Thursday, 13 December 2018

संविधान को फुटबॉल समझने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    संविधान को फुटबॉल समझने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   लोग सरकार बदलते हैं मगर वास्तव में चेहरे बदल जाते हैं आचरण नहीं बदलता है। जो दल दावा करता था सबसे अलग है सत्ता मिली तो सभी जैसा ही नहीं बन गया बल्कि पहले जो थे उनसे चार कदम आगे बढ़कर मनमानी करने लगा। इस देश में संविधान राजनेताओं के लिए भरोसे या आदर करने को नहीं केवल शासन पाने को उपयोगी  होने तक ज़रूरत को ही है। जब खुद किसी दल में लोकतंत्र नहीं है तो उनसे उम्मीद भी कोई क्या कर सकता है। विडंबना की बात ये है कि हमारे सामने ये सब गंदा खेल चलता रहता है और हम चुप चाप देखते रहते हैं। मोदी जी मनमोहन सिंह को कठपुतली बताते थे और परिवारवाद पर तलवार भांजते थे मगर जब खुद सत्ता मिली तो हर राज्य में अपनी पसंद के आरएसएस से जुड़े लोगों को सत्ता पर बिठाते रहे और अदालत सीबीआई आरबीआई सब जगह अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त किया जो अभी भी जारी है। आरबीआई के नया गवर्नर अर्थशास्त्री नहीं आईएएस अधिकारी है जो नोटबंदी के समय रोज़ आकर नया नियम घोषित किया करता था सरकार की बात करता था। कांग्रेस पर आरोप लगाते थे दिल्ली से राज्य की सरकार चलाते हैं खुद आकर दल की भी नहीं दो लोग देश भर की सरकार चलाने लगे और संवैधानिक संस्थाओं को ही पंगु बना दिया। अब चुनावी नतीजे में सरकार बदली तो भी बदला नहीं तौर तरीका और राज्यों का सीएम कौन हो इसका फैसला आलाकमान पर छोड़ दिया गया है। संविधान में आलाकमान शब्द है भी या नहीं कोई नहीं सोचता है। उधर अपने अपने राज्य में अपने दल के अपनी पसंद के नेता के पक्ष में नारे पोस्टर लहरा रहे हैं ताकि जो दिल्ली से आये उसे बता सकें बहुमत किस को चाहता है। क्या इनको पता नहीं है कि संविधान क्या चाहता है क्यों विधायकों को अपनी सभा में खुद तय नहीं करने दिया जाता कि उनकी राय क्या है। मगर बात तो उससे पहले की ही है जब हर दल टिकट बांटता है तो संसदीय क्षेत्र या विधानसभा क्षेत्र के कर्यकर्ताओं या दल को नहीं दिल्ली या राज्य की राजधानी में बैठे पदाधिकारी बंदरबांट करते हैं और मापदंड होते हैं जाति धर्म पैसा बाहुबल और किसी बड़े नेता की नज़दीकी। इतना ही नहीं जब कोई विधायक या सांसद मर जाता है तो उसके परिवार को उपचुनाव में टिकट देना सहानुभूति की बात नहीं बल्कि ऐसा लगता है जैसे कारोबार की दुकान पर बाप की गद्दी बेटे को मिलती है। जो दल अपने विधायकों को सांसदों को अपना नेता नहीं चुनने देते उनसे आम जनता को संविधान द्वारा मिले अधिकारों का सम्मान करने की अपेक्षा करना मृगतृष्णा के समान है। 
                                  जब तक हम इतनी भी बात नहीं समझते कि संविधान किसी को पीएम या सीएम घोषित करने को नहीं मानता है संविधान का नियम है कि चुने हुए विधायक संसद अपना नेता सदन का चुने। ऐसा कब हुआ था शायद लालबाहुदर शास्त्री जी के समय देश में हुआ था कि कोई नहीं जनता था जिस सभा में नेहरू जी के बाद कौन नेता हो खुली बहस में नाम तय हुआ तो जिसका नाम सामने आया वो छोटे कद का महान नेता हाल के आखिर में नीचे सीढ़ी पर बैठा हुआ था जब कोई कुर्सी खाली नहीं दिखाई दी और नाम सामने आने पर पता चला और उनको मंच पर बुलाया गया। उसके बाद से दल पर अधिपत्य जमाये लोग देश के और अपने दल के संविधान को तोड़ते मरोड़रते रहे और ये हर दल में हुआ वामपंथी से दक्षिणपंथी कोई भी हो , जो दल बने ही किसी एक नेता के नाम पर उनका कोई संविधान रहा ही नहीं और बाप दादा ससुर या अन्य संबंध ही दावेदार बनाते रहे हैं। अपने हर दल में अनुशासन कायम रखने की बात सुनी होगी जो वास्तव में अनुचित बात को रोकने की बात नहीं है बल्कि बड़े नेता की गलत बात को गलत नहीं कहने को बनाया इक तानाशाही नियम है। अगर आपको पगता है कि चुनाव के बाद दल अपने विधायक संसद के साथ क्या सलूक करते है उनकी समस्या है तो आप गलत हैं जो विधायक अपने अधिकार पर खामोश रहते हैं अनुशासन के नाम पर उनसे जनता की समस्याओं की बात पर आवाज़ उठाने की आशा ही नहीं की जा सकती है। जिस दिन वास्तव में नियम उसूल और संविधान की सही मायने में पालना की जाने लगेगी हर नागरिक को समानता का अधिकार खुद ब खुद हासिल हो जाएगा। अफ़सोस की बात ये है कि भाजपा कांग्रेस या वामपंथी समाजवादी या अन्य राज्यों के दल कोई भी देश के संविधान की भावना का आदर नहीं करता है और जो भी सत्ता पर आसीन होता है संविधान की न्याय की शपथ उठाकर उसे भूल जाता है। क्योंकि हम संविधान की शपथ को देशभक्ति की भावना की बात नहीं मानते और केवल औपचारिकता निभाते हैं। देश का संविधान जिसकी बात कही जाती है दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है उसकी अहमियत राजनीति में फुटबॉल की जैसी है और हर राजनेता और दल उसके साथ खिलवाड़ करता है। मगर इसके बावजूद मेरा भारत महान है।

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