाज वाले समय से आगे बढ़कर आधुनिक काल इस इक्कीसवीं सदी के रंग ढंग और सभ्यता के अनुसार समझने सोचने और जीने की बात कहनी है। आज किसी की बहन नाक कटवा कर घर वापस आती है तब कोई बिना समझे जाने जिसने नाक काटी उसको सज़ा देने नहीं चल पड़ेगा। जानेगा उसने जिन को पसंद किया उनसे प्यार का इज़हार किया वो क्या वास्तव में इतने अच्छे समझदार और गुणवान हैं और क्या उनके किसी के प्यार के अनुरोध को स्वीकार नहीं करने का कारण उनका केवल एक महिला से विवाह करने की परंपरा है। जब ये मालूम होगा कि दशरथ जी की चार रानियां थीं तब राम लक्ष्मण पर भी कोई रोक कदापि नहीं थी और सीता जी अपना पति स्वयंबर में चुन सकती हैं तो सभी महिलाओं को ये अधिकार होना चाहिए। कोई भी अस्वीकार कर सकता है प्यार या विवाह के अनुरोध को मगर इस के लिए अपमानित नहीं किया जा सकता है। 
 
   राजनीति हो या फिर शादी संबंध बनाने की बात जल्दबाज़ी करना सही नहीं होता है। मुझे घटनास्थल पर जाकर देखना समझना सोचकर निर्णय करना उचित लगा। ऐसा संभव था कि राम या लक्ष्मण मुझे अपनी बहन के योग्य लगते तो उनको अपहरण कर लाता अपनी बहन से क्षमा मंगवा कर विवाह करवाता। लेकिन आप खुद सोचकर बताना कि बनवास में कोई पत्नी सोने का हिरण पाने की चाहत करती है तो इसका क्या मतलब है। महिलाओं को अपने पति से असंभव को संभव करने की उम्मीद रखने का अंजाम यही होता है , हर पति को भी अपनी जीवन संगिनी से ये कहने का साहस होना चाहिए कि कोई भी किसी की सभी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है भगवान देवी देवताओं तक कभी अपने जीवन साथी अपने भक्तजन अपने चाहने वाले अपने उपासकों को सब नहीं दे सकते थे। और अगर कभी किसी ने बिना विचारे सोचे समझे बगैर कोई वरदान दे दिया तो क्या क्या नहीं होता रहा। आपको जो करना था वो आपने समझा ही नहीं हमारी कथाओं कहानियों और क्या करने से क्या अंजाम होगा जैसे सबक सीखने की जगह आपने वही गलतियां दोहराने का काम किया है। 
 
     मेरा इक भाई कुंभकर्ण था आजकल आप कितने लोग जागते नहीं कोई लाख जगाने की कोशिश करता रहे। जानकर अपनी आंखें बंद रखते हैं सामने सच होता है आप नहीं स्वीकार करते। मैंने किसी की सही सलाह नहीं मानी थी अपने अहंकार में चूर था आप कब किसी की सुनते हैं हर शासक मनमानी करता है तब वो मेरा ही शागिर्द है राम का नहीं हो सकता है। मैंने कभी राम कहलाना नहीं चाहा लेकिन अब हर शासक किरदार रावण का निभाता है चाहता है उसको राम कहा समझा माना जाये। राम नाम सत्य है ये हर कोई अर्थी को उठाते समय ही कहता है वास्तविक जीवन में झूठ बोलते हैं सत सरी अकाल शब्द को समझते कब हैं। विभीषण को कोई लाख रामभक्त बताता रहे ऐसा भाई घर का भेदी लंका ढाये यही माना जाता है। कभी किसी ने अपनी संतान को विभीषण नाम देना स्वीकार नहीं किया है। 
 
  जब मैंने देखा कि सीता जी के कहने पर राम सोने का हिरण लाने चले गए और लक्ष्मण भी सीता जी के कहने पर उनकी तलाश को चले गए तब मुझे लगा कि इस महिला को भी उसकी भूल की सज़ा मेरी नासमझ बहन की
हठ करने की सज़ा जैसे ही मिलनी नारी जगत के लिए सबक हो सकता है। बाल हठ नारी हठ और राज हठ सभी का अंजाम समझना चाहिए और किसी की ज़िद को मानकर अनुचित असंभव कार्य करना साहस की बात नहीं बल्कि मूर्खता की निशानी है। ये तो कितनी बार कहते हैं सुना है सभी ने कि राम भी रावण भी हम सभी के मन में रहते हैं और हमको अपने भीतर के रावण का अंत करना चाहिए न कि किसी रावण का पुतला जलाकर उसको और ऊंचा बनाते जाना चाहिए। आखिर में आर पी महरिष जी का इक शेर याद आता है। रावण अपनी बात कह कर चले गए हैं शेर मेरे गुरूजी का है। 

                      " ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी

                     आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह "।

 

Saturday, 24 October 2020

देखते रह गए दूर से ज़िंदगी ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया

    देखते रह गए दूर से ज़िंदगी ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे याद है वो पल जब मैंने खुद इक दिन 
उसकी नर्म आगोश में समा जाना चाहा था 
 
मगर न जाने क्यों कोई मसीहा बनकर आया 
मुझे बड़े प्यार से हाथ थामकर समझाया था 
 
अंधेरा रात भर का है होने वाली है भोर नई
मेरे मन के दीपक को बनकर उजाले की किरन 
 
आशा का दीप जलाया था इक सितारा था वो 
घने अंधकार में भी जीने की राह ढूंढ लाया था। 
 
वो जगमगाता सितारा वो उजाले की किरन भी 
खो गई ज़िंदगी के सफर में चलते हुए इक दिन 
 
मैंने लेकिन निभाया जीने का वादा उसकी कसम 
मुश्किलों से टकराता रहा साहस नहीं छोड़ा कभी 
 
कितनी बार मौत ने मुझे पास अपने बुलाया और 
हर बार मैंने उससे दामन अपना बचाया बार बार 
 
उसने अपनी बाहें फैलाईं मुझे गले लगाने को जब 
अभी रहने दो मिलेंगे कुछ करना है खोना पाना है 
 
बहुत थोड़ा है फ़ासला मौत और ज़िंदगी के बीच 
तय होता नहीं वो भी चाहने बुलाने नहीं आने से
 
ये ख़्वाहिश उस हसीन घड़ी से मिलन की जीते हैं 
जाने क्या क्या सपने बुनते हैं नहीं पूरे होते मगर। 
 
शायद हमने समझा ही नहीं मौत की मुहब्बत को 
ज़िंदगी के दुःख दर्द ज़ख़्म परेशानी आशा निराशा 
 
सभी चिंताओं से मुक्त करती है सुकूं देती है वही 
कौन करता है किसी का इंतज़ार जीवन भर ऐसे 
 
इक वही है जो हमको अपनाती है गले लगाती है 
सभी रिश्ते नाते जाते छूट रूह और जिस्म वाले 
 
बस इक वही है वादा अपना निभाती है हर हाल 
ज़िंदगी कब तलक साथ देती है तोड़ देती नाता 
 
मौत आती है वफ़ा निभाने को अपनी चाहत की 
ज़िंदगी बेवफ़ाई है मौत लेकिन बेवफ़ा नहीं होती।
 
 
 
 
 
 

Thursday, 22 October 2020

सपनों के सौदागर लोग ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    सपनों के सौदागर लोग ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको क्या चाहिए स्वर्ग धरती पर लाने चांद तारे तोड़ लाने के वादे आशिक़ से बढ़कर जान हाज़िर है कहने वाले भाषण में सभी कहने के बाद याद नहीं रखने की आदत राजनेताओं की पहचान यही है। देश की खातिर जीने मरने संविधान की शपथ न्याय का संकल्प सब औपचारिकता की तरह निभाते हैं इन का अर्थ उनको नहीं मालूम। सरकारी अधिकारी कर्मचारी कर्तव्य निभाने की कसम खाते हैं फ़र्ज़ को छोड़ सत्ता का उपयोग अधिकार हासिल कर मनमानी करते हैं। देशभक्ति देशसेवा जनता की समस्याओं का निदान उनकी चिंता का विषय नहीं होते हैं ये झंडा फहराने के बाद केवल लिखा लिखवाया भाषण दोहराना होता है हर बार। उनकी ईमानदारी की बात ईमान से कही जाती नहीं है। 

    आपने फ़िल्म नाटक में किरदार निभाते अदाकार को कितना साहसी कितना सच्चा कितना भलेमानुष का अभिनय कितनी लाजवाब शैली में देख कर तालियां बजाईं और वाह वाह की होगी। उनको खुदा नहीं खुदा से ऊंचा दर्जा देते हैं वास्तव में वही अभिनेता समाज में जीवन जीता है साधारण व्यक्ति की तरह धन पैसा दौलत शोहरत हासिल करने को लालायित और जितना भी मिले अधिक पाने की हवस रखता बेहद गरीब धर्म के अनुसार धनपशु होना। कलाकार संगीतकार समाज को दिशा दिखलाने का नहीं भटकाने का कार्य करते हैं। शिक्षक जब ज्ञान देने की जगह शिक्षा का व्यौपार करने लगते हैं तब पढ़ने वाले डॉक्टर बनकर भी स्वास्थ्य को बढ़ावा देने को छोड़ रोग को उपचार से अधिक धन अर्जित करने का साधन समझते हैं। 

धर्म उपदेशक धर्म की बात करते हैं धर्म की राह नहीं चलते , उनका आचरण उनकी बताई समझाई शिक्षा के विपरीत होता है। जिन धार्मिक किताबों उनमें वर्णित महान साधु संतों की वाणी का वर्णन करते हैं उनका पालन खुद करना तो क्या उनको समझते तक नहीं हैं। धर्म के नाम पर संचय और अपने स्वार्थ सिद्ध करने पर ध्यान देते हैं। अख़बार टीवी चैनल जिनका फ़र्ज़ था झूठ को बेनकाब करना सच को सामने लाना वो सबसे अधिक मार्ग से भटके लोग झूठ अधर्म अनीति और स्वार्थ की राजनीति से तमाम अन्य अनुचित आचरण करने वालों का साथ देते हैं झूठ का गुणगान और सच के क़ातिल बनकर अपने टीआरपी विज्ञापन के मोहजाल में अंधे हैं। 

रिश्ते नाते संबंध सभी मतलब और ज़रूरत के हिसाब से बदलते हैं कहने को अपनत्व वास्तव में बुरे समय कोई किसी के साथ खड़ा नहीं होता है। कहने को शादी विवाह या अन्य अवसर पर भीड़ नज़र आती है मगर मन से भावना से किसी का कोई लगाव नहीं होता है। ख़ास अपने लोग आपको ऊंचा बढ़ाने नहीं नीचा दिखाने को मौके की तलाश में रहते हैं। दोस्ती की बात कैसे छोड़ सकते हैं फेसबुक दोस्ती का मंच होता था जो आजकल बदल कर मतलब की बात से खुद अपने फ़ायदे और गुणगान का स्थान बन गया है। लगता है हम दिन में जागते हुए सपने देखते हैं बड़े खूबसूरत सुहाने ख़्वाब जो टूटने को ही होते हैं। 

अब लगता है दुनिया समाज कोई फूलों का चमन नहीं बस इक वीराना है कांटों भरा इक रेगिस्तान जिस में तपती लू और धूप में कहीं कोई पेड़ नहीं छाया देने को। लेकिन सभी ने इसको नकली कागज़ के फूलों से पत्थर से बने शानदार महलों में बनवटी सजावट से दिखाने को खुशनुमा बना दिया है। कौन है जो झूठे छलने वाले सपनों का सौदागर नहीं है। किसी काम की नहीं है आपकी ये दुनिया जिसका वास्तव में कोई वजूद ही नहीं है।

Tuesday, 20 October 2020

कोरोना रावण और उसके संबंधी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना रावण और उसके संबंधी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     सभी उसकी दवा या उपचार अथवा उसको ख़त्म करने को वैक्सीन ढूंढते रहे और मैं चिंतन मनन करता रहा ध्यान लगाता रहा उसको समझने उसका साक्षात्कार करने के लिए। जो मुझे मिला आपको बताना है मानो चाहे नहीं मानो उसका रिश्ता बहुत पुराना है किसी का दादा किसी का परदादा किसी का लकड़दादा किसी का सगा संबंधी किसी का नाना है। आपने अपने आप को कभी समझा है कभी जाना है कभी खुद को पहचाना है। आपको आज कोरोना के परिवार से मिलवाना है। 
 
