Monday, 30 December 2019

तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया

 तुम नहीं मालिक मेरी है ये दुनिया ( अध्यात्म ) डॉ लोक सेतिया 

                आपको समझना है धर्म क्या है और ईश्वर अल्लाह खुदा भगवान क्या है। चलो आज मिलकर उसी से पूछते हैं जिस ने दुनिया बनाई है। आपको बाहर नहीं नज़र आएगा अपने भीतर झांकना है। आंखें बंद करते हैं और सुनते हैं इक आवाज़ सुनाई दे रही है , अगर आपको सुनाई नहीं दे रही तो आपका विश्वास अभी पूर्ण नहीं है। आवाज़ आ रही है , ये जो सब धर्म धर्म का शोर है कौन कर रहा है धर्म वालों को खुद नहीं पता मैं कौन हूं। उनको ऊपरवाला इक सामान जैसा लगा जिसको बाज़ार में बेचकर इनको अपने स्वार्थ साधने हैं। इक बात बड़ी आसान है और सीधी भी कि मेरी मर्ज़ी से जन्म मृत्यु से लेकर सभी कुछ होता है निर्माण विनाश सब कोई और नहीं कर सकता है जो लोग मिट्टी के खिलौने बनाना जानते हैं खुद को निर्माता मानते हैं मगर उनकी बनाई रचना को पल भर में जो मिट्टी बना देता है उस का उनको पता ही नहीं है। इंसान विज्ञान लाख कोशिश कर ले जीवन का संचार कदापि नहीं कर सकता है। धर्म के नाम पर दंगे फसाद क़त्ल करने वाले सिर्फ गुनाहगार हो सकते हैं परमात्मा को समझने वाले नहीं। मैंने किसी इंसान को क्या पशु पक्षी पेड़ पौधे भी बनाने में कोई भेदभाव नहीं किया है और जो आदमी आदमी में अंतर करते हैं झगड़ा करवाते हैं उन्हें क्या समझ अच्छाई और सच्चाई किसे कहते हैं। रटते हैं ईश्वर सत्य है मगर सच बोलने का साहस नहीं और झूठ को सच साबित करते हैं। 

           अदालत में मुकदमा चल रहा था मंदिर मस्जिद के झगड़े को लेकर। हर कोई किसी को अपराधी मानता है अपने अपने खुदा ईश्वर का घर तबाह करने का और गर्व करते हैं खुद किसी की इबादतग़ाह को तोड़ने का। अदालत जाने किस किस को पक्ष बनाती है असली पक्षकार का कोई नाम तक नहीं जानता। मुझ ऊपरवाले से नहीं पूछते सच क्या है मुझे क्या चाहिए। भला मुझे इन सभी इमारतों की क्या ज़रूरत है और कब किस को मैंने अपना हितेषी या वकील घोषित किया है। मुझे कोई चढ़ावा कोई इबादत कोई दान कोई वस्तु इन से क्यों चाहिए जिनको सभी को खुद मैंने बनाया है और दिया है जो भी जिस के पास है। क्या मुझे नासमझ समझते हैं जो खुद हज़ार देकर एक मांगता हो उसी से जिसे दे दिया। ये तो विश्व की जनता है जो अपने अपने देश की सरकार से अपने दिए धन का छोटा सा हिस्सा भीख की तरह मांगती रहती है। इन धर्म वालों ने मुझे भी राजनेताओं की तरह ठग बनाने का काम किया है ये कहकर कि धार्मिक स्थल बनाने को या कोई आडंबर अनुष्ठान करने को पैसे सामन देकर मुझे खुश कर सकते हैं। अदालत किसी को नियम तोड़ने का दोषी घोषित करती है किसी को अपराधी या क़ातिल। मगर क्या किसी ने विचार किया कि मैं अपनी मर्ज़ी से जिसे भी जब चाहूं अपने पास बुला लेता अथवा उसका जीवन का अंत कर देता हूं। भगवान की मर्ज़ी है कहने के इलावा कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी भी देश की किसी भी अदालत में कोई केस दायर नहीं हो सकता है। आंधी तूफ़ान भूकंप बाढ़ कितनी आपदाओं को मेरे नाम करते हैं फिर कोई तो मेरे ख़िलाफ़ एफआईआर लिखवाता कहीं। मगर ये सब होता इंसान की अपनी गलती से है। 

    विधाता एक ही है और एक ही हो सकता है फिर किसने नाम बदल कर अपने अपने भगवान देवी देवता घोषित कर लिए हैं। वास्तव में उनको ईश्वर को समझने जानने की चाहत नहीं थी उनको मेरे नाम का दुरूपयोग करना था अपने मकसद हासिल करने को। उनको लगता है कोई ऐसा नहीं है और होगा भी तो ऊपर बैठा आराम करता होगा उसे क्या करना कोई क्या कर रहा है। मगर कहते हैं ऊपरवाला जानता है सब देखता है अगर ये भरोसा करते तो फिर मुझे लेकर नफरत का धंधा नहीं करते। उपदेश देते हैं औरों को जिन बातों को लेकर खुद उन्हीं पर नहीं चलते हैं। धरती पर आये हैं कुछ लोग जिन्होंने चिंतन और मनन और अध्यन से समझना चाहा समझाना चाहा जैसे नानक जैसे विवेकानंद जैसे लोग या किसी भी धर्म की शुरुआत करने वाले गुरु मगर बाद में उन्हीं के अनुयाई चेले खुद को भगवान बताने लगे और सत्य की खोज ईश्वर की तलाश छोड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा बनाने लगे। कोई बुत कोई मूर्ति कोई शब्द लिख उसको पूजा ईबादत का साधन बना लिया बिना समझे कि जिसने दुनिया बनाई कोई भी उसको नहीं बना सकता है। ये दुनिया बनाने वाले को बनाने वाले बन बैठे हैं मगर मुझ दुनिया बनाने वाले का कोई अंत नहीं है कोई ओर छोर नहीं शुरुआत नहीं जानते पर इनका जन्म इनका अंत मेरी इच्छा से है। 

