Tuesday, 26 November 2019

कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है - डॉ लोक सेतिया

 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है - डॉ लोक सेतिया 

जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल से दो शेर उधार ले रहा हूं। आज 27 नवंबर सच की खातिर जान देने वाले एक आईएएस अधिकारी का जन्म दिन भी है और उनका क़त्ल भी इसी दिन किया गया था। 

                   इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है।

                 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है। 

कल संविधान दिवस था और हर साल की तरह संसद में इक औपचारिकता रस्म की तरह निभाई गई। संविधान की भावना की बात छोड़ो उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने वाले बड़ी बड़ी बातें बिना किसी लज्जा संकोच कह रहे थे। जबकि लोकतन्त्र की रूह तक परेशान थी उसको कितनी बात कत्ल किया और दफ़नाया जा चुका है और जैसे किसी रोगी को अस्पताल वाले अपनी कमाई की खातिर धड़कन बंद सांस नहीं चलती फिर भी वेंटीलेटर पर मुर्दा लाश की तरह ज़िंदा रखे हुए होते हैं ठीक उस तरह नेता सत्ता की खातिर करते रहे हैं। ये विडंबना की बात है कि हम लोग ऐसे वास्तविक ईमानदार देशभक्त और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अधिकारी को याद नहीं रखते और जिन लोगों ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया उनको सच के क़ातिल होने की कोई सज़ा नहीं दिलवा सके हैं। आज आपको उस आदर्श आईएस अधिकरी की वास्तविक जीवनी से अवगत करवाते हैं। 

                         सत्येंदर दुबे जी


             






                                   जन्म :::::::::::   2 7 नवंबर 1 9 7 3

                                   कत्ल हुआ :::: 2 7 नवंबर  2 0 0 3
सत्येंदर दुबे जी एक अधिकारी थे , इंडियन इंजिनीरिंग सर्विस ऑफिसर , प्रोजेक्ट डायरेक्टर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया कोडरमा। उनको गया बिहार में जान से मार दिया गया था क़त्ल कर उनके ठीक जन्म दिन को ही तीस साल की आयु में।

   हुआ ये था कि उन्होंने जब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में बहुत भ्र्ष्टाचार देखा और तमाम कोशिश करने के बाद भी रोकना संभव नहीं लगा तब उन्होंने एक सरकारी आला अधिकारी रहते एक गोपनीय पत्र पीएमओ को भेजा विस्तृत जानकारी देते हुए। नियमानुसार उस खत को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को ही पढ़ना था। मगर उस गोपनीय सूचना की बात को पीएमओ से सड़क माफिया तक पहुंचाया गया और उन भ्र्ष्टाचारी लोगों ने सत्येंदर दुबे जी को क़त्ल कर दिया था। मगर कभी भी वास्तविक दोषी उन लोगों को कोई सज़ा नहीं मिली जिन्होंने उनके गोपनीय पत्र को माफिया तक पहुंचाया। और आज भी ये व्यवस्था उसी ढर्रे पर चलती है क्योंकि उसमें रत्ती भर भी बदलाव लाने की कोशिश ही नहीं हुई है।  आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल से लेकर सत्येंदर दुबे की आत्मा जो सवाल पूछती है कहना चाहता हूं।

                                  तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं ,

                                   मेरी अर्थी को उठाने वाले।




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