Tuesday, 25 December 2018

पवनसुत अंजनी पुत्र का हल्फनामा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   पवनसुत अंजनी पुत्र का हल्फनामा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   मैं बजरंगबली उर्फ़ हनुमान शपथ राम की लेकर ब्यान दर्ज करवाता हूं कि ये जितने भी लोग मुझे अपने साथ जोड़ने का कार्य अपने उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं उन सभी से मेरा कोई नाता नहीं है। मैं उनको अपना वंशज मानने से इनकार करता हूं और कोई भी उनके साथ मेरे नाम के कारण किसी भी तरह का संबंध रखते हैं तो मेरा इस से कोई लेना देना नहीं है और अपने नुकसान लाभ के वो खुद उत्तरदायी होंगे। पवन अर्थात वायु मेरे पिता का नाम है और पवन को कोई बांध नहीं सकता है देश की सीमा या किसी सरहद की रेखा से या किसी भी ढंग से। हवा पानी धरती आकाश अग्नि पांच तत्व से सृष्टि बनाई गई है जिनको कोई स्वार्थ सिद्ध करने को बदल नहीं सकता है। राम जी से मेरा संबंध उनको समझाना संभव नहीं है जो राम नाम भी मतलब को रटते हैं। राम मेरे दिल में बसते हैं और जहां कहीं भी रामकथा होती है मैं उस जगह उपस्थित रहता हूं। विश्व में केवल मेरा चालीसा ही ऐसा है जिसे कोई भी किसी भी जगह कहीं भी पढ़ सकता है चलते फिरते किसी भी वाहन से कहीं आते जाते और सुबह शाम रात कभी भी। मुझे जब भी कोई संकट में होता है याद करता है और राम भगवान के काज भी संवारने को मैं तत्पर रहता हूं। मगर मतलबी लोगों के कार्य करने में मेरा योगदान संभव नहीं है। मेरा सवभाव सब जानते हैं मैं सबको सम्मति देना चाहता हूं और जो मेरी बात समझ सही मार्ग पर चलता है उसको हमेशा सफलता हासिल होती है। मगर अनुचित कार्य करने वाले लोगों का साथ मुझे कदापि पसंद नहीं है। 
                 वायुदेव मेरे पिता हैं और हर संतान पिता की वंशज कहलाती है , मुझे पर्वत समुंदर कोई रोक नहीं सकता है। जैसा सब जानते हैं मेरी शक्तियों का खुद मुझे ज्ञान नहीं रहता है मगर मुझे अहंकार करना नहीं पसंद न ही अहंकारी लोग भाते हैं। अहंकारी रावण की लंका को पल भर में उसी से कपड़ा घी तेल आग पाकर जलाया था अन्यथा मेरे पास कुछ भी नहीं था। सोने की लंका जल जाती है केवल कड़वे बोल बोलने और मति भ्र्ष्ट होने से इस से सबको सबक लेना चाहिए। जिनको मालूम नहीं उनको बताना ज़रूरी है कि राम जी को राजतिलक होने के बाद मैं उनकी सभा में नहीं रहा था और हरि भजन को वापस वन को चला गया था। रामदरबार में तस्वीरों में मुझे बैठा दिखाया जाता है मगर उसका अर्थ भौतिक रूप से मेरा विराजमान होना नहीं है। अपने कभी देखा जिस सभा में माता सीता जी राम जी के साथ नहीं हों उस में मेरी कोई तस्वीर हो। जब सीता माता ही राजसभा में सिंघासन पर नहीं रही तो उनका सुपुत्र कैसे रहता उस जगह पर। सत्ता शासन से मैं दूर रहता हूं क्योंकि मुझे राजा से पहले जनता का साथ भाता है। अधिक कहने की ज़रूरत नहीं है थोड़े में समझ जाओ जो भी मुझे अपनी निम्न स्तर की राजनीति में घसीटना चाहते हैं। मुझे जब लगता है तो सूरज देवता को निगल सकता हूं मगर मुझे विनती करते हैं सभी देवता तो दया कर छोड़ देता हूं। मेरे साथ कोई छेड़खानी मत करना वर्ना बाद में मत कहना चेतावनी नहीं दी थी। जय राम जी की।  पवनसुत हनुमान।

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