Tuesday, 26 November 2019

कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है - डॉ लोक सेतिया

 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है - डॉ लोक सेतिया 

जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल से दो शेर उधार ले रहा हूं। आज 27 नवंबर सच की खातिर जान देने वाले एक आईएएस अधिकारी का जन्म दिन भी है और उनका क़त्ल भी इसी दिन किया गया था। 

                   इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है।

                 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है। 

कल संविधान दिवस था और हर साल की तरह संसद में इक औपचारिकता रस्म की तरह निभाई गई। संविधान की भावना की बात छोड़ो उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने वाले बड़ी बड़ी बातें बिना किसी लज्जा संकोच कह रहे थे। जबकि लोकतन्त्र की रूह तक परेशान थी उसको कितनी बात कत्ल किया और दफ़नाया जा चुका है और जैसे किसी रोगी को अस्पताल वाले अपनी कमाई की खातिर धड़कन बंद सांस नहीं चलती फिर भी वेंटीलेटर पर मुर्दा लाश की तरह ज़िंदा रखे हुए होते हैं ठीक उस तरह नेता सत्ता की खातिर करते रहे हैं। ये विडंबना की बात है कि हम लोग ऐसे वास्तविक ईमानदार देशभक्त और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अधिकारी को याद नहीं रखते और जिन लोगों ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया उनको सच के क़ातिल होने की कोई सज़ा नहीं दिलवा सके हैं। आज आपको उस आदर्श आईएस अधिकरी की वास्तविक जीवनी से अवगत करवाते हैं। 

                         सत्येंदर दुबे जी


             






                                   जन्म :::::::::::   2 7 नवंबर 1 9 7 3

                                   कत्ल हुआ :::: 2 7 नवंबर  2 0 0 3
सत्येंदर दुबे जी एक अधिकारी थे , इंडियन इंजिनीरिंग सर्विस ऑफिसर , प्रोजेक्ट डायरेक्टर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया कोडरमा। उनको गया बिहार में जान से मार दिया गया था क़त्ल कर उनके ठीक जन्म दिन को ही तीस साल की आयु में।

   हुआ ये था कि उन्होंने जब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में बहुत भ्र्ष्टाचार देखा और तमाम कोशिश करने के बाद भी रोकना संभव नहीं लगा तब उन्होंने एक सरकारी आला अधिकारी रहते एक गोपनीय पत्र पीएमओ को भेजा विस्तृत जानकारी देते हुए। नियमानुसार उस खत को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को ही पढ़ना था। मगर उस गोपनीय सूचना की बात को पीएमओ से सड़क माफिया तक पहुंचाया गया और उन भ्र्ष्टाचारी लोगों ने सत्येंदर दुबे जी को क़त्ल कर दिया था। मगर कभी भी वास्तविक दोषी उन लोगों को कोई सज़ा नहीं मिली जिन्होंने उनके गोपनीय पत्र को माफिया तक पहुंचाया। और आज भी ये व्यवस्था उसी ढर्रे पर चलती है क्योंकि उसमें रत्ती भर भी बदलाव लाने की कोशिश ही नहीं हुई है।  आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल से लेकर सत्येंदर दुबे की आत्मा जो सवाल पूछती है कहना चाहता हूं।

