Thursday, 4 October 2018

इंडिया और भारत अमीर और गरीब ( असमानता दो वर्गों की ) डॉ लोक सेतिया

   इंडिया और भारत अमीर और गरीब ( असमानता दो वर्गों की ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

  देश में अधिकार धन दौलत सत्ता सभी में बंटवारा साफ है। बीस तीस फीसदी के पास सभी कुछ बहुतयात में है और बाकी अधिकांश के पास नाम को ही हासिल है। योग्यता और मेहनत आधार नहीं है चालाक और उचित अनुचित की परवाह नहीं कर मुनाफा कमाने वाले लोग सरकार और संस्थाओं का उपयोग कर तथा सत्ताधारी दलों को चंदा देकर तमाम नियम कानून अपने हक में बनवाने ही से दिन पर दिन और धनवान होते जाते हैं। अर्थशास्त्र का नियम है उनकी अमीरी बाकी लोगों से लेकर ही कायम रहती है। ये बात सभी जानते हैं नेता संस्थाएं सरकारें और अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले विभाग। अभी कुछ लोगों की कंपनियों के क़र्ज़ पर बैंक वालों ने मिल बैठ का आपस में समझौता किया है जिस में एक एक कंपनी का हज़ारों करोड़ के क़र्ज़ का 75 फीसदी से लेकर 94 फीसदी तक माफ़ कर दिया गया है। हैरानी की बात ये है कि  भारतीय रिज़र्व बैंक के बैंकों से बाकी कंपनियों को भी इसी तरह मामला रफा दफा करने की सलाह दी है। ठीक उसी तरह जैसे सड़क किनारे पुलिस वाले को सौ पचास देकर हज़ार रूपये भरने से बचते हैं लोग। मगर रिज़र्व बैंक को इतना प्यार निजि कंपनियों पर ही क्यों आता है। आपका काम है बैंक कोई धांधली नहीं कर सकें लेकिन आप पहले की हुई धांधली पर खुद ही ऐसे निर्देश देते हैं। आम जनता को ही अपराधी मानते हैं जो जब जैसे चाहे उसे परेशान करते हैं। आपको क्यों लगता है अगर इन कंपनियों को नहीं बचाया गया तो कोई अनहोनी घट जाएगी। जो ये बनाते हैं क्या कोई और नहीं बनाता जो अकाल की नौबत आ जाएगी। किसान को लेकर नहीं लगता आपको कि अगर किसान नहीं रहेगा तो अनाज दाल सब्ज़ी फल पहनने को कपड़े अर्थात कुछ भी नहीं मिलेगा किसी को। अगर किसी रिज़र्व बैंक अधिकारी ने किसानी को देखा होता तो समझते ये क्या है। अन्नदाता भूखा है और आप पेट भर खाते हैं किसी दिन थाली में रोटी की जगह सोना चांदी और तमाम सामान रखा हो आपके सामने तब समझोगे। किसान को कुछ लाख का क़र्ज़ भी मकान ज़मीन गिरवी रखकर देने वाले बैंक इन बड़ी बड़ी कंपनियों को हज़ारों करोड़ कैसे बिना किसी ज़मानत और उनकी जायदाद गिरवी रखे दे देते हैं। उद्योगपतियों और कारोबारियों को करोड़ों अरबों रूपये मुहैया करवाते हैं केवल भाईचारा निभाने को , भाईचारा समझते हैं न , रिश्वत लेन देन का ही नाम है। किसी अधिकारी का कुछ नहीं जाता बैंक घाटे में जाते हैं तो उनको क्या , जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। हर बैंक वाला अपना अलग धंधा चलाये हुए है , आप जाते हैं बैंक तो सुनिए आप कतार में खड़े हैं मगर उनकी आपसी बातचीत किस विषय पर है। वेतन के साथ काम पर बैठे बैठे कमाई करना जानते हैं , कभी किसी बैंक वाले को आर्थिक तंगी में देखा है। जो लोग इनको फायदा पहुंचाते हैं ये उनकी खातिर नियम कायदा सब भूल जाते हैं। इधर सरकार आंकड़े देती है कि चार साल पहले जो एनपीए दो लाख छबीस हज़ार करोड़ था अब आठ लाख छयानवे हज़ार करोड़ हो गया है या घोषित कर दिया गया है कि ये वापस नहीं आ सकता और बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। 
