Monday, 21 May 2018

आपकी ख़ामोशी मेरी जान ले लेगी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   आपकी ख़ामोशी मेरी जान ले लेगी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       इक आशिक़ को महबूबा से इतनी शिकायत है कि चुप नहीं रहे हां बोले चाहे ना बोले। ख़ामोशी जान ले लेती है। बस कुछ वही हाल है। लोग बात ही नहीं करते। दोस्त हैं फोन करो तो मिलने से कतराते हैं , आपके दल की सरकार है तो क्या हुआ। कब से हम खुलकर चर्चा किया करते थे हर सरकार की कामकाज की। कोई तो ऐसे भी थे जो खुद नहीं साहस करते थे तो मुझी से कहते भाई इस पर कुछ तो लिखो। वो और बात है कि मैंने किसी के कहने पर कभी कुछ नहीं लिखा। अब कोई चाहता हो नहीं लिखूं तो वो भी नहीं कर सकता या मुझसे नहीं होता है। अखबार वाले सच नहीं लिखना चाहते , टीवी वाले बचते हैं सच बोलने से। उस पर भी कहते हैं हम आज़ाद हैं , कौन आज़ाद है। आपको टीवी वाले बुलाते हैं इस विषय पर कविता पढ़ना। सरकारी राग दरबारी राग से अब अखबारी राग तक बात पहुंच गई है। शासक की समझाई बात को दरबार में कहना सरकारी राग , शासक को खुश करने को किसी नेता के नाम का गुणगान दरबारी राग सुनते थे , अख़बार टीवी चैनल मीडिया क्या अब साहित्य अकादमी सत्ता की आलोचना से घबराती है और निर्देश देते हैं ऐसा कुछ भी नहीं लिखा बोला जाये जिस से शासक नाराज़ हो जाये। इसको ख़ुदकुशी करना कहते हैं जब कोई कहता है :-

   माना आवाज़ है मेरा नाम , मगर आप ही कहो लाशों का बोलने से क्या काम।

ये लाइन मेरी इक व्यंग्य कविता की है , आंखो देखा हाल। वास्तविक घटना की बात है। इक अख़बार की ही बात है। उसे फिर से पढ़ना होगा। क्या हम वापस वहीं पहुंच गए हैं। आपात्काल में भी ऐसा सन्नाटा नहीं था। साहित्य अकादमी से लेकर सरकारी अधिकारी तक विरोध के स्वर को खामोश करना चाहते हैं। बंद कमरों में चीखते हैं ताकि बाहर आवाज़ नहीं सुन ले कोई। आज़ादी के इतने सालों बाद आज़ाद हुए नहीं हम लोग , लगता है गुलामी आदत बन चुकी है। खुदा बदल लेते हैं इबादत करने को। मेरा इक शेर है :-

        तुम खुदा हो , तुम्हारी खुदाई है , हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।

        ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन , लोग फिर भी बगावत नहीं करते। 

   कोई बता रहा था राजधानी गया था , दो लाख का इनाम मिला है , सम्मानित किया गया है। इधर समझ नहीं आता सम्मान अपमान का भेद भी। ये बाज़ारी दस्तूर है बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। इक गीत से ली है ये लाइन भी। जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझ में , राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है। लेकिन ऐसा होता है कभी राख में दबी कोई चिंगारी हवा से आग बन जाती है और कोहराम मच जाता है। आप भी देखोगे इक दिन इस राख में दबी हुई चिंगारी को शोला बनते हुए।

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