अब आप समझना चाहते हैं आपको क्या करना है पूजा आरती ईबादत और कैसे मुझे खुश करना है। नहीं मुझे कोई अपना गुणगान नहीं करवाना है कोई चढ़ावा कोई उपहार कोई घर रहने को नहीं चाहिए। मैंने आप सभी को इंसान बनाया है आपको अच्छे कर्म करने हैं अच्छे इंसान बनकर जीना है। कोई आपसी भेदभाव बड़े छोटे का धर्म जाति का रंग का देश का नहीं रखना है। नफरत की जंग की  अहंकार की सब बातें छोड़कर प्यार से मिलजुलकर रहना और अपने पास अधिक जमा नहीं कर बांटकर खाना इक दूजे के सुःख दुःख को समझना इंसानियत का पालन करना यही आदेश है उपदेश है और मुझे पाने को खुश करने को यही रास्ता भी है।

Saturday, 28 December 2019

दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया

  दान का चर्चा है कमाई पर पर्दा है ( कड़वी बात ) डॉ लोक सेतिया 

कल की बात कोई सुनी सुनाई नहीं सामने देखी और खुलकर समझी समझाई बात है। इक बड़ा सा विज्ञापन लगा था किसी आयोजन का सत्ताधारी नेता का नाम फोटो मुख्य अतिथि के रूप में दे रखा था। जो लोग आयोजन कर रहे थे उनसे जाकर पहचान की अपना परिचय दिया। आप लेखक हैं पचास हिंदी अख़बार मैगज़ीन में चालीस साल से रचनाएं छपती हैं हमारे साथ जुड़ें आपका स्वागत है। मैंने कहा पहले आप मुझे समझ लें मैं भी आपको जान लेता हूं और तमाम वास्तविक घटनाओं की बात हुई। उनकी जानकारी पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहता मगर फिर भी जब विषय आया सत्ताधारी नेताओं अधिकारियों के गुणगान का तो कहना पड़ा मुझे नहीं आता ये काम। उनको शायद इस की उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसा भी बेबाक सच कह सकता है , मैंने कहा आपने जिनको मुख्य अतिथि बनाया है उनको जो उपहार देने वाले हैं उनकी किस विशेषता को देखकर। समाज को देश को उन्होंने क्या दिया है बल्कि सत्ता पर रहते खूब ऐशो आराम से देश सेवा के नाम पर शान से रहते हैं। अपने उनके सचिव से जो मोलभाव किया है सांसद निधि से आपको धन मिलने का बाकायदा इक हिस्सा उनके दल को देने का वो भी बिना किसी रसीद या चेक द्वारा न देकर नकद दो नंबर से ही वास्तव में देश भर में चलते भ्र्ष्टाचार का ही उद्दाहरण है। मैंने उनको बताया कि कभी हमारे शहर के उपायुक्त ने तबादला होने पर खुद मुझे फोन किया घर बुलाया था और जाने पर कुछ हज़ार का इक चेक थमाया था सरकारी खाते से और ऐसा अन्य सौ लोगों को सहायता के नाम पर दे रहे थे बदले में उनको विदाई करते हुए सम्मानित और पुरुस्कृत करने की बात थी। मैंने उनको चेक लौटा दिया था और हमने विदाई में उनको स्मृति चिन्ह दिया था सदस्यों ने अपने पास से राशि खर्च कर के क्योंकि वो हमारे लेखक सदस्य थे संस्था के। 

      यहां कल की इक और बात याद आई है मोदी जी के इक अंध समर्थक ने लिखा मुझे भेजा व्हाट्सएप्प पर कि मोदी जी ने पिछले पांच साल में उनको मिले उपहार और इनाम की राशि दान कर दी है। साथ ये भी था पिछले सत्ताधारी दल वालों ने कितना दान किया था बताओ। उनकी जानकारी सोशल मीडिया से हासिल की हुई है न उन्होंने देश के पिछले इतिहास को पढ़ा न कभी समझने की कोशिश की है। पहली बात उनको धर्म की जानकारी बहुत होने का दावा है तो समझ लेना चाहिए दान देकर इश्तिहार देना दान नहीं नाम पाने को कारोबार कहलाता है जो तमाम लोग करते हैं। वास्तविक दान कहते हैं एक हाथ से दो और दूसरे को भी
पता नहीं चले ऐसा होना चाहिए। मगर इस परिभाषा को भी छोड़ देते हैं हालांकि आखिर में रहीम और गंगभाट का वार्तालाप फिर दोहराना होगा। मोदी जी को देश विदेश से जो भी उपहार मिले हैं कोई खैरात में नहीं मिले अगर उनकी काबलियत से मिलने होते तो राजनेता बनने से पहले ही मिल जाते। उनके हर ऐसे उपहार की कीमत देश ने चुकाई है उनको जिन्होंने भी उपहार दिए बहुत कीमत वसूली है जो हम आप नहीं जानते हैं। उनकी सारी शोहरत देश के ख़ज़ाने को खर्च नहीं बर्बाद कर के हासिल की गई है। इक बात आपको कोई नहीं बताएगा कि जब नेहरू जी देश के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने अपनी सब जायदाद देश को दे दी थी जिसकी कीमत का आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं क्योंकि जैसा सब जानते हैं उनके पिता और दादा इतने बड़े अमीर थे जो नेहरू को विदेश भेजा था शिक्षा पाने को। उनकी काबलियत और देश को आधुनिक बनाने ही नहीं देश में लोकतंत्र स्थापित करने में उनका योगदान ऐसा महान कार्य है जो आजकल के तथाकथित महान नेता करना तो क्या उसको सुरक्षित तक रखने को सक्षम नहीं हैं। मोदी जी ने खुद पर अपने नाम का शोर का डंका पीटने पर देश का पैसा बर्बाद किया है जिस का कोई हिसाब नहीं है। कोई नहीं बताएगा उनके खुद के रहन सहन सैर सपाटे पर कितना खर्च किया गया 375 करोड़ केवल विदेशी दौरों में किराए के विमान पर खर्च हुए ये साल पहले जानकारी मिली थी। देश में 75 शहरों में भाजपा के दफ़्तर बनाये गए हैं जिन पर कितना खर्च हुआ और वो पैसा किस ने कैसे दिया कोई नहीं जान सकता क्योंकि उन्होंने अपने लिए नियम कानून बदल दिए थे दल को विदेशी दान की बात गोपनीय रखने से। 

