Sunday, 17 September 2017

हंसिये चाहे रोयिए - डॉ लोक सेतिया

खबर वाले ( हास्य कविता )

अब हर दिन सुना रहे ,
फिर फिर उसकी कहानी ,
पहले खबर ढूंढते क्या ,
मर जाती थी इनकी नानी। 
रखवाली क्या करोगे ,
घर की बन चौकीदार ,
बिक चुके ज़मीर वाले ,
झूठे हो सभी इश्तिहार। 
अपनी गली में शेर हो ,
कहते हो सेर बाकी सब ,
तुम सब पे सवा सेर हो ,
पेट भर लिया हुए ढेर हो। 

दाता हैं भिखारी ( व्यंग्य कविता )

किसने किसे क्या दिया है ,
ये कैसा अजब माजरा है ,
मालिक तुम हो भिखारी ,
सेवक दाता बन कह रहा है। 
खाली हाथ आया था जो ,
आया था हाथ जोड़ कर ,
कहता है सब का मालिक मैं ,
खुद बन गया सेवक खुदा है।
खोटा सिक्का इस तरह चला ,
करना था जिसे सब का भला ,
सब बुरे पुराने लगते हैं भले ,
जब देखा सभी ने सभी से बुरा।
 

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