                                  तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं ,

                                   मेरी अर्थी को उठाने वाले।




Monday, 25 November 2019

खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये कहानी अलग है और बिल्कुल नई है इस का चौकीदार चोर है कथा से कोई संबंध नहीं है। इक परिवार के मुखिया चाचा और चाचा के भरोसे के भतीजे की आपसी बात है। घर की तमाम जायदाद के 54 दस्तावेज़ राजनीतिक दल के विधायकों की तरह अनमोल सत्ता की चाबी जैसे भतीजे की जेब में सुरक्षित रखने को चाचा ने सौंपे थे। मगर अचानक नीयत खराब होने से भतीजे ने उन दस्तावेज़ों को चुपके से किसी दुश्मन को ऊंची कीमत लेकर बेच दिया। चाचा को जब तक खबर होती दस्तावेज़ उपयोग कर दुश्मन की मालिकाना हक कानूनी ढंग से हासिल हो चुका था। कुछ खास लोग अपनी शिकायत पुलिस थाने नहीं लिखवाते हैं उनकी सीधी पहचान कमिश्नर तक होती है और उनका मुकदमा बड़ी अदालत छुट्टी के दिन भी सुनवाई करने को मंज़ूर करती रहती है। यहां भी वही बात है अदालत को सब खबर है फिर भी उसको संविधान न्याय से अधिक चिंता इस बात की है कि जिनके दस्तावेज़ चोरी हुए उन्होंने अर्ज़ी उस की नहीं बल्कि ये की थी कि जिस ने उन दस्तावेज़ों को देख कर किसी को सत्ता के ताले की चाबी सौंपी थी उस के आदेश को अनुचित घोषित कर निरस्त करना है। जबकि संबंधित अधिकारी के वकील अदालत को बता रहे हैं कि ये उनके मुवकिल का सरदर्द नहीं है कि जिन लोगों ने दस्तावेज़ हस्ताक्षर कर भतीजे को दिए थे उनकी सहमति उचित थी या नहीं थी। और अगर चाचा की जायदाद के कागज़ात किसी पावर ऑफ़ अटॉर्नी का अनुचित ढंग से उपयोग है तो ये चाचा भतीजे का आपसी मामला है। मगर अदालत को ऐसे दस्तावेज़ों से मिले अधिकार को लेकर कोई विचार नहीं करना चाहिए और अगर ये कोई धोखा है हेराफेरी है तो खुद वही अधिकारी इस पर उचित करवाई करने की आज़ाद है मगर कोई समय सीमा अदालत को तय नहीं करनी चाहिए। उधर हर कोई कीमती जायदाद की तरह अपने पास के सामान की सुरक्षा करने का काम कर रहा है ताकि दुश्मन कोई छीनाझपटी जैसी गुंडागर्दी या फिर कोई और ढंग नहीं अपना सके। जिनको सत्ता की चाबी मिली है जानते हैं उनकी ज़मीन पांव तले से निकल चुकी है मगर समय मिल जाये तो संभलने की उम्मीद रखते हैं या फिर चाबी वापस करने की ईमानदारी नहीं कर सकते क्योंकि नीयत खराब हो जाती है तो लाज शर्म की परवाह नहीं करते हैं। धड़कन सभी की बढ़ी हुई है सांसे फूलने लगी हैं जान अटकी हुई है और अदालत ने मामला और चौबीस घंटे को टाल दिया है।
    
   अदालत कहती है कोई उसको ये सुझाव नहीं दे सकता कि जो भी अनुचित कार्य किया जा चुका है उसको किस तरह से सुधारा जा सकता है। अदालत को अपने आदर की चिंता हमेशा रहती है और ज़रा सी बात अदालत की अवमानना की तलवार का शिकार हो सकती है इस डर से सभी सच बोलने की जगह खामोश रहना उचित समझते हैं। जान है तो जहान है कोई ओखली में सर नहीं डालना चाहता खासकर जब ऊपर सुनवाई की कोई उम्मीद ही नहीं हो। अदालत को पता चल चुका है कि आज जिन लोगों ने किसी को लिखित अपने अधिकार सौंपे थे इरादा बदल चुके हैं और कानून ये भी साफ है कि पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी देने वाला जब भी भरोसा नहीं रहे अपने दिए अधिकार वापस लेने का ऐलान कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो जिस ने भी भरोसा तोड़ा उसको भविष्य में कोई भी कार्य करने की इजाज़त नहीं होगी। मगर यहां दग़ाबाज़ भतीजा दस्तावेज़ के दम पर बयनामा कर चुका है और अभी जायदाद को उनके नाम कर सकता है जिनसे सौदेबाज़ी की है। ये इक अजब ढंग की मिसाल बन जाएगी अगर अदालत जानते समझते हुए किसी के अनुचित तरीके से दस्तावेज़ का गलत उपयोग करने वाले लोगों को रोकने को कठोर कदम नहीं उठती बल्कि उनका साथ देती है न्याय की साख को दांव पर लगाकर। वास्तविक अधिकारी लोग बंधक बन जाएंगे और जिसे खज़ाने की रखवाली को खजांची नियुक्त किया था दस्तावेज़ हथिया कर खुद को असली मालिक घोषित कर सकेगा। अर्थात खुद अदालत और कानून खज़ाने की हेराफेरी लूट या उस पर कब्ज़े को अनदेखा कर बंदरबांट की आधुनिक कथा लिख सकती है। और मुमकिन है भविष्य का इतिहास अदालत को गलत परंपरा कायम करने का मुजरिम करार देने की बात कहे।

