Monday, 31 July 2017

कौन बनाएगा किसे बनाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कौन बनाएगा किसे बनाएगा ( तरकश ) डॉ  लोक सेतिया 

    कौन है जो घोषणा कर रहा अगला चुनाव कौन जीतेगा और किसे प्रधानमंत्री बनाया जायेगा। वही जो पिछली बार नहीं बनने की बात कहता था तब गलत साबित हुआ। क्योंकि लोग भूल जाते हैं देश में संविधान नाम का कुछ है जो केवल जनता को अधिकार देता है विधायक सांसद चुनने का और विधायकों सांसदों को हक होता है अपना नेता चुनने का। इधर तो पहली सरकारों से भी आगे बढ़कर एक दो लोग जिसे मर्ज़ी राज्य का मुख्यमंत्री क्या देश का राष्ट्रपति तक तय करते हैं। संसद की चौखट पर माथा टेकने से संसद मंदिर नहीं बनती है आपको संविधान की अनुपालना करनी होती है।
मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

    इक बात समझनी ज़रूरी है ये मानसिकता गुलामी की है जो लोग किसी को इतना महिमामंडित करने लगते हैं मानों जनता ने प्रतिनिधि नहीं कोई देवता चुना है आराधना करने को। मगर इतिहास गवाह है देश की जनता ने उसकी ज़मानत तक ज़ब्त करवा दी थी जिसे लोग इंदिरा इज़ इंडिया बताते थे। हद तो ये है कि ऐसे नेता का मकसद देश की जनता की भलाई करना नहीं अधिक से अधिक सत्ता हासिल करना है। जब ध्येय ही अगला चुनाव और कभी किसी राज्य में सरकार बनाना चुनाव जीतना किसी भी तरीके से बन गया तब वास्तव में बदलता कुछ भी नहीं। आज तीन साल बाद झूठे प्रचार के सिवा क्या किया है आपने। क्या ये आज तक का सब से बड़ा घोटाला नहीं है देश का धन बर्बाद किया अपने गुणगान पर। जोड़ तोड़ में कभी हरियाणा के भजनलाल माहिर थे आज अमित शाह और मोदी गुरु हैं इस काम के। मगर क्या इसे ही अच्छे दिन कहते हैं। सब से अहम बात किसी भी को ये अधिकार नहीं कि बताये जनता किसे बनाएगी या हटाएगी। न टीवी मीडिया वालों को न ही फेसबुक पर चाटुकारिता की दुकानदारी करने वालों को न किसी नितीश कुमार जैसे अथवा अन्य दल के नेताओं को है। क्या हम देशभक्त हैं अथवा किसी व्यक्ति की भक्ति करते हैं।

Sunday, 30 July 2017

राष्ट्रीय राजमार्ग को समझना = डॉ लोक सेतिया

             राष्ट्रीय राजमार्ग को समझना = डॉ लोक सेतिया 

                                    तीर-ए-नज़र

      बहुत दिन बाद जाना हुआ एन सी आर , अर्थात नेशनल कैपिटल रिजन में। कभी सीधी सीधी राहें दिखाई देती थी , सड़क बीच से बंटी हुई मगर दोनों तरफ से सब साफ नज़र आता था। अब कोई चौराहा नहीं कोई लाल बत्ती नहीं बस चलते जाओ मगर देख भाल कर। कहीं से ऊपर से बनाये पुल से कहीं से नीचे से और कहीं किसी सुरंग में से निकलना होता है। इक भूल भुलैया बन गई हैं सड़कें भी। कभी कोई रास्ता सत्ताधारी दल को जाता था कोई विपक्षी दल को जाता था , कोई राह छोटे छोटे और दलों को निकलते थे। कोई दक्षिण को कोई पश्चिम को चला जाता था। इन दिनों देखा लोग घर से निलकते किसी तरफ जाने को मगर भटक कर या फिर जान बूझकर पहुंच जाते सत्ता के दरबार में। सब उधर ही जा रहे हैं जिधर की राह अपनी आंखों पर पट्टी बांध अंधें होकर समझा रहे हैं। कोई नहीं जानता देश में लोग बाढ़ में डूबे हुए हैं और नेता जी अपने स्वार्थ की नैया किनारे लगा मुस्कुरा रहे हैं। अच्छे दिन आ रहे हैं। आप अपनी सत्ता की सड़कें बिछा रहे हैं और हम आपको टोल टैक्स चुका रहे हैं। मन की बात करते हैं मगर मन में छुपे चोर की बात नहीं बताते हैं। आजकल देश के महान नेता बोते जाते हैं बबूल भविष्य में आने वालों के लिए मगर किसी और के लगाए पेड़ों से आम खा रहे हैं। रात को दिन दिन को रात बता रहे हैं , उजालों के नाम पर अंधियारे बढ़ा रहे हैं। सब सोचते हैं मंज़िल को पा रहे हैं , किस राह किस मंज़िल की बात की थी , भुला रहे हैं। इक नई कहानी हमको सुना रहे हैं , जो कल बुरे थे अच्छे आज कहला रहे हैं। किस किस को गले से लगा रहे हैं , गंगा स्नान करवा पाप धुलवा रहे हैं। गूगल मैप से लोग गाड़ी चला रहे हैं , गोल गोल घूम चकरा रहे हैं। 
            इक समारोह दिखाई दिया , स्वच्छता अभियान का डंका बजा रहे थे। किसी ने जाकर बताया आपकी बात कितनी झूठ है , कुछ भी स्वच्छ नहीं है यहां गंदगी हर तरफ है। उसकी बात पर झल्ला रहे हैं , सब की आंखों में धूल झोकें जा रहे हैं , बिना किये बजट को निपटा रहे हैं। और कुछ लोग विज्ञापन में स्वच्छता का सबक पढ़वा रहे हैं। सारे जहां अच्छा हिन्दुस्तां भुलाकर सभी बस इक तुम्हीं हो अच्छे का स्तुतिगान गा रहे हैं। इक बार फिर वही वापस टीवी पर आ रहे हैं , करोड़पति बनाने की बात दोहरा रहे हैं। सवाल बहुत उन्हें याद आ रहे हैं , बस थोड़े से आसान सवाल हल नहीं हो पा रहे हैं। सवाल यही हैं :-

1 अभी तक कितने करोड़पति बनाने के शो में कितनी कमाई किस किस की हुई है। 
   कितने लोगों ने कितनी राशि की जेब कटवाई है। और कितनों की हुई भलाई है। 
2 क्या इसी को लोगों का मार्गदर्शन करना कहते हैं। 
   छल कपट ठगी धोखा जुए का खेल क्या यही समझदारी सिखलाते हैं। 
3 कितने अमीर लोगों को कितना धन और चाहिए , किस नेता को कितनी निरंकुश सत्ता की चाह है। 
   क्या यही देश भक्ति है , इसे ही सेवा कहा जाता है। 
4 संविधान की मर्यादा की बात क्या है , लोकशाही क्या है , शह-मात क्या है। 
   व्यक्तिवाद और इक विवेश संगठन की ही विचारधारा को लागू करने के प्रभाव क्या होंगे।

Thursday, 27 July 2017

हमने पुल बना दिया है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       हमने पुल बना दिया है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    पहले राज़ किसी को भी समझ नहीं आया था , हमीं ने सवाल किया था उन पर गंदगी के छींटें तक नहीं लगे जब कि रहे सत्ता के गंदे गटर में दस साल। अब देखो जो जो कल उधर थे और हम जिनको देश को लूटने वालों का साथी मानते थे , उनको खुद ही हाथ बढ़ा थाम लिया और अपनी तरफ खींच लिया। अब इधर आते ही पापी भी धर्मात्मा बन जाते हैं। उनपर कोई दाग़ नहीं लगेगा उनको मैली गंगा में कदम भी नहीं रखने दिया। समर्थन के पुल से पार ले आये हैं। ये हमारी नई नीति है कपड़े बदलते ही लोग बदल जाते हैं धर्म परिवर्तन की तरह। हम दल बदल धर्म परिवर्तन को सही नहीं मानते , हम बीच बीच में आर पार जाने को पुल की तरह की सुविधा रखते हैं राजनीति में। हमने कितना बड़ा काम किया है जो हमारे प्रधानमंत्री होने की बात का विरोध कर चला गया था उसे खुद लौटा लाये हैं। अवसरवादिता को हमारी रणनीति समझ सकते हैं , कल इसी ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि तमाम बड़े नेताओं की तरह इस के भी पंख काटकर इसे पिंजरे का पंछी बनाना आता है हमें। अच्छे दिन की बात पुरानी हुई और अब लच्छे दिन लाने हैं अगले चुनाव में। लच्छे दिन कैसे होते हैं अभी से नहीं बताया जा सकता। खुद हम नहीं जानते थे अच्छे दिन कैसे होंगे , अब न जाने लच्छे दिन क्या होते हैं , यूं समझो अच्छे दिन से अलग ही होंगे।

