Sunday, 16 August 2020

अपना नहीं है बेगाना है , देश मुसाफिरखाना है ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

    अपना नहीं है बेगाना है , देश मुसाफिरखाना है ( अजब-ग़ज़ब ) 

                                       डॉ लोक सेतिया 

    दो तरह के लोग हैं पहले जो लूटते हैं और बाकी दूसरे जो लूटने की आरज़ू रखते हैं। सभी को पाने की हवस है किसी के पास मुझे देने को कुछ भी नहीं है। जैसे कोई पुरानी हवेली जिसका रखवाला कोई नहीं है जिसे भी जो दिखाई देता है जो भी हाथ लगता है उठाकर ले जाता है। सत्ता वाले सरकार कहलाने वाले बनाने की बात कहते हैं बनाते नहीं जो बनाया हुआ है उसको बर्बाद करते हैं मेरी बुनियाद को ही उखाड़ने लगते हैं। मेरी बर्बादी को देख कर कोई हैरान परेशान नहीं होता है फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते हैं मगर कोई इंसान नहीं होता है। बस दीवारें हैं खिड़की नहीं दरवाज़ा नहीं और कोई आजकल रौशनदान नहीं होता है। मुसाफ़िर आते जाते हैं मगर उजड़े मुसाफ़िरख़ाने में ठहरने को मुसाफ़िर के कोई सामान नहीं होता है। हर कोई कहता है मुझे तुझसे मुहब्बत है भला मुझको शिकायत की ज़रूरत है। समझ आती नहीं किसकी कैसी ये चाहत है मुझे बर्बाद मत करना बस इतनी सी मेरी हसरत है। हज़ारों साल से तकदीर ने मुझको रुलाया है कभी उसने कभी इसने गुलाम मुझको बनाया है। कोई गांधी कोई सुभाष भगत सिंह कोई बिसमिल मुझे छुड़ाकर जंज़ीरों से बस ऐसे दीवानों ने हंसाया है। मगर उनको बताये कौन अब ज़माना जो आया है आंसू खून के मुझे रुलाया है सताया है।

       कहावत है कि इतिहास की नज़रों ने वो मंज़र भी देखा है लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। किसी देशभक्त नेता ने अपने दल के किसी नेता के दंगे करवाने के अपराध को अनदेखा किया था बस उसको नसीहत दे दी थी राजधर्म निभाने की खुद अपना राजधर्म निभाते तो अच्छा था। बस इक परंपरा चलती रही अपनों के सभी गुनाह माफ़ करने की और समाज अपराध की ऐसी दलदल में डूबता जा रहा है कि बचाने वाला कोई भी नहीं है। उनकी अकेले की बात लाखों लोगों को ऐसी समझ आई कि देश से बढ़कर लोग व्यक्ति की आराधना करने लगे हैं। सबकी आंखों पर पट्टी बंधी है झूठ को सच कहते हैं सच को देखते नहीं हैं जानकर भी। कोई नेता अधिकारी जब किसी चोर को रिश्वत लेकर छोड़ता है तो उसे बढ़ावा देकर डाकू लुटेरा ही नहीं खुद अपने भी कातिल बनाने का अपराध करता है। जब कोई गुनहगार मुठभेड़ में मारा जाता है तब भी ऐसे गुनहगार बनाने वाले अपना काम करते रहते हैं। लोग भी अपनी पहचान वाले दोस्त अथवा रिश्तेदार के गुनाहों में उनका बचाव करते हुए साथ नहीं देते बल्कि उनकी ज़िंदगी को बर्बाद करने में भागीदार बनते हैं। हमारे ऐसे गुनाहों का कोई तो हिसाब कहीं पूछेगा अवश्व अन्यथा फिर दुनिया में कोई भगवान नहीं है।

        भगवान के मंदिर बनाने की बात याद आई तो विचार किया क्या मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर सदभावना से बनाये जाते हैं या फिर कोई लड़ाई लड़ कर इस बात का अहंकार रखते हुए धर्म स्थल की आधारशिला रखते हैं कि हमने जीत कर हासिल किया है ये अधिकार। कहते हैं कोई विजय पराजय से भी बुरी होती है अगर जीते हों जोड़ तोड़ साम दाम दंड भेद से या किसी भी अनैतिक तरीके से। हम जो भी चाहे इमारत को कह सकते हैं लेकिन ईश्वर कहां रहते हैं किस जगह निवास करते हैं उनकी मर्ज़ी है। भगवान किसी के बंधक नहीं हैं। भगवान कण कण में रहते हैं और भगवान एक ही हैं आपने ईश्वर को समझा नहीं पहचाना नहीं और उसके रंग रूप वेशभूषा से मान लिया कोई भगवान  किस का है जो आपके अनुसार नहीं दिखाई देता उसको भगवान नहीं मानकर बाहर निकाल दिया। आप धोती कुर्ता पहनते हैं कभी कोट पैंट या जीन शर्ट डाल ली तो आपके बच्चे आपको घर से बाहर निकाल सकते हैं क्योंकि आपका लिबास बदला हुआ है। आखिरी सबक सभी समझते हैं जानते हैं मां से बढ़कर भगवान भी नहीं है कोई इंसान या चाहने वाला या कोई भी आपका सहायक उस से बढ़कर नहीं हो सकता है। अपने देश की जन्मभूमि को माता कहते हैं मानते हैं उसकी जय बोलते हैं। मां के सभी बेटे बेटियां इक समान हैं जो बच्चे अपने ही भाई बहनों देशवासियों से प्यार नहीं करता उनसे कोई माता खुश नहीं हो सकती है। और हर धर्म बताता है अपनी माता को दुःख देने वाले से भगवान कभी खुश नहीं हो सकते हैं। मां के चरणों में स्वर्ग है जन्नत है।

    आपको घर से लगाव प्यार हो तो आपको घर में रहने वालों से मुहब्बत होती है लेकिन जिनको घर भी मुसाफिरखाना लगता है उनको अपने मतलब अपने सुख सुविधाओं से सरोकार होता है। ऐसे लोग घर में रहते हैं उसको सजाते संवारते नहीं उपयोग करते हैं। घर से लगाव प्यार होता है तो घर का सामन बेचते नहीं बनाया करते हैं पुरखों की बनाई चीज़ों को संभाल कर रखते हैं तोड़ते फोड़ते नहीं कभी भी। देश को कुछ लोगों ने सराय समझ लिया है लगता है।

1 comment:

Sanjaytanha said...

बहुत बढ़िया लिखा है sir👍