       क्या आपको जो लोग भाते नहीं अच्छे नहीं लगते नापसंद हैं आप उनको इस दुनिया में जीने नहीं देना चाहते उनसे इस कदर नफरत करते है कि आपका बस चले तो उनको जीने ही नहीं दें। और आप यही करते हैं जो कमज़ोर हैं उनको बर्बाद करते हैं जिनका आप कुछ नहीं बिगाड़  सकते उनसे बचते हैं डरते हैं उनके अंत की मन ही मन कामना करते हैं। फिर तो आप कोरोना ही हैं उस की संतान हैं जो किसी का सगा नहीं है जिसने उसको बनाया उसी को सबसे पहले कोरोना ने सताया तभी उस को समझ आया बनाकर पछताया। ईश्वर ने सभी को अलग तरह से बनाया है किसी को किसी जैसा नहीं बनाया है ये उसकी माया है सभी को जीने का सबक यही सिखलाया है जिओ और औरों को भी जीने दो आपने इसको नहीं आज़माया है। कौन आपका अपना है कौन यहां पराया है ये सुबह और शाम की बात है चढ़ता सूरज है ढलती छाया है। 
 
   कोरोना को कब से इंतज़ार था उसका युग आजकल आया है जिधर देखो ऐसे लोगों ने कोहराम मचाया है जो उनको नहीं भाते जिनसे वो सहमत नहीं उनको क्या क्या नहीं कहा कितना बदनाम किया कितना बुरा बताया है। ये असहमति को स्वीकार नहीं करने वाले खुद कोरोना से बढ़कर हैं उनकी नफरत किसी ज़हर से बढ़कर है। लेकिन ज़हर के असर उन पर भी होता है जो ज़हर बनाते हैं ज़हर बांटते हैं उनके भीतर ज़हर रहता है उनको खोखला करता है। ज़हर नफरत कोरोना बढ़ता जाता है ख़त्म नहीं होता सभी को खत्म करता है अंत में खुद बेअसर हो जाता है। कोरोना का असर कम होने लगा है कोरोना अपने जैसे नफरती लोगों को भी होने लगा है। रावण की तरह उसका अहंकार उसी को डुबोने लगा है। अच्छे अच्छे शासकों को औकात बताई है कोरोना उनका बाप दादा है बड़ा भाई है जमकर लाठी चलाई है सामने कुंवां है पीछे खाई है। खुद इन्हीं लोगों ने ये आफ़त बुलाई है। 
 
   सुनो समझो कोरोना जैसे विचार स्वभाव वालो सभी को ख़त्म करने का ख्वाब मत पालो बचना है जो खुद अपने को बचालो। अरे ओ शीशे के घर में रहने वालो हर किसी पर मत पत्थर उछालो सिकंदर कलंदर सभी चले गए दुनिया से रावण अभी ज़िंदा आप में छिपा हुआ है कोई पुतला मत जलाओ उसको अपने भीतर से निकालो। किसी और को ख़त्म करने से पहले अपने अंदर झांको नफरत वाले कोरोना को मार डालो जिओ और सभी को चैन से जीने दो सबक सीख लो उसे आज़मा लो। उनको ये रोग लगता देखा जो टीवी पर कोरोना से बचने और अपनी इम्युनिटी बढ़ाने की दवा टॉनिक का गुणगान करते थे पता चला वो धर्म वालों की तरह उपदेश देते थे उपदेश देना उनकी कमाई का साधन है उनको ऐसे किसी टॉनिक पर खुद भरोसा नहीं था। हर कोई आजकल आपदा को अवसर बनाने में लगा है खुद बचना ज़रूरी नहीं औरों को बचने की बात समझाने लगा है। 

  इंसान इंसान से घबराने लगा है झूठे सच्चे बहाने बनाने लगा है। दिल से सभी से दूरी बढ़ाने के बाद आजकल फासले बढ़ाने लगा है जिनसे मतलब उनके साथ मिलने मिलाने निभाने लगा है बाकी को मज़बूरी समझाने लगा है। ज़माना बदलने लगा है नये तौर अपनाने लगा है गले नहीं मिलते हाथ नहीं मिलाते बहुत दूर से हाथ हिलाने लगा है समझ लो कोई करीब से बड़ी दूर होना चाहता है छोड़ कर जाने लगा है। कोरोना कितने काम आने लगा है कोई गीत याद आने लगा है। जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए , अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिए।
 
   

Monday, 19 October 2020

बेमतलब की बात कहता हूं ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    बेमतलब की बात कहता हूं ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

मतलबी दुनिया में रहता हूं मैं मगर बेमतलब की बात कहता हूं। कोई माने चाहे न भी माने लोग अब कुछ भी बिना स्वार्थ करते नहीं हैं। मंदिर तक भगवान के घर जाते हैं तब भी मकसद आस्था ईबादत नहीं कुछ और होता है कुछ मांगना है कुछ मिला है उसका आभार जताना है ताकि और मिलता रहे या कोई चिंता परेशानी है खुद जिस का समाधान करना नहीं ईश्वर पर दायित्व छोड़ते हैं तुम्हारा भक्त हूं तुझे ही करना है। भगवान देवी देवा अल्लाह वाहेगुरु जीसस से अपना हाल सभी बताते हैं कभी किसी ने उसका हाल चाल पूछा क्या समझना चाहा क्या जानने की कोशिश की कभी। कोई नहीं जानता खुद ऊपरवाला किस हाल में रहता है है भी कि नहीं बचा हमने उसको ख़त्म कर दिया है। आपको रोज़ वही बात सुनकर उसी इक जगह रहकर मीठा मीठा खाकर लगता है बस कुछ बदलाव होना चाहिए इस से तंग हो गए हैं उसको कितनी बार वही बातें वही भजन आरती वही रटी रटाई बात कब तक सहना होगा। कह भी नहीं सकता कितनी बार हुआ अब बस भी करो कुछ तो बदलना चाहिए , उसकी तकदीर में कोई बदलाव नहीं सभी अपनी तकदीर बदलवाने की चाह रखते हैं। 
 
  अब समझते हैं आपकी इस मतलबी खुदगर्ज़ दुनिया की बात। कोई बिना मतलब किसी के घर नहीं आता जाता सच बताता हूं मुझे ये खराब आदत थी किसी से मिलने को जी चाहा मिलने चला जाता। मिलते ही पहला सवाल यही पूछते कोई काम है आपने फोन किया क्यों कुछ ज़रूरत है यूं ही कह दिया माता जी नज़र नहीं आई तो पूछते हैं उनसे क्या काम है। सच तो ये है लोग मानते ही नहीं बिना मतलब कोई किसी से प्यार लगाव भी रख सकता है। आजकल की दुनिया में ऐसा करना मूर्खता होगा। अब मेरी आदत छूट गई है वर्ना आये दिन किसी न किसी को किसी न किसी बहाने फोन करता रहता था दोस्त से मिलने चला जाता था। खैर अब कोई दोस्त कोई अपना है भी नहीं जिस से बेतक़ल्लुफ़ मिलने बात करने का हौसला हो। अब डरते हैं बिना बात दिल की बात कहने से ताल्लुक ही नहीं बिगड़ जाये। सोचकर बोलना पड़ता है औपचारिकता निभाने की ज़रूरत होती है। 
 
राजनेता समाजसेवी कहलाने वाले या कोई भी कारोबार करने वाले कभी किसी के पास किसी जगह बिना मतलब किसी की समस्या समझने सुलझाने नहीं जाते हैं हर कोई जाकर अपना कोई न कोई हित साधना चाहता है। किसी को नाम शोहरत किसी को अपनी मंज़िल पाने को सीढ़ी बनाकर इस्तेमाल करना किसी को मेलजोल बढ़कर बाद में फायदा उठाना किसी को हमदर्दी का दिखावा कर खुद को महान कहलाना किसी को अपनी किसी संस्था संगठन में पद हासिल करना या अपने एनजीओ के लिए चंदा जुटाकर उस से सुख सुविधा की ज़िंदगी जीने शान बढ़ाने के उपाय करना। क्या क्या कहें किस किस की बात की जाये इस से अच्छा है खुद से मिला जाये खुद दिल से दिल की बात की जाये। रोज़ सुबह से दोपहर दोपहर से शाम शाम से फिर रात की जाये। आज यही सोचा कोई बेमतलब की बात की जाये।

Sunday, 18 October 2020

मुहब्बत की बाज़ी जीती हारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   मुहब्बत की बाज़ी जीती हारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     ये उस पुरानी कहानी का आधुनिक स्वरूप है। दो चाहने वाले किसी विवशता से साथ जी नहीं सकते और साथ साथ मौत का आलिंगन करने का निर्णय करते हैं। दोनों इक गहरी नदी में कूदते हैं लेकिन महिला को कोई डूबने से बचा लेता है और फ़िल्मी ढंग से उनका प्यार और विवाह हो जाता है। आपने राजस्थानी लोक कथा तू पी तू पी पढ़ी नहीं तो पहले उसको पढ़ लेते हैं। 

                               तू पी -तू पी ( लोक कथा )

     ये राजस्थानी लोक कथा है। बचपन की दो सखियां रेगिस्तान से गुज़र रही होती हैं। रास्ते में उनको एक अजीब  दृश्य नज़र आता है। हिरणों का इक जोड़ा वहां मृत पड़ा होता है और पास में थोड़ा सा पानी भी होता है। इक सखी पूछती है दूसरी सखी से भला ऐसा क्योंकर हुआ होगा , ये दोनों प्यासे कैसे मरे हैं जब यहां पानी भी था पीने को। दूसरी सखी बताती है ये दोनों इक दूजे को प्यार  करते थे , प्यास दोनों को बहुत लगी थी लेकिन पानी कम था इतना जो इनमें से एक की प्यास ही बुझा सकता था। दोनों इक दूजे को कहते रहे 
 तू पी - तू पी , मगर पिया नहीं किसी ने भी। दोनों चाहते थे कि जिसको प्यार  करते वो ज़िंदा रहे और खुद मर जायें , साथ साथ मर कर अपने सच्चे प्यार  की मिसाल कायम कर गये। सखी इसको ही प्यार कहते हैं।

                बहुत साल बीत गये और वो दोनों सखियां बूढ़ी हो गई। फिर रेगिस्तान में उनको वही दृश्य दिखाई दिया और फिर एक सखी ने कहा दूसरी से कि देख सखी वही बात आज भी नज़र आ रही है। दूसरी सखी बोली अरी सखी तू किस युग की बात करती है ये वो बात नहीं है। हालत वही थी कि दोनों प्यासे थे मगर पानी थोड़ा था जो किसी एक को बचा सकता था। ये दोनों आपस में लड़ते रहे पानी खुद पीने के लिये। दूसरे को नहीं पीने देने के लिये लड़ते हुए मर गये , किसी ने भी दूसरे को पानी नहीं पीने दिया। ये आज के आशिक़ों  के स्वार्थ की बात है सखी , अब वो प्यार कहां जो दूजे के लिये जान देते थे।
 
    अब आज की मुहब्बत की कहानी कुछ उसी तरह आधुनिक युग के बदले ढंग में। फिर दो चाहने वालों ने साथ मिलकर ख़ुदकुशी करने का निर्णय किया। नदी के पुल पर खड़े होकर महिला ने कहा कि आपको तैरना आता है इसलिए आपको गले में इक घड़ा बांधना ज़रूरी है अन्यथा आप डूबने से बच सकते हैं। पुरुष ने बात मान ली और छलांग लगाकर डूब कर ख़ुदकुशी कर ली। महिला ने बाद में जान देने का वादा किया था मगर अपने आशिक़ के डूबने के बाद उसको ये मुश्किल लगने लगा तभी उसको नदी किनारे कोई खड़ा दिखाई दिया। कसम खाई थी निभाने को नदी में कूदना भी था लेकिन मन जीने की चाहत भी कर रहा था। सोचकर महिला ने उसी के नज़दीक जाकर छलांग लगाई और साथ ही बचाओ बचाओ भी कहने लगी। किनारे खड़ा पुरुष भी उसको देख रहा था और उसने नदी में कूद कर महिला को बचा लिया। 
    
     महिला ने बचाने वाले से कहा मुझे अपने आशिक़ के साथ मरना था अब जब मुझे कोई चाहने वाला ही नहीं तब मेरा ज़िंदा रहना और मुश्किल हो जाएगा। फ़िल्मी अंदाज़ से आपने मुझे मरने नहीं दिया तो मुझे जीने को साथ साथ रहने का भी कर्तव्य निभाना चाहिए। मेरी पहली प्यार की कहानी का अंत हम दोनों की इक नई मुहब्बत की कहानी की शुरुआत होना चाहिए। पुरुष ने कहा आपने बचाओ बचाओ कहा था मुझे तब इस बात का पता नहीं था अब आपको मुझसे प्यार चाहिए तो फिर से छलांग लगानी होगी तब मैं आपको बचाने के बाद आपके साथ जीवन भर संग रहने का वादा करता हूं। पुरुष खूबसूरत था और अमीर भी महिला को लगा ये तो पहले से अच्छा विकल्प मिला है जैसे डूब कर कोई मोती खोज लाता है। 
 
      महिला ने फिर से छलांग लगाई और बचाओ बचाओ की गुहार लगाने लगी। तब उस पुरुष ने बताया कि उसे उसी ने बुलवाया था जिसके साथ आप मरने को आई थी। मैंने उस से वादा किया था आपको बचाने का जो मैंने किया भी। मगर आपसे किया वादा पूरा नहीं कर सकता क्योंकि फिर कभी यही मेरे साथ आप क्यों नहीं कर सकती हैं। आप अपने पहले आशिक़ से धोखा कर सकती हैं तो मुझे विश्वास नहीं करना चाहिए विशेषकर जो खुद मर कर भी आपके ज़िंदा रहने को उपाय कर रहा था उस से बेवफ़ाई करने वाली कभी किसी से वफ़ा नहीं कर सकती है। मुहब्बत का खेल है इस में हारने वाला जीत जाता है जीतने वाला हार जाता है। ये बाज़ी आपने खेली मगर ईमानदारी से नहीं तभी हारना पड़ा है। यहां भी दोनों मरे थे मगर एक को चालबाज़ी से मौत को गले लगाना पड़ा वर्ना वो भी बचने की कोशिश कर भी सकता था और दूसरे को उसकी खुद की चाल उल्टी पड़ने से डूबना पड़ गया।          

Saturday, 17 October 2020

शब्दों को निरर्थक बना दिया ( देवी देवताओं से देशभक्ति तक ) डॉ लोक सेतिया

     शब्दों को निरर्थक बना दिया ( देवी देवताओं से देशभक्ति तक ) 

                                                 डॉ लोक सेतिया 

  क्या वास्तव में इन अच्छे अच्छे संदेशों का कोई अर्थ है। रोज़ राम राम जी कभी कोई देवी देवता कभी भगवान तो कभी देशभक्ति वाले संदेश। कभी महिलाओं कभी बच्चों कभी पेड़ पशुओं नदियों सभी से प्यार की बात कभी माता पिता कभी दोस्त कभी भाई बहन के या पत्नी पति से मुहब्बत करने वालों राधा मीरा की बातें। धर्म को लेकर महान आदर्शवादी संदेश तक आदान प्रदान किये जाते हैं। ये सब अगर हम जीवन में समझते हैं मानते हैं उनपर चलते हैं तो समाज को किसी उपदेश की ज़रूरत ही नहीं होती मगर हमने इतने अच्छे विचारों को किसी स्लोगन की तरह उपयोग किया है जो खुद नहीं समझते सबको संदेश देते हैं जानते हैं उन पर भी कोई असर नहीं होने वाला है। दूसरे शब्दों में हम केवल आडंबर करते हैं जय माता दी कहते हैं मां के मंदिर जाते हैं मगर घर में अपनी मां बहन बेटी या समाज में अन्य महिलाओं के लिए कोई अच्छी पावन भावना नहीं रखते हैं। महिलाओं को वस्तु समझते हैं इंसान नहीं उनको बराबर तो क्या उनका शोषण करने पर गर्व अनुभव करते हैं शर्मिंदा नहीं होते हैं। सबसे हैरानी की बात है हमने कभी इन शब्दों का अर्थ समझने का काम नहीं किया है। सत सरी अकाल कहते हैं जिसका अर्थ है सत्य ही ईश्वर है मगर हर दिन हर घड़ी झूठ बोलते हैं झूठ की जय जयकार करते हैं। 

धार्मिक किताबों से लेकर प्रतीकों और मूर्तियों से लेकर धर्मस्थल या नदी और अलग अलग धर्म की जगह जाने को हमने चिंतन मनन करने नहीं केवल दिल को झूठी तसल्ली देना का माध्यम बना लिया है। इन सब से हमारे जीवन में रत्ती भर भी बदलाव होता नहीं है। क्या हमने सोचा है जो ख़ुदा है भगवान है विधाता है अल्लाह है वाहेगुरु है उसको अपने गुणगान की चाहत हो सकती है वो कुछ चढ़ावा पाकर खुश हो सकता है। अगर ऐसा है तो फिर वो आम इंसान जैसा है ईश्वर नहीं हो सकता क्योंकि जिसने सभी को सब कुछ दिया उसको कोई क्या दे सकता है उसे क्या ज़रूरत है। मगर हम दाता बनकर घोषणा करवाते हैं कितने खोखले हैं हम लोग। वास्तव में इंसान को किसी धार्मिक आयोजन की नहीं इंसानियत की राह चलने और इंसान को इंसान समझने की आपस में बैर नफरत करना छोड़कर प्यार हमदर्दी की ज़रूरत है। वास्तविक सच्चाई और अच्छाई के मार्ग को भुलाकर हमने दिखावे और आडंबर को अपना लिया है। बेशक ऐसा कर के हम खुद को औरों की नज़र में धार्मिक होने का काम कर भी सकते हैं लेकिन क्या ईश्वर भगवान देवी देवता विधाता की नज़र में हम सच्चे उपासक हो जाएंगे , कभी भी नहीं क्योंकि उसको सब मालूम है हम कैसे हैं क्या करते हैं और क्या होने का दम भरते हैं। झूठ किसी भी धर्म के भगवान देवी देवता को मंज़ूर नहीं हो सकता है। हमने भगवान की भक्ति भगवान को लेकर नहीं दुनिया को लेकर दिखावे की करनी शुरू कर दी है। 

   यही कारण है समाज में मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बढ़ते गए हैं आयोजन उपदेशक कितने गुरु बनाते गए हैं लेकिन उनकी किसी बात से सीखा कुछ भी नहीं है। जब धर्म की बात करने वाले खुद लोभी लालची और सोने चांदी के आभूषण पहनने से विशाल भवन और बड़े बड़े आश्रम ज़मीन जायदाद धन जुटाने को लगे हैं तब त्याग की संतोष की बात लोभ लालच छोड़ने की बात किसे समझ आएगी। लगता है हम सभी अपने वास्तविक मार्ग से भटक गए हैं और हैरानी इस बात की है कि हम भटके हुए लोग मार्गदर्शन की बात करते हैं। इक भजन से अंत करते हैं। प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस विध पाऊं तोहे , प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे। सुना होगा ये भजन अब समझना भी अगर समझना चाहते हैं।


Saturday, 10 October 2020

झूठे सपने बेचने से राजा नंगा है कहानी तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    झूठे सपने बेचने से राजा नंगा है कहानी तक ( तरकश ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

           सपनों के सौदागर होते हैं जो आपको झूठे सपने दिखला कर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। आजकल कोई आपको सब बेचने का धंधा करता है आपको करोड़पति बनाने की बात करते खुद महान महानायक का तमगा हासिल कर नाम दौलत शोहरत पाने में सफल है। जालसाज़ी भी करता है मगर सलीके से गैरकानूनी ढंग से किसान होने का दस्तावेज़ हासिल कर उस ज़मीन का मालिक बन जाता है जो किसी गांव की पंचायत की है। राज्य की सरकार साथ देती है पत्नी संसद है जिस दल की सत्ता है सैयां भये कोतवाल फिर डर काहे का। उनकी थाली में सभी पकवान हैं उनको सब खाना है जो किसी पर थाली में छेद करने की बात कहती हैं। थाली गरीब की खाली है जनाब के पास क्या नहीं है घरवाली है सिलसिले वाली है उनकी चाल निराली है लोग कहते मतवाली है। ये कौन लोग हैं जिनको ऐसे लोग भगवान लगते हैं जिनको अपने लिए अधिक से अधिक पाने की हवस है जिनकी भूख पैसे सत्ता से करीबी की बढ़ती जाती है किसी पागलपन की तरह। ये किसी को कुछ देने के काबिल नहीं होते हैं इनका दान धर्म भी मुनाफ़े का धंधा होता है। जिसे देखो वही कहता है ऐसे तथाकथित भगवान के साक्षात दर्शन की चाहत थी। सच क्या है किसे समझना है जिनको खुदा कहते हैं उनका कहना है ईश्वर से उनकी बात होती है ईमेल पर। कभी सभी को ईश्वर की ईमेल बताते तो बड़ा भलाई का काम होता राज़ रखना है तो कोरोना को लेकर ईश्वर से पता करते क्या उसी का किया धरा है ये क्या माजरा है। 
 
     राजा नंगा है कहानी याद है दो ठग किसी राजा के दरबार आये कहा उनके पास ऐसा शानदार कपड़ा है जिस की पोशाक से बढ़कर सुंदर कोई लिबास किसी का नहीं हो सकता है। लेकिन उस की विशेषता है कि जो लोग झूठे हैं उनको वो पोशाक दिखाई नहीं देती है। भरे दरबार में खाली संदूक से कपड़ा निकलने का अभिनय करते हैं जो था ही नहीं और राजा संतरी सभा में उपस्थित सब वाह वाह क्या खूबसूरत है बोलते हैं ताकि खुद को सच बोलने वाले साबित कर सकें। दर्ज़ी उस कपड़े का शाही लिबास सिलने का अभिनय करते हैं और राजा उस पोशाक को पहन नगर में रथ पर निकलते हैं शोभा बढ़ाने को। लोग देखते हैं फूल बरसाते हैं मगर इक मासूम बच्चा बोल देता है अरे राजा तो नंगा है। तमाम लोग देख  भी खामोश थे क्योंकि उनको खुद झूठे साबित होने का भय था। झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो , सरकारी ऐलान हुआ है सच बोलो। घर के अंदर झूठ की इक मंडी है , दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो। राहत इंदौरी जी की ग़ज़ल है। 
 
    सपने देखना और दिखलाना आसान है मुश्किल है सपनों को सच करना। वो अलग बात है निराशा से बाहर निकालने को उम्मीद की बात। लेकिन अपने मतलब की खातिर झूठे सपने दिखला कर मूर्ख बनाना ठगी जालसाज़ी धोखाधड़ी होता है। कहते हैं कोई कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकता है लेकिन सभी को हमेशा के लिए नहीं। हम पढ़ लिखकर भी सच और झूठ को परखते नहीं और वास्तविक नायक और नकली नायक का अंतर नहीं करते हैं तो इस से बढ़कर मूर्खता का कोई सबूत हो नहीं सकता है। जिनको सत्ता की पैसे की चाह है जो इनको पाने को सब करते हैं उनको अगर आपने आदर्श और महान ही नहीं भगवान समझ लिया है तो ये गुलामी की मानसिकता खुद आपको कभी सपनों के आसमान से ज़मीन पर पटकेगी ही। ऐसे जाने कैसे कैसे ख़ुदा बना रखे हैं बिना समझे विचारे कि उनका समाज को योगदान क्या है। धन दौलत सत्ता झूठी शोहरत हासिल करने से समाज को क्या मिला बल्कि समाज से पाया है दिया कुछ भी नहीं। उनके किरदार निभाने को अपने सच समझ लिया रामलीला में राम बनने से कोई भगवान नहीं बन जाता है फिर ये जिनको लोग सदी का महानायक कहते हैं उसने फिल्मों में जो किरदार निभाए हैं जिनसे उनका नाम सफलता से जुड़ा है उन को कोई समाज आदर्श बनाने की बात नहीं सोच सकता है। हिंसा अपराध को बढ़ावा देने से लेकर अपनी बेटी की सहेली से संबंध बनाने जैसे किरदार समाज को क्या सबक सिखलाते हैं। 
 