Wednesday, 20 November 2019

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया तनहा

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया तनहा 

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं 
पांव चलते हुए अचानक फिसल जाते हैं। 

अब मुहब्बत कहां , तिजारत सभी करते हैं 
अब तो क़िरदार रोज़ सारे बदल जाते हैं। 

ढूंढती हर शमां नहीं मिलते वो परवाने 
आग़ में प्यार की जलाते हैं जल जाते हैं। 

आस्मां पे नहीं ज़मीं पर नज़र रखते हैं 
राह फ़िसलन भरी कदम खुद संभल जाते हैं। 

फिर उसी मोड़ पर मुलाकात नहीं हो उनसे 
हम झुका कर नज़र उधर से निकल जाते हैं। 

दब गई राख में चिंगारी बनी जो शोला 
तेज़ आंधी चले महल सबके जल जाते हैं। 

अब वहां कुछ नहीं न शीशा न साकी फिर भी 
देख कर मयक़दे को "तनहा" मचल जाते हैं।

Tuesday, 19 November 2019

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की 
इस तरह उम्र भर , बंदगी हमने की। 

हर सफर पर नये दोस्त बनते रहे 
जो जहां पर मिला दोस्ती हमने की। 

ज़ख्म भी दर्द भी हर किसी से मिले 
पर न घबरा कभी ख़ुदकुशी हमने की। 

मैं खिलौना सभी मुझसे खेला किए 
आप अपने से भी दिल्लगी हमने की। 

सी लिए लब सदा कुछ नहीं कह सके 
बोलने की नहीं ,  भूल भी हमने की।

हम सितारे , ज़मीं पर बिछाते गए
चांदनी कह रही , बेरुखी हमने की।

की वफ़ा फिर भी खुद बेवफ़ा बन गया 
भूल हर बार "तनहा" वही हमने की।


Monday, 18 November 2019

गर्दिश में सितारे ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया

     गर्दिश में सितारे ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 साहिल की ज़िंदगी में पांच लड़कियां आईं मगर जाने क्यों किसी से भी बात जीवन भर को साथ निभाने तक नहीं पहुंची। पचास का होने पर भी अविवाहित ही है। अपनी डायरी से अपने नाकाम इश्क़ के किस्से पढ़ता रहता है। ऐसे में जब पहली बार इक महिला से कहानी अंजाम तक पहुंचने लगी तो उसने मालिनी को अपने अतीत की हर बात बताने को अपनी निजि डायरी जिसे कभी किसी को पढ़ने तो क्या छूने भी नहीं देता था दे दी और कहा शायद ये मेरा आखिरी इश्क़ है क्योंकि इस से पहले मैंने कभी किसी को ऐसे पागलपन की हद तक नहीं चाहा था। और जब भी जिसने रिश्ता नहीं निभाना चाहा मैंने स्वीकार कर लिया था कि शायद मेरे नसीब में मुहब्बत मिलना नहीं है। तुम मेरी डायरी पढ़ कर फिर सोच कर निर्णय करना कि क्या तुम भी वही पुरानी कहानी नहीं दोहरानी है। मालिनी भी साहिल को उतना ही चाहती है मगर फिर भी उसने सोचा कि यही अच्छा होगा साहिल की ज़िंदगी की वास्तविकता को जानकर ही विवाह का फैसला किया जाये। 

   अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की थी जब बिंदु जो पड़ोस में रहती थी उसने खुद प्यार की बात करने को पहल की थी। मगर साहिल ने अभी सोचा ही नहीं था और पढ़ाई पूरी करने के बाद विचार करने को कहा था। हंसी मज़ाक की बात होती रहती थी मगर कुछ महीने बाद बिंदु की सगाई हो गई और विषय का अंत हो गया था। कुछ समय बाद किसी रिश्तेदार ने हंसिनी से उसके दफ्तर में साहिल को ले जाकर मुलाकात करवाई और कहा जब तक साहिल की नौकरी नहीं लगती खत लिख कर संबंध रख सकते हैं। फिर साल भर बाद हंसिनी के विवाह का निमंत्रण पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि खत का जवाब मिलना बंद होते ही आशंका होने लगी थी। अमृता से अचानक मिलना हुआ जब एक साथ इक जगह काम करने पर साथ आना जाना पड़ा और राह चलते बात होने लगी मगर दिल की बात कह नहीं सके दोनों ही। अचानक अमृता ने दफ्तर आना बंद कर दिया और जैसे कोई खो जाता है कुछ भी बताये बिना , मगर कोई वादा नहीं हुआ था दोनों में कभी। साहिल को थोड़ा एहसास हुआ जैसे कोई दोस्त नहीं मिले कुछ दिन तो याद आती है। फिर शायद पहली बार खुद किसी ने पसंद करती हूं कह कर हैरान कर दिया था। दो साल नाता रहा और लगता है जैसे बहाने बनाकर रचना इंतज़ार करती रही साहिल के और अच्छी नौकरी मिलने का मगर जब इंतज़ार नहीं किया गया तब इक कारोबारी से घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली थी। साहिल अपनी नौकरी छोड़ दूर चला आया था और दस साल से अकेला रहने लगा मन से विवाह की बात ही भुला दी थी। उर्मिला से जान पहचान हुई तो उसने शर्त रखनी चाही जो साहिल ने मंज़ूर नहीं की थी। हर नाता कुछ दिन महीने या एक साल भर बाद टूट गया था। 

  मालिनी ने साहिल की डायरी से उसके जन्म की तारीख समय स्थान देख कर लिख लिया और अपने पंडित जी को जाकर कुछ भी नहीं बता कर ज्योतिष के अनुसार साहिल को लेकर कुंडली बनवाई। पंडित जी ने बताया कि साहिल का रिश्ता जिस भी लड़की से टूटता रहा वास्तव में ऐसी पांच लड़कियों की कुंडली में विधवा होने की संभावना रही है। मगर साहिल की आयु लंबी है तभी उन से विवाह तय नहीं हुआ और वो लड़कियां विवाह के कुछ साल बाद सुहागिन नहीं रही। वास्तव में साहिल के सितारे गर्दिश में कभी नहीं थे बल्कि खुशनसीबी है जो अविवाहित रहा अभी तक। मगर तुम उनसे अलग हो क्योंकि तुम सदा सुहागिन होने के सितारे पाकर आई हो साहिल के जीवन में। और ऐसे उनका विवाह हो गया था और अब दोनों साथ साथ ख़ुशी से रहते हैं। साहिल के सितारे अच्छे हैं तभी पांच पांच बार उन कश्तियों से किनारे लगने से पहले किसी मझधार में डूबने से बचता रहा है।

Sunday, 17 November 2019

पुरानी मुहब्बत की तलाश में ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     पुरानी मुहब्बत की तलाश में ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

तुम मेरी महबूबा हो ,
मुझे प्यार है तुमसे दिल्ली। 

कभी नहीं भूलती पहली मुहब्बत ,
मेरा दिल हमेशा यहीं कहीं रहा है ,
माना 45 साल बीत गए हैं बिछुड़े ,
जैसे कोई मुसाफिर भटक गया हो ,
अपनी मंज़िल की राह से किसी दिन ,
और भूल गया हो राह अपने घर की ,
मगर याद अपनी मुहब्बत की साथ ,
लेकर करता रहा लौटने की दुआएं। 

फिर ढूंढता फिरता हूं बिछुड़े कारवां ,
के धुंधले से कदमों के निशानों को अब ,
इधर भी उधर भी चला था जिधर भी ,
वो अचानक आना यहीं रह जाना मेरा ,
तुम भूल गईं हो नहीं भुलाया है मैंने ,
कहीं बहुत दूर से कितनी बार तुझको ,
देकर आवाज़ दिल्ली बुलाया है मैंने। 

जाने क्यों बदनाम करते हैं तुझको लोग ,
बदल गई है पुरानी ग़ालिब की दिल्ली ,
मुझे अभी तक तेरी हर गली कूचे में ,
हवा में भीनी भीनी पहचानी खुशबू वो ,
कहीं न कहीं से कोई झौंका बनकर के ,
सांसों को महकाती है ताज़गी देकर के ,
लगता है फिर से जीने लगा हूं जैसे ,
मिलते हैं दो आशिक़ कहानी में आखिर। 

