Saturday, 29 September 2018

जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये ( कड़वी गोली ) डॉ लोक सेतिया

    जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये ( कड़वी गोली )

                                        डॉ लोक सेतिया 

आज शायद पहली बार कड़वी गोली को मीठी चासनी चढ़ा का अपनी बात कहने की कोशिश करने जा रहा हूं। नया कुछ शायद लिखना ही नहीं अपनी पहले की रचनाओं से ही ग़ज़ल कविता नज़्म से शेर छंद बंद दोहा लेकर बात कहने करनी है। शीर्षक जाँनिसार अख्तर जी की ग़ज़ल के मतला को थोड़ा बदल कर लिखा है। दुआ दी जाये को सदा दी जाये कर लिखा है क्षमा याचना करते हुए। 

जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। 

शायद यही भूल करते हैं हम आये दिन , जिसके इशारे पर कत्ल हुआ उसी से फरियाद करते हैं इंसाफ की। जब तक सरकार खुद नहीं आते हम शव को जलाएंगे नहीं। आएंगे आते हैं झूठे आंसू बहाने मगर इंसाफ की उम्मीद मत रखना। 
                                 ( आब :पानी। )

किसी ने घर जलाया था उसी से जा के ये पूछा , 

जला के घर हमारा आब क्यों नहीं देते। 

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे , 

कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे। 

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ,

 तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं। 

अब सभी को खबर हो गई है ,

 बेहयाई हुनर हो गई है। 

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे , 

अश्क पीते गये आह भरते रहे। 

इन बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो , 

बेदर्द शासकों को अवतार मत लिखो। 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ , 

न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही , 

कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें , 

खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां , 

सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी , 

नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो , 

हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली , 

नहीं वो "तनहा" है बागबां।

बड़े लोग ( नज़्म )

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,
कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं।

ग़ज़ल 

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है। 

ऊपर मेरी रचनाएं शायद काफी नहीं हैं।  दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों से बात पूरी करते हैं। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।


यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।


न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।


खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।


वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।


तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।


जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।


( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )
अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से 


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।


कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।


कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।

 

( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने आये थे और जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )


ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।


किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।


वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।


( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना )


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।


आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी ,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।


हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )


खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।


फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।


हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।


रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।


कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।


कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।


मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।


सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।


उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।


वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।


( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )


होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।


गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।


उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।


( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )


अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।


आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।


रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।


मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।


इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।


हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।


रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।


दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।


( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )


तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।


मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।


तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।


तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।


तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।


बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।


ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो ,
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।


( साये में धूप से साभार )

 


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