   जिनको पैसा कमाने को झूठ को सच बताना अर्थात किसी भी चीज़ को बेचने को इश्तिहार विज्ञापन का हिस्सा बनना उचित लगता है बगैर ये विचार किए की उस से पैसा जाने कितने लोगों की मेहनत की कमाई को हथियाने लूटने से अर्जित किया जाता है अनुचित ढंग की आमदनी के भागीदार बनते हैं। उनको अपना आदर्श भगवान कहना ईश्वर के किरदार को नीचे गिराना है। ठीक इसी तरह जनकल्याण की राजनीति करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को भूलकर हमने सत्ता के लोभी नेताओं को आदर्श और महान समझने की बड़ी भूल की है। ऐसे स्वार्थी नेताओं ने देश को जिस कगार पर लेकर खड़ा कर दिया है उस से उबारने को कोई वास्तविक नायक कहीं दिखाई नहीं देता है। किसी अभिनेता की तरह सज धज कर डायलॉग बोलने की तरह से अच्छी अच्छी बातें कहने से नहीं सच बोलने और असली देशभक्ति जनता के लिए कुछ अच्छा करने से होनी चाहिए। जब देश की अर्थव्यवस्था बदहाल हो किसी नेता की विलासिता और शानो शौकत जले पर नमक छिड़कने जैसा काम है। जिसने किसी और को हम्माम में रेनकोट पहनने का कटाक्ष किया था शायद खुद अपनी वास्तविकता शानदार पहनावे लिबास से भी ढकने में सफल नहीं है। ये जो पब्लिक है सब जानती है भले बुरे को पहचानती है।

Thursday, 8 October 2020

विश्व कल्याण नहीं खुदगर्ज़ी में अंधे हम लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        विश्व कल्याण नहीं खुदगर्ज़ी में अंधे हम लोग          

                                    (  आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

    सोच कर दिल घबराता है कि हम कहां से चले थे हमको किधर जाना था और हम किस जगह पहुंच गए हैं। चकाचौंध रौशनी है जिस में सच झूठ का फर्क नहीं दिखाई देता है इक शोर है जिस ने पूरे वातावरण को जैसे भयानक ख़मोशी में बदल दिया है। विवेक को छोड़ डर से लालच से हम किसी की हर बात को सच मानकर दोहराने लगे हैं। सच बोलने से कतराने लगे हैं झूठ को सच बनाने लगे हैं। विश्व देश समाज मानवता के मूल्य जानकर भुलाने लगे हैं अपने स्वार्थ नज़र आने लगे हैं सभी अच्छे आदर्श किसी ठिकाने लगे हैं। बोलने से पहले फायदे नुकसान के तराज़ू पर ज़मीर डगमगाने लगे हैं ऊंचे चढ़ने को पायदान ढूंढते खुद को नीचे गिराने लगे हैं। खुदगर्ज़ी में सामाजिक पारिवारिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने और अपने विचारों में ज़हर भरे ऐसा समाज का निर्माण कर रहे हैं जिस में खुद भी सुरक्षित नहीं और सभी के लिए खतरा हैं। हवा पानी धरती पेड़ पौधे किसी को भी छोड़ा नहीं है जीने को खुद मौत का सामान बनाते रहे हैं। आज़ादी का अर्थ नहीं जानते देशभक्ति के मायने याद नहीं और नैतिकता ईमानदारी इंसानियत की परिभाषा बदलने लगे हैं। मनोरंजन जीवन का मकसद नहीं हो सकता है सार्थक जीवन की बात महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। शिक्षा स्वास्थ्य और सभी के लिए समानता की बात को छोड़ अपने लिए इनका उपयोग खास बनने को करते हुए मार्ग से भटक गए हैं शिक्षक चिकित्सक उपदेशक समाजसेवा की धर्म की बात करने वाले लोग। इस सिरे से उस सिरे तक सभी शामिल हैं अपने समाज को रसातल को ले जाने के अपराध में।  धन दौलत पैसा शोहरत भगवान बन गए हैं और ये हासिल करने वाले हमारे नायक कहलाने लगे हैं कितने खोखले आदर्श हैं आधुनिक समाज के जिस के नायक ऐसे लोग हैं जिनको बहुत मिला है फिर भी उनको और अधिक की लालसा है सब है फिर भी और की चाहत है ये सबसे गरीब होना है। हर कोई जो है ही नहीं वैसा आदर्शवादी महान कहलाने को व्याकुल है। जैसे अपने चेहरे को किसी मुखौटे से छिपाते हैं कहते उपदेश देते हैं जो खुद उन बातों पर खरे उतरने की बात नहीं सोचते हैं।
      
   सच कहूं तो अभी समझ नहीं आ रहा कि आज लिखना क्या है। बस यही चाहता हूं कि कुछ नया लिखा जाये और सार्थक लिखा जाये। विषय तमाम हैं मन में फेसबुक से लेकर समाज तक , देश की राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक। अपनी गली की बात से देश की राजधानी तक। इधर उधर यहां वहां सब कहीं का हाल। बहुत ही आश्चर्य की बात है जिस किसी से भी चर्चा करो सभी जानते हैं कि कहीं भी सब ठीक नहीं है। मगर किसी को सच में इस बात से सरोकार नहीं है कि उसको कब कौन कैसे सही करेगा। क्या हम किसी और देश की बात करते हैं , ये अगर हमारा अपना वतन है तो इसकी बदहाली को देख कर हम भला चैन से कैसे रह सकते हैं। कभी कभी लगता है जैसे हम लोग संवेदनहीनता का शिकार हो गये हैं। किसी को किसी के जीने मरने से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। जिसको देखो अपना ही रोना रो रहा है। ये बेहद चिंता का विषय है कि लोग शोर भले मचाते हों सब देशवासी एक हैं ये देश सभी का है और हम एक हैं मगर ये बात वास्तव में दिखाई देती नहीं है। क्या यही आधुनिक होना है , क्या हम सभ्य नागरिक बन रहे हैं या यहां हर कोई अपने स्वार्थ की बात ही सोचता है। सवाल  बहुत हैं सामने जवाब कोई भी नहीं। एक तरफ करोड़ों लोग दो वक्त रोटी को तरसते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग बेरहमी से हर चीज़ की बर्बादी दिन रात करते हैं। क्या ये देश दो हिस्सों में बटा हुआ है , विशेष लोगों को सभी कुछ और बाकी आम लोगों को कुछ भी नहीं। कितने राजनैतिक दल कितने तथाकथित नेता हैं देश में , लेकिन सभी का ध्येय सत्ता की राजनीति करना बन गया है। सब जोड़ तोड़ सारी भागमभाग कुर्सी हथियाने का एक ही मकसद लेकर। कोई विचारधारा नहीं , कोई योजना नहीं देश में सभी को एक समान जीने के हक़ मिलने की। ये कैसा विकास हो रहा है जिसमें गरीब और अमीर के बीच अंतर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा , बल्कि और अधिक बढ़ता ही जा रहा है। क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि जब देश समाज रसातल की तरफ जाता नज़र आता है तब हम तथाकथित पढ़े लिखे लोग कोई चिंतन करने की बजाय फेसबुक पर ट्विटर पर चैटिंग पर मौज मस्ती कर अपना समय बिताते नहीं व्यर्थ बर्बाद करते हैं। कभी काश सोचते कि यही वक़्त यही साधन यही ऊर्जा किसी और की भलाई करने पर लगाते। ऐसा लगता है हम आंख वाले अंधे बन चुके हैं , आस पास कुछ भी घटता रहे हम विचलित नहीं होते। मीडिया टीवी अख़बार सच के पैरोकार कहलाने वाले कभी निष्पक्ष और निडर ही नहीं रहते हैं बल्कि उनका उदेश्य धन कमाना और खुद को महान बताना होता है। कभी ऐसा नहीं होता था और  कहा जाता था कि पैसा ही बनाना है तो और कोई काम कर लो अगर जनहित और समाज की देश की बात करनी है तो अपना घर जला कर भी रौशनी करो। आज वही लोग टीवी अख़बार लेखन को शुद्ध कमाई का कारोबार समझने लगे हैं। विज्ञापन ,  संख्या , टी आर पी , यही मापदंड बन गये हैं इनके। सच बोलते नहीं हैं , झूठ को सच का लेबल लगा कर बेचने का काम करते हैं। एक अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं ये सब , एक नीचे गिरता है तो बाकी भी उससे भी नीचे गिरने को तैयार हैं , अव्वल आने के लिये। लगता है इनमें यही प्रतियोगिता चल रही है कि कौन मूल्यों का कितना अवमूल्यन करता है। धर्म जो दीन दुखियों की सेवा की बात किया करता था आज वो भी धन संपति जोड़ने और अहंकार करने की राह चल पड़ा है। हर बात में लाभ हानि का गणित होता है चाहे वो शिक्षा के विद्यालय हों , स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्प्ताल या फिर समाज सेवा ही क्यों नहीं हो। वो जिनके पास दौलत के अंबार लगे हैं वे भी दौलत की हवस में अंधे हो बिना जाने समझे हर उचित अनुचित रास्ता अपना रहे हैं। ये फिल्मी सितारे हों या खिलाड़ी या फिर येन केन प्रकरेण धन कमाने वाले यही आज के आदर्श बन गये हैं और इनका गुणगान किया करता है आज का मीडिया जो खुद इन के जैसा ही बनना चाहता है। जनहित , देशहित , त्याग और समाजिक मूल्यों की बातें शायद किस्से कहानी की बात लगती है या कुछ ऐसी पुरानी किताबों में लिखी हुई है जो अब उपयोगी समझी ही नहीं जाती। राम और कृष्ण का देश नहीं रह गया ये देश अब , रद्दी के भाव बिकती हैं आदर्शवादिता की सारी बातें। सच कहूं तो अपने देश की , अपने समाज की इस बर्बादी के लिये हम सभी किसी न किसी रूप में ज़िम्मेदार हैं। चलो सब आगे बढ़ें और अपने अपने हिस्से की धूल को साफ करें। दोष उसका नहीं जो आईना दिखाता है , दाग़ अपने चेहरे पर जो हैं , साफ उनको करना होगा। इनसे अधिक हैरानी की बात बुद्धीजीवी वर्ग का ये स्वीकार करना कि कुछ बदलना संभव नहीं है , जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत। ऐसे लोगों से इतना कहना चाहता हूं।
 
  कागज़ कलम नहीं लैपटॉप कंप्यूटर पर सोशल मीडिया पर लिखने लगे हैं , पढ़ने को फुर्सत नहीं अब तो हर कोई चाहता है जल्दी से समझना , लंबी बात पढ़ने को फुर्सत नहीं है। पढ़ने के बाद विचार नहीं करना बस पसंद करना तक की बात है। दो लफ़्ज़ों की कहानी भी इतनी छोटी नहीं होती है। जाने कैसी पढ़ाई की है कि पढ़ना अच्छा नहीं लगता , हर कोई बोलना चाहता है सुनता कोई भी नहीं। मुझे कहते हैं लिखा तो सबको भेजने की ज़रूरत क्या है नहीं पढ़ता कोई विस्तार से इतनी लंबी बात। शब्द क्या है मन की भावना को इक आवाज़ देने का उपाय भीतर कुछ है बाहर आना चाहता है लब पर आते हैं शब्द तभी अर्थ समझता है सुनने वाला और शब्द सार्थक हो जाते हैं। किसी से कहना नहीं कोई जानेगा नहीं समझेगा नहीं तो लिखना किस काम का। जीवन में सबसे पहले खुद को समझना है फिर पाना है अपने आप को अपने अस्तित्व को जानकर। भगवान खुदा की बात उसके बाद की बात है मगर दुनिया के बहकावे में हम विपरीत दिशा को जाने लगे हैं। आज थोड़ा विस्तार से फिर भी कम शब्दों में संक्षेप से तमाम बातों की चर्चा करते हैं। सिलसिलेवार इक इक को लेकर चिंतन करते हैं। 

