Saturday, 15 September 2018

अंधेरी कोठरी में कोई रौशनदान नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 अंधेरी कोठरी में कोई रौशनदान नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है , आज शायर ,ये तमाशा देखकर हैरान है। 

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए , ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है। 

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम , तू न समझेगा सियासत तू अभी इनसान है। 

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब कि सदके आपके , जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है। 

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है। 

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं , हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है। 

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो - इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है। 

 


 

          यकीनन आज फिर से उसी मोड़ पर है देश , आज इतिहास अपने को दोहरा रहा लगता है , शायद दुष्यंत कुमार की इस ग़ज़ल से बेहतर आजकल के दौर को कोई नहीं समझा सकता है। मगर एक बड़ा अंतर है , आज कोई बूढ़ा आदमी नहीं है अंधेरी कोठरी में उजाला लाने के लिए। शायद आज बहुत कम लोग जानते हों कि वो बूढ़ा आदमी कौन था। उस से बढ़कर हैरानी की बात ये भी है कि इस ग़ज़ल की गूंज विदेश तक जा पहुंची थी और किसी ने सवाल पूछा था ये किस की बात है जो शायर कहना चाहता है। आपकी जानकारी के लिए वो बूढ़ा आदमी जयप्रकाश नारायण जी थे और आपात्काल की अंधेरी कोठरी से बाहर लाने का काम उन्होंने ही किया था , भले ये बात कहना वाला शायर तब दुनिया में नहीं रहा था। मुझे नहीं लगता आज कोई भी कवि शायर या लिखने वाला देश के दर्द को उतना गहराई से समझता है और महसूस करता है। इसीलिए आज भी देश की दशा को बयान करने को दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें ही याद आती हैं और मुझे अपनी बात उसी से शुरू करनी ज़रूरी लगी है। अल्लामा इक़बाल की भी कुछ बातें शामिल की जाएं तो और भी आसानी होगी। आपको अगर उनका नाम याद नहीं तो तराना -ए -हिन्दी , सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा याद कर लो। देखते हैं उनकी शायरी क्या समझाती है।

जमहूरियत :-

इस राज़ को इक मर्दे-फिरंगी ने किया फ़ाश , हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते 

जमहूरियत इक तर्ज़े-हुकूमत है कि जिसमें , बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते। 

अर्थात इक यूरोपवासी ने ये राज़ बताया कि बुद्धीमान इसे खोला नहीं करते कि जमहूरियत शासन करने का वो तरीका है जिस में गिनती की जाती है बंदों की उनकी काबलियत को नहीं परखा जाता है। 

नई तहज़ीब :-

उठाकर फेंक दो बाहर गली में , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे 

इलेक्शन मिम्मबरी कैंसिल सदारत , बनाए खूब आज़ादी के फंदे 

मियां नज़्ज़ार भी छीले गए साथ , निहायत तेज़ हैं यूरुप के रन्दे। 

अर्थात ये नई तहज़ीब किसी काम की नहीं है। चुनाव असेंबली के मेंमबर बनाना आज़ादी देने नहीं छीनने को फंदे की तरह हैं और विदेशी रन्दे की हैं जो बढ़ई के हाथ ही छील देते हैं। बात साफ है हमारा लोकतंत्र जनता को ही घायल करता है। मगर आज दुष्यंत इक़बाल जयप्रकाश नहीं है तो कौन समझाए हमें जाना किधर चाहिए ऐसे हालात में। इस सब को ध्यान में रखकर चर्चा करते हैं। 

