Friday, 8 March 2019

हम पुरुष नहीं महिला होते ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया - महिला दिवस पर विशेष चर्चा

  हम पुरुष नहीं महिला होते ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

                                  महिला दिवस पर विशेष चर्चा

       आज का विषय गंभीर है फिर भी इसकी बात हल्के फुल्के ढंग से ही करनी होगी। जैसे कोई अधिकारी तबादला होने पर विचार करता है अब तो मुझे शहर की तस्वीर बदलनी थी। अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत जैसी बात होती है। सरकार की हालत भी यही होती है तभी हाथ जोड़ती है पांव पकड़ने से धोने तक सब करती है ताकि जो करना था अभी तो करने को तैयारी की थी पांच साल और चाहिएं सत्ता के नशे में वक़्त बीत जाता है पता ही नहीं चलता । बस पांच साल का सवाल है बाबा झोली खाली होने को है। दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया। जीवन का चौथा पहर ढलती काया बुलावे की बेला वापस जाने की घड़ी कभी भी आने को है तब आज ये ख्याल आया कि सोच विचार किया जाये हम पुरुष बनकर नहीं नारी बनकर दुनिया में आये होते तो क्या क्या मिलता जो खोया है और क्या है जो पुरुष बनकर पाया और नहीं मिलता महिला होने पर। आपने ठीक समझा अपनी मर्ज़ी से कहां पुरुष बने या नारी रूप पा सकते थे। पागलपन है उल्टी-सीधी बात करना मगर पागलपन का अपना ही लुत्फ़ होता है। पागल खुद को जो मर्ज़ी समझ सकता है और पागलपन का ईलाज करने वाला डॉक्टर उसकी हां में हां मिलाकर ही उसको ठीक करता है। आप भी थोड़ी देर को मेरी चर्चा में उसी तरह शामिल हो जाओ और सोचो आप अगर पुरुष हो तो नारी और अगर महिला हैं तो पुरुष होकर क्या होता। कभी रामलीला में पुरुष ही नारी बनकर अभिनय किया करते थे और फिल्मों में भी शुरआत इसी तरह हुई थी। कॉमेडी शो में कितने ही पुरुष महिला बनकर मनोरंजन के नाम पर अश्लील हरकतें करते हैं कमाई करने को। कुछ अभिनय करने वाले महिला बनकर कमाल का अभिनय करते हैं महिला देख कर दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो सकती हैं।