आप उसको देश सेवा नहीं कह सकते जिस में आप करते क्या हैं नहीं पता मगर आपको सरकारी खज़ाने से अपने धार्मिक दान देने की अनुमति है। गुजरात से दिल्ली आते हुए भी दावा किया गया था कुछ लाख जो बचत थी मोदी जी दान कर आये थे। और आने के महीने बाद नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर जाकर 2500 किलो चंदन की लकड़ी करोड़ रूपये की दान दे आये थे। आपको मालूम है धर्म आपको दान अपनी ईमानदारी की कमाई से करने की हिदायत देता है जो पैसा भारत सरकार के खज़ाने से खर्च हुआ मोदी जी उस दान को अपने नाम से संकल्प लेकर नहीं दे सकते थे और संकल्प कोई संस्था संगठन नहीं व्यक्ति करता है। आप को पता है मोदी जी के चुनाव आयोग को दिए ब्यौरे में कितना धन दौलत है उनके पास देख लेना। जिस ने 35 साल भीख मांग कर पेट भरा ऐसा बताया गया और वेतन भी दान दे देते हैं उनके पास पैसा कैसे जमा है कोई जादू की छड़ी या अलादीन का चिराग़ है तो उस से देश के करोड़ों लोगों की गरीबी मिटाते। आपको सच नहीं बताया जाता है फिर भी जिस पर रोज़ लाखों रूपये राजसी शान से जीने पर खर्च होते हैं उस जैसी देश सेवा और गरीबी कौन नहीं चाहता करना। ये सब माफ़ होता अगर देश की जनता को अच्छे दिन न भी मिलते ऐसे बदलाल खराब दिन तो नहीं भोगने पड़ते। कहने को बहुत है मगर जिनको नहीं समझना कितना विवरण दे कर भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है। 

   रहीम इक नवाब से कवि थे मगर रईस थे और दान दिया करते थे दरबार में जो भी ज़रूरतमंद मांगने आता। उनकी दरबार के इक सदस्य कवि गंगभाट थे , उनहोंने ध्यान दिया कि दान देते समय रहीम अपनी नज़रें ऊपर नहीं रखते झुकाये रहते हैं। विचार किया और इक दोहा पढ़कर सवाल किया था। 

सिखिओ कहां नवाब जू ऐसी देनी देन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

रहीम ने उनके दोहे का जवाब दोहा पढ़ कर दिया था। 

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन। 

बात मोदी की हो या किसी भी सत्ताधारी शासक की उनके इश्तिहार उनकी जिस बढ़ाई की चर्चा करते हैं कि मनोहर उपहार या मोदी योजना अदि बेहद अनुचित और धर्म नैतिकता के विरुद्ध है क्योंकि जो भी खर्च किया जाता है उनकी खुद की कमाई नहीं देश राज्य की आमदनी से किया जाता है।

Friday, 27 December 2019

प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया

 प्यास नहीं पीने को बहुत है ( आजकल का समाज ) डॉ लोक सेतिया 

हर साल की तरह इस साल भी विचार करने लगा बीत रहे साल क्या पाया क्या खो दिया और भले निभा नहीं सकूंगा अगले वर्ष का संकल्प क्या होना चाहिए। पहली बात समझ आई सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर समाज की देश की गंभीर जागरूकता की बात करना। बचपन की सुनी बात याद आई कि आप हम या कोई भी बैल को तालाब पर ले जा सकता है मगर छी-छी कहने से पानी नहीं पिला सकते हैं। जिनको नहीं मालूम उनको बता देता हूं गांव में जानवरों को पानी के पास ले जाकर छी-छी बोलते हैं ताकि जानवर को इशारे से समझाया जा सके कि पानी पिओ। बात आजकल की है तो आजकल की तरह समझनी होगी , बाहर अंट शंट चाट पकोड़े जिसको गंद शंद कहते हैं चाव से खाते हैं पेट भरने से भी दिल नहीं भरता है और फिर कहते हैं थोड़ा ज़्यादा भर गया पेट आज अब कोई हज़्म करने को पाचक भी लेना होगा। यही हालत आजकल सभी लोगों की है अनाप-शनाप बोलते पढ़ते लिखते हैं व्यर्थ की बहस और अपने को जानकर साबित करने अन्य को मूर्ख अज्ञानी समझने की मानसिकता बन गई इसलिए भौंकते हैं सुनाई कुछ नहीं देता। ऐसे शोर में सार्थक संवाद संभव नहीं तभी सोचा है जिनको प्यास नहीं उनको पीने की बात कहना बंद यही अगले साल का संकल्प है। 

    मुझे सबसे अधिक प्यार जिन से है और जिनसे सच्चा प्यार मिला और जिनसे बहुत सीखा समझा जाना वो हैं मेरे दादाजी झंडारामजी और मां माया देवी जी। विशेष बात है दोनों को हमेशा अपने पर भरोसा रखते हुए देखा और जीवन की विषम समस्याओं में भी घबराते नहीं पाया। क्या लोग थे आज उनकी याद भी मुझे इक आशावादी एहसास देती है। जबकि उन दोनों का जीवन बेहद कठिन हालात में रहा होगा। दादजी दस साल के थे जब पिता का साया सर से उठ गया और मां को बचपन में कोई रोग माता का जैसा कहते हैं लगने से उनकी आवाज़ और सुनाई देने की शक्ति कम हो गई थी। उनकी शादी करने के बाद मायके के नाते रिश्ते नाम को साथ थे इक मामाजी और मामीजी को छोड़कर। हमारे घर अर्थात ससुराल में दादाजी की छोटी बहु का रुतबा किसी असहाय और खामोश गाय की तरह था। पिता जी अवश्व उनका ख्याल रखते थे मगर उन्होंने कभी नहीं समझना चाहा उनकी पत्नी को घर में समानता बराबरी का अधिकार नहीं मिलता है। शायद उनकी काबलियत जानकर भी काबिल समझना नहीं चाहते थे लोग। फिर भी मां को शायद ही कभी किसी से तकरार करते देखा उदास नहीं देखा हमेशा इक सहज मुस्कान उनके चेहरे पर रहती थी। मैंने इक बार उनकी आंखों में आंसू देखे थे मगर तब भी उन्होंने मुझे कारण नहीं बताया था। किसी की बुराई करते नहीं देखा उनको अपने बच्चों से शिकायत भी हंसते हुए लहज़े में करती थी , तुम्हें नहीं मिलती फुर्सत कि बहु ने मिलने आने नहीं दिया और हंस देती। अपनी दो बहुओं से कभी कोई तीखी बात जीवन भर नहीं की आज भी दोनों याद करती हैं उनके सासु मां बड़ी मधुर सवभाव की महिला थी। 

