Sunday, 23 December 2018

इतिहास पढ़ते इतिहास बनते लोग ( निठल्ला चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

इतिहास पढ़ते इतिहास बनते लोग ( निठल्ला चिंतन) डॉ लोक सेतिया 

      गर्व करना काफी नहीं है गर्व करने के काबिल बनना चाहिए। हम अक्सर पुराने इतिहास की बातें शान से बताया करते हैं मगर ये शायद सोचना भूल जाते हैं कि जिस पर गर्व की बात करते हैं उसका अनुसरण भी करते हैं या वास्तव में उसके खिलाफ आचरण किया करते हैं। सत्यवादी हरीशचंद्र की कहानी से सच बोलना सीखा है या ऐसा सबक लिया है कि उन जैसा बनना नहीं है। हमारा इतिहास बहुत सबक सिखलाता है और कई गलतियां भी हुई हैं जिनको दोहराना नहीं चाहिए याद रखना चाहिए। सब से महत्वपूर्ण बात ये है कि आज जो भी हम करते हैं क्या कल हमारे बाद आने वाले लोग उस पर गर्व किया करेंगे या फिर ऐसा करते हैं जिसे जानकर आने वाली पीढ़ियां शर्मसार हुआ करेंगी कि हम ऐसे लोग थे। इतिहास उन पर गर्व करता है जो ज़ालिम से टकराते रहे और कट मरे सूली चढ़ गये ज़हर पी लिया मगर झुके नहीं अपनी डगर से भटके नहीं। इतिहास उनको माफ़ नहीं करता तो कायर बनकर तानाशाही को स्वीकार करते रहे और देश को रसातल की तरफ धकेलते रहे। समाज के कल्याण को अपना घरबार त्याग जीवन भर औरों की भलाई या किसी उद्देश्य को लेकर जीवन बिताने वाले लोग इतिहास को दिशा देते हैं देश को आज़ाद करवाते हैं बंधन से मुक्ति पाते हैं समाज की बुराइयों को खत्म करते हैं सद्भावना का भाईचारे का माहौल बनाते हैं। मगर जो वास्तविक जीवन में करते कुछ  नहीं हैं और केवल बातें महानता की किया करते हैं उनको इतिहास दर्ज करता है तो काला अध्याय मानकर। शायद इधर हम स्वर्णिम इतिहास की रट लगाते हुए इतिहास में काला अध्याय बनने का कार्य करते लगते हैं। झूठ स्वार्थ नफरत क्या इन पर कोई गर्व किया करेगा और हम उजाला करने का नहीं अंधेरों को बढ़ाने का काम करने लगे हैं। जिधर देखते हैं अंधकार का कारोबार फल फूल रहा है। घर पर महमान भगवान बनकर नहीं आते लगता है हमने अपने पूर्वजों की सीख को त्याग दिया है। हम सब एक हैं की जगह हम कहने लगे हैं उस राज्य के लोग इधर क्यों आते हैं कितने छोटे दरवाज़े हैं और दिल में किसी के लिए जगह ही नहीं है क्या वासुदेव कुटुंभ इसी को कहते हैं। लोग आपसी मेल जोल के लिए पुल बनाते थे और हम खाई खोदने का कार्य करते हैं खाई पाटने की कला जानते तक नहीं। कलाकार कहानीकार नाटककार गीतकार फ़िल्मकार क्या क्या बदलाव लाने का कार्य किया करते थे। इक जोश भर जाता था और कुछ अच्छा नया करने की चाह जगती थी , मगर आजकल जो परोसा जा रहा है भटकाने का काम करता है। केवल करोड़ों की कमाई को सफलता समझना क्या महान कार्य होना चाहिए। धन को अपना उद्देश्य समझने वाले लोग समाज का आदर्श नहीं कहला सकते और खुद अपने आप पर आसक्त होना तो सबसे बड़ा रोग है। मुझे ही सब चाहिए की भावना खतरनाक है औरों को सब देना मिल बांट कर खाना मानवता का कल्याण हो ऐसा करना समाज को सही राह दिखाना है। मनोरंजन अगर आपको अज्ञानता की तरफ ले जाता है तो उसे दिल बहलाना नहीं इक ऐसा नशा कहना चाहिए जिस में आपका विवेक काम नहीं करता है। क्या आज का वर्तमान इतिहास कुछ इसी तरह का नहीं है , हम क्या सार्थक कर रहे हैं। अपने आप में सिमित होना और खुद को छोड़ किसी की चिंता नहीं करना मतलबी होना क्या इसे आधुनिक होना कहोगे। ये तो सदियों पीछे जाना है जब समाज का निर्माण नहीं हुआ था और हर कोई एक समान था , पशु और इंसान दोनों इक जैसे हुआ करते थे। ये कब कैसे हुआ कि हम वापस वहीं पहुंच गये हैं। विकास के नाम पर भौतिकता के पीछे भागते हम इतना भटक गए हैं कि जिस पेड़ पर बैठे हैं उसी को काटने का कार्य कर रहे हैं। क्या हम जाग रहे हैं या कोई गहरी नींद है जिस की आगोश में हैं। इतिहास की रट लगाना किस काम का जब खुद जो करते हैं कल उसको गर्व करने नहीं खेद जताने के लिए कोई याद करेगा। आंखे खोलकर आज की बात अपने वर्तमान को समझना देखना होगा अन्यथा बाद में पछतावा भी किसी काम नहीं आएगा। 

 


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