Friday, 11 May 2018

अदालत धर्मराज की ( तरकश ) भाग -2 , डॉ लोक सेतिया

     अदालत धर्मराज की ( तरकश ) भाग -2 , डॉ लोक सेतिया 

       ये रचना पहले लिखी रचना से आगे की कहानी है , आप इसे उसी तरह समझ सकते हैं जैसे इधर हिट फिल्म के आगे उसी नाम से दो तीन चार अगेन अदि जोड़कर नई फिल्म बना लेते हैं। अभिनेता वही रहते हैं कहानी बदल जाती है। ऊपर वाले की अदालत में मुजरिम बदलते रहते हैं मगर न्यायधीश और हिसाब किताब धर्मराज और चित्रगुप्त जी ही किया करते हैं , गवाह की ज़रूरत नहीं न जिरह की , ऊपर वाला सब जनता है। इंसाफ किया ही नहीं जाता वास्तव में इंसाफ ही होता है। जैसा कि पिछली कथा में सुन चुके हैं जो जो भी भगवावेसधारी साधु संत मरने के बाद अदालत आते हैं उनको जुर्मों की हज़ार गुना सज़ा मिलती है क्योंकि औरों को उपदेश देने वालों का खुद काम क्रोध लोभ मोह अहंकार में फंसना माफ़ी के काबिल नहीं है। 
                          तीन तरह के लोग कतार में लगे हैं , आम लोग जो बाकी अपराध बेशक नहीं भी किये मगर सरकारी दस्तावेज़ में अपराधी बताये गए। उनसे सवाल किया गया आपने सरकार को पूरा कर क्यों नहीं चुकाया , आमदनी को सही नहीं बताया , सामान बिना बिल खरीदा और किसी तरह ज़मीन जायदाद खरीदी तो उस पर सरकारी फीस कम कीमत की अदा की। जवाब था कि सरकार ने नियम ही ऐसे बनाये हुए थे कि ईमानदारी से जी ही नहीं सकते फिर भी सरकारी विभाग की तय की कीमत पर ही सब को पंजीकरण करवाना पड़ता था। इतनी अनुचित शर्तें और नियम बनती है सरकार कि संभव ही नहीं होता कोई काम बिना सिफारिश या घूस दिए करवाना। इसके बावजूद आम जनता को बिना अपराध किये शर्मसार होने की आदत होती है इसलिए उन्होंने सर झुका अपने लिए सज़ा मांग ली। भगवान की अदालत का नियम है माफ़ी से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती , जो मन आत्मा से माफ़ी मांगता उसे सज़ा नहीं मिलती। ये भी विचार किया गया कि अगर आम लोग नियमानुसार कर भरते तब भी नेता और अधिकारी उसको देश पर नहीं खुद पर खर्च करते। आम लोगों को उनके बाकी सभी अपराधों की सज़ा मिली मगर सरकारी कर और नियम पालन नहीं करने की गलती को माफ़ कर दिया गया। 
                             अधिकारी और उद्योगपति बड़े कारोबारी लोगों को उनके अपने निजि जीवन में किये अपराधों की सज़ा के साथ सरकारी काम में रिश्वत लेने और ईमानदार लोगों को अनावश्यक परेशान करने को सज़ा दी गई कि आपको पिछले जन्म में अच्छे कर्मों से सब कुछ मिला था मगर आपने ऐसे अमानवीय कार्य किये कि अगले कई जन्म तक आपको जानवर बनकर उन्हीं इंसानों से सज़ा पानी होगी जिन्हें आपने तड़पाया हमेशा ही। आपने अपने स्वार्थ से गलत किया चाहे किसी बड़े अधिकारी के आदेश पर जुर्म आपका ही है , कोई आपको कुवें में कूदने को कहता है तो सोचना आपको है कि कूदना है या नहीं। आगे किसी भी जन्म में आपको उच्च शिक्षा उच्च पद नहीं मिलेगा बेशक आपकी जाति धर्म कोई भी हो। आप जनसेवक थे और वही आपकी जाति थी धर्म था। 
                               नेताओं की बात सामने आई तो सब हैरान हो गये। पता चला वो कहावत वास्तव में सच है कि राजनीति और वैश्यावृति इक जैसे पेशे हैं। आपने देश को लूटा झूठ छल कपट सब किया और जिस जनता ने सत्ता दी उसी पर ज़ुल्म किये। आपको अपने सभी बाकी अपराधों की सज़ा तो सौ गुना मिलेगी ही साथ में अगले जन्मों तक आपके साथ आपके साथी रहे सभी लोगों को अपना जिस्म बेचने वाली वैश्या बनकर बिताने होंगे। भगवान की अदालत का इन्साफ कभी गलत नहीं होता है , जिन लोगों ने अनुचित ढंग से कमाई की थी उनको कई लाईलाज रोग और ज़िंदगी की तमाम परेशानियां उसी का नतीजा थी मगर मूर्ख लोग समझते है कि पैसे से हमने रोग का ईलाज और समस्याओं का समाधान कर लिया। कुदरत के नियम को समझते तो ईमानदारी से सुखी जीवन जीते सब।

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