  मां 80 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रही हमेशा। सभी बच्चे दिल से चाहते थे और उनकी हर बात आदेश समझ प्यार से मानते थे। अपने व्यवहार से अपने घर को बिना आदेश देने की आदत घर की महारानी जैसा रुतबा पा लिया था। जबकि विवाह कर आई थी जैसे कोई वजूद ही नहीं था। मां चिट्ठी लिखती थी अर्थात पढ़ी लिखी थी और गाया करती थी इक भजन जो अपने आप में इक मिसाल था। मैंने याद कर उस भजन को लिखा हुआ है ब्लॉग पर , उस भजन जैसा कोई और भजन मैंने नहीं सुना आज तक। भगवन बनकर अभिमान न कर तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने। तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। कोई ऐसे कह सकता है ईश्वर है इस बात पर अकड़ना मत तुझे मानते हैं हम तभी है ये ध्यान रखना। शायद सच्चा आस्तिक और भक्त जिसे पूर्ण विश्वास हो वही कह सकता है। कोई डर नहीं घबराहट नहीं जैसे अपने करीबी दोस्त बेहद अपने से प्यार से बात करते हैं। उनको धागे से कुरेशिये से कितनी तरह के रुमाल बनाने की बड़ी खूबसूरत कला आती थी जो कम महिलाओं को आती थी और इतने लाजवाब ढंग डिज़ाईन कि हर कोई कहता था चाची जी मुझे भी बना दो और सबकी चाची उनको बना देती थी महीने लगते थे। भोली थी और लोग भोलेपन को नासमझी समझने की भूल करते हैं मगर हम हैरान हो जाते थे जब जो पुरानी बात किसी को याद नहीं होती वो बताती थी ये उस दिन उस जगह उस तारीख़ की बात है। मिला जुला संयुक्त परिवार था और बारह भाई बहन की सबकी जन्म की तिथि बताती थी और बचपन की बातें भी। मेरा भरोसा है और दावा भी कि दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं हो सकता जो ये कह सके कि मेरी मां ने कभी उसके या किसी के साथ कोई अनुचित व्यवहार किया हो। इस से बढ़कर तपस्या नहीं हो सकती कि भले आपके साथ किसी ने कैसा भी अच्छा बुरा किया हो अपने कभी मन में कोई भेदभाव की भावना नहीं रखी हो। 

दादाजी भी 90 साल से अधिक जीवन जिया और बड़ी शान से रहे किसी शहंशाह की तरह। उनकी विशेषता थी बच्चों को भी नाम के साथ जी कहकर बुलाते थे। आवाज़ ऊंची शायद ही कभी होती मगर बात का असर कमाल का हुआ करता था। घर की बैठक या गांव की डयोढ़ी में बैठे होते तो हर कोई पांव छूकर आदर से दादजी नमस्कार कहते हुए भीतर जाता , कोई महमान आये जो रोज़ की बात थी तो बिना खाना नहीं जाने देते थे। अपने दम पर और अपने उसूलों पर चलकर बहुत बनाया मगर हर किसी को बांटते रहते थे। जाने कितने करीबी क्या दूर दराज के नाते रिश्ते वाले आये और बोला दादाजी कोई कमाई का साधन नहीं और उनको नौकर चाकर नहीं भागीदार बनाते गए। बहुत बार लोग धोखा देकर भाग जाते तब भी कोई शिकन नहीं आती थी माथे पर बस कहते उसका नसीब था जो ले गया। तायाजी और पिताजी को आदेश था जो बेईमानी कर चले गए कभी मिलें तो कोई बात नहीं कहना न वापस मांगना। और दोनों भाईओं ने ये बात हमेशा याद रखी निभाई भी। दादजी स्कूल नहीं गए थे मगर उनको इक भाषा जिसको लंडे कहते हैं लिखनी आती थी और हिसाब चुटकिओं में गिन लेते थे। मगर उनको धार्मिक किताबों को सुनने का बेहद शौक था और सभी भाई बहनों में ये मुझे ही करना होता था जब बाकी खेल कूद में लगे होते मैं दादजी की इच्छा पूरी करने को बैठा रहता और उनको शायद सबसे अधिक प्यारा भी लगता था। 

  बात हुई थी प्यास की और आजकल किसी को भी अच्छी मुहब्बत की बातों की चाहत नहीं है। इक दौड़ है आपसी खुद को सबसे अच्छा साबित करने की। ये बात कोई नहीं जानता कि वास्तव में सम्पूर्ण कोई भी नहीं है और अपने आप को ऐसा समझना नासमझी की हद है। मुझे बहुत सीखना है समझना है और करना भी है। अभी तक कुछ भी नहीं कर पाया , अब सार्थक करने को समय भी कम ही है। बात खत्म नहीं हुई विराम देता हूं बाकी अगली पोस्ट पर।

Wednesday, 25 December 2019

सोचिए क्या आप वापस जाना चाहते हैं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

  सोचिए क्या आप वापस जाना चाहते हैं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

