Friday, 31 May 2019

हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) 

                        डॉ लोक सेतिया ( किसी की डायरी से )

    इस बार भी बुलावा नहीं आया कितना शानदार उत्सव था। सखियां ज़रूर छेड़ेंगी मान जाती खुद ही चली जाती भला कोई रोक सकता था। जब मानते हैं अभी भी तुम उनकी पत्नी हो तो अधिकार था जाती साथ की कुर्सी पर विराजमान होती। टीवी चैनल वाले भी उनकी माता जी मतलब आपकी सासु मां को घर बैठ टीवी पर देखते दिखाना छोड़ तुम्हीं पर कैमरा फोकस करते हम भी देखते कितना अच्छा लगता। कोई बहाना समझ ही नहीं आ रहा इस बार पिछली बार कहा था बुलाने का इंतज़ार करती रही बुलावा मिला ही नहीं। जाने कैसे लोग पता लगा लेते हैं जो जानकारी मिली कि जिस भी नेता को पद पर आसीन होने की शपथ लेनी हो उसके परिवार को बुलावा भेजना ज़रूरी है और इस के लिए उनके कहने की ज़रूरत नहीं समझी जाती है। खैर इस बार ये उम्मीद नहीं थी जाऊं चाहे नहीं भी जाऊं बुलाना तो होगा ही। उस दिन जानकर घर से बाहर नहीं निकली न किसी से संपर्क किया किसी तरह भी। सब समझे होंगें चली गई होगी इस बार बुलावा आने की राह तकने की भी ज़रूरत नहीं होगी। 

     हम लोग रिश्तों को लाख आपसी मन मुटाव होने पर भी निभाते हैं ख़ुशी के वक़्त बुला लेते हैं दुःख की घड़ी चले जाते हैं खबर मिलते ही। पति पत्नी में तो रूठना मनाना घर के भीतर होता है बाहर समाज को पता नहीं चलने देते कोई झगड़ा भी है। ऐसे मिलते हैं आदर्श जोड़ी की तरह इक दूजे की ख़ुशी को मिलकर मनाते हैं। जाओ जी बड़े वो हो , अरी तुम भी अजीब हो घर की मालकिन सबको बुलाती है तुम को भला बुलाने की ज़रूरत थी कोई। खत नहीं फोन नहीं व्हाट्सएप्प संदेश भेज कर लोग जिसको नहीं पसंद उनको भी आने को निमंत्रण भिजवा देते हैं खुद नहीं जाना तो डाक से कुरियर से ही। अधिकतर चले जाते हैं उत्सव का अवसर है गीले शिकवे भुलाकर फिर से मरासिम कायम रखने को सिलसिला चल पड़ता है। 

    अगली सुबह सखियां चली आईं बधाई देने को। मिठाई मंगवाना भूल गई ओह याद किसी की न सताये राम जी। झूठ बोलना पड़ा मिठाई की दुकान से लड्डू मिले ही नहीं पहले से बुक करवा लिए थे उन्हीं के दल वालों ने। घर पर ही हलवा बनाकर खिलाना पड़ा। गई क्यों नहीं सवाल आना था जाने क्यों जवाब सूझ भी गया सखी इस बार डाक विभाग की गलती है उन्होंने इतना खूबसूरत निमंत्रण पत्र भिजवाया है मगर पहुंचा उत्सव खत्म होने के बाद तो कैसे जाती। सखियां नहीं समझी सच है या बहाना है। ये राजनेता लोग विपक्षी नेता को या अपने ही दल के विरोधी को जानकर देर से बुलावा भेजते है सभा में आने का पर घर के लोगों वो भी पत्नी को इस तरह नहीं बहलाया जा सकता है। चलो इसी बात पर इक ग़ज़ल आर पी महरिष जी की सुनते हैं। 

आईने में देखना अच्छा लगा , अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। 

आत्मश्लाघा में खुद अपनी पीठ को , थपथपाना ठोंकना अच्छा लगा। 

आज विश्वामित्र के बहरूप को , मेनका ने फिर छला अच्छा लगा। 

आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में , उनको चस्का जाम का अच्छा लगा। 

एक खलनायक की कटु मुस्कान पर , हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। 

बाद उत्सव के निमत्रण पत्र वो , खूबसूरत सा मिला अच्छा लगा। 

हम तो रुकने ही को थे महरिष मगर , उसने रोका रास्ता अच्छा लगा।       


No comments: