Thursday, 4 April 2019

शादी का इंश्योरेंस का अधिकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     शादी का इंश्योरेंस का अधिकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                हमारी सरकार महिलाओं पर मेहरबान रही है मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक पर ही नहीं जिन महिलाओं ने धर्म बदलकर मुस्लिम बने विवाहित पुरुष से शादी की उनकी भी काबलियत को समझा और उनको अपना बनाया है। संस्कार और संस्कृति की इक आधुनिक परंपरा की शुरुआत की है। बिना तलाक अपनी पत्नी को छोड़ने वाले को आदर्श स्थापित करने वाला महनायक घोषित किया गया  है क्योंकि  ऐसी महिला  को सीता जी की तरह त्याग किये जाने पर बनवास नहीं भेजा गया। फिर भी शादी पर संशय बना रहने की बात को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। महिला को बीच भंवर बेसहारा देखना अच्छी बात नहीं है , शायद दोबारा विचार कर उनकी दशा और सुरक्षा पर ध्यान देना ज़रूरी है। सरकारी दल की तरफ से फ़िल्मी सुंदरी महिला जगत से चर्चा कर वोट देने की बात समझा रही है। सुझाव देने की बात कही गई तो महिला मंडल की अध्यक्ष मांग सामने रखने लगी है।   

                       नेता जी आपकी कोई समस्या नहीं है। खुद अभिनय करती हैं और आपके नेता जी भी बहुत अच्छा अभिनय अच्छे होने का सफलता से करते हैं। कोई आपसे सवाल नहीं करता किसी और महिला का पति छीन लेने पर , कोई नेता जी से सवाल क्यों करेगा अपनी पत्नी को अधिकार नहीं देने और दुनिया की महिलाओं की चिंता जताने में विरोधाभास पर। मगर आज  नारी जगत जाग गया है अब बाकी कुछ भी नहीं चाहिए केवल एक अधिकार की मांग रखनी है सभी दल वालों के सामने। आरक्षण नहीं बराबरी नहीं कोई खैरात नहीं महिला होने पर किसी भी साहूलियत की। मगर इक नया कानून संविधान संशोधन द्वारा पारित करवाना लाज़मी है। शादी का पंजीकरण नहीं उसका इंश्योरेंस किया जाना चाहिए और उस में साफ़ किया जाना चाहिए कि जिस से विवाह कर रही है कोई महिला उस को जो है वही रहना और उसी के अनुसार महिला को सभी कुछ उपलब्ध करवाना हमेशा को तय किया गया हो। बहुत धोखे हैं गठबंधन में लड़की सोचती है कारोबारी है रईस है डॉक्टर है आईएएस है उद्योगपति है और सदा को ऐशो आराम का साधन है। मगर बाद में हालात बदल जाते हैं रईसी नहीं रहती धंधा मंदा हो जाता है या किसी कारण आर्थिक परेशानी होती है तो महिला को लगता है ठग लिया गया है। हीरा समझा था जिस पति को पत्थर निकला और कितना नुकसान हुआ कोई हिसाब नहीं जीवन भर का रोना घाटा ही घाटा। मुस्लिम महिलाओं को लिखित मिलता है भरपाई की राशि का भुगतान बाकी को अदालत कचहरी मगर ये भी तलाक के बाद ही। नहीं ये बड़ी नाइंसाफी है गब्बर सिंह मानते हैं तीन आदमी तीन गोलियां हिसाब बराबर।

                 विवाह गठबंधन होता है सात जन्म की नहीं एक जन्म की बात तो हो निभाने की , सुख दुःख की साथी मगर जब पति शासक बन जाता पत्नी जनता बनी रही राजा की रानी नहीं। सब जानते हैं भगवान ने हर पुरुष का नसीब किसी नारी से जोड़ा हुआ है और पति ऊंचाई छूता है पत्नी के भाग्य के कारण ही। हमने पूछा है पंडित जी से उन्होंने बताया है अगर अपनी पत्नी को तलाक दे देते तो नेता जी के भाग्य में नेता बनना ही नहीं मुमकिन था। जिसकी तकदीर ने उनको नाम शोहरत दी उसको क्या मिला , जाने को कितने धर्म स्थानों की सैर पूजा आरती करें मगर व्यर्थ है भगवान राम को भी यज्ञ करने को पत्नी सीता की सोने की मूर्ति बनवानी पड़ी थी। किसी दूसरे दल के नेता की ऊंची मूर्ति बनवाने से पहले पत्नी की बनवाते तो अच्छा था।  चलो जो बीत गई सो बात गई मगर इस बार महिला जगत को उनका शादी का इंश्योरेंस का अधिकार मिलना चाहिए और इस बार अच्छे दिन की तरह से बात से मुकरना नहीं है। इंश्योरेंस का सबूत मिलना ज़रूरी है आपके नेता जी को अपनी पत्नी को साथ लेकर वोट की भीख मांगनी चाहिए। जिसकी पत्नी संग नहीं कोई महिला उसको समर्थन देकर नारी जगत की एकता को ठेस कैसे पहुंचा सकती है। आपका पति से अलग रहना आपकी और आपके पति की मर्ज़ी या सुविधा हो सकता है लेकिन नेता जी की पत्नी की मर्ज़ी कब उनसे जानी गई है। देश की सभी महिलाओं को अपनी बहन की उलझन को सुलझाना चाहिए। आपको घर बनाना नहीं आता किसी का तोड़ कर अपना बनाना जानती हैं हम सभी घर बसाने की बात करती हैं। आपका क्या है आप किसी और की गेंहूं की तैयार फसल काटने को दराती लेकर चली जाती हैं जबकि आपको दराती क्या है ये भी पता शायद ही हो। नकली मज़दूर महिला बनना आसान है वास्तव में कभी नंगे पांव चलना पड़ा तो होश ठिकाने लग जाएंगे। मगर चुनावी खेल में सब मुमकिन है नेता जी पत्नी को मनाने जा भी सकते हैं सत्ता क्या नहीं करवा सकती। क्यंकि महिला जगत को आश्वासन नेता जी से नहीं उनकी धर्मपत्नी की ज़ुबान से चाहिए इंश्योरेंस मिलने को लेकर। बात भरोसे की है।

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