राजनीति समाज और साहित्य :-

     इनको अलग नहीं किया जा सकता है। राजनीति का पहला मकसद नीति की बात को समझना है मगर आजकल नीति की कोई बात ही नहीं करता। जिसको आप राजनीति समझते हैं वो वास्तव में किसी का या शायद सभी का इक सत्ता की सुंदरी पर आसक्त होना है। वासना में जब आकर्षण से बंधे किसी के पांव छूने चाटने लगते हैं तब मुहब्बत की प्यार की बात नहीं कुत्सिक मानसिकता की बात होती है। आजकल राजनीति सत्ता पाने का मार्ग बनकर रह गई है सत्ता पाकर देश समाज की दशा बदलने की बात छूट गई है। साहित्य अख़बार अथवा आधुनिक परिवेश में मीडिया टीवी चैनल वास्तव में किसी दर्पण की तरह होने चाहिएं। और आईने का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है उसको समाज की छवि को सामने लाना होता है। मगर यहां आईना खुद को तस्वीर समझने लगा है और वास्तविकता को नहीं देखता न दिखलाना चाहता है। फिर ये आईना किस काम का है , जब कोई दर्पण सच नहीं झूठी तस्वीर बनाकर दिखाने लगे तो उसको हटवा देना उचित है। ऐसे आईने को तोड़ना अच्छा है। जो चिंतक विचार बनकर राह दिखलाते थे समाज और राजनीति के आगे चलते थे मार्ग दिखलाते थे आज सत्ता और स्वार्थ की राजनीति के पीछे भागते हुए पागल होकर अपने मकसद से भटक गये हैं। हम यही कर सकते हैं कि इनको कोई महत्व नहीं देकर इनके पतन को ऊंचाई समझना छोड़ नकार दें। ये खुद ब खुद मिट जाएंगे अपनी नियति को पाकर। कोई इनकी दूषित सोच को सही नहीं कर सकता है इस तालाब का सारा पानी गंदा है इसको बदलना होगा तालाब को खाली कर नया साफ पानी डालना होगा। कोई विचार ही नहीं विचारधारा की बात क्या करें सत्ता की चाह ध्येय है धन दौलत शोहरत की हवस की कोई सीमा नहीं है।

मुहब्बत रिश्ते नारी पुरुष संबंध :-

    मुहब्बत क्या है ये वो नदी है आपको लगता है बहती जाती है और अपने समंदर से मिलती है। मगर नदी क्या है नदी दो किनारों का नाम है जो कहीं नहीं मिलते , उसी जगह रहते हैं आमने सामने दो आशिक़ साथ भी और फासले को निभाते हुए भी। कोई पुल इन किनारों को जोड़ता है मगर मिलवाता नहीं है बस इस किनारे से उस किनारे कोई आता जाता है। जैसे कोई डाकिया किसी खत को आदान प्रदान करता है। बहता पानी है दोनों के बीच में और राह में कोई प्यास बुझाता है कोई मैल धोता है कोई मछली पकड़ता है कोई डुबकी लगाता है कोई तैरता है कोई डूब कर फिर उभरता नहीं है नदिया में । पानी के साथ बहते बहते जाने क्या क्या अपनी मंज़िल की तलाश में बहता हुआ किसी जगह जा पहुंचता है। समंदर तक जाते जाते पानी जीवन का आखिरी पल समंदर से मिलने से नहीं उस में विलीन होने पर खो देता है। समंदर की गहराई आशिक़ के भीतर की घुटन को छुपाने को होती है और हम बाहर खड़े उसकी लहरों को देख समझते हैं थाह पा ली है। समंदर की ख़ामोशी को कोई हवा तोड़ने का काम करती है थोड़ी देर को तूफ़ान बनकर मगर तूफ़ान गुज़र जाता है हवाएं थम जाती हैं और समंदर खामोश ही रहता है। उसके भीतर की आवाज़ का कोई शोर नहीं होता है उसकी गहराई बहुत कुछ छुपाये रखती है। नदी का सफर पर्वत से समंदर तक धरती का सफर है पानी की धारा जीवन में मधुर संबंध प्यार रिश्ते नाते की तरह है जिसको समझे बिना हम कोई अनुभव नहीं हासिल कर सकते हैं। प्यार की मुहब्बत की भावना की धारा हमारे भीतर बहती नहीं है और स्वार्थ की अपने मतलब हासिल करने की भावना दुश्मनी और नफरत का ज़हर भरा रहता है जिस से हम जीते हैं मगर जीवन नहीं होता है। रिश्ते प्यार त्याग और समर्पण के नहीं रहे आत्मा मन से नहीं शारीरिक और स्वार्थ से होने लगे हैं वासना और मतलब ने प्यार को भी कारोबार समझ लिया है। पाना चाहते हैं देना नहीं चाहते तो कुछ और होगा मुहब्बत नहीं हो सकती है।


     दुनिया बदल चुकी है मगर हम अभी भी उसी जगह खड़े हैं सदियों से। आज भी सुबह टीवी अख़बार पर कोई बारह राशियों का राशिफल बताता है अर्थात एक नाम की राशि वाले सभी का समय एक जैसा रहेगा। कोई थोड़ा चालाकी करता है और बताता है भाग्य के साथ अगर आप खुद भी संभल जाओ तो बुरे से बच सकते हैं और अच्छे को और बेहतर बना सकते हैं। भगवान से आज भी हम प्यार और भरोसा नहीं करते बल्कि उस से डरते हैं घबराते हैं। आज भी टीवी वाले नागिन के महिला बनने की कहानी परोसते हैं विष कन्या की कहानी बनाते हैं और हमें दिशा दिखाने की जगह भटकाने का काम करते हैं। धर्म आज भी समझने और अच्छाई बुराई परखने की बात नहीं कहता और केवल धर्म के ठेकेदारों का कारोबार बढ़ाने की बात करता है। गिनती नहीं है कितने मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे हैं जिनको लेकर कहते हैं वहां जाकर मांगने से सब मिलता है मगर हर दिन लाखों लोग ऐसी जगहों पर जाते हैं सब मिला कर करोड़ों लोग कितना वक़्त और पैसा इस पर खर्च करते हैं फिर भी शायद ही उनकी कामना पूरी होती है और दूसरी तरफ धनवान लोग पूजा अर्चना भी आडंबर रचाने की तरह किया करते हैं और किसी अंधविश्वास की परवाह नहीं करते फिर भी उनके सब काम होते रहते हैं। विवाह तक कुंडली मिलाने के बावजूद असल में सफल नहीं होते और या संबंध विछेद की बात होने लगती है या किसी तरह से समझौता कर नर्क की तरह ज़िंदगी बिताने को तैयार हो जाते हैं। जिस जल के छिड़कने से इंसान की हर वस्तु शुद्ध हो जाती है उस से किसी महिला की पावनता कायम नहीं हो पाती भले उसका कोई दोष नहीं हो और उसके साथ किसी वहशी ने कदाचार किया हो। पुरुष की पावनता का कोई सवाल नहीं उठता है कुदरत ने पुरुष और नारी को जैसा बनाया है उस को समझे बिना और वास्तविक पावनता मन की आचरण की विचारों की होती है इसे समझे बिना कुल्टा शब्द उपयोग किया जाता है। जिन धार्मिक किताबों को लोग पूजते हैं उन्हीं से सबक लेते तो पता चलता वास्तविकता कुछ और है। मगर हम इसकी चर्चा से घबराते हैं और सवाल करने से बवाल खड़ा हो जाता है। तर्क वितर्क की बात करना छोड़ दिया है। वास्तव में हमारा धर्म आवरण की तरह है जो लिबास पहना हुआ है उसे धर्म समझते हैं लिबास के भीतर जो है वास्तव में उस इंसान उसकी अंतरात्मा की कोई बात नहीं करता है। कर्मकांड को धर्म मान लिया है ताकि वास्तविक धर्म की कठिन राह पर चलने से बच सकें। कोई विचार नहीं करता कि जब हर तरफ सभी धर्म की मानने की बात करते हैं तो पाप अपराध और अधिक बढ़ते कैसे जा रहे हैं। उस धर्म का क्या फायदा जो सच की भलाई की सच्चाई की राह से दूर करता जा रहा है जिसका मतलब है समझने और समझाने में कोई खोट है।
 
                         कौन लोग हैं जो हम सभी को आधुनिक समाज नहीं बनने देना चाहते हैं क्योंकि जिस दिन हम निडर होकर सच का साथ देने और झूठ का विरोध करने लगे उनका शासन बचेगा नहीं। ठीक समझे हैं आप इस में राजनीति कारोबार और धर्म गुरुओं से लेकर मीडिया टीवी चैनल अख़बार ही नहीं तमाम लिखने वाले भी किसी न किसी सीमा तक शामिल हैं कोई आपको सोचने की आज़ादी नहीं देना चाहता है। उन का स्वार्थ आपको अधिकतर लोगों को कूप मंडूक बनाये रखना ही है। शिक्षा आपको विवेकशील नहीं बनाती है तो उस शिक्षा से हासिल क्या हुआ इंसान को बेजान सामान बनाने वाली शिक्षा अपने कर्तव्य से भाग रही है। वर्ना इतना पढ़ लिख कर उच्च पद पाने के बाद भी कोई अंधविश्वास के चंगुल में कैद कैसे रह सकता है। कोई चिंतक कोई समाज सुधारक सामने नहीं दिखाई देता है कोई ज्ञान की रौशनी दिखलाने वाला नहीं है और जो अंधेरों का कारोबार करते हैं दावा करते हैं उजाला लाने का। किस जगह ठहरा हुआ है समाज जिस जगह सैंकड़ों साल पहले था और कब तलक आगे नहीं बढ़ेगा उस सब को छोड़कर। 
 

 जीने का ढंग क्या हो :-

       आप पैदल चलते हैं या किसी वाहन की सवारी कर सफर करते हैं आपको कुछ कायदे कुछ नियम समझने ज़रूरी होते ही हैं। बायीं तरफ चलना देख कर कदम रखना और ऊंचाई या निचाई फिसलन या धूल और गंदगी के इलावा जानवर आदि का ध्यान रखना होता है। सड़क पार करनी हो तब इधर उधर देख सही जगह से करना होता सुरक्षा की खातिर। जब आप वाहन चलाते हैं तब भी आपको बहुत बातों का ध्यान रखना होता है। किस गति से चलना किस तरफ कैसे मोड़ काटना सिग्नल पर रुकना और हैलमेट पहनना। आपको सिर्फ खुद अपने वाहन का ही ध्यान नहीं रखना होता , दायें बायें आगे पीछे चलते वाहनों का भी ख्याल रखते हैं। कभी सोचो अगर सब केवल खुद अपनी मर्ज़ी से इधर उधर होते बगैर सब को रास्ता देते चलने लगें तो कितना टकराव हो कितनी दुर्घटनायें घटती हैं ऐसी लापरवाही से। पुलिस हवालदार और जुर्माने का डर काफी मदद करता है खुद हमारी सुरक्षा में।  विश्व कल्याण और मानवता सभी की भलाई की बात को छोड़कर हम लोग सिर्फ अपने अपने मतलब को महत्व देने लगे हैं , कितना खुदगर्ज़ समाज का निर्माण कर लिया है हमने कभी सोचा है। 

                 मगर क्या हम अधिकतर जीवन में इन बातों पर विचार करते हैं , जीने का सही तरीका भी वही है जब हम सब केवल अपनी सुविधा नहीं सभी की परेशानियों और अधिकारों की परवाह करें। कभी ध्यान देना हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ खुद हमारे अथवा किसी दूसरे के सामाजिक नियमों की अनदेखी करना होता है। मुझे जो चाहिए जैसे चाहिए की सोच उचित नहीं है , क्यों और किसलिए भी सोचना समझना ज़रूरी है। काश इतनी छोटी सी बात सभी समझ लें कि चाहे जो भी हो हमें सही राह पर चलना है , मुश्किलों से बचने को आसान रास्ते नहीं तलाश करने। कहने को बेशक हम सब दावा करते हों कोई अनुचित कार्य नहीं करने का , मगर वास्तविकता ये नहीं है। अगर हम अनुचित नहीं करते तो कोई हमारे कारण परेशान नहीं होता। खेद की बात तो ये है कि हम हर अनुचित काम उसको उचित ठहरा कर करते हैं। आप अपने घर के सामने सफाई रखते हैं और चुपके से या छिपकर अपनी गंदगी पड़ोसी के दरवाज़े के सामने या जहां कहीं चाहते हैं डाल देते हैं। कोई रोकता है तो हम समझते हैं वही गलत है , इस तरह हम चोरी और सीनाज़ोरी करते हैं। रिश्वत खाना और खिलाना दोनों अनुचित हैं , हम उचित काम भी अपनी सुविधा से करवाने को ऐसा मर्ज़ी से भी करते हैं और कभी विवश होकर भी। आपने रिश्वत देकर अपना काम ही नहीं करवाया अपने दूसरों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी , क्योंकि आपने गलत लोगों की आदत बना दी घूस लेने की।

            सोचो अगर सरकारी अधिकारी अपना काम निष्पक्षता से पूरी इमानदारी से करते तो आज देश की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं होती। चंद सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने देश के करोड़ों लोगों के प्रति अपराध किया है।  कितने राजनैतिक दल कितने तथाकथित नेता हैं देश में , लेकिन सभी का ध्येय सत्ता की राजनीति करना मात्र हो गया है। सब जोड़ तोड़ सारी भागमभाग कुर्सी हथियाने का एकमात्र मकसद लेकर। कोई विचारधारा नहीं , कोई योजना नहीं देश में सभी को एक समान जीने के हक़ मिलने की। ये कैसा विकास हो रहा है जिसमें गरीब और अमीर के बीच अंतर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा , बल्कि और अधिक बढ़ता ही जा रहा है। उद्योगपतियों कारोबारियों , सभी ने नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाईं हैं। अध्यापक या डॉक्टर क्या इस लिये होते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को मानव कल्याण के खिलाफ अपने मतलब के लिये इस कदर लूट खसूट का कारोबार बना देना चाहें। वकील और न्यायधीश न्याय को हैं अथवा अपनी ज़रूरत अपनी सुविधा अपनी आय ही सब से बड़ा धर्म है। कोई जो भी काम करता है उसको अपने कर्तव्य में ईमानदारी को महत्व देना होगा , जब कोई भी अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता और अधिकार सब चाहते तब यही होना है जो आज होता दिखाई देता है। कभी ये बड़े  बड़े धनपशु राजनेता खिलाडी अभिनेता तमाम तरह के धंधे करने वाले उद्योगपति कारोबारी लोग विचार करते इंसान को कितना चाहिए अंत दो गज़ ज़मीन की ज़रूरत है। इतना संचय करना अपव्यय करना अपने ऐशो आराम शानो शौकत पर मनवता के खिलाफ अपराध ही है कि जिस मायानगरी में ऊंची अटालिकाओं में ये रहते हैं उसी महानगर में दुनिया की सबसे गरीब लोगों को बड़ी बस्ती है। नहीं ये कोई भाग्य की बात नहीं है ये उचित से कहीं अधिक अनुचित ढंग से कमाई पाप की कमाई है। मानवता की इंसानियत की परवाह छोड़ कर ही इतना किया जा सकता है।

           आम आदमी क्या तथाकथित महान कहलाने वाले लोग भी अपने मार्ग से भटके हुए हैं। धर्मप्रवचक उपदेशक खुद मोह माया और नाम शोहरत में उलझे हैं , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। क्या यही उपदेश है किसी भी धर्मग्रंथ में लिखा कि धर्मस्थल अपने पास धन दौलत के अंबार जमा करते रहें। दीन दुखियों की सेवा की बात किस को याद है। पत्रकारिता और लेखकों कलाकारों अभिनय करने वालों फिल्मकारों आदि को मालूम है उनको क्या आदर्श स्थापित करने हैं। समाज का आईना जब बिगड़ गया है और धन दौलत हासिल करना सफलता का पैमाना बन गया हो तब क्या होगा।  पथप्रदर्शक मार्ग से भटक गये हैं। शायद किसी को फुर्सत ही नहीं ये सोचे कि उसका अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभाना उसकी निजि बात नहीं है। हर मानव समाज का हिस्सा है और हर हिस्से को सही काम करना चाहिए। आप प्रकृति को देखें हवा पानी आग मिट्टी , पेड़ पौधे सूरज सब नियमित अपना अपना काम करते हैं , दुनिया तभी कायम है। आपके जिस्म में हर अंग अपना अपना काम ठीक करता है तभी हम ज़िंदा हैं , हाथ पांव क्या बदन का छोटे से छोटा भाग ठीक नहीं हो तब मुश्किल होती है।  जिस्म के अंदर भी मांस हड्डी रक्त और हृदय गुर्दे और फेफड़ों की तरह कितने और भाग हैं मस्तिष्क  की नाड़ियों से लेकर महीन ग्रन्थियों तक , सब अपना काम रात दिन करते हैं तभी जीवित हैं हम सब। यही नियम समाज का भी है , जब हम में कोई अंग रोगग्रस्त होता है बिमारी का असर सारे समाज पर पड़ता है।

                  शायद अब आप सोचोगे कि काश इंसान के लिये भी कोई कानून का पालन करवाने वाला हवालदार होता जो हर लाल बत्ती की तरह गलत दिशा में जाने से रोक देता। मगर वास्तव में ऐसा है , वो ईश्वर है या जो भी जिसने इंसान को बनाया है , उसने इक आत्मा इक रूह इक ज़मीर सभी में स्थापित किया है। मगर क्या हम अपनी अंतरात्मा अपने ज़मीर की आवाज़ सुनते हैं , ये फिर लाल बत्ती पर कोई हवालदार खड़ा नहीं होने पर सिग्नल तोड़ आगे निकल जाते हैं। सब जानते है उचित क्या है अनुचित क्या , पाप पुण्य का अंतर समझने को शिक्षित होना ज़रूरी नहीं है। जब भी किसी के साथ अन्याय करते हैं या किसी को उसका अधिकार नहीं देते तब हम जानते हैं ऐसा गलत है। हर धर्म यही समझाता है मगर हम खुद को धार्मिक बताने वाले धर्म-अधर्म में अंतर जानते हुए भी अनुचित मार्ग अपनाते हैं खुदगर्ज़ी में। लेकिन क्या हम सोचते हैं हमें अपने अपकर्मों की कर्तव्य नहीं निभाने की कोई सज़ा नहीं मिलेगी। ये खुद को धोखे में रखना है। आप बबूल बोते हैं तो आम कैसे खाओगे। आपका बीजा बीज इक दिन उगेगा पेड़ बनकर , अगले जन्म की बात नहीं है , इसी जन्म में सब को अपने अपकर्मों की सज़ा मिलती है ये कुदरत का नियम है जो किसी सरकारी कानून की तरह बदला नहीं जा सकता। हैरानी की बात ये है कि जब हम सभी को कोई दुःख कोई परेशानी होती है तब हम ये नहीं सोचते कि ऐसा अपने किसी अपकर्म के कारण तो नहीं हुआ , हम किसी और को दोषी ठहरा अपने आप को छलते हैं। सही यात्रा के लिये यातायात के नियम पालन करने की ही तरह सार्थक जीवन यात्रा जीवन में मानवीय मूल्यों का पालन कर ही संभव है। 
 
                    जैसे मेरे अंदर सोया हुआ कोई फिर से जाग गया। बहुत दिन से अखबारों में चर्चा  को नगर  में मानव अधिकार आयोग की सभा आयोजित होनी है। सोचा चलो चल कर देखते हैं शायद कुछ विशेष मिल जाये जो सार्थक हो। पता चला कि सैमीनार आलीशान बैंकट हाल में होना है क्योंकि सरकारी सभी इमारतों के हाल वातानुकूलित नहीं है , और बड़े बड़े लोग आने हैं भाषण देने को। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा प्रवेश के मुख्य द्वार पर बैठे पुलिस वाले आम लोगों को दूसरे रास्ते से भेज रहे हैं। मैंने पूछा क्या सभा उधर हो रही है , तो बताया गया कि नहीं सभा तो यहीं ही है मगर , मैंने कहा , क्या ये दरवाज़ा ख़ास लोगों के प्रवेश के लिये सुरक्षित है। तब इक पुलिस वाले ने इशारा किया दूसरे को कि मुझे यहीं से अंदर जाने दे , और मैं भीतर चला गया। हाल भरा हुआ था और अधिकतर सरकारी लोग , पंचायतों के सदस्य , और तमाम बड़े तबके के लोग या संस्थाओं से जुड़े लोग ही नज़र आ रहे थे। जिन गरीबों मज़दूरों , घरों में दुकानों में काम करने वाले बच्चों को कोई अधिकार नहीं मिलता , उन में से कोई भी वहां नहीं दिखाई दिया मुझे। देखते ही किसी शानदार पार्टी का आयोजन जैसा प्रतीत हो रहा था। सभा शुरू हुई तो बात मानवाधिकारों की हालत पर चिंता की नहीं थी , संचालक अधिकारी लोगों की महिमा का गुणगान करने लगा था। मुझे इक मुल्तानी कहावत याद आई , तू मैनू महता आख मैं तैनूं महता अखेसां। उसके बाद आयोग के लोग बताते रहे कि दो तीन साल में ही हरियाणा का मानव आयोग एक कमरे से शुरू होकर आज एक पूरे भवन में काम कर रहा है। बिलकुल सरकारी विकास के आंकड़ों की तरह , जिसमें ये बात पीछे रह जाती है कि जिस मकसद से संस्था गठित हुई वो कितना पूरा हुआ या नहीं हुआ। बस कुछ सेवानिवृत लोगों को रोज़गार मिल गया , यही अधिकतर अर्ध सरकारी संस्थाओं में होता है जहां करोड़ों का बजट किसी तरह उपयोग किया जाता है , साहित्य अकादमी भी ऐसी ही एक जगह है।

                  भाषण होते रहे और अधिकतर मानवाधिकारों के हनन की बात से इत्तर की ही बातें हुई। लगता ही नहीं कोई समस्या भी है किसी को मानवाधिकार नहीं मिलने की। अच्छा हुआ कोई पीड़ित खुद नहीं आया वहां वरना निराश ही होता , जो कुछ लोग थोड़ी समस्याएं लेकर गये उनको भी पुराने सरकारी ढंग से स्थानीय अफ्सरों से मिलने की राय दी गई। और जिनकी शिकायत उन्हीं को हल निकालने की बात कह कर समस्या का उपहास किया गया जैसे। तीन चार घंटे चले कार्यक्रम में कहीं भी चिंता या मानवाधिकारों की बदहाली पर अफसोस जैसा कुछ नहीं था , मानों कोई दिल बहलाने को मनोरंजन का आयोजन हो। बार बार संवेदना शब्द का उच्चारण भले हुआ , संवेदना किसी में कहीं नज़र नहीं  आई। वास्तव में ये सभी वो लोग थे जिनको कभी जीवन में अनुभव ही नहीं हुआ होगा कि जब कोई आपको इंसान ही नहीं समझे तब क्या होता है। पता चला ये आयोग राज्य के बड़े सचिव मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को सेवानिवृत होने के बाद भी पहले की ही तरह सरकारी सुख सुविधा पाते रहने को इक साधन की तरह उपयोग किया जाता है। जो सरकार सत्ता की अनुकंपा से ऐसा रुतबा पाते हैं उन्हीं से अपेक्षा रखना कि नागरिक को सरकार और अधिकारी वर्ग से वास्तविक मानवाधिकार दिलवाने का कर्तव्य निभाएं इक मृगतृष्णा जैसा है। न्यायधीश तक सेवा काल खत्म होने के बाद अपने लिए सब कुछ पाने को इसका उपयोग करते हैं। शायद ही किसी को वास्तविक मकसद की कोई परवाह है। अंधी पीसती है कुत्ते खाते हैं की कहावत सच लगती है , शिक्षित लोग देश समाज की नहीं अपनी चिंता करते हैं और उनको अपने सिवा कोई नज़र आता नहीं है।  और यही सरकारी नेताओं विभागों संगठनों संस्थाओं की बड़ी बड़ी सभाओं में होता है जिनको वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता है बस अच्छी अच्छी बातें भाषण होते हैं जिनका हासिल कुछ भी नहीं होता है। अपने उद्देश्य को भूलकर अपने को विशेष और बेहद महान घोषित करते पढ़े लिखे अनजान होकर जानकर होने का दम भरते झूठे लोग। जनता देश की समस्याओं का समाधान ढूंढने नहीं खुद सबसे बड़ी समस्या बन गए हैं।
 

शांति की खोज से हिंसा की राह तक  :-

 
    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है।
 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं।
 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे।

             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। साल 2020 भी आना था आया और जाने  को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है बेशर्मी की हद है आप इसको छलना और ढगी से भी विश्वासघात करना कह सकते हैं।

             ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। 

 जो बोओगे वही काटोगे :-

     विषय का विस्तार बहुत है , चिंता का अंबार बहुत है। निरर्थक की बहस नहीं है समझने को सार बहुत है। सब पहले यही समझते हैं हमने अपनी संतान को अच्छी परवरिश दी है बड़े होकर समझेंगे हमारी उलझन को। किसी और की बात सुनते हैं पढ़ते हैं कि ऐसा हुआ क्या कर दिया तो दिल में पहली बात आती है खुद उन्होंने भी यही किया होगा शायद अपने बड़ों के साथ। मगर ऐसा होता नहीं है हर माता पिता अपनी संतान को अपनी हैसियत से बढ़कर नहीं है पास वो भी उपलब्ध करवाना चाहते हैं। बच्चों की बिना अर्थ की तुतली आवाज़ को भी सुन कर ख़ुशी महसूस करते हैं उनको बढ़ावा देते हैं फिर भी वही बच्चे बड़े होने पर माता पिता की बातों को अनावश्यक उपदेश कहकर अनसुना करते हैं कभी खिल्ली उड़ाते हैं और समझते हैं हम पढ़ लिख कर आधुनिक समाज को जानते हैं इनको खबर नहीं दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। तमाम बच्चे समझते हैं हमने माता पिता को पैसा कमा कर दिया सब सुख सुविधा उपलब्ध करवाते हैं इस से बढ़कर उनको क्या चाहिए। बस उनको इतना सा ही तो समझाते हैं जैसा हम सोचते हैं आप वैसा किया करो। रिश्तों का संबंध कभी शर्तों पर नहीं कायम रहता है माता पिता संतान को किसी अनुबंध में बांधकर नहीं रखते हैं कि आपको बदले में इस तरह करना होगा। मगर फिर भी बड़े होकर हर बच्चे को लगता है मुझे जितना मिला थोड़ा है और माता पिता को भी शिकायत होने लगती है इसकी उम्मीद नहीं की थी। यही बात घर से बाहर समाज की है और देश को लेकर भी इक निराशा दिखाई देती है जिस जिस से जो अपेक्षा है पूरी नहीं होती हर कोई समझता है मैं जो भी करता हूं ठीक करता हूं। अपने आप से बाहर निकल कर समझते हैं जो कड़ी घर से शुरू होती है पूरे समाज और देश को जोड़ती हुई निर्धारित करती है हम क्या क्यों कैसे हैं। 

      हमने संतान को बड़े होकर क्या करना है क्या बनकर दिखाना है कैसे आधुनिक ढंग से जीना है कितना धन किस किस तरीके से जोड़ना है नाम शोहरत पाने को क्या करते हैं दुनियादारी की समझ देते हैं। अच्छे इंसान बनने की सच कहने के साहस की ईमानदारी की कर्तव्य की बातें सिखाना शायद हम सोचते हैं बड़े होकर खुद सीख जाएंगे बच्चे। हमने बहरी परिवेश कपड़े पहनने अच्छे नज़र आने की बात समझाई मगर भीतर मन से सुंदर होने का सबक पढ़ाया नहीं या खुद हमें भी नहीं पढ़ाया गया था। हम चाहते हैं जो बनाना उसको बनाने को पहले बहुत कुछ करना भी था जो किया ही नहीं। हमने बचपन से सभी से अनावश्यक मुकाबला करने की सोच बना ली थी और अपनी संतान को तुम औरों से किस बात में कम हो सबसे बढ़कर समझदार हो की भावना को स्थापित किया और बढ़ावा दिया है। अपनी गलती को समझना तो क्या स्वीकार भी नहीं करना ऐसी आदत बनाने के दोषी हम खुद हैं। मैं ये हूं मैं वो हूं जाने हर किसी को खुद को बेकार इक अहंकार कैसे आ जाता है जो बाहर हर किसी को अपने से कमतर समझते समझते घर में भी सब से काबिल होने का गुरुर पैदा कर देता है। स्वाभिमान की बात और होती है आत्मसम्मान की कीमत नहीं समझते हम मतलब को गधे को बाप कहना पड़ता है ये धारणा बना ली है। जिन विकसित देशों में जाकर व्यवस्था और सब बड़े छोटे बराबर होने को देख हम तारीफ करते हैं खुद अपने देश और समाज में आचरण करते हुए उस तरह नहीं चलते हैं। मनमानी और मतलबपरस्ती की आदत को हमने समझा है अवगुण नहीं खासियत है अपनी बुरी बात को अच्छा साबित करना चाहते हैं। 

     कितने अच्छे स्कूल कॉलेज की पढ़ाई कितना अच्छा कारोबार हो जो सबसे महत्वपूर्ण है नैतिक आचरण जो जैसा है उसी तरह का नज़र आना और गलती करने पर पछतावा या भूल का सुधार करने का हौंसला रखना कोई सोचता ही नहीं इनके बिना आदमी विवेक शून्य बनकर ऐसा समाज बनाता है जो संवेदना से रहित है। ऊपर चढ़ने की चाहत में राह उचित अनुचित का विचार करते ही नहीं हैं। आधुनिकता और झूठी दिखावे की सभ्यता ने हमसे जो बेहद मूलयवान था छीन लिया है जो दिया है वो सच कहा जाये तो किसी काम का नहीं है। हीरा खोकर पत्थर जमा करने का काम करते हैं हम लोग। मगर सब जानते समझते ऐसा होने कैसे देते हैं हम , कारण है कि हम चिंतन नहीं करते अपने बारे न देश समाज के बारे। कोई कौन होता है हमें उपदेश देने वाला हम सही हैं या गलत उनको क्या लेना देना। खुद अपने आप से डरते हैं खुद को आईने में देखने का साहस नहीं करते। जब किसी से कोई शिकायत रखते हैं तब क्या सोचा कभी औरों को भी हमसे कितनी शिकायत हो सकती हैं। जब हम मज़बूर होते हैं तब समझते हैं बेबसी का दर्द क्या है लेकिन जब हर किसी की विवशता पर हंसते हैं मज़बूर होने पर किसी का शोषण करते हैं भूल जाते हैं इंसानियत क्या है।

      नाम मुहब्बत प्यार के अपनेपन के हैं फिर भी इन में सब कुछ होता है मधुर संबंध मिलना बड़ा कठिन है। लोग हैं जो निभाए जाते हैं जैसे कोई बोझ ज़िंदगी ने सर पर रख दिया है ढोना मज़बूरी है। हर रिश्ते की कुछ कीमत होती है जो चाहे अनचाहे चुकानी पड़ती है। रिश्ते बनाते नहीं हैं बने बनाये मिलते हैं और निभ सके चाहे न निभे निभाने पड़ते हैं। दिल का दिल से कोई नाता होता भी है सच कोई नहीं जानता बात दिल की कहते हैं दिल से पूछो दिल की दिल ही जानता है। दर्द से दिल भरा होता है फिर भी मिलते हैं हंसते मुस्कुराते हुए ये चेहरे हैं कि मुखौटे हैं जो क़र्ज़ की तरह होटों पर हंसी रखनी होती है और अश्कों को छुपकर किसी कोने में बहाना होता है अकेले अकेले। दुनिया भर में कोई कंधा सर रख रोने को नहीं मिलता कोई आंचल पलकों के भीगेपन को पौंछता नहीं है। दर्द देते हैं अश्क मिलते हैं रिश्ते क्या कोई ख़ंजर हैं जो घायल करना जानते हैं मरहम लगाना नहीं आता है। ये जो सुनते हैं हमदर्दी के साथ निभाने के नाते किस दुनिया की बात है इस दुनिया में तो नहीं मिलते खोजते रहते हैं जीवन भर। मुझे अकेला छोड़ दो कौन है जो ऐसा कहना नहीं चाहता पर कहा नहीं जाता है कहने पर सवाल होते हैं। जब आपको साथ चाहिए आप अकेले होते हैं भरी महफ़िल में और जब कभी आपको अकेले रहना होता है भीड़ लगी रहती है। कोई तकलीफ हो लोग आते हैं हालचाल पूछने को मगर ज़ख्मों को छेड़ कर दर्द बढ़ा जाते हैं , रिश्ते हैं रिश्तों की रस्म निभा जाते हैं। ज़रूरत होती है बुलाओ भी नहीं आ सकते पर बिन बुलाये भी चले आते हैं कितने अहसां जताते हैं।
 
      बेगानों ने कहां किसी को तड़पाया है ये किस्सा हर किसी ने सुनाया है जिसको चाहते हैं उसी ने बड़ा सताया है। दर्द देकर कोई भी नहीं पछताया है हर अपने ने कभी न कभी सितम ढाया है। रिश्ते ज़ंजीर हैं रेशम की डोरी नहीं हैं हर किसी का इक पिंजरा है बंद रखने को कैद करने को। रिश्ते आज़ादी नहीं देते हैं जाने कितने बंधन निभाने होते हैं हंसते हंसते तीर खाने पड़ते हैं। कोई नाता नहीं जो खुली ताज़ा हवा जैसा हो जिस का कोई खुला आकाश हो पंछी की तरह उड़ने को फिर शाम को घौंसले में लौट आने को। कितनी शर्तों पे जीते मरते हैं सच नहीं कहते इतना डरते हैं , बात झूठी करनी पड़ती है करते हैं। सुलह करते है फिर फिर लड़ते हैं। मतलब की दुनियादारी है हर रिश्ता नाता बाज़ारी कारोबारी है हर पल बिकती है वफ़ादारी है कितनी महंगी खरीदारी है। भीड़ है हर तरफ मेला है जिस तरफ देखो इक झमेला है कोई बवंडर है कि तूफ़ान कोई ये जो इतना विशाल रेला है। जीना किसने दुश्वार किया है हर किसी को गुनहगार किया है कभी छुपकर कभी सरेबाज़ार किया है। अपने भी तो रिश्तों का व्यौपार किया है खोने पाने का हिसाब हर बार किया है। कितने रिश्तों ने परदा डाला है कितनों ने शर्मसार किया है। ये रिश्ते हैं कि पांव की बेड़ियां हैं हाथ पकड़े हैं कि लगी हथकड़ियां हैं। ज़िंदगी भर जिसको निभाया है हुआ फिर भी नहीं अपना पराया है इक बार नहीं सौ बार आज़माया है। अब नहीं मिलती धूप के वक़्त कहीं भी छाया है। 
  
       आज आगे की बात करते हैं। इक कहानी जैसी बात है दो अजनबी मिलते हैं जान पहचान होती है। कोई कहता है अकेला हूं मुझे साथ लेते चलो। चलना है तो चल सकते हो मेरे साथ लेकिन मैं नंगे पांव पैदल चलता हूं और बस चलते जाना है बने बनाये रस्ते पर नहीं खुद अपनी राह बनाता हूं। तुम जब तक साथ चल सकते हो चलना जब थक जाओ रुक जाना तेज़ जाना हो आगे बढ़ जाना कोई शर्त नहीं साथ निभाने की जितना साथ चल सकते हैं चलना जब नहीं निभे तो अलग हो जाना किसी शिकायत गिले शिकवे के। तुम को मेरी राह कठिन लगेगी कभी तो चले जाना अपनी मर्ज़ी की राह पर अलविदा कहकर। मुझे नहीं आता है दिखावे की दुनियादारी निभाना और मुझे औरों को भी साथ लेकर चलना है खुद आगे बढ़ने को किसी को राह में नहीं छोड़ना है। धन दौलत महंगे उपहार नहीं हैं खाली जेब है और खुश रहता हूं जिस भी हाल में , मिलते हैं लोग बिछुड़ते रहते हैं यादें बनकर रह जाते हैं। आज तुम मुझे कोई कीमती उपहार देना चाहते हो कल मुझसे चाहोगे बदले में शायद नहीं दे पाऊं ये जो तुम नहीं लेना चाहता दे रहे हो यही अमानत है जब भी चाहो लौटा दूंगा मगर मुझे रिश्तों में हिसाब करना नहीं आता है। बहुत कुछ है जो एक साथ रहते मिलता है जिसको धन दौलत से तोला नहीं जा सकता है। कुछ भी नहीं छुपाया था सब बताया था अपनी विवशता अपनी सोच और अपने मकसद को लेकर भी। अचानक सवाल करने लगे आपकी कोई बात मुझे मंज़ूर नहीं है और मज़बूरी को अविश्वास समझ लिया अब और नहीं आपके साथ चलना संभव है। ठीक है जितना साथ चले अच्छा है। ये इक पंजाबी की कविता या ग़ज़ल की बात है। कोई झूठ नहीं कोई हेरा फेरी नहीं मगर मंज़िल अपनी अपनी जाना है तो किसी मोड़ पर राह बदल सकती है। हम लोग रिश्तों को इक कैद बना लेते हैं दोस्ती या प्यार या कोई भी नाता हो चाहते हैं अपनी शर्तों पर साथ निभाना है लेकिन दिल से कोई ऐसा नहीं कर सकता है। घर को पिंजरा मत बनाओ रिश्तों को जंजीर बनाकर साथ जकड़ने से रिश्ता इक बोझ बन जाता है। कोई मिलता है तो किसी मोड़ पर अलग भी होना पड़ता है ऐसे में बिछुड़ने का दर्द हो मगर गिले शिकवे कर जो मधुर नाता रहा उसको कड़वी याद बनाना उचित नहीं है।