  आजकल ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ मानवीय  पक्ष की बात कहने पर अपशब्दों का उपयोग करते हैं और उनकी भाव भंगिमा हिंसक दिखाई देती है। जिनको लगता है कि भारत एक कट्टर हिंदू देश होना चाहिए और बाक़ी धर्म वालों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाना चाहिए जिन्हें इक डर और असुरक्षा की भावना से जीना चाहिए। ये बेहद खेद और चिंता की बात है कि पिछले कुछ सालों में इस मानसिकता को बढ़ावा मिला है और तमाम संकुचित सोच वाले लोगों की दबी छुपी आंकाक्षा उभर आई है। मगर हैरानी इस बात की है कि जिस हिंदू धर्म की ये बात कहते हैं उसको इन्होने न तो पढ़ा है और न ही समझा है। स्वामी विवेकानंद का नाम सुना है उन्होंने विदेश जाकर अपने धर्म और विचारधारा को जिस तरह समझाया और विदेशी लोगों को प्रभावित किया उस को नहीं पढ़ा न जानते हैं। आओ पहले उनकी बात को सुनते हैं जो बताते हैं कि हम उस विचारधारा हिंदुत्व से हैं जिसने हमेशा सभी अन्य धर्म के लोगों और उनकी बातों को अपनाया है। 


क्या उनको बात से कोई असहमत हो सकता है। फिर भी जिनको लगता है उनको देश की हिंदुत्व की चिंता औरों से अधिक है और उनको किसी नेता की संकुचित मानसिकता पसंद है और बिना ये समझे कि देश और खुद उन्हीं के धर्म के लिए क्या उचित है जो किसी के अंधसमर्थक बने हैं जैसे कई लोग कभी किसी और के लिए यही समझते थे और   . . . . . .  इंडिया है और इंडिया  . . . . .  है कहते थे उनकी राह चलना चाहते हैं। उनको समझना होगा क्या विश्व आज सदिओं पुरानी गलतिओं को दोहरा सकता है और इसी तरह से अपने देश में किसी इक धर्म या वर्ग को स्थापित करने की बात कर सकता है। विश्व में कितने देशों में जो हिंदू सिख या अन्य धर्म वाले हैं उनको किनारे कर सकता है। क्या आप चाहते हैं बाकि देश भी इसी राह पर चल सके और उन देशों में रहने वाले हिंदू वापस देश आएं भले उनको यहां हासिल इक नफरत भरा समाज हो और कोई सुरक्षा देश की सरकार शिक्षा रोज़गार क्या शराफत से रहने को भी नहीं मुहैया करवाने को प्रतिबद्ध हो। जिस देश की राजनीति अपराधी सांसदों से भरी पड़ी हो और सत्ताधारी नेताओं को संगीन जुर्म करने पर सीबीआई तक बचाने का कार्य करती रही हो ये बाद देश की सबसे बड़ी अदालत को कहनी पड़ी है। अगर यही आपका हिंदू धर्म है जिस में भगवा धारण कर जो भी चाहे अपराध करने की छूट है तो आपको मुबारिक हो क्योंकि अपने ऐसे अपराधी नेताओं के खिलाफ कभी अपशब्द नहीं उपयोग किये मगर जो मानवता की बात कहते हैं उनको आप गाली देते हैं। नहीं देश को स्वामी विवेकानंद जी का हिंदू धर्म चाहिए उन का नहीं जिनको धर्म सत्ता की सीढ़ी लगता है।

    आप विदेश जाते हैं कई जाकर बसना चाहते हैं मगर आपकी संकुचित विचारधारा हर देश अपनाये तो क्या आपका विदेश जाना संभव होगा और जाकर बसना तो दुश्वार ही हो जाएगा। इतना ही नहीं आपको अन्य देशों से कारोबार भी बंद करना होगा , न आपकी कोई वस्तु विदेश बिकेगी न आपको किसी देश से कुछ भी मिलेगा। ऐसे देश हैं जो चीन की तरह सब अपना बनाते हैं उनको फेसबुक गूगल या व्हाट्सएप्प की कोई ज़रूरत नहीं है उनके पास खुद अपने बनाये विकल्प हैं। अगर इस तरह धर्म या किसी अन्य आधार पर विश्व से अलग संकुचित मानसिकता से चले तो आपका जीवन कठिन हो जाएगा। आपके पास बहुत कुछ है जो भारत में नहीं बनता है यहां तक की जिस पटेल की मूर्ति की बात करते हैं इस आधुनिक युग में वो भी हम अपने देश में नहीं बना पाए न ही बुलेट ट्रैन खुद बनाने की बात करते हैं। सोचना आपके देश के जिस नेता की नीति को आप पसंद करते हैं उसको विश्व के पचास देशों की सैर करने की ज़रूरत क्या थी। अपने देश के गांव शहर को जाकर समझते देखते तो कुछ मकसद भी था। लेकिन वो क
ठिन था और जाते हैं तो भाषण देने को आम लोगों से कोई संवाद नहीं करते हैं। उनको चाहत है विश्व की शोहरत की जो देश के खज़ाने से धन बर्बाद कर मिलेगी नहीं क्योंकि सच्ची शोहरत वास्तविक आचरण से मिलती है। शोर विज्ञापन से कीमत चुकाकर कदापि नहीं।

आज जिस राह पर देश की सरकार चल रही है क्या पश्चिम देशों अमेरिका जापान जाकर कुछ बात कर सकते हैं। हम नहीं समझ सके पिछले पांच साल में करीब चार सौ करोड़ मोदी जी ने विदेशी सैर सपाटे पर जो खर्च किये उन से देश की अर्थव्यवस्था का कोई भला नहीं हुआ क्योंकि उनकी हर विदेशी यात्रा विदेशी सरकारों की शर्तों पर होती रही है। बहुत कीमत चुकाई है देश की जनता ने इक व्यक्ति की नाम और शोहरत की चाहत की। सबसे पहली बात हमारे देश की पहचान , सत्यमेव जयते , सच ही ईश्वर है की रही है। क्या कोई इनकार कर सकता है कि कभी किसी भी नेता ने उच्च पद पर रहते इतने झूठ नहीं बोले होंगे। सच धर्म है और झूठ पाप है। आपको सोचना है आपको किधर खड़े होना है।