   अभी बाकी है रचना  

Wednesday, 26 July 2017

ख़ूबसूरती की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       ख़ूबसूरती की बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   सब से पहले सुंदरता की परिभाषा नहीं होती मायने समझ लेना ज़रूरी है। आपको रिमझिम रिमझिम बरसात अच्छी लगती है मगर अभी कल टीवी वाले ही नहीं देश के प्रधानमंत्री जी भी बरसात का तांडव शब्द बोल रहे थे। इंद्रदेवता को नृत्य नहीं भी आता हो मुमकिन है तांडव नृत्य पर शिव जी का कॉपी राइट है। बिना सोचे समझे हम शब्दों का उपयोग करते हैं , बाढ़ आना देवी देवता का कोप नहीं खुद हमारी गलतियों से है। मगर विषय और है , सुंदरता ख़ूबसूरती की बात। आपको हरियाली अच्छी लगती है फूल अच्छे लगते हैं पेड़ पौधे पहाड़ ही नहीं नदियां समंदर क्या रेगिस्तान तक में कशिश दिखाई देती है। वास्तव में जो दृश्य हमारी आंखों को पसंद आते वो हमें सुंदर लगते हैं। सभी फूल खूबसूरत होते हैं फिर भी लोग गेंदे के फूल की कोमलता से अधिक कांटों वाले गुलाब को देख ख़ुशी अनुभव करते हैं। मुझे तो लगता है प्यार को गुलाब से जोड़ने के पीछे ये भी मकसद होगा कि संभल कर इस में कांटे भी छुपे हैं। परिभाषा को छोड़ अब सीधा विषय की बात करते हैं। 
        जब भी सुंदरता की बात की जाती है तो अधिकतर महिलाओं की ही बात होती है। और बेशक किताबों में नारी की सुंदरता का वर्णन करते हर औरत सुंदरता और त्याग की मूरत होती है बताया गया है तब भी हमने या फिर सुंदरता के बाज़ार ने कुछ मापदंड बना दिए हैं। सालों तक इक साबुन फ़िल्मी नायिकाओं की सुंदरता की बात कह कर बिकता आया है और कुछ पॉवडर क्रीम भी। रंग गोरा होना भी ज़रूरी है ये किसी नासमझ की फैलाई बात है , मजनू को लैला खूबसूरत लगती थी किसी ने कहा तेरी लैला तो काली है , मजनू का जवाब था तेरी आंख नहीं है देखने वाली। अर्थात सुंदरता देखने वाले की नज़र में होती है। हर मां को अपनी संतान दुनिया की सब से सुंदर लगती है क्योंकि नज़र किसी और की नहीं मां की होती है। 
       महिलाएं क्षमा करें मेरे मन में उनके लिए आदर बहुत है मगर समाज की वास्तविकता लिखना मेरा धर्म है। अक्सर जब भी महिअलों के साथ कदाचार की बात होती है कुछ लोग पहनावे पर इल्ज़ाम लगाया करते हैं , मेरा मकसद यहां वो कदापि नहीं है। किसी महिला ने क्या पहना है उस से आपकी सोच गंदी नहीं हो जाती और जिनकी सोच खराब है उनको गलत आचरण करने को महिला की वेशभूषा की ज़रूरत नहीं होती। मैंने बहुत महिलाओं से और पुरुषों से इस विषय पर खुलकर बात की बहुत समय लगाकर। आपको कौन किस तरह किस कारण भाता है या भाती है और क्या क्या आपको प्रभावित करता है। विश्लेषण कुछ इस तरह है। आकर्षक होना और उत्तेजित करना दो अलग बातें हैं। साड़ी में अधिकतर महिलाएं अच्छी लगती हैं अगर साड़ी सलीके से पहनी हो , सूट भी अपनी उम्र और शारीरिक बनावट को ध्यान में रखकर पहना हुआ अच्छा लगता है। मगर हर नए फैशन को अपनाना सही नहीं है। कपड़े शरीर ढकने को पहनते हैं जब आपका पहनावा ऐसा हो जो आपके बदन को ढकता नहीं दिखलाता हो तब उस पहनावे को अपनी पसंद बता सकते हैं मगर देखने वालों को क्या लगता है आप उसे नहीं बदल सकते। इधर अधिकतर इस तरह का पहनावा अपना चुके हैं भेड़चाल की तरह। वास्तव में आपको क्या पहनना क्या नहीं इस बारे कहते आये हैं कि खाओ मन पसंद और पहनों जग पसंद। मतलब जो आपको अच्छा लगता वही खाओ मगर पहनावा वही ठीक जो देखने वालों को अच्छा लगे। 
                        बात केवल पहनावे की नहीं है , आप सुंदर लगते हैं ये बहुत और बातों पर भी निर्भर करता है। मेरी आदत है हर फोटो को ध्यान से देखता हूं और महसूस करता हूं इस फोटो लेते समय चेहरे पर भाव क्या हैं। बहुत कुछ समझ आता है। मुझे अपनी मां शायद सब से सुंदर लगती थीं क्योंकि उनका चेहरा ही नहीं मन भी बहुत निर्मल था। उन जैसी महिलाएं शायद दो चार ही मुझे मिलीं। बात मेरी माता जी की इसलिए नहीं की क्योंकि मेरी मां थीं बल्कि क्योंकि आज भी उनको जानने वाले सब उनकी सरलता मासूमियत और भोलेपन के साथ मधुर व्यवहार और हमेशा इक मुस्कान रहना चेहरे पर को याद करते हैं। कभी किसी बेटे बेटी बहू दामाद या बच्चों तक से कठोर बात की हो किसी ने नहीं देखा। हर किसी से अपनेपन से मिलना और किसी के लिए मन में बैर भाव नहीं रखना , यहां तक की किसी से कोई गिला शिकवा भी करतीं तब भी हंसती हुई। आपका बात चीत का ढंग और सौम्यता ही असली सुंदरता है जो कभी ढलती नहीं है। आपको बूढ़े लोग भी देखने पर प्रभावित करते हैं अपने आचरण से। मोटापा या शरीर का शेप का रंग का होना असली खूबसूरती नहीं होता। पल भर की चमक और हमेशा की आभा में ज़मीन आसमान का अंतर होता है। चर्चा को बातें बहुत हैं मगर संक्षेप में इतना बहुत है।

Tuesday, 25 July 2017

जवाब मिल गया सवालों का ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   जवाब मिल गया सवालों का ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

