Monday, 27 July 2020

अब मंदिर भगवान से बड़ा हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अब मंदिर भगवान से बड़ा हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

भगवान छोटे हो गए उनका मंदिर बड़ा हो गया है। भगवान हमेशा से थे मगर किसी ने ये भरोसा नहीं जताया कि वो कोरोना को खत्म कर देंगे बल्कि उल्टा समझा समझाया गया कि मंदिर भगवान के भरोसे मत रहना कोरोना उनसे भी फैल सकता है दरवाज़े ही बंद किये मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा सभी ने। ये अब अचानक जाने कैसे किसी को पता चला है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन होते ही कोरोना का अंत हो जाएगा। अच्छा है ये नहीं कहा कि अभी तक मंदिर नहीं बनाया इसी से भगवान ने कोरोना को भेजा समझाने को। मंदिर और ऊंचा और चौड़ा और अधिक गुंबद वाला होगा ये भी राम जी को खुश करने को बहुत है जैसे बकाया धन ब्याज सहित लौटाना। नारद जी सोचते होंगे नारायण नारायण नहीं मंदिर मंदिर जपना फायदे का है सत्ता भगवान के नाम से नहीं उसके मंदिर निर्माण की बात से मिलती है। भगवान कोई भी कोरोना में किसी काम नहीं आये मगर मंदिर बड़े काम आएंगे लगता है। कुछ लोग किसी नेता के भक्त बन गए हैं उनको लगता है जिस किसी ने भी उन नेता जी को उनके दल को वोट डाला उन सभी का नाम राम मंदिर बनाने वालों में शामिल हुआ है। भगवान राम किसी एक राजनीतिक दल के होकर रह गए हैं जिनको सत्ता पाने को राजनीति में आगे बढ़ने को कोई तथाकथित ढांचा गिराने का अपराध करना भी धर्म लगता है। विवादित जगह पर घर बनाना शायद कोई नियम कानून पालन करने वाला नहीं चाहेगा मगर ये तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर उसी जगह बनाने की ज़िद को जाने किस मर्यादा और धर्म का नाम देते रहे हैं। भगवान राम को नहीं जानते समझते बस मंदिर मंदिर रट लगाते हैं।

अपने देश के लोगों की जान बचाने के काम से बढ़कर अच्छा दान धर्म का काम कोई और नहीं हो सकता है। देश की सरकार आर्थिक संकट से गुज़र रही है कोरोना से लड़ने को सभी से दान मांगने के बाद विश्व बैंक से सबसे बड़ा क़र्ज़ ले रही है कोरोना से बचाव के लिए ही। ऐसे में ये धन जो राम मंदिर बनवाने पर खर्च किया जाएगा क्यों नहीं देश की आबादी को कोरोना से बचाव और गरीबी भूख जैसी समस्याओं के समाधान पर खर्च किया जाना चाहिए। लगता है सभी सच्चे मानव धर्म की बात भूल गए हैं भगवान घट घट में कण कण में बसते हैं मन में रहते हैं राम को राजपाट की चाहत नहीं थी। सत्ता की राजनीति को भगवान राम या किसी भी धर्म से अलग रखना चाहिए। उधर जिनके तथाकथित धर्मगुरु अपराध करने पर जेल में सज़ा पा रहे हैं उनके भी भक्त अपने गुरु को न केवल रिहाई देने बल्कि उनसे माफ़ी मांगने को कहते हैं ये दावा करते हैं वो ही कोरोना का अंत कर सकते हैं। ये कोरोना मतलबी लोगों को अवसर लगने लगा है कोई कोरोना की दवा खोजने का झूठ बोलकर कारोबार करना चाहता था तो किसी को कोरोना का भय दिखाना भी धर्म लगता है। धर्म क्या है धर्म उपदेश देने वालों ने ख़ामोशी रखना उचित समझा है ये कैसा धर्म है जिसकी कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती मगर शोर बहुत मचा हुआ है। संकट के समय समस्या का हल तलाश किया जाता है दुनिया कोरोना की दवा वैक्सीन ढूंढ रही है और हम ऐसे समय मंदिर की बात करते हैं जैसे कोई मंदिर कहीं पहले नहीं है। भगवान का महत्व मंदिर होने से बढ़ता नहीं है भगवान को कोई कुछ नहीं दे सकता न उसको मंदिर की ज़रूरत है। मंदिर जिनकी चाहत है उनको भगवान को समझना पहले चाहिए जो लगता नहीं उनको किसी मर्यादा की चिंता है उनको भगवान की चाहत होगी।