मुझे अपनी आगोश में फिर से ले लो ,
गले से लगा लो अपना बना लो तुम ,
माना बाल मेरे सफ़ेद हो गए हैं और ,
ढलती उम्र के निशां चेहरे पे उभर आए ,
अपनी बाहें पसारे सबको अपनाती रही ,
तुम मेरी चाहत हो जानती हो ये बात ,
कोई कैसे समझे किस किस को समझाए ,
वो दिन वो समां था कितना सुहाना जब ,
जवानी के पल साथ साथ हमने बिताए। 

तुम्हीं मेरी मंज़िल हो मेरी जान दिल्ली ,
मुझे कोई गैर अजनबी मत समझ लेना ,
तेरी मिट्टी की खुशबू अभी तक भी मुझे ,
वही बारिश के मौसम सी महकती हुई सी ,
धड़कन में नाम तेरा दोहराता रहा हूं मैं ,
कितनी बार आने की आरज़ू में करीब आ ,
बिछुड़ता रहा  दूर तुझसे जाता रहा हूं मैं।

पर मेरा आखिर ठिकाना है मेरी दिल्ली ,
तू रूठी हुई है तुझको मनाना है दिल्ली ,
नहीं बिन तेरे मुझे कोई  भाया है दिल्ली ,
ये सच है यकीं तुझे दिलाया है दिल्ली ,
कोई नहीं मैंने बहाना बनाया है दिल्ली ,
लग रहा फिर तुम्हीं ने बुलाया है दिल्ली।


Friday, 15 November 2019

सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला - ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया

     सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला 

               - ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया 

खामोश रहना उचित नहीं होता है मगर कभी अत्याधिक शोर से भी बचना चाहिए। तभी इस संवेदनशील विषय पर कुछ समय विचार करने के बाद अपना मत रखने जा रहा हूं। आस्तिक हूं मगर धर्म को लेकर कभी भी कट्रता को स्वीकार नहीं किया है। मुझे मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे इक समान लगते हैं और मेरा अभिमत है कि धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजि विषय है और सरकार कानून अदालत को निरपेक्ष होकर कार्य करना चाहिए। 

     ये उचित परंपरा नहीं हो सकती कि बिना नियम कानून और तर्क के बहुमत की राय को स्वीकार कर लिया जाये। संविधान सबको बराबर की आज़ादी देता है इसलिए बिना सोचे समझे किसी की बात को विरोधी समझ कोई अनुचित आरोप नहीं लगा देना चाहिए। मगर ऐसा लगता है अब कुछ लोग यही करते हैं और उचित बात कहने पर देशभक्ति पर सवाल खड़े करने लगते हैं। 

  इक आई एस अधिकारी ने अपना पद छोड़ दिया सरकारी निर्णय को अनुचित समझते हुए। उनका भाषण उनकी बात सुनने लायक हैं। 


   इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या विवाद पर निर्णय पर इक रिटायर न्यायधीश ने विचार व्यक्त किये हैं जो सोचने को विवश करते हैं। उनकी कही बातों को समझने की कोशिश करते हैं। कुछ बातें हैं जिन पर विचार करते हुए अपनी आस्था विश्वास और चाहत को किनारे रख कर देश के संविधान की भावना को समझना ज़रूरी है। 

      अदालत एक तरफ कहती है उसको आस्था को लेकर कोई निर्णय नहीं करना और विवाद कानूनी मालिकाना अधिकार का है। फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ए एस आई का जांच करना आधार बनाना इस को लेकर कि सैंकड़ों साल पहले उस जगह क्या था क्या होता था निर्णय को प्रभावित कैसे कर सकता है। देश की आज़ादी के बाद संविधान लागू किया गया और देश की अदालत और कानून को उसके बाद उसके अनुसार विचार करना उचित होता क्योंकि इस तरह से देश भर में कितनी इमारतें भवन निर्मित हुए कितने शासकों के शासनकाल में। केवल इस बात को सोचकर कि बहुमत की अवधारणा और राय किस पक्ष में होगी निष्पक्ष होकर निर्णय नहीं किया जा सकता है। पहले भी सत्ताधारी शासक नेताओं द्वारा अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त कर अपनी मर्ज़ी के सुविधाजनक निर्णय करवाए जाते रहे हैं। 