                 हल तलाशें सभी सवालों का , है यही रास्ता उजालों का।

तलाश करने से सब मिलता है। इक दिन तमाम नेताओं को पता चला इक जानकार है जो अपने सॉफ्टवेयर से हर सवाल का बिल्कुल सही हल बता देता है , बदले में लेता कुछ भी नहीं। इक शपथ खिलवाता है कि राज़ की बात बतानी नहीं किसी को , इतना ही बता सकते हो कि मेरी बात बिल्कुल सच है। राजा बेटा सब से पहले जा पहुंचा और पूछा मेरे देश का हाल बहुत बुरा है और सब बाकी दल वाले हमारे दल को दोष देते हैं। अभी तक मैं खुद शासक नहीं बना न ही मेरी माता  जी भी। पिता राजनीति में  नहीं आना चाहते थे मगर आना पड़ा , उनको अपनों ने ही बदनाम कर दिया और इक दिन बेमौत मारे गए। दल वालों को मेरी माता जी से अच्छा कोई नहीं मिला दल को ज़िंदा रखने को इसलिए उन्हें बुलाया गया मनुहार से। आप सब जानते हैं इतिहास क्या है , मुझे चिंता है देश में आखिर कब वास्तविक आज़ादी आएगी। क्या मैं ये काम कर सकता अगर शासक बन गया या फिर किसी कठपुतली की तरह नाहक बदनाम हो जाऊंगा। सॉफ्टवेयर से लिखित पर्ची निकाल उसे दे दी थी पढ़कर फाड़ देनी थी। परिणाम लिखा था , आप शासक बन जाओ तो पचास साल में देश को सब हासिल हो सकता है। मगर तुम शासक बनोगे कैसे , लोग पप्पू समझते हैं तुमको। आजकल लोग सीधे आदमी को गधा समझते हैं , तुम्हारी बातों की खिल्ली उड़ाते हैं। लोगों को बड़ी बड़ी बातें ऊंचे ऊंचे सपने पसंद हैं कि कोई देवता या मसीहा आकर सब ठीक करेगा जादू की छड़ी से। राजा नंगा है कहानी में ठग लोभी थे अब शासक लोभी जी हैं जो अच्छे दिनों की इक पोशाक बेच गए जिसका अस्तित्व ही नहीं है। और उसी तरह जैसे राजा बिना कुछ पहने निकला था और लोग जनता राजा को नंगा देख कर भी चुप भी थी और जय जयकार कर पुष्प भी बरसा रही थी , अब भी गंदगी को स्वच्छता और गरीबी को खुशहाली और ख़ुदकुशी को नासमझी बता रही है। सब पहले से बुरा है फिर भी धनबल से टीवी अख़बार मीडिया में उसी लोभी जी की महिमा का गुणगान करते हैं। शाइनिंग इंडिया से भारत निर्माण तक सब से जो नहीं हुआ इश्तिहारी विकास उसी को दोहराया जा रहा है। मगर जो तुम चाहते हो वास्तव में करना हो तो तुम्हें पचास साल तक शासक बनकर काम करना होगा। भाग्य में लिखा होगा तो अवश्य बनोगे , देख सकते हो कौन कौन भाग्य से किस जगह जा पहुंचा है। इक परिवार की शाखा में जाने वाले पेड़ की डाली को पकड़े शिखर तक जा पहुंचे हैं। 
                कठोर सिंह जी , निराश कुमार , छाया वती जैसे सभी यही सवाल पूछने गए और अपना अपना जवाब पढ़कर वापस चले आये। किसी को चालीस किसी को सौ बरस लगने की बात बताई सॉफ्टवेयर ने। जब लोभी जी को पता चला तो पहुंचे वो भी दर पर बहुत चढ़ावा लेकर , कहने लगे इसे आप रिश्वत नहीं समझना। मैंने घूसखोरी शब्द को ही शब्दकोश से निकलवा दिया है , मैंने जिसे भी देता दान या उपहार बता देता हूं। अपने लोग क्या विदेश तक बहुत बांट रहा हूं नाम शोहरत की खातिर , किसी ने अनुचित कहने का साहस किया नहीं। मगर सॉफ्टवेयर वाले ने कहा आपकी सब चीज़ें मेरे किसी काम की नहीं हैं। आप चिंता नहीं करें आपको सटीक भविष्यवाणी मिलेगी। और पर्ची लिखी निकली अभी तीन साल जिस तरह किया काम उस तरह आपको दो सौ साल शासक बनकर रहना होगा तब सब बदलेगा। अभी तो आप दो साल बाद की ही चिंता में डूबे हैं और आपके चाटुकार बीस बरस लोभी जी की बातें सोशल मीडिया पर करते हैं। उन्हें याद ही नहीं संविधान क्या है और वो तय नहीं कर सकते कितने साल कौन रहेगा। तुम भी समझ लो , शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो  टूट भी सकती है। आप भी जानते हैं इस तरह के झूठे प्रचार की टहनी कितने लोग थामे रहे और परिणाम क्या हुआ। लोभी जी को अब कोई दूसरा काम नहीं करना , बस अंग्रेज़ों की तरह दो सौ साल शासन करना है। लोभी एक लोभी दो से लोभी बीस तक भी नाम लोभी जी ही रहेगा। 
                     बहुत खोज कर हल मिल ही गया है , लोभी जी के क्लोन बनवाये जा रहे हैं , उनकी उम्र दो सौ साल नहीं हो सकती तो क्या है हर बीस साल बाद नया क्लोन उनकी जगह लिया करेगा। इंडिया में अब एक ही नेता है जो सब कुछ करना चाहता है और कर सकता है। किसी और को अपने बराबर कद का होने नहीं देना है। ज़िंदा रहे न रहे शासक उन्हीं का नाम उन्हीं की सूरत का होगा। 

             तेरी सूरत से नहीं मिलती किसी की भी सूरत ,

                हम जहां में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं। 

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अख़बार पत्रिका वाले मेरी इस रचना को छाप सकते हैं। मौलिक है और बिल्कुल आधुनिक भी।

Thursday, 20 July 2017

चैन की बंसी बजाने वाले लोग ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

   चैन की बंसी बजाने वाले लोग ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

 हम कौन हैं शायद सोचते ही नहीं , नीरो के वंशज हैं देश जल रहा है और हम जश्न मना रहे हैं। कोई सड़क पर तड़पता मर जाता है और लोग व्हाट्सएप्प पर सोशल मीडिया पर विडिओ अपलोड करने में लगे हैं। किसी को स्मार्ट फोन पर गेम खेलनी है किसी को संगीत सुनना है किसी को पिक्चर मैसेज भेजने हैं मानवता के उपदेश से धर्म की बातों वाले। कोई है जो चुटकुले बना रहा है , जैसे मनोरंजन ही जीवन का मकसद होता है। सत्तर साल जीना बेकार है जब वास्तव में सार्थक कोई काम नहीं किया। क्या इक पागलपन है अथवा कोई नशा है ये सब जिसमें हम भूल जाना चाहते हैं कि देश समाज ही नहीं मानवता और धर्म भी रसातल को जा रहा है। वाह रे टीवी वालो राम रायसीना हिल्स में घोषित करने लगे हैं। राम मंदिर में नहीं आलिशान भवन में रहेंगे अब देश के सब से बड़े पद पर बैठे। किसे कब खुदा किसे कब शैतान बताना मीडिया की मर्ज़ी है , मगर खुद को नहीं देखते क्या थे क्या हो गए हैं आदमी थे दुकान बन गए हैं।  चलो आपको गोविंद जी के गांव लिए चलते हैं टीवी उद्घोषक बताता है। सत्तर साल पहले इसी पेड़  के नीचे पढ़ते थे आज भी गांव उसी तरह बदहाल है मगर गांव का नाम सब को पता चल गया यही बड़ी बात है। दीवाली की तरह पटाखे बज रहे हैं दलित कहां से कहां पहुंच गया , क्या इसी तरह दलित कल्याण किया जायेगा। सत्ता बड़ी शातिर है लोग उसकी चाल नहीं समझते , बात दलित उद्धार की नहीं है वोट की है और कौन सत्ताधारी दल के लिए निष्ठा रखता है इस का महत्व है। उनको किसी को महल में संविधान की रक्षा को नहीं बिठाना , इक मोहर चाहिए अपने हर कागज़ पर लगाने को। ये क्या वास्तव में सही दिशा को जाना है। 
              चुने जाने के बाद गोविंद जी बचपन की बात दोहराते हैं कच्चा घर , मगर जब 150 एकड़ में बने भवन में सैकड़ों कमरों में महाराजा की तरह रहेंगे तब क्या विचार करेंगे इसका अर्थ क्या है। एक दिन का खर्च राष्ट्रपति भवन का लाखों रूपये है और इतनी जगह लाखों लोग रह सकते हैं। कोई नहीं जनता उस भवन में रोज़ इतना खाना गटर में डाला जाता है जिस से हज़ार लोग भूख मिटा सकते हैं। किसी का सत्ता मिलना बड़ी बात नहीं होता सत्ता पाकर जो किया उसका महत्व होता है। लेकिन अब ध्येय ही सत्ता विस्तार बन गया है , बाकी सब झूठे प्रचार और भाषण तक सिमित हैं। क्या देश का प्रधानमंत्री कोई तमाशा दिखाने वाला है जो बातों से मनोरंजन करता है और हम ताली बजाते हैं , तमाशबीन हैं। गरीबी भूख बदहाली हर तरफ है मगर हम देख कर भी अंधे बन चैन की बंसी बजाते है और समझते हैं हम राष्ट्रवादी हैं।

