Sunday, 13 October 2019

झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया

   झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया 

जाने किस कवि शायर की रचना है जो पंजाबी में रचना है मैंने उसका वीडियो देखा और शेयर किया था। आज संक्षेप में बता देता हूं। कवि कहता है , रावी नदी से तीन नहरें निकलीं जिन से दो सूखी और तीसरी में कभी पानी नहीं आया सतलुज यमुना नहर की तरह। जो कभी भी नहीं बहती उस में तीन लोग नहाने को गए उन से दो डूब गए और तीसरा खो गया मिला ही नहीं। जो मिला ही नहीं उसको नहर से तीन गाय मिलीं जिनसे दो फंडड़ अर्थात जो बच्चा नहीं दे सके और तीसरी जिसका गर्भ नहीं बच्चे देने को। जिसका गर्भ नहीं उसने जन्म दिया तीन बछड़ों को जिन में दो लंगड़े और तीसरा उठ भी नहीं सकता। जो उठ भी नहीं सकता उसकी कीमत तीन रूपये दो खोटे और एक चलता ही नहीं। जो रुपया चलता नहीं उसको देखने को तीन सुनयारे आये जिन में दो अंधे और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता। जिसको कुछ भी दिखाई नहीं देता उसे तीन घूंसे मारे गए दो निशाना चूक गए और तीसरा लगा ही नहीं। बस चुनावी वादे ऐसे ही हुआ करते हैं जिनसे हासिल कुछ भी नहीं होता है। 

      अब आज की बात एक दल ने सौ वादे किये दूसरे ने दोगुणा वादे गिनवा दिए। पहले भी उन दोनों ने हज़ार वादे किये थे भूल गए उनकी बात अब नहीं करते। गरीबी भूख अन्याय और जाने क्या क्या स्वर्ग धरती पे ले आने की बातें की थीं। मछली को जाल में फंसाने को कांटे में कुछ देते हैं कोई मछली से प्यार नहीं करता है। आशिक़ चांद तारे तोड़ कर आंचल में भरने की बात कहता है शादी के बाद पता चलता है वादा तेरा वादा। औरत या वोटर हमेशा धोखा खाते हैं सपने कभी सच नहीं होते हैं। आज तक कभी किसी नेता ने सत्ता पाकर खुद सब कुछ नहीं हासिल करने की बात नहीं कर दिखाई और पति बनते ही पत्नी को कभी खुश करने को तुम से अच्छा कौन है नहीं समझा है। नेता और पति बेवफ़ा होते ही हैं आप इन पर भरोसा करते हैं तो धोखा खाते हैं। इस विषय को समझना है तो इक पुराना व्यंग्य नेता पति है पत्नी है जनता पढ़ सकते हैं। 

     वादों का इतिहास यही है वो वादा ही नहीं जो निभा दिया गया हो। जो मिल गया मुक्क्दर था वरना कोई आपको खोटी कोड़ी भी नहीं देना चाहता। गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया। कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या। कितने गीत कितनी कहानियां कितनी कविताएं ग़ज़ल मुहब्बत की बेवफ़ाई की बात समझाती हैं लोग फिर भी नासमझ बन सोचते हैं अपने को जो मिला वफ़ादार है। खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता लोग समझाते हैं सुंदर सुनहरे ख्वाब सच नहीं होते कभी। हम लोग आदी हैं सपने देख कर यकीन करते हैं किसी दिन सच होगा भगवान छप्पर फाड़ कर देगा मगर कभी किसी गरीब के घर पैसों की बारिश नहीं हुई नेताओं अफ्सरों के घर दफ्तर धनलक्ष्मी बरसात करती है। आप तो शरद पूर्णिमा को खीर बनाकर भोग लगाते रहते हैं दीपावली पर लक्ष्मी अब भी किसी दल के घर जाकर रहेगी। पांच साल में उनका कायापल्ट हो जाता है। वादा नहीं था जो हो जाता है वादे बस वादे रहते हैं उनकी कहानी बदलती नहीं कभी भी।

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