            अपने बहुत चर्चा सुना होगा सरकार ने दवाओं के दाम स्टंट के दाम कम करवा दिए हैं। मगर ये केवल धोखा है आज भी दर्द का एक इंजेक्शन जो 12 रूपये का था 25 रूपये का हो गया है जो रोज़ उपयोग किया जाता है मगर वही इंजेक्शन 5 रूपये का भी और कंपनी का है। अभी इक निर्देश सर्वोच्च न्यायालय का मिला डॉक्टर्स की एसोसिएशन का भेजा हुआ जिस में आपको दवा लिखने से पहले इक साइट पर दाम चेक करने की सुविधा है। क्या ये उपहास नहीं है सरकारी विभाग क्या करते हैं क्यों किसी दवा बनाने वाली कंपनी को मनमर्ज़ी की कीमत रखने की अनुमति दी जाती है। अब ये लगभग असंभव है कि हर डॉक्टर अपने हर रोगी को हर दवा लिखने से पहले इस काम पर समय लगा सके। वास्तविकता ये भी है कि जिन डॉक्टर्स के अपने अस्पताल में खुद अपनी दुकान खुलवाई हुई है या जिन बड़े बड़े हॉस्पिटल्स में केमिस्ट शॉप लाखों रूपये किराये पर चढ़ाई हुई है उन सभी जगहों पर केवल कई गुणा कीमत की घटिया दवाएं बिकती हैं। हर सरकारी अस्पताल के पास ये खुली लूट सरकार की मर्ज़ी से होती है। जब सरकार खुद किसी कानून को लागू करने की बात करती है मगर बाद में बदल कर उसे पचास बिस्तर से बड़े अस्पतालों पर ही लागू करने का धोखा करती है क्योंकि नेताओं को अरबों रूपये मिल गये हैं। जब किसान की फसल की लागत की बात करते हैं तो बाकी लोग चाहे जो भी बनाते हों बेचते हों उनकी भी कोई सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती है। एक के साथ एक मुफ्त , इसके साथ ये मुफ्त आदि सब लूटने के ढंग ही हैं। उचित कीमत हो तो ये सब संभव ही नहीं है। सरकार किसी शायर की बात के अनुसार समंदरों की तलाशी नहीं लेती और गरीब लहरों पर पहरे बिठाये जाते हैं जैसे मार्ग पर चल रही है। आह भरने वाले बदनाम कत्ल करने वालों का चर्चा नहीं। किसानों को बता दिया गया है दिल्ली दूर से ही अच्छी है करीब आओगे तो ज़ालिम हो जाती है। उनकी नींद में खलल पड़ना सहन नहीं किया जा सकता। सत्ता की रैली में लाखों जमा हो सकते हैं अधिकार मांगने को आओगे तो धारा 144 है। जो पंचकूला में लगी थी मगर दिखाई नहीं दी थी सत्ता की मनमर्ज़ी है। शिक्षा स्वास्थ्य सेवा को मनमानी छूट देने का मतलब ही है उनका केवल अमीरों के लिए सुरक्षित अथवा आरक्षित कर देना। बराबरी कैसे हो सकती है। मगर जब नेताओं को केवल सत्ता की अधिकारीयों को अपने ऐशो आराम की उद्योगपतियों और कारोबारियों को अपने मुनाफे की चिंता हो और देश समाज की कोई सोचता ही नहीं हो तब विकल्प क्या है। इंडिया वालों को जितना भी मिल जाये उनकी हवस मिटती नहीं है और भारत जो वास्तव में गांव में बसता है और जिसका कोई संगठन है ही नहीं बंटा हुआ है उसकी सुध कौन लेगा। आखिर में इक ग़ज़ल दुष्यंत कुमार की शायद जो नहीं लिखा जा सका उसे बयां कर दे। कहने को बहुत बचा हुआ है। 

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा , मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा। 

यहां तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां , मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। 

कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में , वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा। 

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं , खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। 

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते , वो सब के सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा। 

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है , कि इन्सानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। 

चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें , कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।


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