Tuesday, 18 July 2017

मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

साकी ने प्यासे से नहीं पूछा मयकदे में ,
धर्म जाति या किस देश के वासी हो ,
सुराही ने पैमाने को भरते नहीं सोचा ,
मैं सोने की पीतल की जाम है कांच का।
किसी पीने वाले ने समझी नहीं प्यास ,
कितनी है साकी के मन की सुराही की ,
भीतर कितनी रही है अधूरी हमेशा ही ,
जाम भी नहीं बुझा सके अपनी प्यास। 
नदी से नहीं पूछा सागर ने नाम पता ,
मैली है या साफ़ है नहीं डाली नज़र ,
बाहें फैला कर सब नदियों को अपनाया ,
लेकिन सागर का खारापन कहां मिट पाया। 
मेरा नाम मुहब्बत है ईमान है इश्क़ ,
हर आशिक़ मेरे पास चाहत ही लाया ,
कब कौन किस मोड़ तक साथ रहा है ,
जब रात अंधेरी थी नहीं पास रहा साया। 
मैं फूल हूं खुशबू ही लुटाता मैं रहा हूं ,
हर हुस्न को हर दिन सजाता मई रहा हूं ,
मैं बारिश नहीं बस ओस की बूंद हूं मैं ,
सर्दियों को तुम धूप बुलाता मैं रहा हूं। 
परिंदा बैठा कभी मंदिर मस्जिद कभी ,
इंसानों को रास्ता भी दिखाया है मैंने ,
मुझको पिंजरे में कैद नहीं करना तुम ,
आज़ादी का परचम लहराना है मैंने।

अब पछताए क्या होत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      अब पछताए क्या होत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

अब कुछ नहीं हो सकता , काश बचपन में खाकी निक्कर पहन ली होती तो हम भी सत्ता की गली के निवासी होते। कोई विधायक बना कोई सांसद कोई बड़े आधिकारिक पद पर आसीन हुआ। कितने राज्य के मुख्यमंत्री बन गए और अब देश के राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति भी। बस इतना बहुत है। आप इसको परिवारवाद नहीं बताना बेशक उनका यही परिवार है। इसको सिफारिश भी नहीं समझना क्योंकि ये उनकी मर्ज़ी की बात है। कौन याद करता है संविधानिक मर्यादा की बात। जनता की गलती है इतना बहुमत देना जो दिल्ली की सत्ता हो या राजधानी की देश की सत्ता बिन बौराय नहीं रहता कोई। सोने में धतूरे से सौ गुनी मादकता होती है तो सत्ता की मादकता का खुमार उतरता तभी जब वापस असली ठिकाने लगाए जाते हैं। बहुत को देखा है आकाश से धरती नहीं पाताल तक नीचे आते। मगर कोई इनसे सवाल क्या करेगा जब , मीडिया वाले :-

                 बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते

                  सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। 

किस्मत की बात है जो घर से भागे थे बचने को उनको फंसाया है उसी जाल में। चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। ये युग ही योगी के भोगी बन जाने का है। चोर उच्चके भी अब शाखा में जाने लगे हैं , अंधे भी सब को रास्ता दिखलाने लगे हैं। लो गूंगे मधुर स्वर में गाने लगे हैं। और हम आप नाहक शर्माने लगे हैं। चिड़िया खेत चुग गई हम पछताने लगे हैं।

Friday, 7 July 2017

मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       जो दवा के नाम पे ज़हर दे , उसी चारागर की तलाश है।

कल मुझसे सवाल किया किसी ने मैं क्यों बर्बाद करता रहता अपना इतना वक़्त ये बेकार की बातें लिखने पर। मैंने कहा ये मेरा काम है मुझे ख़ुशी मिलती ऐसा कर के बल्कि मैं लाख चाहूं बिना लिखे नहीं जी सकता। टीवी पर खबर आ रही थी सोशल मीडिया के नशे की , लत पड़ गई है लोगों को व्हाट्सएप्प आदि की। मुझे भी उस में शामिल समझते लोग जो सच नहीं है। चालीस साल पहले इक काम शुरू किया था देश समाज की वास्तविकता को उजागर करने का काम करना। वही करता चला आ रहा हूं , माध्यम बदलते रहे हैं। कभी किसी विभाग को खत लिखता था , फिर अख़बार में पाठकों के कालम में चिट्ठियां रोज़ लिखने लगा। कई पाठक लिखते थे अपना नाम छपा पढ़ने को , मैं लिखता था हर दिन इक लड़ाई लड़ने को। रिश्वतखोरी हो या कारोबारी लूट अथवा भगवान के नाम पर ठगी सब लिखा और घर फूंक तमाशा देखा। न जाने कैसे अख़बारों में हिंदी की मैगज़ीनों में व्यंग्य कविता ग़ज़ल कहानी आलेख छपने लगे और सब मुझे लेखक समझने लगे। लोग तो ज़रा छपने पर किताब छपवा साहित्यकार होने का तमगा लगवा लेते हैं , मुझे कभी भी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं लगा न ही मुझे समझ आया दो तीन सौ किताबें छपवा खुद ही बांटते रहना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ना ज़रूरी ही नहीं लगता। आज सुबह जागते ही कल मुझसे किये सवाल का जवाब मुझे समझ आया और मैं सैर पर जाना छोड़ लिखने बैठ गया। सब को लगता है काम करने का मतलब है आप की कमाई किस से है , अब जब मुझे लिखने से मिलता नहीं कुछ भी आर्थिक लाभ तो इतना समय देना लिखने को अपना समय बर्बाद करना ही तो है। मुझे लगा कि लोग कितना समय भगवान की पूजा पाठ में खर्च करते हैं , कभी मंदिर जाते हैं कभी उपदेश सुनने को जाते हैं , हज़ारों रूपये खर्च कर हरिद्वार मथुरा काशी मक्का मदीना हरिमंदिर साहब दर्शन को जाते हैं। देवी देवताओं की शरण जाते हैं , अपने अपने गुरु की अर्चना करते हैं। क्यों करते हैं वो ये सब काम जब जानते हैं भगवान मिलते नहीं हैं किसी को। मुझे अभी भी याद है मेरी मां जो भजन गाती थी , तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। बस परस्तिश करने से इबादत करने से आरती करने से जो मिलता है सबको वही सुकून मिलता है मुझे लिखने से। और मैंने कभी नहीं समझना चाहा मेरा लेखन कितना अच्छा है या नहीं है , आप कभी सोचते हैं आपकी इबादत कैसी है। क्या जो लाखों करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते उनकी आस्था बड़ी और जो चंद पैसे डालते दानपेटी में उनकी छोटी है। अब जो भी है और जैसी भी है मेरी इबादत ठीक है , मैं भगवान की पूजा करना उतना ज़रूरी नहीं मानता जितना सच लिखना क्योंकि मुझे हर धर्म में यही लिखा मिला है सत्य ही ईश्वर है। भगवान क्षमा करें मैंने उनकी तुलना लेखन से की है , पर क्या करूं मेरा सच यही है। मैं उन की तरह नहीं जो जिन नेताओं अधिकारीयों को रिश्वतखोर और कामचोर बताते उन्हीं के सामने हाथ जोड़े खड़े मिलते हैं। 

