Tuesday, 16 July 2019

इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

          इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

 दुनिया के तराज़ू के पलड़े के दोनों तरफ मुझे नहीं बैठना। न तुलने का सामान होना है न ही तोलने का बाट होना है। नहीं मंज़ूर मुझे ये बड़े-छोटे अमीर-गरीब समझदार-नासमझ काबिल-नाकाबिल जैसे किसी भी दो हिस्सों में दुनिया समाज को बांटना। आपकी अमीरी आपकी समझदारी आपकी क़ाबलियत सफल होने की और आपका बड़पन्न आप सभी को मुबारिक हो। मुझे नहीं पसंद भेदभाव की सोच वाली ये दुनिया , मुझे लगता है हर इंसान इंसान होने का हकदार होने से बराबर है। जिस दिन आपकी किसी मशीन का कोई छोटा सा पुर्ज़ा नहीं काम करता उस दिन आप को उसकी अहमियत समझ आती है। ख़ामोशी से अपना काम करने वाला लगता है कोई काम नहीं कर रहा मगर कभी उसी धुरी पर बाकी कलपुर्ज़े चला करते हैं टूटते ही सबका चलना बंद हो जाता है।

        लाखों करोड़ हैं जिनके पास उनको अभी और की हवस है और धन दौलत नाम शोहरत पाने को सब करने को तैयार हैं। अमीरी इसको कहते हैं तो ऐसी अमीरी किस काम की बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर , पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर। ये ऊंचे कद वाले किसी के काम नहीं आते हैं समाज को देश को कुछ नहीं मिलता इन जैसों से। लेकिन हर छोटा कहलाने वाला कुछ न कुछ योगदान देता है समाज को देश को , उसकी गरीबी उसका अपराध नहीं है शोषण की व्यवस्था और अन्यायकारी सामाजिक संरचना है। जिस में बड़े ओहदे पर बैठा कम मेहनत कर भी अधिक मेहनताना लेता है और औरों को उनकी मेहनत और काबलियत का कम मेहनताना देकर रईस बनता है। अमीरी किसी और के हिस्से की लूट से मिलती है सबको पूरा मेहनत का दाम मिले तो अमीर की अमीरी बच नहीं सकती। हमने वो समाज बनाना है जिस में जितना है सबको समान हासिल हो , इस दुनिया से हमारी जंग इसी बात की है।

  अगर आप भी खुद को बाकी लोगों से बड़ा या अमीर या काबिल समझदार मानते हैं तो बस इतना कर दिखाना जो भी छोटा काम किसी से करवाते हैं खुद किसी और की खातिर करना पड़े तो क्या मेहनताना लेना मंज़ूर है उतना उसको देना जिस से छोटा समझ कोई काम करवाते हैं। नहीं समझ आया मुमकिन है बहुत काम आप किसी कीमत पर नहीं करना चाहोगे जिसके लिए चंद सिक्के देकर समझते हैं इतना क्या थोड़ा है। वास्तविक अमीरी उसे कहते हैं जो किसी से लेने नहीं देने की सोच रखते है। जिनके पास बहुत पास है मगर अभी और और और अधिक की लालसा रखते हैं सबसे बड़े गरीब होते हैं। मैं जानता हूं मेरी क्या काबलियत है और उसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। दाम लगाया उनका जाता है जो बिकाऊ हैं बाज़ार में अपनी कीमत ऊंची लगवा बिकने को राज़ी हैं , हम बिकने वालों में शामिल नहीं हैं। इक शेर मेरी ग़ज़ल का अंत में।

                        अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,

                          देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

No comments: