Wednesday, 31 July 2019

शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 शासकों की मुहब्बत की दास्तां अलग हुआ करती है। इधर मुहब्बत का रंग ढंग बदला है आशिक़ महबूबा की जान लेते हैं। इक आशिक़ी देश से मुहब्बत की भी होती है आजकल जिसका शोर बहुत है , कभी देश की खातिर जान देने वाले खुद को महान कहते नहीं थे समझते थे जन्मभुमि का हक अदा करना है उसको आज़ाद करवा कर। पहले शाहजहां मुमताज की मुहब्बत को समझते हैं इक तस्वीर पर लिखी सच्चाई को समझते हैं। 







मुमताज शाहजहां की चौथी पत्नी थी सात पत्नियों में से और मुमताज से शादी करने को उसके पति का क़त्ल किया था उनहोंने उनके बच्चे को जन्म देते हुए छोटी आयु में मुमताज की मौत हो गई थी। जिसके बाद शाहजहां ने मुमताज की बहन से शादी कर ली थी। चलो इश्क़ मुहब्बत की बात से पहले बात करते हैं देश से मुहब्बत करने की और उसकी बदलती हुई आधुनिक परिभाषा की भी। मगर ताजमहल अपने देखा होगा कभी सोचा मुमताज को क्या मिला उसने नहीं देखा दुनिया को इक शहंशाह ने दिखाया उसकी मुहब्बत कैसी है। मगर फिर भी वो इक मज़ार है जिसमें किसी की जाने कितनी आरज़ूएं दर्द दफ़्न हैं। पत्थर कितने चमकदार हों उनमें कोई एहसास नहीं होता मुहब्बत तो बाद की बात है। साहिर ने कहा था इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।

         उनका दावा है उन से बड़ा देशभक्त कोई नहीं है यहां तक बात पहुंची है कि जो उनकी आलोचना करता है उसकी देशभक्ति पर शक किया जाता है। शाहजहां ने मुमताज की मुहब्बत में तालमहल बनवाया था ताकि उसकी बगल में अपनी मजार मरने के बाद बनाई जाये अर्थात मरने के बाद भी उसके जिस्म को पास रखना चाहते थे और उस पर बेतहाशा धन सरकारी खज़ाने से खर्च किया गया। आज भले आमदनी होती होगी ताजमहल देखने वालों से मगर तब शासक उस धन से देश की जनता की भलाई को कितना कुछ कर सकता था। शायद शाहजहां ने फिर जन्म लिया है या इक नया शहंशाह पैदा हुआ है जो अपने शौक अपनी शोहरत की खातिर बेतहाशा धन बर्बाद करता है। लोकशाही है राजाओं का शासन नहीं सत्ता मनमानी करने को नहीं देश की समस्याओं को समझने उनका हल निकालने को मिलती है। कितने करोड़ धार्मिक आयोजन सैर सपाटे पर कितने हज़ार करोड़ पचास देशों की सैर करने पर कितना धन आडंबर करने ऊंची मूर्तियां बनवाने पर कितना धन सरकारी खज़ाने से अपने फायदे को जनता को झांसा देने को सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर इश्तिहार देने पर खर्च किये जिनसे कितने भूखे पेट भर सकते थे कितने स्कूल अस्पताल बनवा सकते थे। केवल अपने और अपने दल के लिए शासन बनाये रखना देशभक्ति कहलाता है तो बड़ी हैरानी की बात है। सत्ता का ऐसा मोह देश से नहीं कुर्सी से प्यार कहला सकता है।