                     आयुर्वेद और स्वास्थ्य की बात             

            कल रात ही इक विडिओ देखा जो बहुत आचम्भित करने वाला है , कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा को लेकर। तथ्य ये है कि विश्व में कुल जितनी दवा बिकती और लोग खाते हैं उसका बड़ा हिस्सा चालीस प्रतिशत केवल भारत के लोग खा रहे हैं और उस दवा की ज़रूरत है भी कि नहीं बिना जाने ही डॉक्टर लिखते हैं दिल के रोग कम होने की उम्मीद में जबकि कोई पक्के तौर पर नहीं साबित कर सका ये कितना सच है। मुझे 1990  में आज से करीब 27 साल पहले दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के डॉ मल्होत्रा जी ने जांच करवा बताया था तब मेरी आयु चालीस साल थी कि आपका कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ा हुआ है , ट्रिग्लिसराइड चार सौ आये थे। चाहते तो वो तभी लिख देते दवा मुझे खाने की , मगर उन्होंने कोई गोली तक नहीं लिखी थी। मेरा खान पान पूछा था दिनचर्या समझी थी और साफ बोला था इस तरह तो आप साल भर भी शायद स्वस्थ्य नहीं रह पाओगे। मुझे छह महीने तक उबली सब्ज़ियां खानी पड़ी और रोज़ सुबह तीस से चालीस मिंट की दौड़ कॉलेज के मैदान में लगाई थी और मैं ठीक हो गया था और उसके बीस साल तक बिना किसी दवाई खाये तंदरुस्त रहा हूं। अगर यही अपना कोलेस्ट्रॉल मैंने दवा खाकर घटाया होता तो मुमकिन ही नहीं बल्कि संभावना यही है कि मुझे उस दवा से और कई रोग मिलते और मैं शायद ज़िंदा होता ही नहीं अथवा होता तो तमाम रोगों को लेकर जी रहा होता। तब योग की कोई बात नहीं होती थी और आजकल लोग योग को ही स्वस्थ होने का आधार कार्ड मानते हैं सरकारी कार्ड की ही तरह। मगर मैंने केवल सैर की है कभी योग नहीं अपनाया और मुझे विचार आता है क्या किसी ने इस को लेकर रिसर्च की है कि योग करने वालों और नहीं करने वालों में कितना फर्क हुआ है। मुझे सामने दिखता तो नहीं योग के बढ़ते होने से रोगी कम हुए हों। आज तो हालत और खराब है डॉक्टर्स बिना ज़रूरत बहुत दवाएं लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर या फिर निदान नहीं करने की आदत से एक की जगह चार दवाएं लिखना। मगर बीस साल पहले ही डब्ल्यू एच ओ विश्व स्वास्थ्य संघठन ने भारत सरकार को चेतावनी दी थी आगाह किया था कि आपके देश की आबादी को जितनी दवाएं उपयोग करनी चाहियें उस से पचीस गुना अधिक उपयोग की जा रही हैं जो खतरनाक हैं। मगर अपनी सरकारों की चिंता लोग नहीं दवा कंपनियां रहती हैं और जनता का स्वास्थ्य तमाम लोगों की कमाई का साधन है। पिछले सप्ताह डॉक्टर्स दिवस पर इक पिक्चर मैसेज मिला डॉक्टर को भगवान बताने वाला , मैंने उन डॉक्टर को जवाब लिखा मुझे बताओ तो सही वो भगवान है कहां। अब उसको जो भी लगा हो मेरा सच यही है। और कोई हैरान हो सकता है मेरी पहली व्यंग्य रचना इसी विषय पर थी। उत्पति डॉक्टर की। इक सवाल था भगवान ने ये प्रजाति बनाई क्यों होगी , आज तो ये और भी सार्थक है।

जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नाम बदल दिया तौर तरीके वही हैं। हरियाणा की सरकार ने इक नया तमाशा शुरू किया है , राहगिरी नाम से। आज सुबह देखा सामने अपने घर के। जनता से सम्पर्क क्या इसी तरह होगा , बड़े अधिकारी उसी शासकीय अंदाज़ से आये जब उनकी ही पसंद वाले शासन से जुड़े लोग उस जगह उनका अभिनंदन को तैयार बैठे नहीं खड़े थे। किसी भी तरह कोई नहीं समझ सकता कि समानता की कोई झलक भी है। कुछ ख़ास लोग कुछ बेहद ख़ास लोग और कुछ ख़ास से भी खास ऊंचे ओहदे वाले लोग। और उसी सत्ताधारी अंदाज़ से हर नियम कायदे की अनदेखी कर जब जो जैसे करते हुए। बीच सड़क मंच लगाकर , स्कूल के बच्चों को सर्वोच्च न्यायालय की बात को दरकिनार कर उपयोग करते हुए। सरकारी तंत्र से बुलाये हुए लोग कलाकार योग और जाने क्या क्या दिखाते लोग। गीत संगीत और शोर शराबा सब किसी भी सरकारी आयोजन की तरह कुछ पल की झूठी चमक दमक। कहीं भी आम निवासियों से वास्तविक मेल मिलाप की बात नहीं , किसी को अपनी समस्या बताने की अनुमति नहीं।  बस भाषण सुनना है इक फासला रख कर अधिकारी लोगों से , कोई खेल तमाशा ही नहीं , सब का वास्तविक उद्देश्य से दूर तक कोई मतलब लगा ही नहीं। हर दिन इसी तरह सरकारी धन किसी संस्था या विभाग द्वारा कुछ तथाकथित समाजसेवी लोगों की दुकान चलने को ही। सब से पहली बात ऐसा कदापि नहीं लगता कि आपके पास सरकार के लोग सेवक बनकर आये हैं। उसी खनक उसी ठसक के साथ जिस अंदाज़ से सचिवालय में मिलते हैं शासक बन शासित लोगों की तरह मानकर जनता को। जब तक नेता और अधिकारी अपनी मानसिकता नहीं बदलते और उनको ये नहीं समझ आता कि वो जो करते हैं उनका कर्तव्य है और अगर अपना कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते तो ये देश और जनता के खिलाफ अपराध है। इन को उपहार अथवा भीख नहीं बांटनी है जनता को उसके हक देने हैं। जो चलन चलता आया है सत्ता की लाठी वाला उसका अंत होना ज़रूरी है। जिस दिन लोग हाथ जोड़ कर नहीं अपना अधिकार अधिकार की तरह लेना सीख जायेंगे उस दिन ही व्यवस्था बदलेगी। हम राज करने वालों से उम्मीद करें खुद झुकने की तो वो केवल सपने में मुमकिन है।



Thursday, 6 July 2017

नियम कायदा क़ानून अपने पर लागू नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

नियम कायदा क़ानून अपने पर लागू नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 



इसको राहगिरी नाम दिया गया है। राहगिरी इक राह बनाना होता है , हरियाणा में फतेहाबाद में पुलिस विभाग सरकारी हॉस्पिटल को जाती मुख्य सड़क को रोक अपने आयोजन का मंच बनाते हैं। उनको किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत कब है। अदालत आदेश देती है सरकार अपने आयोजनों में बच्चों की उपयोग नहीं करे मगर कौन मानता है। वास्तव में अपने प्रचार को राहगिरी नाम देना ही सही नहीं है। कई शहरों में ये शब्द प्रदूषण कम करने को राहगिरी नाम से नियमित किया जाता किसी एक दिन सप्ताह में कोई मार्ग वाहनों के लिए नहीं केवल साईकिल सवार और पैदल चलने वालों के लिए खुला रहता है। राहगिरी राह रोकना नहीं राह बनाना होता है। मगर क्या किया जाये नेता अधिकारी जनता की राहें रोकते ही अधिक हैं , बनाते खुद अपने लिए बहुत हैं। एन जी ओ की आड़ ने अपने लोगों को रेवड़ियां बांटने की परंपरा नई नहीं है। हर दिन बेकार के आयोजन करते हैं और राज्य या देश का धन फज़ूल बर्बाद किया जाता है , हासिल इन से कुछ भी नहीं होता है। कहने को जनसम्पर्क की बात मगर जनता को पास तक नहीं फटकने देते , शासक वर्ग अपनी पसंद के चुने लोगों के साथ कार्यकर्म करते हैं। किसी आम नागरिक की बात कोई बोल नहीं सकता सवाल करना तो दूर की बात है। सार्थकता की फ़िक्र किसे है निरर्थक किये जाते हैं आयोजन कभी इस नाम कभी उस नाम से। जो करना उसकी याद किसी को नहीं जिसका कोई मतलब नहीं बस कुछ पल का तमाशा वही किये जाते हैं। सरकारें तमाशा दिखाने को नहीं होती न ही देश की जनता तमाशबीन है , तमाशाई आप हैं जो किसी दिन खुद तमाशा बनते हैं तब होश उड़ जाते हैं।

जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                        मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया की बात चलते चलते वहां पहुंच गई है जहां भारत को स्वदेशी की अवधारणा को ही तिलांजलि देनी पड़ी है। तीन साल हो गए गंगा की सफाई करते इस सरकार को भी और पिछली सरकारों की तरह ही गंगा पापियों के पाप धोते धोते और मैली हो गई है। आज राजकपूर जी होते तो उनकी फिल्म का भी रीमेक आ जाता और बाकी नायकों की तरह समाज की बात को अपनी कमाई का जरिया बना सकते थे वो भी। अब हमारी गंगा कोई विदेशी आकर बताएगा कैसे साफ़ होगी , पानी भी उसी से साफ़ करवा लिया जाएगा और देश की सुरक्षा को ड्रोन भी उसी से मिलेंगे। इन सब को छोड़ उस छोटे से देश से ईमानदारी और साहस के साथ निडर होकर किस तरह रहना भी सीख लेते तो बाकी सब खुद ब खुद हो जाता। इधर टीवी और अख़बार वाले खबरों के नाम पर मनोरंजक सामान बेच रहे या झूठे इश्तिहार से कमाई कर के सच के पैरोकार कहला रहे अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर। इनकी खबर में राजनेता अभिनेता खिलाड़ी और शेयर बाज़ारी या अन्य कारोबारी ही नज़र आते हैं। बाकी तीन चौथाई जनता की कोई खबर नहीं है , बस उनकी ख़ुदकुशी खबर है पांच सेकंड की इक दिन। अब महिलाओं से अनाचार की खबर जैसे केवल दोहराई जाती जगह का नाम बदल कर। देश बदल रहा है मोबाइल की कॉलर ट्यून भर बनकर रह गया है , दिखावे की देशभक्ति की तरह।
                                    इधर सत्ताधारी दल को लगता है देश में सरकार संविधान में बताये लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव से नहीं फेसबुक व्हाट्सएप्प पर बहस और शोर से बनेगी। कोई अगले चुनाव में फिर अपने दल को जिताने की कोई और आगे बढ़कर बीस साल किसी नेता की सरकार बनाने की आस लगाए है। सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं। कल क्या होगा किसे मालूम , अभी तलक देश की जनता बहुत अचंभित करती आई है ऐसे आसमानी लोग धरती पर पटकती रही है। ये जो पब्लिक है ये सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब कुछ पहचानती है। आपको इस नए दौर की सुशासन की कुछ वास्तविक घटनाएं बताना ज़रूरी है। शहर की स्वच्छता और आवारा पशु रहित करने का इनाम मिलता है अधिकारी को , मगर जिस जगह राज्य अधिकारी बड़े बड़े भाषण देते वहीं गंदगी उनको दिखती नहीं। किस को छल रहे हो जनता को या खुद अपने आप को। पिछली सरकारें खुला दरबार लगाती थीं आपने नई खिड़की खोल दी अपने नाम से सी एम विंडो मगर हुआ क्या वही ढाक के तीन पात। एक शिकायत वह भी खुद सरकारी प्लॉट्स पर कब्ज़े की नियम कानून को ताक पर रखने और रिश्वतखोरी की , एक महीने में हल किये जाने की बात कहने वाले पहले लिख देते कोई करवाई ज़रूरी नहीं , फिर दोबारा खुल जाती और एक साल छह महीने तक इधर से उधर भेजी जाती जबकि सी एम विंडो को पहले मालूम किस विभाग की बात है। कोई बड़ा अधिकारी साल तक कुछ नहीं करता मगर अचानक सी एम का दौरा होने पर फिर कागज़ी करवाई कर निपटान कर दी जाती है। अभी इतना काफी नहीं है सात महीने बाद बताया जाता है जांच करने पर शिकायत फिर खोल दी गई है। किसी सरकार को खुद अपना उपहास इस तरह करते कभी नहीं देखा था जो इनका देख लिया। 
                   शायद बहुत लोगों को इतना भी मालूम नहीं कि किसी दल की सरकार होना उनके हर नेता को अधिकार नहीं देता सरकारी काम काज में दखल देने को वो भी अपना रोब जमाने को। दल के नेता को खुद की परेशानी होने पर कोई कानूनी अधिकार किसी विभाग पर छापा डालने का है या नहीं , मगर टीवी अख़बार खबर देते हैं नौ बजे दल के नेता ने छापा मारा और कुछ अधिकारी नहीं उपस्थित थे। उनको इतना भी मालूम नहीं बेशक तब वो घर पर रहे हों मगर उनको विभाग के काम पर बाहर भी होना ज़रूरी होता है। और ऐसे में उन पर धौंस जमाना कि हमारा फोन नहीं लिया कितना उचित है जबकि यही सब आम जनता से अधिकारी हर दिन करते रहते हैं। और इस के बाद क्या हुआ वो भी जान लें , विभाग के अधिकारी सत्ताधारी दल के आवास पर छापा डालते हैं और बिजली की चोरी होती पाते हैं तो नेता जी मार पीट और गुंडागर्दी करते हैं ताकि अपने दल की सरकार की सुशासन की परिभाषा समझाई जा सके। जब विभाग के कर्मचारी चेतावनी देते हैं तब उन नेता जी पर मुकदमा दर्ज किया जाता है। मगर दल के लोग अभी भी कहते हैं कि नेता जी की अनुपस्थिति में बिजली काटनी गलत है। अब नेता जी की माता जी जाकर बेटे की गलती की माफ़ी मांगती हैं अधिकारी से मारपीट करने पर। और शायद सदा की तरह मामला पंचायती ढंग से निपटा दिया जाये। नियम कायदा अपराध हर बात आम सहमति से समझौता करवा खत्म। इसको कानून का नहीं कोई और शासन कहते हैं। दिल्ली को जाने कैसा रोग लगा है एक दिल्ली का शासक खुद को दूध का धुला मानता है और जब मर्ज़ी अपने ढंग से जनमत को अपने पक्ष में साबित कर अपने कर्मों को उचित ठहराता है तो दूसरा खुद को समझता है कि बस वही देश की नैया पार लगा सकता है और घोषित करता रहता है उसी का शासन चलने वाला है। ऐसे में क्या बीस साल को चुनाव आयोग को छुट्टी दे दी जाये और टीवी बहस और सोशल मीडिया पर तय हो जाये जनता का अभिमत क्या है। अभी भी आपको लगता है देश और समाज सही दिशा के जा रहे हैं।
       

Tuesday, 4 July 2017

इश्क़ करना सीख लिया ( उल्टा पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया

   इश्क़ करना सीख लिया ( उल्टा पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया 

शायरी भरी पड़ी है इश्क़ की बातों से , बहुत नाम हैं दुनियावी इश्क़ वाले भी रूहानी इश्क़ वाले भी। मीरा को न जाने कितनों ने क्या समझा होगा , राधा नसीब वाली है जो उसके मंदिर बने हैं। किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगर राधा नहीं होती राधा तो कृष्ण कनहिया भी नहीं होते। किसी शायर की ग़ज़ल है बंदे को खुदा करता है इश्क़। इश्क़ करने वाले खुदा नहीं होते वो किसी से करते हैं इश्क़ और उसको खुदा बना देते हैं। हर कोई इश्क़ करना चाहता है आज भी मगर जनता नहीं इश्क़ होता क्या है। आज का ये सबक उन्हीं सब की खातिर पढ़ाया जा रहा है जिनको इश्क़ का फ़तूर है। लोग कितने अजीब हैं इश्क़ भी करते हैं और छुपाते भी हैं , आजकल के राजनेता ही देख लो सत्ता देवी के आशिक़ हैं सब के सब। जब भी जिसको मिलती है उसकी सुध बुध खो जाती है , सामने है देख लो ध्यान से। आप भी खुद बनना चाहते वही और जो मजनू बना हुआ उस को पत्थर भी मारते हैं। यही सब से उलटी बात है , अपना अपना इश्क़ इबादत लगता है और कोई और हो आशिक़ तो अदावत करते हैं। आप यही सोच रहे ये कैसा लिखने वाला है इधर उधर की बात करता है सीधी बात करता नहीं खुद अपने इश्क़ की। शीर्षक दे कर भूल ही गया। भटक गया है विषय से , नहीं। घूम फिर का आना उसी पर है , हर कोई यही करता है बात किसी की हो अपने पर ले आते हैं। चलो कौन है जिस से मुझे इश्क़ है अभी बता देता हूं , चालीस साल से उसी की आशिक़ी की है। अपना घर फूंक तमाशा देखता रहता हूं। मेरा इश्क़ मेरा जुनून यही तो है इक पागलपन है लिखते रहना देश समाज की बात , आईना दिखलाना सब को। मैं क्या कर सकता हूं अगर आईने में हर किसी को अपनी असली सूरत दिखाई देती है जो सब को अपनी लगती नहीं , लोग अपने मुखौटे को अपना चेहरा समझते हैं। आईने से मेकअप छुपाए नहीं छुपता , और लोग आईना ही तोड़ देते हैं। हर दिन कितनी बार टूटा हूं फिर भी ज़िंदा हूं खुद मैं भी हैरान हूं। इक शेर है मेरी एक ग़ज़ल का जो सब को पसंद आता तो है समझ आया कि नहीं मुझे नहीं मालूम। 

