Thursday, 1 August 2019

पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज की बात से पहले इक ग़ज़ल कैफ़ी आज़मी जी की कहना चाहता हूं विषय को समझने को उचित है। 

मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहान नहीं मिलता , नई ज़मीन नया आसमान नहीं मिलता। 
नई ज़मीन नया आसमान भी मिल जाये , नये बशर का कहीं कुछ निशान नहीं मिलता। 
वो तेग मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा , किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता।
जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्या , यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता। 
खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में , तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहां नहीं मिलता। 

         आज जो बात कहनी है वो किसी एक की नहीं सारे समाज की है। साहित्य हो राजनीति हो धर्म हो समाज सेवा कोई कारोबार हो या कोई शिक्षा स्वस्थ्य समाज सेवा का क्षेत्र हो अजीब विसंगती है विडंबना है खेद की चिंता की बात है कि अपना योगदान देकर उसको समृद्ध कोई नहीं करना जनता हर कोई उस से बहुत कुछ हासिल करने को व्याकुल है। क्या हम सब इतने खाली हो चुके हैं जो जितना भी भरता रहे कोई भी फिर भी खालीपन ख़त्म नहीं होता है। ये देश समाज कभी ऐसा तो नहीं था जो सिर्फ मांगता है छीनता है देता किसी को कुछ भी नहीं है। ये कैसी हवस है और अधिक पाने की जो बढ़ती जाती है , ऊंचे से ऊंचे सिंहासन पर बैठा व्यक्ति भी वास्तव में बहुत छोटा है देना नहीं पाना चाहता है। राजनीति में लोग देश को सेवाएं देने नहीं अपने लिए धन साधन अधिकार शोहरत ताकत पाने को आते हैं। अर्थात हर कोई भिखारी है मांगता है देश को देने को पास है ही नहीं कुछ भी। 

धर्म वालों की हालत इतनी खराब है कि उपदेश देते हैं संचय नहीं करें गरीब दर्दमंद की सहायता करें मगर खुद धन दौलत का जायदाद का अंबार लगाने को लगे हैं। समाज सेवा या सरकारी नौकरी हो कर्तव्य नहीं अधिकार याद रहते हैं और उनका दुरूपयोग करना अनुचित नहीं लगता है। नैतिकता का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि अपने पद की गरिमा को भी संभाल नहीं पाते हैं। जो जितना धनवान कारोबारी है उसको उतनी ही ज़्यादा भूख और किसी भी तरह पाने की है। हर कोई चलता है बड़े होने का मकसद लेकर मगर ऊपर जाने को नीचे गिरने से संकोच कोई नहीं करता है। खुद आत्मसम्मान स्वाभिमान को खोकर किसी की चाटुकरिता कर क्या हासिल किया नहीं समझते हैं। अंतरात्मा को ज़मीर को मारकर ज़िंदा रहना मौत से बदतर है। 

नहीं मिलता कुछ भी। जिस जहान की तलाश थी नहीं मिलता। कुछ भी नयापन नहीं है नई ज़मीन नया आसमान कोई ढूंढता ही नहीं चांद तारों की बात होती है। धरती को रहने के काबिल नहीं बनाते हैं। कोई इंसान इंसान जैसा नहीं मिलता मिलती है हर किसी में छुपी हुई हैवानियत जिधर भी जाओ। चर्चा होती है सब गलत होने की अन्याय की व्यवस्था की बदहाली की , ये भी जानते हैं किस तलवार से ये खून मानवता का बहा है मगर उस तलवार पर किसी क़ातिल के हाथ का निशां नहीं मिलता है। आपको खुदा अल्लाह की नहीं मिलने की कमी लगती है वो नहीं मिले तो मातम करने की क्या ज़रूरत है दुःख तो इसका है आदमी आदमी की बात नहीं समझता है। ये दुनिया किसी चेहरों के जंगल की तरह है मगर कोई भी चेहरा आदमियत का इंसानियत का दिखाई नहीं देता है। 

           सबको मंज़िल पानी है रास्ता कोई नहीं बनाना चाहता , शायद राह पर चलना भी नहीं चाहता कोई भी। राह की मुश्किलों को रास्ते की रुकावटों को हटाए बिना कभी कोई मंज़िल मिलती नहीं है। हम सभी बस खड़े हुए हैं ये उलझन लेकर कि कोई पूछे तो क्या बताएं कि जाना किधर है। निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं।
 

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