रामायण के भगवान राम बन में रहते हैं महल में आने के बाद भी पत्नी बिना सुख साधन उपयोग नहीं करते धरती पर बिछौना बिछा कर सोते हैं। उनके नाम के मंदिर के विशाल भवन की शुरुआत ऐसा शासक करेगा जिस ने विलासितापूर्ण ढंग से जीने पर देश का खज़ाना जमकर लुटाया है जिसने मन की बात नहीं की मनमानी करने का इतिहास बनाया हो। कलयुग में जिसे लोगों ने खुद वोट देकर चुना बनाया हो जो अच्छे दिन दिखलाने के झांसे देकर सत्ता पाया हो और दिन पर दिन मुश्किलें जनता के लिए खड़ा करता लाया हो। खुद सैर सपाटे और झूले झूल दिल बहलाया मौज उड़ाया हो। आडंबर दिखलाने का किर्तिमान बनाया हो और झूठ बोलने का अपनी कही बात बदलने का खेल खेला खिलाया हो। राम मंदिर की पहली ईंट उस से रखवानी चाहिए जिस ने राम नाम की धुन पर सादगी से जीवन बिताया हो। मगर यहां सभी संत महत्मा शाही शान दिखाते हैं औरों को लोभ मोह अहंकार छोड़ने की कथा सुनाते हैं खुद धर्म के नाम पर क्या क्या बड़े बोल सुनाते हैं जो उनकी बात नहीं माने उस पर वाण चलाते हैं।

राम लला बचपन के हैं भगवान उनको कौन जाने क्या भाएगा कृष्ण कन्हैया गोकुल में मिट्टी कैसे खाएगा जब उसको भी पत्थर की हवेली में झूले पर बिठाया जाएगा। राम क्या हैं कृष्ण कौन है गीता क्या रामायण क्या छोड़ो उनकी बात को राम मंदिर किसने बनवाया लिखवाएगा। ये ताजमहल ऊंची मूर्ति क्या इनसे धर्म बढ़ाओगे पहले ढूंढो हैं राम कहां कैसे उनको समझाओगे वो राम नहीं मानेंगें कभी उनके बंदे बेघर बर्बाद रहें तो राम कैसे शहंशाह बनकर ऐसे महलों में आबाद रहें। राम सभी के राम हैं ये लगते हैं सत्ता और धनवानों के भगवान हैं। जो जतलाते हैं बनवा मंदिर बढ़ाई अपनी झूठी शान हैं जिस को समझे मालिक हैं हम इस घर के कुछ दिन को यहां महमान हैं। मंदिर बनने से पहले ही दीप जलाओ कहते हैं जाने ये कैसे लोग हैं किन परंपराओं की राह पे चलते हैं। अपनी सुविधा से अपने मापदंड बनाये हैं सीता माता की याद नहीं हनुमान जी को भुलाए हैं। शायद सोने की सीता जैसा कोई सोने का राम बनाओगे सोने के झूले में सोने का बिस्तर लगवाओगे राम लला कहते हैं क्या ऐसी सेज पर सुलाओगे रातों को नींद नहीं आएगी जगवाओगे और तड़पाओगे। लोरी तुमको आती नहीं तुम हर घड़ी शोर मचाओगे। राम सच है मगर सच बोलना बड़ा मुश्किल है जुर्म है शासक सत्ता का सच बताना भी।  अभी तक शुभ घड़ी उसको मानते थे जब जिस पल भगवान का जन्म हुआ राजतिलक हुआ अयोध्या आगमन और रावण पर विजय। मगर अब राम मंदिर का भूमिपूजन करने को शुभ मुहूर्त ढूंढ लिया है कितना बदल गया इंसान। मंदिर बड़ा हो गया है छोटे रह गए हैं भगवान उनकी बढ़ गई है शान।

चलो इक ग़ज़ल सुनते हैं।

पूछते सब ये क्या हो गया ( ग़ज़ल )

डॉ लोक सेतिया "तनहा"


पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया।

3 comments:

Pammi singh'tripti' said...


आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 29 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Ananta Sinha said...

आदरणीय सर,
बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। हर पंक्ति का भाव उभर कर आता है और मन को छू जाता है।

Sanjaytanha said...

ये बढिया शानदार लेख है