Wednesday, 3 April 2019

कुछ भी नज़र आता नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        कुछ भी नज़र आता नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   आंखें भी हैं , नज़ारे भी हैं। फिर भी दिखाई क्यों नहीं देते। इस देश की हालत कुछ इस तरह की है। ईलाज करवाते रहे सभी लोग डॉक्टर बदल बदलकर। कभी इस कभी उस पर ऐतबार किया कभी एक से बात नहीं बनी तो कुछ डाक्टरों की टीम के गठबंधन को भी आज़माया गया। नतीजा वही ढाक के तीन पात। जब जब जिस के पास गये उसने कहा मेरा चश्मा लगाओ फिर देखो हर तरफ खुशहाली है , बहार है चांदनी है ठंडी ठंडी हवाएं चल रहीं हैं। गरीबी भूख अन्याय अत्याचार जीवन की बुनियादी ज़रूरतों की कमी कहीं नहीं है। जनता का वहम है , जब देश का लाखों करोड़ का बजट है राजधानी की चकाचौंध है तो यह सब देखने की ज़रूरत क्या है। आंखों के डॉक्टर जानते हैं किस की दूर की नज़र कमज़ोर है किस की नज़दीक की। किसी को सफेद मोतियाबिंद है किसी को काला मोतियाबिंद की शिकायत है। काला धन की तरह काला मोतिया का ईलाज पहले करना होता है , फिर चाहे कोई अंधा हो जाये पर काला मोतिया नहीं रहने देना है। अब अगर बदकिस्मती से आंखों के किसी डॉक्टर को नज़र की समस्या हो तो उसका क्या कसूर है। फिर उसकी आपकी किस्मत ऊपर वाले के हाथ है। 
             किसी शायर ने कहा है , खुदा ऐसे एहसास का नाम है , रहे सामने और दिखाई न दे। और दुष्यंत कुमार कहते हैं , खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही , कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए। परेशानी यह है कि सबको सपनों में जीना नहीं आता अन्यथा धर्म वाले कब से स्वर्ग का जन्नत का सपना बेच रहे हैं। 

     तकनीक बदल गई है। अब आपको चश्मा लगाना नहीं पड़ता। आपकी आंख में मंहगा सस्ता हर दाम का देसी विलायती लैंस डाल देते हैं और आपको सब दिखाई देता है। अपने किस डॉक्टर से आंख बनवाई है इस पर निर्भर करता है। पिछली बार डॉक्टर ने कहा था मुझे आता है अच्छे दिन दिखाना। इस के बावजूद लोगों को कुछ भी फर्क नहीं दिखाई तो कमी ईलाज की नहीं है। आप खुद देखना नहीं चाहते खुशहाली , विकास के सपने।  आप आंख बंद कर ध्यान लगाएं और अच्छे अच्छे ख़्वाब बुनकर मस्त हो जाएं। आंख खोलते सामने कुछ भी नज़र नहीं आए तब भी खुद पर नहीं डॉक्टर पर भरोसा रखें , कहें जी हां वही नज़र आ रहा है जो अपने दिखाने को वादा किया था। हम भगवान के होने का विश्वास करते हैं , वो सामने नज़र आए इस बात की ज़िद नहीं करते हैं। भगवान और सरकार है , इसका भरोसा करना ज़रूरी है। लोग जब कहते हैं भगवान कहां है या सवाल उठाते हैं सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है यहां तो लूट भ्र्ष्टाचार और कुशासन दिखाई देता है तो समस्या खड़ी हो जाती है।

      ईलाज दोनों तरह से होते हैं। सर्जीकल का ज़माना है। ईलाज वादों की दवाओं से भी किया जाता है , लातों की ज़रूरत भी हो सकती है। स्कूल मास्टर और पुलिस का थानेदार तब तक पिटाई करता है जब तक छात्र और गुनाहगार तौबा नहीं कर लेते। आप भी तौबा कर लो उस आशिक़ की तरह , जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। जिस लोकतंत्र में बहुमत के वोट पाने वाले विपक्ष में बैठते हैं तौबा उस से। तौबा से याद आया हर सुबह तौबा करते हैं हर शाम जाम छलकाते हैं , नशा कोई भी हो छूटता नहीं है। सत्ता का नशा और बेईमानी का सुरूर सर पर चढ़ा रहता है। लाख कसमें खाते हैं नेता और अधिकारी छूटता नहीं है नशा। होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है। राजनेताओं पर सत्ता का खुमार चढ़ा रहता है सत्ता जाने तक। हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये। सागर में ज़िंदगी को उतारे चले गये। फिर चुनाव आये हैं मुद्दों की बात कहीं नहीं है , नाचने गाने झूमने ठुमके लगाने वाले बुलाए जा रहे हैं। देश की समस्याओं का यही समाधान हमारे सभी दल वालों को नज़र आता है। झूठ के ऐसे आइनों को तोड़ दो , इन में अब कुछ भी नज़र आता नहीं। जब सभी अंधे हों तब जो काना होता है उसी को राजा बना देते हैं। आंखे हैं मगर अंधे हैं और अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी है।
 

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