Monday, 27 March 2017

कबूलनामा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तमाम उम्र जीने का इक गुनाह किया है ,
हर रोज़ खुद अपने हाथ से ज़हर पिया है ,
मैं दुनिया में हर किसी का गुनाहगार हूं ,
न जाने कितना सभी से कर्ज़ लिया है।
हर रोज़ अपनी नाकामी का गवाह रहा हूं  ,
चाहा जो आज तलक कर नहीं सका हूं ,
इक अपराधबोध है मेरा जीवन तमाम ,
जाने ये कैसी आग में दिन रात जला हूं।
कुछ भी मैं मांगता तुझसे और मेरे खुदा ,
बस चाहता हूं खत्म कर दो जीने की सज़ा ,
शायद जी के नहीं मर कर ही दे सकूं कुछ ,
चुका सकूं कुछ तो कर्ज़ है यही इक इल्तिज़ा।
आंसू मेरे भी शायद नहीं काम कर सके कोई ,
फरियाद किस तरह करूं जो सुन सके कोई ,
कैसे सभी से भीख क्षमा की मांगने को जाऊं ,
ये चाहता हूं मुझे कभी न माफ़ भी करे कोई।


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