           संविधान क्या कहता है और होता क्या है 

  संविधान में जनता विधायक और सांसद चुनती है ऐसा प्रावधान है और उसके बाद विधायक या सांसद चुनते हैं अपना नेता जो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री होता है। मगर क्या ऐसा होता है शायद नहीं। आपको पता है संविधान में दलों की कोई बात नहीं है , ये सब कुछ लोगों ने सत्ता हासिल करने को बनाया है। सब दल एक जैसे हैं कोई भी देश और समाज की सेवा की खातिर नहीं है सबको सत्ता चाहिए शासन का अधिकार चाहिए। और सब एकमत हो जाते हैं अपने लिए सुविधा वेतन और विशेषाधिकार हासिल करने की बात पर। ये कैसी व्यवस्था है मालिक भूखा और उसके नुमायंदे हलवा पूरी खाएं मौज उड़ाएं। जो वास्तविक हिंदोस्तान है वो चीथड़े पहने है और सत्ता पर बैठा शानदार पहनावा और शाही ठाठ बाठ से देश की जनता का धन उड़ाता है जिस बेदर्दी से पहले किसी ने नहीं उड़ाया था। लाज की बात बेमानी है इनकी असलियत क्या है सब जानते हैं। उपाय है कि हम किसी दल या किसी तथाकथित बड़े नेता या किसी घराने के वारिस को नहीं महत्व दें और किसी और द्वारा खड़े व्यक्ति को नहीं बल्कि खुद अपने बीच में से अच्छे सच्चे ईमानदार आदमी को खड़ा करें और धनबल से नहीं अपने विवेक से अधिकार का उपयोग कर वास्तविक देशसेवक लोगों को चुनकर भेजने का अपना कर्तव्य निभाएं। देश को 543 ईमानदार सांसद और कुछ हज़ार विधायक देने हैं हमने जो सादगी से जीवन यापन करें और देश की पाई पाई देश पर खर्च करें। संभव है मगर कठिन तो होगा क्योंकि ऐसे लोग आपके पास वोट मांगने नहीं आएंगे न ही आपको झूठे वादों से बहलायेंगे। खुद आपको जाना होगा अच्छे लोगों के पास उन्हें देश और समाज की सेवा करने को कहने को। हमने नियम कायदे कानून बना तो लिए हैं मगर उनको लागू भी करना है पालन भी करना है ये विचार ही नहीं किया। धीरे धीरे हमारा समाज नैतिकता को अपने जीवन से बाहर करता रहा है और इक ऐसा समाज बना लिया है जो अपने स्वार्थ में अंधा होकर जिस शाख पर बैठा हुआ है उसी को काट रहा है। विडंबना की बात ये है कि इस सब का ज़िम्मेदार वही समाज का अंग है जिस पर देश की व्यवस्था और कानून को लागू करने का दायित्व रहा है। नेता अधिकारी लोग देश के खलिहान को बाड़ बनकर बचाने की जगह खुद ही खाते रहे हैं। इक्का दुक्का कोई नेता कोई अधिकारी अगर ईमानदारी की राह चलना भी चाहता है तो बाकी देश को लूटने वालों ने उन्हें बेबस किया है और उनकी राह में रोड़े अटकाए हैं। देश को अपना समझा ही नहीं बल्कि विदेशी शासकों से कहीं बढ़कर लूटा है। कोई ग्लानि कोई अपराधबोध नहीं किसी को भी अपना कर्तव्य नहीं निभा पाने का।
       सवाल किसी भी सरकार का नहीं है , जैसे सभी पहले से और अधिक बढ़ावा देते आये हैं। केवल बातें ही करते हैं काम नहीं और देशभक्ति को आडंबर बना लिया है। हर सरकारी विभाग ने समाज को छलने का काम किया है। अस्पताल हैं कि खुद ही बीमार हैं , शिक्षा विभाग है कि देश को दिशा देने की जगह और भटकाता रहा है। ये कैसी शिक्षा है जो जीवन में उपयोगी ही नहीं है केवल किताब रटने और इम्तिहान में सफल होना आधार और मापदंड बना तो लिए मगर समझना भी नहीं चाहा उस से हासिल क्या है। हम कहने को गीता कुरान की बात करते हैं मगर कोई पढ़ता नहीं पढ़कर समझता नहीं। रोटी रोटी बोलने से पेट नहीं भरता है ,झरने की तस्वीर आपकी प्यास नहीं बुझा सकती है। मगर हमने शिक्षा और धर्म को केवल इक दिखावा बना डाला है। ये हम किस तरफ बढ़ रहे हैं , हर कोई अवसर मिलते ही मनमानी करने लगता है। बड़े उद्योगपतियों और कारोबार करने वालों ने शासकों से गठबंधन कर गरीब जनता को और गरीब ही बनाया है खुद और अधिक की चाहत में। हमने धनवान होने को सफलता का सूचक समझ लिया है बिना विचारे कि दौलत आई कैसे है। हर सरकारी योजना की नाकामी इसी कारण है करोड़ों किसी की तिजोरी में चले जाते है मगर होता कुछ भी नहीं। कारोबार और निर्माण में हद दर्जे की बेईमानी से सड़क बनती है टूट जाती है पुल बनने के साथ गिर जाते हैं। गंगा और गंदी होती जाती है , लोग हर दिन और बदहाल हो रहे हैं ये कैसी व्यवस्था का बोझ ढो रहे हैं।
