Thursday, 29 November 2018

सेल लगी सस्ते दाम बिकता सब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सेल लगी सस्ते दाम बिकता सब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    कभी मेला लगता था त्यौहार पर छूट की लूट होती थी। इक ज़माना था लोग बस में जल्दी आ जाते थे बस से आते जाते बस अड्डे पर बारी बारी सामान बेचने वाले आते और रस्ते का माल सस्ते में बेच कर भी कमाई कर जाते थे। बेचने बिकने का धंधा इतना बढ़ा कि लोग ईमान धर्म इंसानियत तक बेचने लगे और ऐसा कर करोड़ों अरबों की कमाई करने लगे। राजनीति का धंधा चौखा है जिस में जीत हार जो भी हो तिजौरी कभी खाली नहीं होती और राजनीति के बाज़ार में दुकान खोलना ज़रूरी है उसके बाद आपकी दुकान में क्या सामान है कोई नहीं देखता है। हाथ से कोई सामान देना नहीं है वादा भर करना है जीत जाने दो जो मांगोगे पाओगे। नहीं जितवाया तो पछताओगे हाथ मलते रह जाओगे। बस में खट्टी मीठी गोलियां चूर्ण मंजन सुरमा बेचते थे मेले में खिलौने से लेकर खाने पीने का सामान और नौटंकी से लेकर बंदरिया का नाच और रस्सी पर चलती लड़की और पिंजरे के तोता मैना जो घर लाते ही बोलना भूल जाते थे। ऐसे सभी दुकानदार समय बदलते ही राजनीति के शोरूम्स और मॉल खोल कर नियमित राजनीति का सामान बेचते हैं। देश बेचने से देशभक्ति बेचने तक सब करते हैं जिस से कमाई हो जाये। 
           किसी दल ने गांधी को बेचा और गरीबी हटाओ नारा बेचकर सिंहासन पर बैठे रहे। पिछली बार किसी दूसरे ने अच्छे दिन का वादा बेचा और सत्ता हासिल की मगर बाद में समझाया ऐसा कोई सामान होता ही नहीं है और जिस डिब्बे में अच्छे दिन बंद थे उसको खोला तो नोटबंदी और जाने क्या क्या भयानक अनदेखे अनुपयोगी सामान को ऊंचे दाम खरीदने को विवश किया गया। अपनी तिजौरी भरने को सरकार ने सभी की तलाशी ली और देश की जनता को चोरों की तरह खड़ा कर दिया। चौकीदार बनकर मालिक को हड़काने वाला और खुद शाही अंदाज़ से रहने वाला पहली बार दिखाई दिया जो सबको झूठा बताता और खुद अपने तमाम झूठों को सच समझने को मज़बूर करता। नकली रौशनियों से सबकी आंखों को चुंधिया कर जो नहीं हुआ देखने की बात और जो सामने दिखाई देता उसके अनदेखा करने की बात करने लगा। राजा नंगा है कहानी का नया अध्याय लिखा जाता रहा और दो ठग भरी सभा में जो कपड़ा था ही नहीं उसकी तारीफ करवाते और मुंह मांगी कीमत के साथ ईनाम पुरुस्कार लेकर उल्लू बनाते रहे मगर जब उस कपड़े की पोशाक बनाकर पहनी तो पता चला कि सबको नंगा कर दिया है। सीबीआई सीवीसी पीएमओ कितने लोग नंगे नज़र आने लगे हैं। 
                   मगर उसको अपनी पोल खुलने की चिंता नहीं है उसे मालूम है लोग लुभावने इश्तिहार के झांसे में आकर फिर उसकी दुकान का धंधा बढ़ा देंगे और विज्ञापन की कला का वही उस्ताद है। जो लोग इश्तिहार बांटने छापने और दिखलाने का कारोबार करते हैं सभी उसने खरीद लिए हैं और सब उसी का गुणगान करते हैं। उन लोगों ने किसी का योग बेचने से हर वो सामान जो उसने बनाया तक नहीं मगर इतना अधिक बिकवाया जितना देश भर में है ही नहीं फिर भी असली का लेबल लगाकर। धर्म बेचते हैं अंधविश्वास को बेचते हैं अपने कार्यकर्म में शो में सीरियल में अश्लीलता और अपराध को बढ़ाने का अपराध करते हुए खुद को सबसे महान समाज की बात और सच का झंडाबरदार बताते हैं। झूठ पर सच का लेबल लगाने की ही नहीं झूठ को सच साबित करने में किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। सबको असली चेहरा दिखाने की बात करते हैं मगर खुद अपने चेहरे के दाग़ धब्बे नज़र नहीं आते हैं। वास्तविक समाचार की जगह फेक न्यूज़ चलाते हैं। खुद अपने गुण गाते नहीं शर्माते हैं। वास्तविकता से नज़रें चुराते हैं और बेकार बहस में उलझाते हैं। आगे बढ़ने की चाहत में नीचे गिरते जाते हैं। खुद बिके हुए हैं खरीदार कहलाते हैं।
           अच्छे दिन विकास सबका साथ किसान मज़दूर शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य की बात को छोड़ कर वही दुकानदार अपने नये बनाये आलिशान भवन रुपी मॉल में भगवान बेचने का धंधा करना चाहता है। जनता को बुनियादी सुविधाएं सरकार नहीं भगवान से मांगनी होंगी। भगवान अब एक नहीं है उनकी दुकान पर कई देवी देवता हैं आपको जो पसंद हो उसी को चुन सकते हो। देश पहले भी लोग मानते थे इतना सब गलत है फिर भी कायम है तो ज़रूर भगवान भरोसे चल रहा है। अब उस में भी विकल्प मिलने की बात होने लगी है दलित लोग अपना भगवान कौन है समझ सकते हैं। अदालत को सलाह धमकी की तरह देने लगे हैं कि इंसाफ तथ्य को परख कर नहीं अधिकांश जनता की भावनाओं को देख कर निर्णय करें अन्यथा फैसला लागू नहीं होगा। ये किसी संविधान को नहीं जानते हैं जो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है। इनका न्याय भीड़ का फैसला है भीड़ बनकर कानून की धज्जियां उड़ा सकते हैं। धर्म की राजनीति की बात कोई नहीं करता है इनकी राजनीति की साहूलियत से अधर्म को धर्म साबित किया जा सकता है। कानून जिसे गुनाह मानता है इनको ऐसे अपराध करना गर्व की बात लगती है मगर जहां सत्ता की बात आती है वहां भगवान को भी दरकिनार कर देते हैं। इन्हें भगवान चुनावी नैया पार लगाने को याद आते हैं अन्यथा जो जो कहते थे सत्ता मिली तो करना है सब छूट गया है। ऊंची दुकान फीके पकवान भी नहीं इनकी दुकान में कोई सामान ही नहीं है सब जादू का खेल है और जादूगर का शो जब तक है बहुत कुछ दिखलाएगा मगर जब लोग हॉल से बाहर निकलेंगे तो कुछ भी नहीं होगा सब गायब हो चुका होगा। आपकी जेब खाली होगी और घर भी आप खाली हाथ जाओगे। क्या अपनी भूल फिर से दोहराओगे , कितनी बार धोखा खाओगे पछताओगे।

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