Saturday, 21 December 2019

दादाजी की ज़ुबानी बहुरानी की कहानी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  दादाजी की ज़ुबानी बहुरानी की कहानी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 पता नहीं कैसे पचास साल पुरानी सुनी कहानी याद आई है। अनपढ़ थे मेरे दादाजी मगर सब उनकी समझदारी का लोहा मानते थे। मैंने दादी नानी को नहीं देखा दादाजी से बहुत कुछ सीखा समझा है। तब उनकी बातों की गहराई कहां समझ आई थी उनकी मौत 1970 या 1971 में हुई थी जब मेरी आयु 20 की रही होगी। गीता रामायण सब उनको याद थे सुनते रहते थे और मैंने उनको बचपन में सब धार्मिक किताबों की कथा पढ़कर सुनाई है। मुझे उनसे बहुत प्यार मिला और समझ भी उनकी बातें तब नहीं अच्छी लगती थी कि धन दौलत नहीं इंसानियत भाईचारा और सादगी से मिलकर रहना वास्तविक जीवन का आधार है। भूमिका को छोड़ उनकी सुनाई कहानी बताता हूं। 

परिवार में नई बहुरानी लाने को उसको चुना गया जिसने घर को स्वर्ग बनाने और सभी की सेवा करने दासी बनकर रहने की मीठी मीठी बात से होने वाली सास का दिल जीत लिया जिसने घर भर को उसकी तारीफ कर इक सपना देखने को विवश कर दिया कि बस यही इक कमी है और नई बहुरानी के आने से सबकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी। आते ही घर की खज़ाने की चाबी अपने हाथ ले ली थी और समझाया था अभी तक सभी घर के लोग कहने को खुश रहते रहे हैं वास्तविक आनंद को जानते भी नहीं हैं। मधुर भाषा और सज धज नाज़ नखरे हर नई दुल्हन के शुरू शुरू में लुभाते हैं। हर कोई उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आकर उसी का गुणगान करने लगा था। चार दिन में उसने बढ़े बूढ़े सभी पुराने लोगों को साबित कर दिया था कि उन्होंने जो भी किया गलत था और जो करना था उनको पता ही नहीं था। मगर अब मैं आई हूं तो सब ठीक कर दूंगी। आधुनिकता के नाम पर बदलाव का नाम लेकर सब पहले का किया हुआ बर्बाद करने लगी थी मगर इक जादू था जो सबको नशे में रखता था सुंदर सपने वाली दुनिया दिखलाने का। उसकी बातों से लगता था सच उसने सब तरह की पढ़ाई की हुई है जबकि कोई नहीं जानता था उसने कब किस स्कूल कॉलेज से क्या किस अध्यापक से पढ़ा था। 

सेवा दासी की बात कोई कह नहीं सकता था और उसने घर की सभी तरह की देखभाल अपने पीहर से ला ला कर अपनी पसंद के लोगों के हाथ सौंप दी थी। दो चार साल में वही घर की वास्तविक मालकिन बन गई थी और घर के असली मालिक बेबस होकर रह गए थे। पति-पत्नी का नाता क्या है उसको मालूम ही नहीं था। बस मनमानी करती गई और घर की हालत बिगड़ती गई थी। जो लगता था सीधी सादी भोली भाली है उसने अपने असली रंग दिखला कर सबको अपने आधीन कर लिया था और सब अपने अधिकार में लेती गई थी। हर कोई उसकी चाल में फंसकर घर के बाकी लोगों से लड़ने झगड़ने नफरत करने लगा क्योंकि उसने सभी को इक दूसरे की मनघड़ंत बातों से भेदभाव की दीवार खड़ी कर अलग अलग कर दिया था। जिस महल बनाने की बात करती थी उसकी कोई नींव ही नहीं थी आसमान में हवा में कोई जादू का नगर बसाने की झूठी बात से सभी को ठगने का कार्य कर दिया था। तमाम तरह से अपने गुणगान के चर्चे अपने खास लोगों को आर्थिक फायदा पहुंचा कर करवाने लगी थी। धीरे धीरे घर का सब बिकने लगा था हरा भरा घर किसी तपते रेगिस्तान में बदल गया था। उसकी हर योजना असफल होती रही मगर सबको भरोसा दिलाती रही अब बस सब ठीक होने वाला है कुछ दिन सहन करो मगर खुद उसने अपने खुद पर बेतहाशा धन शौक पूरे करने पर बर्बाद करने में कोई सीमा नहीं बाकी रहने दी। हल ये हुआ कि पहले सब चैन से रहते थे अब हर कोई बेचैन है घबराया हुआ है। आपसी मेल जोल बचा नहीं भरोसा कोई किसी पर नहीं करता और हर कोई अकेला उसकी चालों का शिकार होकर परेशान है। 

   माफ़ करना दादाजी ने आगे की कहानी सुनाई थी मगर मुझे नींद आ गई थी। आप भी आजकल किसी नींद की खुमारी में लगते हो नहीं जानते कल क्या होने वाला है। भविष्य का कुछ पता नहीं है और कोई आपको जगाने वाला भी नहीं। घनी गहरे अंधेरे की रात है मगर कहते हैं हर रात का अंत होता है और सुबह होती है। चलो इक गीत सुनते हैं जाने माने शायर का है। 

मौत कभी भी मिल सकती है , लेकिन जीवन कल न मिलेगा।


रात भर का है महमां अंधेरा , किस के रोके रुका है सवेरा। 

 

रात जितनी भी संगीन  होगी , सुबह उतनी ही रंगीन होगी। 

 

ग़म न कर गर  है बदल घनेरा , किस के रोके रुका है सवेरा। 

 

लब पे शिकवा न ला अश्क़ पी ले , जिस तरह भी हो कुछ देर जी ले। 

 

अब उखड़ने को है ग़म का डेरा , किस के रोके रुका है सवेरा।

 

आ कोई मिलके तदबीर सोचें , सुख के सपनों की ताबीर सोचें। 

 