  आज देश आर्थिक बदहाली और बेरोज़गारी और हर तरह से बुरे हालात में पहुंच गया है मगर आपको फुर्सत ही नहीं पिछले शासकों को खराब बताने के अनुचित काम से। जिनकी बात करते हैं उन्होंने कभी देश पर कोई उपकार करने का दावा आपकी तरह नहीं किया था। शहीदों की शाहदत को वोट पाने का औज़ार कभी किसी ने नहीं बनाया था पहले। आपके दल के नेता आये दिन गंभीर अपराध करते पाए जाते हैं मगर आपकी ज़ुबान से दो शब्द नहीं निकलते उसको देश समाज का दुश्मन बताने को। सत्ता पाने को कितने अपराधी दल में शामिल किये हैं कोई हिसाब नहीं जैसे कोई धर्मं परिवर्तन या गंगा स्नान हो पापियों के पाप धोने को। गंगा को वादा किया था बेटा होने की बात कही थी सफाई की गंगा पहले से मैली हो गई बताते हैं। हर दिन कोई धर्म के नाम पर भीड़ बनकर दंगा करता है कोई सत्ताधारी बलात्कारी सरकारी संरक्षण पाकर पीड़ित पक्ष को और परेशान करता है। ये सुशासन है देशभक्ति है। देश से मुहब्बत हो या किसी आशिक़ की आशिक़ी दोनों इबादत की तरह होती हैं और इबादत शोर मचाकर नहीं ख़ामोशी से की जाती है। आजकल फ़िल्मी ढंग से गुलाब देकर या उपहार भेजकर किसी से प्यार का इज़हार किया जाता है और इनकार करने पर मुहब्बत नफरत में बदल जाती है। वास्तविक मुहब्बत कभी ऐसी नहीं हुआ करती है ये वासना जिस्मानी हवस है जो इधर नज़र आती है। इक गीत बहुत पसंद किया गया था , आये दिन बहार के फिल्म से। मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे। मैंने इस से बढ़कर बद्दुआ किसी को देते नहीं सुना है ये चाहत हर्गिज़ नहीं है इसको मुहब्बत नहीं कहा जा सकता कि मुझे नहीं किसी और को मिले तो हद से ज़्यादा नफरत दिल में हो जाये। जिस दिल में मुहब्बत होती है नफरत को जगह नहीं हो सकती। जिनकी देशभक्ति नफरत को बढ़ावा देती है भेदभाव की बात करती है उनकी देशभक्ति भी अपने स्वार्थ की दिखावे की हो सकती है।

   ताजमहल फिल्म बनाने के वक़्त साहिर को गीतकार बनाने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया था। क्योंकि उनकी नज़्म कुछ और बात कहती थी और सच्चा शायर पैसे शोहरत की खातिर अपनी ज़ुबान नहीं बदल सकता है। शायर कहता है मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको। मैं किसी शहंशाह की तरह नहीं जो मरने के बाद भी महबूबा को जकड़े रखना चाहता है। तुम मुझे ठुकरा के भी जा सकती हो तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। ये जिनकी देशभक्ति औरों को बंधक बनाये रखना चाहती है उसी तरह की है चाहत नहीं है मतलबपरस्ती की बात है।  इस आधुनिक शासक ने भी खुद अपनी शान दिखाने को वही दोहराया है। कुछ तस्वीरें देखते हैं।









मुस्लिम महिलाओं की बड़ी चिंता थी अच्छा है तीन तलाक को कानूनी अपराध घोषित करने को संसद में कानून बना दिया। मगर जिन महिलाओं को पति बिना तलाक छोड़ देते हैं उनका दर्द कोई कभी समझेगा। इनकी शानो शौकत देख का वो महिला जाने क्या सोचती होगी जिनको बिना कारण जनाब बेसहारा अकेली उस ज़माने में छोड़ आये थे जब छोड़ी हुई औरत का लोग जीना दूभर  देते थे। जब तक चाहा पत्नी होने की बात छुपाए रखी दस्तावेज़ में नहीं घोषित किया मगर जब लगा कहीं इसी से चुनावी नुकसान नहीं हो जाए घोषित कर दिया। चलो उनकी आपसी बात है हम कौन होते हैं।

     मगर क्या कानून बनाने से बाल मज़दूरी मिट गई दहेज लेना देना बंद हुआ और तो और बच्चों को शिक्षा का अधिकार भूखे को रोटी अनाज का अधिकार वास्तव में मिला है। कल कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक देगा तो क्या होगा , महिला शिकायत करेगी तो शौहर जेल में बंद खुद अकेली बेसहारा और नहीं करेगी शिकायत तब तलाक  स्वीकार कर अलग। चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाक़ू पर कटना खरबूजे को ही है। वोटबैंक के झांसे में हासिल आम नागरिक को कुछ नहीं होता है राजनीति अपना खेल खेलती है उसकी कोई संवेदना नहीं होती है।  खुदा खैर करे उन मुस्लिम महिलाओं को शायद कुछ राहत सच मिल जाये।

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