 आजकल बड़े नेता लोग भाषण देते हैं तो इक जादू सा छाने लगता है और भाषण सुनने वालों को दुनिया सपनों सी सुंदर लगने लगती है। जो हुआ नहीं दिखाई देता है जो किया नहीं सब भूल जाते हैं। जादूगर का खेल घंटे दो घंटे तक असर रखता है भाषण का असर सोच समझ को सालों तक भटकाये रहता है। आप पर मेरे जादू का असर छाने लगा है और आपकी कल्पना वही करने लगी है। महिला होता तो बन संवर कर घर से निकलता और इठलाता कि हर नज़र मुझी को देखने को बेताब है। सूरत जैसी भी हो हर लड़की किसी न किसी को बेहद सुंदर लगती है अपनी जवानी में। नखरे उठाने को लोग तैयार मिलते और चाल बाल चुनरी और आंखों से लेकर अंग अंग तक बिजली गिराते लगते। पढ़ने लिखने में अध्यापक से लेकर सहपाठी तक खुद सहायक बनने की बात करते। मन ही मन हंसती उनकी नीयत को डगमगाते देखती बचती चलती अपनी डगर पर। समझदार चालाक समझने वाले पुरुष बुद्धू ही नहीं काठ के उल्लू होते हैं। महिला होने पर इक डर को छोड़कर बाकी सब बढ़िया है। अपनी सुरक्षा कोई मुश्किल भी नहीं अगर संभल कर चलना आता हो तो और खतरे महिला को ही नहीं पुरुष को भी होते हैं पग पग पर। मगर महिला होने पर आपको नौकरी मिलने और तरक्की मिलने से लेकर ईनाम पुरूस्कार शोहरत सब आसानी से हासिल होते हैं। इक नज़र इक मीठी मुस्कान से लोग आपको आसमान पर पहुंचा सकते हैं। तीर तलवार की चाक़ू छुरी की ज़रूरत ही नहीं लोग इशारे पर ज़ख़्मी घायल मरने को उतावले हैं। महिला को पहनने को क्या क्या नहीं है पुरुष को धोती कुर्ता और पैंट कमीज़ को छोड़ बाकी सब उसकी नकल ही है। बिंदी चूड़ी हज़ार शृंगार के आभूषण महिला की सुंदरता को चार चांद लगाने को हैं। महिला को लाख बुरा और बेवफ़ा कहने के बाद भी हर कोई उसी की मुहब्बत के गीत गाता है या फिर विरह के दर्द भरे नग्में। नारी की अपनी कथा मिल सकती है इतिहास में धार्मिक किताबों में मगर बगैर महिला इंसान तो इंसान भगवान देवता तक की कोई कहानी नहीं मिलती। न जाने क्यों महिलाओं ने खुद को पुरुष से बराबरी की बात करनी शुरू की है जबकि वास्तव में नारी हर बात में नर से बढ़कर है। कोई है जिसको नारी ने जन्म नहीं दिया हो वो चाहे राजा हो या रंक हो जन्मदाती महिला ही है। सच कहा जाये तो इसका विवरण करना अपने बस की बात नहीं है। सरकार और समाज महिलाओं के लिए तमाम तरह से आरक्षण आदि की व्यवस्था करते हैं। महिला होना सहानुपति पाने का बिना मांगे हक देता है। शर्म नहीं आती बेचारी अबला नारी को परेशान करते , कैसे पुरुष हैं आप। आगे इस बात की चर्चा होगी कि अगर मैं सच महिला पैदा होता तो क्या जो मिला खो सकता था। 
    लड़की होने पर मुमकिन है पढ़ाई भी स्कूल तक होती और कुछ बनने का सपना तोड़ दिया जाता। समाज कमज़ोर समझ अपने बिना तर्क के नियम मनवाता और किसी घर में पिंजरे के पंछी की तरह कैद होना किस्मत होता। काबिल होने के बावजूद नासमझ पुरुषों की हर बात को स्वीकार कर पल पल खुद को मरते देखती रहती फिर भी अश्क़ बहाना भी गुनाह समझा जाता और जीवन भर खुद अपने अस्तित्व को मिटाकर अपनी महिला जगत की गलत छवि और परंपरा का बोझ ढोती रहती। ज़िंदगी भर प्यासी रहती खाली जाम की तरह बाकी सभी की प्यास बुझाती और साबित करती कि नारी होना त्याग करने का अनिवार्य अंग है। साल भर अपने स्वाभिमान की बली देने के बाद एक दिन 8 मार्च को महिला दिवस मनाती नाचती झूमती गुनगुनाती और कुछ फूल कुछ शुभकामना संदेश के कार्ड लेकर गर्व अनुभव करती। सिरहन सी होती है सोचकर कि हमारे समाज में आज भी नारी होना इक वरदान समझा जाना चाहिए मगर समझा जाता है जैसे अभिशाप है। महिला होना संभव नहीं है किसी पुरष के लिए मगर फिर भी इस महिला दिवस पर इसकी कल्पना करनी चाहिए हम सभी पुरुष वर्ग को , तब समझ आएगा शायद नारी को कमतर समझना कितना बड़ा अपराध है। मैंने देखा सोशल मीडिया फेसबुक पर महिला लेखिकाओं की रचनाएं उनकी सुंदर फोटो के साथ सैंकड़ों लाईक्स और तारीफ करते कमैंट्स दिन भर मिलते हैं जबकि अधिकतर पुरुष लेखक की फोटो देख कर ही लगता है खूसट जैसा कोई आदमी होगा। महिला की अधिकतर समस्याओं का कारण कोई महिला अधिक और पुरुष कम होते हैं। उसकी साड़ी उसकी सज धज गहने मुझसे अच्छे क्यों ये सबसे कठिन समस्या है। महिला बनकर जीना कठिन होता मगर फिर भी जीने का कुछ अर्थ अवश्य होता है जबकि हम पुरुष कभी समझते ही नहीं हमारा होना नहीं होना क्या अंतर रखता है।

बात को इक मंज़िल तक लाने को आखिर में निष्कर्ष निकलना ज़रूरी है। इस चिंतन के बाद सोचना होगा पुरष को भी और महिला को भी इस भेदभाव को छोड़ इंसान होना चाहिए। अगर हम पुरुष हैं तो बेशक जैसे भी अधिकार हमारे पास विरासत में मिले हों हमें महिला को बराबरी का आदर और अधिकार पाने की हकदार हैं ऐसी सोच बनानी चाहिए। ठीक इसी तरह महिलाओं को अपनी महनत काबलियत को पहचानना चाहिए और केवल औरत होने के कारण पुरुष पर निर्भर नहीं होना चाहिए। ये खेद और चिंता की बात है कि जितने भी आधुनिक समाज की बात करते हैं , पढ़ लिख शिक्षित होकर बड़े बड़े घर सुख सुविधा के मालिक बन जाते हैं अपनी सोच को नहीं बदलते या बदलना चाहते। आज भी अगर महिला सुरक्षा और शिक्षा अगर समस्या है तो इस जुर्म का अपराधी पुरुष वर्ग ही है। वास्तविक समानता उस दिन समझी जानी चाहिए जिस दिन महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। महिलाओं पुरुषों को मिलकर इस पर कार्य करना होगा।

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