जो तेरा है वही ग़म है मेरा , किस के रोके रुका है सवेरा। 

आपको याद है फिल्म का नाम था , सोने की चिड़िया।


Friday, 13 December 2019

शासकों की मनमानी जनता की मज़बूरी आज़ादी नहीं है ( सच और केवल सच ) डॉ लोक सेतिया

       शासकों की मनमानी जनता की मज़बूरी आज़ादी नहीं है 

                           ( सच और केवल सच ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार ऐलान जारी करती है देश की जनता को स्वीकार करना होता है।  लोग परेशान हों या उनके लिए कितनी समस्याएं खड़ी हों सत्ताधारी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की बला से। अभी फ़ास्ट टैग की ही बात ले लो जिस देश की आधी आबादी अनपढ़ है जिसको अभी आधुनिक ऑनलाइन या स्मार्ट फोन की सही जानकारी तो क्या अपनी सुरक्षा को लेकर समझ नहीं है और गरीब अशिक्षित नागरिक से उनके कार्ड या अन्य कागज़ कोई और ले कर उपयोग करता है क्या ये सब के लिए आसान होगा।  कदापि नहीं मगर सरकार को अपनी साहूलियत और सुविधा देखनी है। आपको इतने दिन में ये अपनाना ही होगा। लगता ही नहीं कि किसी भी नेता या सरकार में शामिल दल को नागरिक परेशानी से कोई सरोकार हो। बस ये महत्वपूर्ण है और तय सीमा में लागू करना ही होगा। हर बार जब शासक को फरमान जारी करना अधिकार उपयोग करना हो तब कहते हैं इस को करना लाज़मी है। 

    मगर कभी भी जो कर्तव्य देश की सरकार को पूरे करने हैं उनको लेकर ऐसा नहीं होता है। क्या कभी घोषणा की गई कि इतने दिन बाद कोई गरीबी की रेखा से नीचे नहीं रहने दिया जाएगा। सरकार को ये उस से पहले करना ज़रूरी है। कोई बना घर नहीं रहेगा की बात छोडो कोई भूखा नहीं रहेगा ये भी कब होगा किसी सत्ताधारी को चिंता नहीं है। वीवीआईपी लोगों को स्वस्थ्य सेवा तुरंत ऐम्स जैसे अस्पताल में मिलती है मगर आम नागरिक कतार में खड़ा अधमरा होकर मौत का इंतज़ार करता है कब इस भेदभाव की व्यवस्था का अंत होगा क्या कोई दिन तय है। अर्थात देश की जनता को बुनियादी अधिकार मिलने को लेकर कोई भी सरकार कभी अपने कर्तव्य को निभाने को संकल्प नहीं निभाती है। सत्ता जनसेवा नहीं इक हथियार है डंडे से हांकने को नागरिक को गुलामों की तरह। 

    राजनेता सांसद विधायक बनकर देश की जनता के पैसे से करोड़ों रूपये पाने के हकदार बन जाते हैं और इनको कोई लज्जा शर्म नहीं आती ऐसा करते देश सेवा के नाम पर ऐशो आराम और लूट करते हुए। कोई बोलता नहीं ये अनुचित ढंग कब बंद होगा और सेवक कहलाने वाले कब देश की गरीब जनता पर बोझ नहीं बनेंगे। कोई भी राजनीतिक दल हो अपनी महत्वकांक्षा या वोटों की गंदी राजनीति की खातिर आम नागरिक को तमाम अन्य परेशानियों के बीच और परेशानी देने में संकोच नहीं करते हैं। 

संसद को इक अखाड़ा बना दिया गया है। 13 दिसंबर को संसद पर हमला हुआ था और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे उनकी याद औपचारिक ढंग से कुछ क्षण करने के बाद जिस तरह संसद में सांसद विपक्षी नेता के ब्यान को लेकर हंगामा करते रहे अपने राजनीतिक मकसद की खातिर उसे ब्यान को आपत्तिजनक मान कर भी ज़रूरी नहीं समझा जा सकता है। वैसे भी ऐसे घटिया ब्यान खुद सत्ताधारी भी विपक्ष में रहते करते रहे हैं तब यही लोग ताली बजाया करते थे , आज भी बहुत नेता हैं जो सत्ताधारी दल में होते हुए अक्सर बेहद अनुचित और आपत्तिजनक भाषण ब्यान देते हैं मगर अपने दल के नेता की बात पर खामोश रहते हैं। जिन महिला सांसदों को महिलाओं के साथ अपराध पर आवाज़ उठानी चाहिए मगर नहीं कुछ भी बोलती सत्ता उनकी है इसलिए वही विपक्षी दल के नेता के ब्यान पर उत्तेजित हो जाती हैं। काश यही भाव महिलाओं के अधिकार उनके आरक्षण या उनसे भेदभाव को लेकर भी नज़र आता। मगर अपनी दलगत राजनीति से इतर उनको देश की वास्तविक चिंता कभी नहीं दिखाई देती है। 

 ये बेहद खेद की बात है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था इतनी स्वार्थी और सत्ता के मोह में अंधी हो चुकी है कि शासन करने वाले नेताओं सत्ताधारी दल सरकारी अधिकारियों को नेताओं सांसदों विधायकों को देश सेवा की नहीं सत्ता की चाहत होती है और इनकी जनसेवा देशभक्ति सिर्फ कहने या दिखाने को है आडंबर है। वास्तविक जनता की भलाई या उनकी समस्याओं से किसी को कोई मतलब नहीं है। हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा।

Sunday, 8 December 2019

नारद जी सुन रहे आधुनिक गीता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  नारद जी सुन रहे आधुनिक गीता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  अचानक आकाश मार्ग से विचरण करते हुए नारद मुनि जी को गीता गीता का शोर ऊंची ऊंची आवाज़ में सुनाई दिया। जिज्ञासा हुई फिर से गीता का ज्ञान देने कौन आया है धरती पर जाकर दर्शन करने चाहिएं। अपना पुराना रूप बदल इंसान बनकर उपदेश देने वाले के कक्ष में चले आये , नारद जी की ये आदत बदलती नहीं जब जिस जगह चाहा बिना सूचना दिए चले जाते हैं। दरवाज़े के बाहर पहुंचे तो भीतर से वार्तालाप सुनाई दे रहा है उत्सुकता हुई समझने की और चुपचाप खड़े होकर चर्चा का आनंद लेने लगे। 

