Sunday, 26 February 2017

अथ् श्वान कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    हर शहर की हर इक गली में एक न एक कुत्ता रहता है। ये सारे कुत्ते खुद को गली ही नहीं समाज और देश का रखवाला बताते हैं। अपनी गली में ही नहीं बाहर भी सारे कुत्ते शेर हैं , अब इनकी आपसी लड़ाई अपनी जगह है , और इन सब के समान हित अपनी जगह। ये भौंकते ही नहीं काटते भी हैं , मगर जिस के हाथ में डंडा हो उस से डरते भी हैं। जो इनके सामने हड्डी डालता है उसके आगे दुम भी हिलाते हैं और मतलब को तलुवे भी चाटते हैं। इन्होंने अपनी एकता कायम रखने को संगठन भी बनाये हुए हैं , जिसकी सभा में एक सुर में राग अलापते हैं। फिर भी इन में कोई दूसरे का दोस्त नहीं सब खुद को बड़ा बाकी को छोटा मानते हैं। हर कुत्ता अपने को सब से सुंदर काबिल और मूल्यवान समझता और बाकी को बिकाऊ माल हैं। सच का झंडाबरदार हर कोई अपने आप को घोषित करता है , झूठ को सच के लेबल लगा बेचना जानते हैं सभी। हर दिन हर कुत्ते की मुलाकात किसी चोर के साथ तय होती है जिस में साथ साथ डिनर कर बाकी की बुराई की जाती है।  पालतू कुत्ते को खाने को अपने आप मिलता रहता है , जो किसी के पालतू नहीं उनको मालिक की तलाश होती है। ये सब खुद को ख़ास मानते हैं और हर सभा में अगली कतार में जगह आरक्षित होने को अपना अधिकार समझते हैं। नेता और प्रशासन इन से बहुत भय खाता है , इनका भौंकना बंद कराने को बोटियां भिजवाता है , हड्डियां डलवाता है।
       अभिव्यक्ति  की आज़ादी का अधिकार इन सब को भाता है , इनका भौंकना लोकतंत्र को बचाता है , ये बोलता हुआ औरों की आज़ादी को चबाता है खा जाता है। जब कोई कुत्ता नेता बन जाता है , उसमें इक और पागलपन छा जाता है। तब वो कुत्ता खुद को अल्सेशियन डॉग बतलाता है , सत्ता की दूध मलाई खाता है। इनका अंग्रेजी भाषा बोलना इन्हें हिंदी में भौंकने से ऊपर ले जाता है , सब को इन पर ज़्यादा प्यार आता है। पांच साल बाद जब चुनाव आता है , भाव इनका आसमान पे चढ़ जाता है। बंद कमरों में इनकी कीमत लगाई जाती है , रूठे को मनाने को हर सफाई दी जाती है। सरकार इन पर बड़ी मेहरबान रहती है। इनको बसाने को अलग आवासीय कॉलोनी बनाना चाहती है , पर इनकी आपसी महाभारत से घबराती है। इनका हर पल ध्यान रखती है।  

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