 इतिहास की आंखों ने वो मंज़र भी देखे हैं 

लम्हों ने खता की थी और सदियों ने सज़ा पाई।


Friday, 8 November 2019

कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बड़ी प्यारी सी बच्ची है तुतली ज़ुबान में बोलती हुई सवाल पूछती है कोई मेरे मम्मी-पापा का नाम पता बताओ मुझे अनाथालय में छोड़ गया जो जन्म देते ही वो कौन था। स्कूल में पढ़ाई करने जाना चाहती है आधार कार्ड बनवाना ज़रूरी है समझो कितनी मज़बूरी है। सरकारी ऐलान है नोटबंदी हुई बदनाम है काली कलूटी उसका नाम है पर उसका रंग गुलाबी है छुपे खज़ाने की चाबी है काला धन कहां छिपा है तूं तूने की सब बर्बादी है। धन काला मिला नहीं इसका कोई गिला नहीं पर जो तीन साल की बच्ची है ये अक्ल की कच्ची है राजनीति से वाकिफ़ नहीं सरकार से पहचान नहीं ये जायज़ संतान नहीं। सच इसको समझाए कौन काला धन खोज लाये कौन। रोटी से जो खेलता है उसका पता बताये कौन संसद इस सवाल पर आखिर रहेगी कब तलक मौन। चलो हम मिलकर जन्म दिन मनाते हैं हैप्पी बर्थडे टू यू गाते हैं बच्ची का दिल बहलाते हैं। 

        मोदी जी आएंगे आकर तुझे खिलाएंगे जब रात आठ बज जाएंगे गले तुझको लगाएंगे। तुझे पढ़ाया जायेगा तुझको सबसे बचाया जायेगा बच्ची तू इतिहास नहीं वर्तमान है भविष्य बनाया जायेगा। हम गुब्बारे बहुत फुलाएंगे पार्टी राह पर मनाएंगे केक भी कटवाना है मोमबत्ती बुझवाना है ताली बजाकर हैप्पी बर्थडे टू यू गाना है। मोदी जो तोहफ़ा लाएंगे सबको ये सच बतलाएंगे खाते में कितना धन डलवाएंगे हम मालामाल हो जाएंगे। मोदी जो ने फ़रमाया है पांच साल व्यर्थ गंवाया है अब दूर की कौड़ी लानी है की अब तक मनमानी है। अध्यापक जी समझाएंगे नोटबंदी की बात बताएंगे पूरी कहानी सुनाएंगे हम झूमेंगे और गाएंगे तीन साल का जश्न मनाएंगे। जन्म दिन तुम्हारा मिलेंगे लड्डू हमको गीत बजवाएंगे , तुम जियो हज़ारों साल जिओ वाले मुस्कुराएंगे। थक कर खुद सो जाएगी ये बच्ची भूखी प्यासी सपनों में खो जाएगी। सरकार आपको बधाई हो प्यारी सी बिटिया आई है गूंगी नहीं है खामोश है लगता है देख आपको घबराई है। 

    मोदी जी कहते हैं नोटबंदी करने का फायदा तीन साल बाद नज़र आया है। दुश्मन मुल्क़ में महंगाई आसमान छूने लगी है। अब अपने देश का इस में क्या भला हुआ अपनी समझ से बाहर है ये कुछ उस तरह है कि मेरी पोशाक मैली है मगर देखो मैंने दुश्मन की गंदी कर दी है। अर्थात मोदी जी चले थे सफाई करने मगर मैल छुड़ाने नहीं आता था गंदगी करना आसान था औरों को अधिक मैला कर खुद की चमक बढ़ाने का दावा कर लिया। मैल कपड़े का धुल जाता है मन का मैल साफ करने को कोई साबुन नहीं बना है। संसद की चौखट पर माथा टेका था याद होगा अब मन से सोचना पांच साल में कितना मन का मैल छुड़ाया , बस कपड़े बदलते रहे दिल की सफाई नहीं की। अब मानो न मानो नोटबंदी आपकी दी सौगात है और अपने किसानों को फसल का दुगना दाम देने का वादा किया था मगर हरियाणा के सीएम साहब पानीपत की अनाज मंडी में आकर किसानों की बर्बादी की बात पर बोलते हैं तो हम क्या करें। भले भी हम बुरे भी हम समझिओ न किसी से कम , हमारा नाम बनारसी बाबू। बनारस के ठग मशहूर हुआ करते थे ये गुजरती तो बनारस वालों का भी बाप निकला। बनारस वालों को गंगा मईआ के नाम पर ठग गया और शरद जोशी के मामा जी की तरह हम घाट किनारे खड़े हैं तौलिया लपेटे पूछते हैं देखा है उसको जो हमारे कपड़े सामान ले गया उल्लू बनाकर।

