Thursday, 17 May 2018

खुदा से शिकायत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        खुदा से शिकायत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमेशा सोचा था , 

रहा नहीं गया , कह दिया। 

खुदा तूने किस बात का बदला लिया ,

सारी उम्र मुझे दर्द ही दर्द दिया। 

बोला हंसकर मुझसे खुदा ,

तुझको मैंने प्यार किया यही किया। 

तुझे दर्द मिले ज़ुल्म किये सभी ने ,

हर दिन अपमान का विष भी पिया। 

पल भर नहीं भूला मुझको कभी ,

बस इक मेरा हमेशा नाम लिया। 

समझा दुःख सहकर सभी के दुःख ,

किसी से कभी नहीं बदला भी लिया। 

मैंने कहा बता मेरे खुदा सब का दर्द मैंने सहा ,

अपना समझ औरों का दर्द सदा है लिखा। 

कोई तो होता मेरा भी साथी दुनिया में ,

हर घड़ी सबसे अकेला ही मैं लड़ा। 

तुमको सच बोलने की ताकत दी थी मैंने ,

खुदा बोला तभी कभी नहीं तू किसी से डरा। 

लेकिन फिर भी मिला मुझे सच का सिला ,

रोया मैं झूठ रहा हंसता हुआ खड़ा। 

खुदा हंसा हंसकर इतना ही कहा ,

सच बोलकर निडर तू है हमेशा रहा। 

झूठ बाहर से हंसता हुआ लगता था ,

अंदर से रहता था सच से डरा डरा। 

सुख मिला हो या दुःख हो मिला किसी को ,

बड़ी बात है कौन किस तरह है जिया। 

दुनिया को मिला सब कुछ लेकिन ,

उनको नहीं जो तुझको मिला है खुदा।


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