Monday, 7 May 2018

अपनी मर्ज़ी के मापदंड नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     अपनी मर्ज़ी के मापदंड नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     देश में राज्य में दो कानून नहीं हो सकते। सरकार का कोई धर्म नहीं होता , केवल संविधान ही उसका राजधर्म है और उसी का अनुपालन करना होता है। जो सरकार किसी एक तथाकथित बाबा के सैकड़ों एकड़ के अनुचित और अवैध निर्माण को नियम बदल कर वैध करार कर देती है और सत्ता पाने को किसी अपराधी का बचाव करती रहती है जब तक अदालत उसे सज़ा देकर जेल में नहीं भेज देती , उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं किसी और को सही गलत बताने का। वास्तव में किसी भी दल की सरकार को किसी भी धर्म के नाम पर वोट मांगने का असंवैधानिक कार्य नहीं करना चाहिए। आपकी निष्ठा जिस किसी धर्म में हो वो आपका निजि मामला है , आपकी पूजा अर्चना अपनी खुद की कमाई और साधनों से की जानी चाहिए। सरकारी साधनों का उपयोग कर के नहीं। जब आप किसी धर्म की आड़ में सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने की बात करें तब आपको याद रखना चाहिए कि आप भी किसी भी धर्म जाति को वोटबैंक की खातिर कौड़ियों के दाम पर ज़मीन नहीं देंगे। जब सत्ताधारी खुद हर किसी को अपने स्वार्थ की खातिर अनुचित लाभ देते हैं तब भूल जाते हैं यही पहले वाले सत्ताधारी करते रहे और आपने गलत बताया था। सर्वोच्च न्यायालय तक कितनी बार चेतावनी दे चुका है लेकिन कोई भी सरकार अपनी ही ज़मीन पर अवैध रूप से धार्मिक स्थल बनाने को रोकती नहीं है। उल्टा आम तौर पर ये काम किया ही सत्ताधारी नेताओं की मूक सहमति से ही है। राजनीति के हम्माम में इस बारे सभी एक समान हैं। सच कहा जाए तो राजनेताओं का किसी धर्म से कोई मतलब नहीं होता है। धर्म की परिभाषा जानते होते तो खुद अपने आचरण को स्वच्छ करते सभी नेता।

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