         राजनीती इतनी गंदी हो चुकी है कि सवाल तालाब के पूरे पानी को बदलने का है। मगर ऐसा हो कैसे ये रास्ता बतलाये कौन। कोई रास्ता दिखलाने वाला नहीं है जो भी सामने आता है देश को किसी अबला की तरह नोचता है उसकी बोटी बोटी खाता है। अपने स्वार्थ की खातिर दंगे फसाद करवाता है लोगों को आपस में लड़वाता भिड़वाता है , कोई भी भारतवासी नहीं कहलाता है। जाति धर्म ऊंच नीच की दीवार उठाता है , इन सभी ऊंचाइयों में सूरज नज़र नहीं आता है। जितनी रौशनी लगती है उतना अंधियारा बढ़ता जाता है। कौन समझता है भगवान भी है जिसका अपना बही खाता है और अनुचित करने से भय खाता है। इंसान इंसानियत को भूलता जाता है मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर आडंबर करने जाता है धर्म की राह नहीं अपनाता है।
खुदा पत्थर के आदमी पत्थर दिल और हर हाथ पत्थर उठाये है डर भी है और डराता भी है। हर कोई नज़रें चुराता है। बोलना सबको आता है बात नहीं कोई समझता न समझ पाता है। आप डॉक्टर बने इंजीनियर बने शिक्षक बने मगर उद्देश्य अपना कर्म नहीं केवल पैसे का नाता है। हर कोई आपसी भाईचारा निभाता है , अपने संगठन के लोगों को अनुचित करने से रोकना नहीं उसका गलत आचरण करने पर साथ निभाता है , देश भाड़ में जाये उनका क्या जाता है।
                              जिनका फ़र्ज़ था सच की रक्षा करना सच को ज़िंदा रखना , उनका सच से कोई नहीं नाता है। अख़बार टीवी चैनल या बुद्धिजीवी कहलाने वाला सत्ता संग रंगरलियां मनाता है। झूठ को सच बनाकर सरकार से सहूलियत पाता है। ये समझता है देश का भाग्यविधाता है मगर यही गलत तस्वीर बनाकर देश को भटकाता है , सरकारी बैसाखियों के दमपर आगे बढ़ता इतराता है। मुफ्त का माल समझ जनता के पैसे से मौज उड़ाता है। साधु संतों का नहीं सही मार्ग से कोई नाता है सबको जितना मिले लालच बढ़ता जाता है और इनका सत्ता से सरकारी विभागों से सबसे गंदा नाता है कोई नियम कानून इनके सामने नहीं आता है। सब को अंधेरा हर तरफ बढ़ता नज़र भी आता है मगर हर कोई आरोप और पर लगाकर चैन की नींद सो जाता है। रौशनी करने को दिया कोई कब जलाता है। हम जिधर जा रहे हैं उधर अंजाम क्या होगा नहीं कोई सोचता न कोई समझता है न ही कोई समझाता है। सिंघासन पर बैठा हुआ घना अंधेरा है जो सूरज कहलाता है। कहीं नहीं कोई जननायक नज़र आता है , कोई सत्येंदर दुबे जब सरकारी योजनाओं का सच बताता है तो देश का पीएमओ भी नज़रें चुराता है और सच बोलने पर सत्येंदर दुबे कत्ल कर दिया जाता है। 27 नवंबर हर साल आता है मगर देश सरकार मीडिया ऐसे लोगों को भूल जाता है। उजाला करना है जिसे वही चिरागों को बुझाता है। आप को कभी अपने देश का ख्याल आता है , क्या देश से समाज से कोई आपका नाता है। देश से प्यार दिखावा नहीं जो किसी दिन जाग जाता है और देश प्यार के गीत गुनगुनाना देशभक्ति नहीं बन जाता है। देश आपको हर दिन बुलाता है क्यों यहां  हर कोई अधिकार ही मंगता है फ़र्ज़ नहीं निभाता है। आपको कभी पुराना गीत याद आता है।

       हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के , इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के।

कौमी तराने नहीं हम लोग बेमतलब के गीत लिखते हैं गाते हैं सुनते सुनाते हैं। हवाओं से फैसला चिरागों का करवाते हैं। अंधेरे हैं जो और और बढ़ते जाते हैं।
            
                                        

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