          जीवन खोने और खो कर पाने का नाम है। हम पाना सब कुछ चाहते हैं खोने को तैयार नहीं होते है। सभी कुछ आज तक किसी को नहीं मिला है। जो मिला उसको लेकर खुश नहीं होते और जो नहीं मिल सका उसको लेकर दुःखी रहते हैं। दोस्ती रिश्तों के संबंध में देना है तो बदले में पाने की शर्त रखकर मत दो क्योंकि जितना भी मिलेगा आपको कम लगेगा जितना दिया वो बहुत अधिक लगता है। जब पलड़े में तोलने लग जाते हैं तो दुनियादारी होती है अपनापन प्यार मुहब्बत नहीं बचता है। फिर आपको बार बार जतलाना पड़ता है किसी को चाहते हैं जबकि जतलाने की बताने की ज़रूरत होनी नहीं चाहिए। 
 

   अभी बाकी है पढ़ना-लिखना :-

               चलो खुद अपनी सभी लिखने वालों की वास्तविकता की  बात करते हैं उनकी भी आज जिनका दावा है कि वो दर्पण हैं समाज का। बहुत जोखिम भरा काम है ये , आईने को आईना दिखाना। इतनी छवियां उनमें दिखाई देती हैं कि नज़रें हार जाती हैं उनको निहारते निहारते। ये विषय इतना फैला हुआ है कि इसका ओर छोर तलाशते उम्र बीत सकती है। इसलिये कुछ आवश्यक बातों पर ही चर्चा करते हैं ताकि ये समझ सकें कि आज का साहित्य , आज का लेखक कहां खड़ा है , क्या कर रहा है और किस दिशा में जा रहा है। जब भी कोई कलम उठाता है तब वास्तव में सब से पहले वो खुद अपने आप को तलाश करता है , मैं क्या हूं , मेरा समाज कैसा है , कहां है। तब सोचता है कि ये समाज होना कैसा चाहिये , मुझे क्या करना चाहिये इसको वो बनाने के लिये। इतिहास में जितने भी महान लेखक हुए हैं वो सभी अपने इसी मकसद को लेकर लिखते रहे हैं। उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि उनको लिखने से क्या हासिल होगा या क्या नहीं मिलेगा। कुछ भी पाना या खोना उनका ध्येय नहीं था , केवल इक लगन थी जो उनको लिखने को विवश करती रही। और उन्होंने दुनिया को वो दिया जो सदियों तक कायम रहा। इधर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो लिखने को विवश नहीं होते , कोई विवशता उनको लिखने को बाध्य करती है।  जैसे अखबार या पत्रिका का संपादक नित लिखता है नये विषय पर इसलिये नहीं कि उसकी सोच विवश करती है , बल्कि इसलिये कि उसको इक औपचारिकता निभानी है।

                इधर देखते हैं इक भीड़ नज़र आती है लिखने वालों की , मगर ध्यान दें तो समझ नहीं आता इसको क्या कहना चाहिये। साहित्य सृजन या कुछ और या मात्र कागज़ काले करना। कुछ भी तो दिखाई नहीं देता जो सार्थक हो , कोई बताता है वो महिला विमर्श की बात कहता है , कोई जनवादी-वामपंथी लेखन का पैरोकार बना बैठा है , कोई दलित लेखन का दम भरता है। ये कैसा साहित्य है जिसको पूरा समाज नज़र नहीं आता , कोई खास वर्ग दिखाई देता है जिसमें। कितना भटक गया है आज का लेखक , क्या हासिल करना चाहता है वो समाज को इस तरह टुकड़ों में विभाजित कर के। सब की बात क्यों नहीं करना चाहता ये इस नये दौर का नया लेखक। जब लिखने वाला खुद को और अपने समाज को पहचानने के वास्तविक ध्येय से भटक जाता है , और चाहता है लोग उसको पहचानें , उसके लेखन का सम्मान हो , मूल्यांकन हो तब वही होता है कि आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। लगता है यही करने लगा है आज का लेखक। वह समाज को कुछ देना नहीं चाहता बल्कि उससे कुछ पाना चाहता है। अथवा जितना देता है उससे अधिक पाने की लालसा रखता है। कई-कई किताबें छपवा डाली हैं , शायद ही कभी सोचा हो कि उनमें लिखा क्या है। बहुत हैरानी होती है जब अधिकतर पुस्तकों में कुछ भी काम का नहीं मिलता , कुछ तो जो सार्थक हो , जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करे। अन्यथा व्यर्थ समय और शब्दों की बर्बादी से क्या हासिल होगा। अब उस पर शिकायत कि लोग पढ़ते ही नहीं किताबों को , क्या कहीं लेखन में कमी नहीं जो पाठक ऊब जाता है कुछ पन्ने पढ़कर। एक हास्यस्पद बात है , बहुत सारे लेखक खुद अपने ही लेखन पर फिदा हैं। जैसे कोई दर्पण में अपनी ही सूरत को निहारता रहे और अपने आप पर मोहित हो जाये। कहते तो हैं कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता , मगर मेरे कॉलेज के इक सहपाठी कहते थे कि दर्पण हर देखने वाले को बताता है कि तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं है। शायद हम खुद अपने आप को बहलाना चाहते हैं। माना जाता है कि खुद को और बेहतर बनाने के लिये अपने से काबिल लोगों का साथ हासिल करना चाहिये मगर आजकल के लेखक उनका साथ पसंद करते हैं जो उनको महान बताकर हरदम उनकी तारीफ करता रहे। अपनी कमियों से नज़र चुराकर लेखक काबिल नहीं बन सकता है। सम्मान , पुरूस्कार आदि की अंधी दौड़ में शामिल लेखक सच से बहुत दूर। 

    धर्म जो दीन दुखियों की सेवा की बात किया करता था आज वो भी धन संपति जोड़ने और अहंकार करने की राह चल पड़ा है। हर बात में लाभ हानि का गणित होता है चाहे वो शिक्षा के विद्यालय हों , स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्प्ताल या फिर समाज सेवा ही क्यों नहीं हो। वो जिनके पास दौलत के अंबार लगे हैं वे भी दौलत की हवस में अंधे हो बिना जाने समझे हर उचित अनुचित रास्ता अपना रहे हैं। ये फिल्मी सितारे हों या खिलाड़ी या फिर येन केन प्रकरेण धन कमाने वाले यही आज के आदर्श बन गये हैं और इनका गुणगान किया करता है आज का मीडिया जो खुद इन के जैसा ही बनना चाहता है। जनहित , देशहित , त्याग और समाजिक मूल्यों की बातें शायद किस्से कहानी की बात लगती है या कुछ ऐसी पुरानी किताबों में लिखी हुई है जो अब उपयोगी समझी ही नहीं जाती। राम और कृष्ण का देश नहीं रह गया ये देश अब , रद्दी के भाव बिकती हैं आदर्शवादिता की सारी बातें। सच कहूं तो अपने देश की , अपने समाज की इस बर्बादी के लिये हम सभी किसी न किसी रूप में ज़िम्मेदार हैं। चलो सब आगे बढ़ें और अपने अपने हिस्से की धूल को साफ करें। दोष उसका नहीं जो आईना दिखाता है , दाग़ अपने चेहरे पर जो हैं , साफ उनको करना होगा।  हो जाता है। देश में और राज्यों में साहित्य अकादमी में लोगों को पद काबलियत को देख कर नहीं बल्कि सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करने से मिलते हैं और सत्ता के चाटुकार कभी सच्चे लेखक नहीं बन सकते। ऐसे लोग हर वर्ष अपनों अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम करते हैं। साहित्य भी गुटबंदी का शिकार हो चुका है , साहित्य अकादमी के पद पर आसीन व्यक्ति हर उस लेखक को सरकारी आयोजन में नहीं बुलाता जो उसको पसंद नहीं है। जिनको लोग समझते हैं कि अच्छे साहित्यकार हैं तभी पद पर हैं कई बार वो लेखक ही नहीं होते।

                    वापस मूल विषय पर आते हैं। हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरुद्वारे किसलिये जाते हैं , अक्सर ये याद नहीं रहता। क्या हम ईश्वर को देखने गये थे , दर्शन करने , स्तुति करने या केवल अपनी बात कहने।  कभी कुछ मांगने तो कभी कुछ मिलने पर धन्यवाद करने। कितनी बार तो हम श्रद्धा से नहीं किसी भय से या अपराधबोध से जाते हैं। कभी काश ये सोच कर जाते कि आज अपने भगवान का हाल-चाल पूछेंगे , कि वो कैसा है और वो बताता कि कितना बेबस है परेशान है अपनी दुनिया को देख कर। हम जो अपनी दुनिया में ये शिकायत करते हैं कि अब बच्चे स्वार्थी बन गये हैं , मां बाप से क्या पाया है कभी सोचते ही नहीं , हर दिन मांगते रहते हैं और अधिक , लौटाना जानते ही नहीं। भगवान को भी तो ऐसा ही लगता होगा कि हम कभी खुश ही नहीं होते , उसने कितना दिया है , क्या क्या दिया है , हम हैं कि सब अपने पास रख लेना चाहते हैं। भगवान को नहीं चाहिये हमसे कुछ भी , मगर हम इतना तो कर सकते थे कि जितना हमें मिला उसका आधा ही हम उसके नाम पर लौटा देते उनको देकर जिनके पास कुछ भी नहीं है। ऐसे हमारा आस्तिक होना किस काम का है , जब हमने धर्म की किसी बात को जीवन में शामिल किया ही नहीं।

                  यही हाल तो है साहित्य का भी। समाज के दुःख दर्द पर लिखना , क्या इतना ही काफी है। क्या हमें दूसरों के दुःख दर्द से वास्तव में कोई सरोकार भी है। करते हैं प्रयास किसी की परेशानी दूर करने का। सब से पहले हर लिखने वाले को चिंतन करना होगा कि जैसा उसका लेखन पढ़कर प्रतीत होता है क्या वो वैसा है। अधिकतर किसी का लेखन पढ़कर जो छवि मन में उभरती है , जब नज़दीक जाकर मिल कर देखें तो वह सही नहीं दिखाई देती। प्यार की , संवेदना की , मानवता की , परोपकार की बातें लिखने वाला अपनी वास्तविक ज़िंदगी में कठोर , निर्दयी और आत्मकेंद्रित होता है। ईर्ष्या , नफरत , बदले की भावना को मन में रख कर उच्चकोटि का साहित्य नहीं रचा जा सकता। जिसको देखो खुद को महाज्ञानी समझता है , खुद को सब कुछ जानने वाला समझना तो सब से बड़ी मूर्खता है। समझना है तो ये कि अभी हम कुछ भी नहीं जानते और जानने को कितना कुछ है। ढाई आखर प्रेम के पढ़ना बाकी है अभी। 
 

     नेपथ्य और मंच :-  

  कविता ग़ज़ल नहीं मंच पर बेकार अनावश्यक बातें चुटकले तक और सभाओं में भाषण में तथ्य रहित झूठी बातें तालियां और अपने स्वार्थ हासिल करने को धर्म को आडंबर बनाने की बात जैसे कोई मदहोशी में विवेक खो बैठा हो ऐसा लगता है। आपको अपनी विरासत पर गर्व होना उचित है मगर साथ ही आपको पुराने इतिहास की गलतियों को सबक की तरह लेना चाहिए और किसी किताब में लिखी कहानी को आधुनिक युग में सही या गलत है इसे समझना चाहिए। जीवन बदलने और चलते रहने का नाम है ठहरने का नहीं बहता पानी स्वच्छ रहता है ठहर गया तो गंदला होने लगता है। अपनी पीढ़ियों की अनुचित परम्पराओं कुरीतियों को छोड़ना चाहिए। आखिर कब तक सदियों पुरानी जाति धर्म की भेदभाव की आपसी टकराव की नफरत की बातों का बोझ ढोते रहना है। सत्यमेव जयते और सभी जगत के लोग अपने हैं वास्तविक आदर्श त्याग हम खुदगर्ज़ समाज बन गए हैं।