Tuesday, 2 July 2019

क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       पहले अपनी बात कहता हूं जी रहा हूं मगर वास्तव में जीना नहीं आया अभी तलक मुझे। बेकार गाता रहा हमेशा ही , किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , हमको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। किसे आता है सलीका जीने का जो सिखलाता। सब लोग सूखे तालाब किनारे बैठे हैं प्यास लेकर नाता निभाने को। जब बहुत अधिक बोलने लगे कोई तो उसको खामोश रहने की सलाह देते हैं लेकिन चुप रहना क्या आसान है उसके लिए जिस के भीतर तूफान मचलते रहते हैं भंवर लिए फिरता है कदम कदम अपने साथ। कुछ इसी तरह सोचकर समझ आया जितना लिखा किसी काम का नहीं है अब विराम लेकर थोड़ा याद रखने के काबिल काम का लिखना बेहतर है। लिखना भी खुद पढ़ना भी खुद है किस को बिना मतलब की बात पढ़ना सुनना पसंद है बात करते हैं तो भी कोई मकसद छिपा रहता है। अब जब मरने की तैयारी करनी चाहिए हसरत जाग उठी है थोड़ा सा हम भी जी कर देख लेते। किसी ने कहा था मौत के बाद जीना है तो दो काम हैं करने को , या कुछ कर जाना लिखने के लायक या फिर लिख जाना पढ़ने के काबिल। अपने आप पर गर्व नाज़ करना फज़ूल है अभी तो नाज़ करने जैसा कुछ भी नहीं किया है। आज़ादी की चाहत में कैदखाने की दिवारों को और ऊंचा करते रहे हैं जाने किस डर से और समझते रहे यही सुरक्षा की ज़रूरत है।

  इधर समस्या खड़ी हो गई है , सरकार को पता चला है देश में जनसंख्या में कुछ गड़बड़ है। नोटबंदी की तरह अचानक घोषणा की गई है सबको अपने ज़िंदा होने का हल्फनामा जमा करवाना होगा कुछ दिन के अंदर और इक दस्तावेज़ हासिल करना होगा ये घोषणा करने का कि हां अमुक नाम का व्यक्ति मरा नहीं है। ज़िंदा होने की बात फिर भी साफ नहीं लिखी जाएगी क्योंकि ज़िंदा होने का भरोसा नहीं किसी का भी। सांस चलती है दिल धड़कता है विवेक काम नहीं करता उसको ज़िंदा नहीं कहते हैं मरने की राह पर मदहोशी की बात है। जाने कितनी चलती फिरती लाशें हैं जिन में ज़िंदगी होने का कोई एहसास नहीं होता है। जी रहे हैं मगर जीते हैं मर मर कर मुर्दों की तरह से , फर्क इतना है लोग खुद अपनी अर्थी को उठाये फिरते हैं। सीने पर बोझ लिए सांसों की गिनती करते वक़्त गुज़रते हैं। 

    इस से पहले कि आप घर से निकल पड़ें समझ लेना ज़रूरी है ज़िंदगी के अलामात क्या हैं। पहला काम आपको अपने भीतर झांकना है कोई आत्मा ज़मीर नाम का है भी या नहीं। बेच तो नहीं बैठे किसी को किसी दिन जाने अनजाने में। एक्स रे अल्ट्रासाउंड से आधुनिक उपकरण है जो आपके सामने पाते ही घोषित करेगा आपका ज़मीर है या नहीं है। नहीं समझे तो आईना सामने रखकर देखना , मन का दर्पण आपको साफ सच बता देगा। उस के बाद जाना किसी डॉक्टर से जांच करवाने लेकिन ख्याल रखना उस डॉक्टर के पास ज़िंदा होने का आत्मा और ज़मीर के सुरक्षित और स्वस्थ्य होना का दस्तावेज़ है तभी अन्यथा उसको अपने साथ किसी और के पास लेकर जाना। ज़िंदा नज़र आना और ज़िंदा होने का फर्क होता है संवेदना रहित गतिमान व्यक्ति बिना भावना या एहसास के बस इक मशीन है। मशीन खुद नहीं करती कुछ भी जिस के हाथ मशीन होती है उस की मर्ज़ी से चलती फिरती काम करती है। जैसे कोई वाहन किसी चालक की इच्छा से आता जाता है , हम किसी को इंसान नहीं इस्तेमाल की चीज़ समझते हैं और उसकी पसंद नापसंद नहीं समझते पूछते जानते समझते। जो हम चाहते हैं उस से करने की उम्मीद करते हैं। कोई काम आप करना नहीं चाहते करना पड़ता है वेतन पाने को नौकरी का सवाल होता है तब आदमी आदमी नहीं रहता मशीन हो जाता है।

    कहने को आपका शहर देश या गांव है मगर जैसा होना चाहिए होता नहीं है आपको बेगानापन लगता है। लोग भागते रहते हैं देश विदेश घूमते हैं चार दिन सैर करने को लाजवाब जगह भी हमेशा रहने को कभी लगता है मज़बूरी है। जिस जगह आपको हमेशा रहकर ख़ुशी मिले उस जगह आपका घर होना मुमकिन नहीं होता है। घर अपना नहीं किराये का भी हो तब भी आपको अपनी मर्ज़ी से रहने की अनुमति मिलना ज़रूरी नहीं होता मिल ही जाये। घर क्या कमरे का कोई इक कोना आपका अपना हो अपने अनुसार रहने को और कोई आपके हंसने रोने नाचने गाने झूमने पर अंकुश नहीं लगा सकता हो तो खुल कर जीने का लुत्फ़ लिया जा सकता है। दुनिया के नियम कानून आपको जीने नहीं देते और मरने की भी मनाही होती है फिर भी कहते हैं इस ढंग से जीना है उस ढंग से जीना सही नहीं है। आज़ाद होना चाहते हैं सभी मगर किसी दूसरे को आज़ादी देने को कोई तैयार नहीं होता , और किसी का मनमर्ज़ी से जीना क्यों आपको खराब लगता है।

      और होंगे जिनको चिंता रहती है मौत के बाद लोग याद रखें मुझे , मैंने तो चाहा है लोग भूल जाएं मुझे भी मेरी सभी खताओं को भी। किस किस का मुजरिम नहीं हूं क्या किया है ऐसे जीता रहा जैसे कोई हर दिल इक गुनाह करता है। कुछ भी नहीं है मुझ में याद रखने के काबिल और कोई हसरत नहीं बाद मरने के याद करे कोई , हसरत है थोड़ी फुर्सत मिले इजाज़त मिले ज़माने की तो पल दो पल जीकर देखा जाये ज़िंदगी किसे कहते हैं। मरने के इंतज़ार में सांसे की गिनती को जीना नहीं कहते हैं।

   

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