    कितने इश्तिहार बंटवा दिए स्वागत द्वार बनवाये हैं कितने ख़ास लोग शामिल होंगे सरकारी सहयोग से क्या क्या हासिल होगा। उनकी अपनी लिखी हुई घोषित गीता कितने ऊंचे दाम पर कौन कौन खरीदेगा और अभी तक किस सरकार ने कितनी गीता की किताबें उनकी ऊंची कीमत पर खरीदी हैं। नेताओं से सरकार से गठजोड़ से पिछले साल से कितना अधिक मुनाफा कारोबार में होने की संभावना है। अपने नाम को कितना अधिक आसमान से अधिक ऊपर विश्व भर में उपदेशक होने का सबसे बड़ा जानकर होने वाला घोषित किया जाना अभी बाकी है। नारद जी को जिस बात की आशा थी गीता ज्ञान को लेकर इक शब्द भी सुनने को अभी तक नहीं मिला था। जनाब क्या मैं आपसे मिलने भीतर आ सकता हूं दरवाज़े से बाहर खड़े नारदजी ने पूछा तो अंदर आने की अनुमति मिल गई। जाकर जो भी आसन दिया गया नारदजी बैठ गए। बहुत चेले चपटे तमाम तरह की बातें अपने उन गुरूजी से करते रहे नारदजी को लग रहा था कोई कारोबार चल रहा है। नारदजी से पूछा गया आपको क्या कार्य है क्या शिष्य बनने की इच्छा से आये हैं या चरण छूने की अभिलाषा है। शाम को उपदेश से पहले आपका भी नाम घोषित किया जा सकता है अगर चाहते हैं तो तय राशि देकर नाम लिखवा सकते हैं। आपको मंच पर बुलाकर गुरूजी की फोटो के साथ सम्मान दिया जाएगा। नारदजी बोले भाई आपको ग़लतफ़हमी हुई है मेरे पास पैसे नहीं हैं कुछ भी खरीदने को। गीता के ज्ञान की कोई बात करते हैं तो सुनने की चाहत थी। 

    उपदेशक ने पास बुलाया और समझाया कि शाम को सभा में गीता का पाठ सुनाते हैं अवश्य आईयेगा। नारदजी ने कहा श्रीमान क्या थोड़ी बात करने को अभी समय है मुझे कुछ सवाल परेशान किये हुए हैं। हां ज़रूर पूछ सकते हैं आपके हर सवाल का उतर यहीं मिलेगा। नारदजी ने अपने झोले से ताज़ा अख़बार निकाला और खबरें पढ़कर सुनाने लगे। हत्या बलात्कार लूट दंगे फसाद और देश की राजनीति की गंदगी और शासकवर्ग के जनसेवा से भटकने और सत्ता का मनमाना दुरूपयोग करने को लेकर पूछा क्या आप लोगों को इस अधर्म को लेकर कोई चर्चा करते हैं ताकि सबको धर्म अधर्म का भेद समझाया जाये। उपदेशक जी कहने लगे नासमझ इंसान आप किस युग में रहते हैं भला किसी की शामत आई है जो इन सभी ताकतवर लोगों के बारे में ज़ुबान भी खोले। नारदजी ने सवाल किया तो क्या आपको गीता से कायरता का ज्ञान मिला है। जब अपने साधु  भेस धारण किया है और गीता का पाठ करते हैं तो किस बात का डर है कैसी चिंता है। क्या जीना है क्या मरना है क्या पाया है खोना क्या है। उपदेशक बोले भाई अभी जाओ शाम को आकर सभा में ध्यान पूर्वक सुनना फिर समझ जाओगे। ठीक है बोलकर नारदजी बाहर चले आये। 

शाम को नारदजी आठ बजे ही सभा स्थल चले आये जबकि उपदेशक ने बताया था आठ बजे मुझसे पहले छोटे गुरु उपदेश देते हैं मैं एक घंटा बाद नौ बजे आता हूं। ये अपने महत्व को समझने या समझाने का ढंग होगा मगर नारदजी आठ बजे ही सही समय पर चले आये। देखा इक बाज़ार लगा हुआ है हर सामान पर उपदेशक गुरूजी का नाम फोटो अंकित है और महंगे दाम बिकता है। दुकानदार से जाकर पूछा भाई यहां लोग गीता ज्ञान का सार समझने अर्थ जानने आते हैं और आप इस जगह व्यौपार करने आये हैं। धर्म की बात छोड़ अर्थ का मोह लिए हुए हैं। दुकानदार ने बताया कितने नासमझ हैं ये सारा धंधा उन्हीं का है पांच दिन के उपदेश की कीमत पांच लाख लेते हैं। शुद्ध कारोबार है इसमें धर्म की खोज मत करना , ये जो भी लोग खड़े हैं कतार लगाकर कोई धर्मात्मा नहीं हैं सब दो नंबर की आमदनी से कुछ दान देकर दानवीर और धर्मात्मा होने का तमगा खरीद ले जाते हैं। आपको गीता को समझना है तो इनकी हज़ार रूपये वाली ज़रूरी नहीं है बाज़ार से सौ दो सौ की खरीद पढ़ लेना। इधर कोई गीता पढ़ने सुनने नहीं आता है सबके मकसद कुछ और ही हैं। हैरान मत होना यहां किसी ने आपको नहीं पहचाना मगर मैंने आपको पहचान लिया है। नारद जी बोले क्या और कैसे मुझे पहचान लिया है। दुकानदार बोला कि आपके पास आते ही बिना आपके मुख खोले ही , नारायण -नारायण की ध्वनि सुनाई दी थी मुझे तभी समझ लिया था नारदजी हैं आप। ये उचित जगह नहीं है गीता को सुनने समझने के लिए आपको किसी और जगह जाना होगा। 

    तभी ऊपर से आते उपदेशक मिल गए तो नारदजी ने उनके सजाए बाज़ार को देख कर कहा था , अपने बुलाया था चला आया मगर ये सब गीता से आपको समझ आया होगा मुझे नहीं समझना है।