                  तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,

                     मेरी अर्थी को उठाने वाले।

किसी को अपनी शायरी से इश्क़ होता है , किसी को कविता कहानी से , कोई संगीत से इश्क़ करता है , कोई अभिनय से। आशिकी वही है महबूब अपने अपने हैं , मेरी आशिक़ी बस कलम चलाना है , अपनी कलम से इश्क़ है भले कलम जो भी लिखे , ग़ज़ल कविता कहानी व्यंग्य या फिर आज की तरह बेसिर पैर की बात। अभी भी आपको लगता असली बात नहीं बताई , कोई तो आई होगी जीवन में जिस से हुआ होगा मुझे भी इश्क़। लोग मानते हैं कि शायरी करता है तो कोई तो ज़रूर होगी जिस का दर्द छलकता है ग़ज़ल के अशआरों में। है कोई सपनों की रानी जिस से हुई है मुहब्बत , ढूंढता फिरता हूं कभी कहीं तो मिलेगी जो मुझ जैसे सरफिरे से इश्क़ करने को राज़ी होगी। जिस को न सोने के गहने चाहिए होंगे न चांदी की पायल , न कोई कीमती उपहार न कोई फूल गुलाबी। मेरा दामन तो भरा हुआ है कांटों ही से। मेरे गले लगेगी तो खुद अपने जिस्म को घायल ही कर लेगी , इसलिए जब कोई लगती भी है ऐसी जो मुझसे इश्क़ कर सकती है तब मैं उस से फासला रखता हूं। ये ज़रूरी भी है क्योंकि जो दूर से लुभाते हैं उनको पास से देखते हैं तो लगता है सपना बिखर गया है। ऐसा बहुत बार हुआ है कोई कहीं दूर से मुझे अख़बार या मैगज़ीन में पढ़कर मिलने आया और मिलते ही लगा उसे मैं कोई और ही लगा। जो अक्स बनाकर मिलने आते हैं किसी ख़ास व्यक्ति वाला जिस से मिलने की चाहत थी वह आम सा लगता है तो मुमकिन हैं पछताते हैं। क्योंकि मिल कर जाने के बाद वो खत फिर नहीं मिलते मुझे। तभी चाहता हूं अपने चाहने वालों से आमने सामने नहीं मुलाकात हो। क्योंकि मुझे आता नहीं है वही दिखाना बनकर जो आपका चाहने वाला चाहता है। जिस दिन अपनी असलियत को छुपाने लग गया वो मेरा आखिरी दिन होगा , मर जाना और क्या होता है। अमर भी नहीं होने की चाहत , किसी शायर की तरह जो कहता है। " बाद ए फ़नाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या "।  ये भी लोगों की अजीब चाहत है मर कर भी मरना नहीं चाहते , सोचते हैं कोई निशानी छोड़ जाएं ताकि लोग भूल नहीं जाएं। जीने की उतनी फ़िक्र नहीं जितनी मर जाने की चिंता। भाई हमने तो पच्चीस साल पहले लिख दी थी अपनी वसीयत , तैयार हैं मौत आये तो सही। मैंने इक शेर भी कहा है कुछ इस तरह। " मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया "।
            अश्क़ की दास्तां अधूरी है , किसी आशिक़ की कहानी अंजाम तक कभी पहुंची है। बाकी बहुत बातें हैं अभी याद तो करने दो 66 साल में कौन कौन आया जीवन में। अभी तो मेरी इक ग़ज़ल जो मेरी वसीयत भी है उसका लुत्फ़ उठायें और मुझे चाहे भूल जाना मेरी वसीयत को याद रखना। 

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये , 

बाअदब अपनों परायों को बुलाया जाये। 

इस ख़ुशी में ,कि मुझे मर के मिली ,ग़म से निजात ,

जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये। 

मुझ में ऐसा न था कुछ , कोई मुझे याद करे ,

मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये। 

दर्दो-ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह , तनहाई ,

ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये। 

जो भी चाहे वही ले ले ये विरासत मेरी ,

इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।         


Monday, 3 July 2017

हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

          हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

मैं अपनी ये रचना फेसबुक और व्हाट्सएप्प के नाम करता हूं। जब तक मैं इन दोनों को नहीं समझा था बेचैन रहता था। सोचता था लोग दोस्त बनते हैं बस नाम को ही , इक संख्या हैं हम सभी , भारत सरकार के किसी विभाग के झूठे आंकड़ों की तरह। सैकड़ों नहीं हज़ारों दोस्त फिर भी बातें दोस्ती की कम दुश्मनी की अधिक लगती , या कभी लगता इक लेन देन है। बाजार में आप जेब खाली कर पसंद का कुछ खरीदते हो , फेसबुक पर जेब भी भरी रहती और जो आपको पसंद वो भी मिल जाता। आपको लाइक्स के बदले लाइक्स ही करनी है और कमैंट्स में वाह क्या खूब लिखना है , बस थोड़ा झूठ बोलकर किसी को ख़ुशी देना इस में गलत क्या है। आप किसी को गलती से भी सलाह मत देना कि आपकी कविता में कोई कमी है , हर कविता नाम की लड़की नाराज़ हो जाएगी , खुशबू रानी को भी बुरा लगेगा , और ग़ज़ल तो रूठ ही जाएगी। मुझे ये सब इक साथी हास्य कवि से समझ आया है। उसकी बात आखिर में , पहले अपनी भड़ास निकालनी है। काफी चिंतन करने के बाद मैंने इक फेसबुक और बना डाली व्यंग्य साहित्य नाम से ये सोचकर कि अब इस पर कौन क्या है बिना सोचे दोस्त बना लेना और फिर ये चिंता नहीं करनी उसकी पोस्ट पर क्या लिखा है या मेरी पोस्ट कोई पढ़ता भी है कि नहीं। सब ज्ञानी लोग ज्ञान बांट रहे हैं अपना ज्ञान खुद पास नहीं रखते औरों को देते हैं अव्यवहारिक ज्ञान। मुझे अपनी मूर्खता को ज्ञान नहीं समझना ये हमेशा से सोचा हुआ है , मुझे समझदारी और अक्लमंदी से फासला रखना पसंद है। समझदार लोग जो करते हैं सब जानते हैं , औरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना। आप ये मत पूछना उल्टा और सीधा उल्लू होता क्या है , मैं उल्लू नहीं न किसी को बनाता ही हूं। अब वापस असली बात पर उस हास्य कवि की कविता से बात करते हैं।

    देख कर सब कवि हैरान थे , सब से बढ़कर छा गया था , इक प्रेम की कविता सुनाकर , जो कवि उसको मिली थी सभी , महिला श्रोताओं की तालियां , जैसे सभा में बैठी उसकी सालियां।  मगर बताया था बाद में राज़ , फैला दी थी उसने सभा में बात , जिसको चाहता है उसी पर लिखी , आज आया है खुद उसे सुनाने को , और जाने किस किस को लगा था , ज़रूर मुझी से हुई है मुहब्बत , सब , समझ रही थी है वही उसकी चाहत। इक कवि भाई ने अकेले में पूछा , दिखला दो मिलवा दो भाई हमें भी , देखी अभी तक कोई कविता सी नहीं , हंसकर बोला कोई हो तो मिलवाऊं , ख्वाब की मेहबूबा को हकीकत बनाऊं , मुझे तो सब की सब लगती हैं आफत , मेरी रचना ही है केवल मेरी मुहब्बत।

         बस मुझे इक गुरुमंत्र मिल गया था , मुझे दूसरों की नकल करना पसंद नहीं है इसलिए मैंने अपना वास्तविक तरीका अपनाया। मैंने भी अपना इक फेसबुक और इक व्हाट्सएप्प का ग्रुप बनाया जिसका एडमिन खुद को बनाया , अपनी मर्ज़ी से धूप की अपनी मर्ज़ी से छाया। मगर अपनी सच बोलने की बुरी आदत फिर भी नहीं छोड़ पाया। मैंने संबंध बनाने का अलग अपना नुस्खा अपनाया , खुले में लिखकर नहीं किसी को गलत को गलत बताया।  उस लिखने वाले को या लिखने वाली को इनबॉक्स समझाया , इस तरह बहुत को अपना चाहने वाला बनाया। लोग ग्रुप में महिला दोस्तों की बेकार कविताओं को पसंद कर रहे थे , इधर हम दो कदम और आगे बढ़ रहे थे। उनकी रचनाओं को सही करने का काम कर रहे थे , वो समझती थी हम उन पर मर रहे थे। सर जी सर जी सुनकर मज़ा आ रहा था , कोई अनपढ़ गुरु बन गया था , दसवीं फेल टीचर नहीं बन पाया अब योग सिखला रहा था। मैं देख कर चुपके चुपके मुस्कुरा रहा था। मुझे इक पुराने दोस्त की बात जो कभी नहीं समझ आई थी समझ आई थी , जब उस से अपनी कुट्टी है बिना बात हुई लड़ाई थी। आज होने लगी बात तो वो भी बताता हूं , इक सच्ची बात पर आज तलक पछताता हूं। दोस्त अखबारी छपास का मारा है उसको लगता अपना छपा नाम सब से न्यारा प्यारा था। इक दिन उसने अख़बार में समाचार लिख भेजा , किसी को नहीं खबर थी किस किस को किस ने देखा। जो लोग उस दिन शहर में नहीं थे खबर में उस कवि गोष्ठी में उपस्थित थे। मैंने किया फोन और बोला मेरे भाई , जो नहीं आया उसकी भी बधाई , इतना सितम नहीं करो मेरे यार। बुरा मान गया था , वो समझाता था भगवान को भी तूती पसंद है , हम तो आदमी हैं तारीफ के भूखे हैं। बस मुझे इसीलिए भगवान को मनाना आया नहीं , झूठी बातों का भोग मैंने लगाया नहीं। अब काम की बातें लिखना छोड़ बेकार की अनाप शनाप लिखता हूं और अपनी लिखी पोस्ट को जब भी खुद पढ़ता हूं खुद ही लाइक भी और कमेंट भी करता हूं। बस मुझे सोशल मीडिया की समझ आई है , खुद अपनी पीठ सब से थपथपाई है। टीवी हो अख़बार हो या फिर अपनी सरकार हो , सब खुद अपनी आरती गए रहे हैं , कोई  नहीं सुने फिर भी दोहरा रहे हैं। जो कहते थे न खाएंगे न खाने ही देंगे आजकल मौज मना रहे हैं।

