Wednesday, 30 October 2019

मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

 मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है , करें क्या ज़िंदगी की बात करना भी ज़रूरी है। 

   मेरी ग़ज़ल का मतला है बहुत पहले लिखा था। कई बार पहले सोशल मीडिया पर और व्यक्तिगत तौर पर भी मिलने वालों को बताया है कि मैंने लिखने की शुरुआत 1974 में नियमित रूप से इक मकसद को लेकर की थी। इक मैगज़ीन में कॉलम पढ़कर जिस में संपादक ने सभी से कहा था की शिक्षित होने पर अपने खुद घर परिवार को छोड़कर कोई न कोई काम देश समाज की भलाई को लेकर करना भी इक कर्तव्य है समाज से जो भी मिला उसका क़र्ज़ उतारने के लिए। डॉक्टर होने से साहित्य को पढ़ने का अवसर कम मिला बस इधर उधर से थोड़ा बहुत ही पढ़ा है। समाज की जनहित की बात लिखते लिखते व्यंग्य कविता कहानी ग़ज़ल आलेख लिखता गया जब जिस विषय पर जो भी विधा उचित लगती रही। लिखने के स्तर को लेकर हमेशा से मुझे मालूम रहा है कि ग़लिब दुष्यंत परसाई शरद जोशी मुंशी प्रेमचंद अदि को सामने कुछ भी नहीं हूं न बन सकता हूं। साहित्यकार होने का भ्र्म नहीं पाला दिल में और नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार की चाहत रही नहीं। लिखना मेरे लिए जीना है सांस लेने की तरह ज़रूरी है। नहीं रह सकता लिखे बिना। मैंने जितना जो भी लिखा ज़िंदगी की बातों से अनुभव से और निष्पक्षता से समाज की वास्तविकता को उजागर करने को लिखा और बगैर इसकी चिंता किये लिखता रहा कि किसी और के तो क्या खुद मेरे भी ख़िलाफ़ तो नहीं। मेरा पहला व्यंग्य " उत्पति डॉक्टर की " अपने ही व्यवसाय पर तीखा कटाक्ष था। अभी तक कोई किताब नहीं छपवाई मगर अख़बार मैगज़ीन लोगों को समाजिक संस्थाओं से नेताओ अधिकारियों को लिख कर जहां जो भी समस्या थी विसंगति थी गलत हो रहा था लिखकर भेजता रहा। 

        जो लोग किताबें पढ़कर दुनिया समाज को समझते हैं किताबी साहित्य के मापदंड और नियम आदि की चिंता करते हैं उन्हें कभी मेरे लिखने पर उलझन होती है। सीखा है कई तरह से लिखने को सुधारने की कोशिश करता रहता हूं मगर उपदेशकों की ज़रूरत नहीं लगती है। खुद विचार चिंतन और अभ्यास से कोशिश करता रहता हूं और अच्छा लिखने की।  मगर सबसे महत्वपूर्ण बात लगती है सच और सही बात ईमानदारी से निडरता से लिखने की। भले मेरा लेखन जैसा भी जिस भी विधा में हो उसमे वास्तविक्ता है आडंबर नहीं बनावट झूठ या बात को उलझाने की कोशिश कभी नहीं की है। इतना काफी है। खुद को किसी तथाकथित साहित्यगुरूओं के तराज़ू पर उस इस पलड़े पर रखकर तोलना ज़रूरी नहीं लगा है उनसे कोई प्रमाणपत्र पाने को जिसकी मुझे कोई चाहत नहीं है।


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