     कहावत है इक बार सच और झूठ नदी में नहाने को गए। झूठ जल्दी से बाहर निकला और सच के कपड़े पहन चल दिया। सच बाहर निकला तो उसके कपड़े नहीं थे और झूठ के पहन नहीं सकता है तभी से सच नंगा है। नोटबंदी बिटिया की दर्द भरी कहानी ऐसी ही है , तीन साल से हर कोई उसको बुरा बता रहा है और धुत्कार खाती फिरती है अपने जन्मदाता को ढूंढती जो शायद उसको अपना समझना तो क्या पहचानना भी नहीं चाहता है। जन्मदिन पर भी उदास है रोते रोते सो गई है।

Friday, 1 November 2019

इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

   इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर 

                         ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

 रिहाई की बात नहीं है रिहा होने की आरज़ू भी कभी की भूल गई। थोड़ा बदलते समय के दौर पर सोचा तो फुर्सत में किसी फिल्म की तरह फ्लैशबैक की तरह यादें चली आईं। ज़िंदगी अपनी हरदम किसी कैद में रहते गुज़री है कैदी यही रहा सय्याद बदलते रहे। आदमी को इतना भावुक और संवेदनशील भी नहीं होना चाहिए कि जीना दूभर होता जाये। हंसना चाहो तब भी आंखें नम हो जाएं और हर किसी से अश्क़ छिपाने की ज़रूरत हो या फिर ख़ुशी के आंसू हैं बताना पड़ जाये। मगर कुदरत भी कभी ठोस पत्थरीली ज़मीन पर कोई नाज़ुक सा फूल उगा देती है शायद मुझे यही मिला नसीब से। पत्थरों में रहकर भी फूल कोमलता बरकरार रखता है नहीं बन सकता पत्थर दुनिया की तरह। 

     कैद खुद अपनी भी बनाई हुई है और रिहा होने को कोशिश भी खुद ही करनी होगी इस बात को जानता हूं मगर होता है कभी जीवन भर पिंजरे में रहते रहते पिंजरा भाने लगता है। कोई पिजंरे का दरवाज़ा खोल देता है फिर भी मन बाहर नहीं निकलता और मुमकिन है कोई पकड़ कर खुली हवा में उड़ा दे तब भी पंछी खुद अपने पिंजरे में वापस लौट आये। बोध कथा की तरह। पर ये भी सच है पिंजरा चाहे सोने का हो या चांदी का बना पिंजरा पिंजरा ही होता है पंछी उड़ने को बेताब रहता है। मगर सय्याद ने जब पंख ही तोड़ डाले हों तब पंछी छटपटा भी नहीं सकता उड़ना तो दूर की बात है। 

   मुझे कैद रखने वाले समझते रहे मुझसे मुहब्बत करते हैं मेरा ख्याल रखते हैं मुझे सब दुनिया से बचाकर रखना ज़रूरी है। पिंजरे में बंद पंछी का चहकना अपने अंदर कितना दर्द छुपाये रहता है कोई नहीं समझता है। आज़ाद होने की ख्वाहिश रहती थी कभी अब नहीं बची शायद नियति को मंज़ूर कर लिया है। कितने साल जिस घर में रहा अपना था मगर लगता नहीं था अपना उस से बिछुड़ते समय पता नहीं उदासी का अर्थ क्या था मगर मन उदास उदास था अवश्य। 

    दुनिया की तेज़ रफ़्तार ने सुबह से शाम तक कितना लंबा सफर तय कर लिया और मैं खुद अपने पिंजरे को साथ लिए नई अजनबी दुनिया में चला आया नहीं सोचा समझा कुछ भी। अब उलझन पड़ी है सब बदला बदला है और मुझे समझाया जा रहा है नए माहौल में बदले तौर तरीके यहां की भाषा तहज़ीब सीखनी होगी। उनकी बात सुन सकता हूं अपनी कहनी नहीं आती है ऐसे में किस तरह बताऊं सीखने को जितना है जीने को उतना वक़्त भी शायद बचा नहीं है। आपके इशारे समझते समझते जाने कब कोई इशारा मिल जाये और भीतर का पंछी उड़ जाए अपनी आखिरी मंज़िल की तरह सुहाने सफर पर।