Sunday, 2 July 2017

आज़ादी अपनी नहीं सभी की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       आज़ादी अपनी नहीं सभी की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

आपको भी शायद बहुत मज़ा आता होगा , यू ट्यूब पर फेसबुक पर सोशल मीडिया में अजीब अजीब हरकतें करते बच्चे जानवर पशु पक्षी न जाने क्या क्या। कभी सोचा इस की कीमत क्या है , इक महिला अपनी एक साल की बच्ची को कीर्तन करना सीखा रही है। बच्ची को करना होता जैसा मां आदेश देती , उसको भूख लगी है या चॉकलेट का लालच दिया जाता है। इक और साहब ऐसा अपने तोते से कराते हैं , उसको खाने को तभी मिलेगा जब तोता मालिक की कही बात दोहराएगा। किसी की बेबसी मज़बूरी का फायदा उठाना या किसी को लालच देकर अपनी बात मनवाना बताता है कि आप आज़ादी पसंद नहीं हैं। जानवर से प्यार का ढोंग करते हैं और अपनी अंदर की शासक होने की ललक को पूरा करते हैं। बहुत हैरानी की बात है हम सत्तर साल से दावा करते हैं कि आज़ाद हो चुके मगर आज़ादी के अर्थ तक को नहीं समझते। पिता सोचता है बेटा जैसे मैं कहता उसी तरह जिए क्योंकि मैंने उसको जन्म ही नहीं दिया पाला पोसा ही नहीं बल्कि उसको काम करने को पैसे मुझ से लेने हैं तो मेरी शर्त माननी ही चाहिए। कोई पति सोचता पत्नी को घर चलाने को कमाई देता हूं तो उसको मेरी हर बात माननी ही होगी। पत्नी भी अपने ढंग से सोचती है कि जब मुझ से विवाह किया है तो पति को हर कदम मेरी पसंद से चलना होगा। जब जिस का बस चलता तब वही दूसरे को अपने अधीन रखना चाहता है। आप हम बेशक कितने आधुनिक और पढ़ लिख कर सभ्य हो जाने की बात समझते हों , शायद ही कभी सोचते हैं वास्तविक आज़ादी किसे कहते हैं। आप अपनी आज़ादी चाहते हैं मगर दूसरों की आज़ादी की कदर नहीं करते हैं। अमीर गरीब की आज़ादी को खरीदता भी है तो सोचता है उचित कर रहा हूं। 
       आज फेसबुक पर इक पेज देखा बीस साल और मोदी। तमाम लोगों ने पसंद किया हुआ बिना समझे कि आप क्या कर रहे हैं। आप केवल किसी व्यक्ति की चाटुकारिता ही नहीं कर रहे अपितु देश के संविधान और डेमोक्रेसी को भी ताक पर रखने की बात कर रहे हैं। और ऐसा कर भी क्या देख कर रहे हैं , आपको मालूम भी है देश की अधिकतर आबादी की हालत कितनी बुरी है मगर इस आपके तथाकथित महान आदमी की किसी योजना में आम गरीब को कोई अधिकार शिक्षा का स्वास्थ्य का जीवन की बुनियादी सुविधाओं का कोई ज़िक्र तक नहीं है। हर पुरानी सरकार की तरह उनको खैरात के टुकड़ों पर रहना है की योजना है। आप के सामने आएगा इस तरह देश की हालत नहीं सुधरने वाली। अभी विदेश जाने से पहले बहुत दवाओं को उस सूचि से बाहर किया गया जिस में दवा कंपनी बिना सरकारी अनुमति मोल नहीं बढ़ा सकती। यही सरकार जब अपनी पीठ थपथपानी हो तब आपको बताती है हमने निर्धारित किये हैं दवाओं के दाम। मगर जब दवा कंपनी वालों से मिलना होता तो उनकी बात पहले ही पूरी कर दी जाती है। अगर तब भी आपको इस में कोई घोटाला नहीं समझ आता तो आप बापू के बंदर हैं जो आंख मुंह कान बंद रखे हुए हैं। 
               आज तक किसी ने सवाल नहीं किया मगर अब करना कोई , सूचना के अधिकार का उपयोग कर पता लगाना आपका प्रधानमंत्री हर दिन कितना धन खुद पर खर्च करता जनता ही का। क्या पिछली सरकारों से बहुत अधिक और तब हिसाब लगाना करोड़ों रूपये से राजसी शान से रहकर आम जनता की भलाई को वास्तविक मिला क्या है। अगर आपको नहीं पता अभी तक तो इक बार फिर दोहराता हूं , इस देश का सब से बड़ा घोटाला और कुछ नहीं सरकारी विज्ञापन हैं जिन पर जितना धन सत्तर साल में अपने महिमामंडन पर बर्बाद किया गया उसी से देश को खुशहाल बनाया जा सकता था। जनता के धन की लूट में कौन कौन शामिल है कभी विचार किया। आपको टीवी चैनल वाले बताएंगे बड़ी तेज़ दौड़ रहे हैं , लेकिन उनसे कोई कहे आप को सरकारी विज्ञापन या और तमाम ऐसे लोगों के झूठे विज्ञापन जिन से जनता को गुमराह किया जाता धोखा दिया जाता है की असलियत कभी क्यों नहीं खोलते। बैसाखियों पर चलने वाले अपाहिज लोग हैं , और ये भी कहां ईमानदार हैं। खबर किसे कहते हैं , पत्रकारिता क्या होती है , नहीं जानते। खुद को सब से ऊपर मानते हैं। इक शब्द लोग भूल गए हैं पीत पत्रकारिता। आज का मीडिया टीवी अख़बार सब पीलिया रोग से पीड़ित हैं। सच बोलते नहीं हैं झूठ को सच साबित कर बेचते हैं। और विचारों को अभिव्यक्त करने की आज़ादी इनको केवल अपने लिए ज़रूरी लगती है , बाकी कोई बोले तो हंगामा खड़ा हो जाता है।

Saturday, 1 July 2017

कलमकार की चाहत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       कलमकार की चाहत (  कविता ) डॉ लोक सेतिया  

आपको किसी कवि से शायर से ,
किसी कथाकार से ग़ज़लकार से ,
हो गई है अगर मुहब्बत सच्ची ,
दर्द उसके अपने समझना ख़ुशी। 
शायद नहीं देगा वो महंगा उपहार ,
बस इक फूल देकर करेगा इज़हार ,
पर महक रहेगी उस फूल की सदा ,
आपको दिल की जगह लेगा बसा। 
उसकी कहानी शुरू तुमसे होगी ,
ग़ज़ल तुम्हीं पर कविता तुम होगी ,
हर लफ्ज़ में तुम्हारा नाम होगा ,
आशिक़ तेरा है क्यों बदनाम होगा। 
ज़माना कभी नहीं जान पाएगा राज़ ,
लिखी उसने ज़माने की बता के बात ,
नहीं आपको मौत भी खत्म कर सकती ,
हर रचना में ज़िंदा रहेगी दोनों हस्ती। 
कभी मगर नहीं इक बात करना आप ,
उसकी रचनाओं को सौतन न समझना ,
बड़ी खूबसूरत जगह है प्यार वाली ,
रहती वहीं आप ख़ुशी खशी ही रहना।