Monday, 30 January 2017

कलयुग के अवतारों की बात ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

                                कलयुगी अवतारों की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
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 आत्मा का मिलन प्रमात्मा से हुआ तो भगवन ने पूछा बताओ क्या क्या पाया जीवन भर में। आत्मा बोली भगवान मुझे नहीं पता क्या पाना था और कैसे पाना था , मुझे तमाम उम्र यही सवाल परेशान करता रहा कि मुझे जीवन मिला किसलिए है। सच बताती हूं मैं कभी जीवन को जी ही नहीं सकी , इसी में उलझी रही क्या इसी को जीवन कहते हैं। शिक्षक मिले धर्म-उपदेशक भी मिले और खुद भी बहुत तरह से प्रयास भी किया ज्ञान प्राप्त करने का मगर नहीं समझ पाई मैं क्यों धरती पर आई। भगवान बोले लगता तुम भूल ही गई तुझे भेजा था धरती पर क्या क्या हुआ क्या होता आया बताने को। तुमको लिखना सिखाया था ताकि जो जो देखो समझो लिखती रहो और याद रखो मुझे आकर बताओ जिन जिन को मैंने जिस जिस प्रयोजन से भेजा वो सब अपना काम ठीक से कर रहे भी अथवा नहीं। मैंने कहा भगवन आपको तो सब मालूम है सभी यही समझते हैं , आप जानते ही हैं दुनिया की हालत कितनी खराब है। लोग बिमार हैं भूखे हैं बदहाल हैं और बेबस और लाचार हैं। सब उम्मीद करते हैं कलयुग में भी आप कोई अवतार लोगे और सभी के दुःख-दर्द मिटाओगे। भगवन ने पूछा क्या तुम्हें कोई अवतार नहीं दिखाई दिया , मैंने तो बहुत भगवा धारी साधु संत सन्यासी और कितने ही जनता के सेवक भेजे हैं जनता का कल्याण करने को। अभी भी दो अवतार हैं भेजे हुए जिनको जनता की गरीबी भूख और बदहाली को , लूट खसूट को दूर करना है और लोगों को स्वस्थ रहने के उपाय समझाने हैं। भगवन ने उन दोनों के चित्र उसे दिखलाये , आत्मा पहचान भी गई मगर हैरान और दुखी भी थी। सोचने लगी भगवान को क्या बताये उसके भेजे कलयुगी अवतार क्या कर रहे हैं। मगर भगवन आत्मा की दुविधा समझ गये और बोले तुम मुझे बताओ ये क्या क्या कर रहे हैं। अब तक तो लोग सभी रोगों से मुक्त हो चुके होंगे और जनता की गरीबी भूख और बदहाली खत्म हो चुकी होगी। ऐसा होने के शोर की बात मुझे हर दिन आत्माएं आकर बताती रही हैं। तुम बताओ अच्छी तरह से कितना कुछ बदला है इन कलयुगी अवतारों ने अब तलक।
           वो आत्मा बोली जिस भगवा भेसधारी बाबा को सभी को निरोग रहने के उपाय समझाने थे , उसने तो लोगों को योग सिखाने का कारोबार कर खूब नाम और धन कमाया है मगर अभी तक रोग या रोगी तो कम हुए लगते नहीं धरती पर। अब तो उसकी इतनी शोहरत है कि उसका नाम बिकता है , हर शहर में उसके नाम से लोगों का उपचार किया जाता है , जाने किस किस को नियुक्त किया हुआ है उसने। बस उसी की बनाई दवायें बेचते हैं गली गली अप्रशिक्षित लोग नीम हकीमों की तरह। और ऐसा कर वो बाबा जी आज दुनिया के गिने चुने अमीरों में शामिल हो चुका है। आजकल तो उसका घी तेल आटा शहद फेस क्रीम सौन्दर्य प्रसाधन से हर चीज़ बिकती है।  ऐसा भी प्रचार है कि जैसे कभी राम जी का नाम लिखने से पत्थर तैर गये थे समुद्र में सेतु बनाने को ठीक उसी तरह उसकी कंपनी का नाम लेबल लगने से हर वस्तु शत प्रतिशत शुद्ध हो जाती है। दो घूंट पीने और योग करने से बताता है लोग रोगों के कुचक्र से मुक्त हो जाएंगे , फिर भी कितनी दवायें भी बेचता है। भगवन आपका ये अवतार तो आज का सफलतम व्योपारी है। दावा है शुद्ध और सस्ता बेचने का फिर भी खूब कमाई होती है , ऐसी अनहोनी पहले सुनी न देखी। लगता कोई घर फूंकने की बात कर भी ऐसी कमाई कर सकता है , कुछ तो राज़ की बात अवश्य है।
           आत्मा ने कहा जिस दूसरे अवतार की बात है उसने जनता को अच्छे दिन का वादा किया तो था , मगर कब आएंगे वो अच्छे दिन ये शायद बताना भूल गया। अभी तलक को अच्छे दिनों की परछाई भी नज़र नहीं आई , मालूम नहीं किसे अच्छे दिन कब नसीब होंगे। कहने को उसने हर दिन इक नया काम करने की घोषणा की है योजनाओं का अंबार खड़ा कर दिया मगर उनसे हुआ कुछ भी नहीं लगता। बस हर नेता की तरह कागजों पर बहुत विकास वास्तव में नहीं कुछ भी। स्वच्छता अभियान भी है इश्तिहारों में और गंदगी भी पहले की तरह ही नहीं शायद और भी अधिक , न गंगा साफ़ हुई , न मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया से घर घर शौचालय और सुंदर शहर कहीं सच में दिखते हैं। कितने लोग मर गये इक योजना में मगर न काला धन खत्म हुआ न ही नेताओं अधिकारियों की लूट ही बंद हुई है। जिनको सपने दिखलाये थे गरीबी मिटाने के वो ख़ुदकुशी तक करने को विवश हैं , सर्वोच्च अदालत भी परेशान है। राजनीति में अपराधी आज भी खुद उन्हीं की सभा में उनके साथ मंच पर बैठते हैं और उन्हीं के भाषण में महानता की उपाधि पाते हैं। शासक बनते ही अपनी सत्ता का विस्तार सभी राजनेता हमेशा ही चाहते रहे हैं , ये भी उन्हीं की राह पर हैं , अलग नहीं हैं। उनको जनता की बदहाली मात्र इक उपहास लगने लगती है शासक बनते ही। आये थे हरि-भजन को ओटन लगे कपास की तरह अच्छे दिन की बात कर आये थे और ला रहे और भी खराब दिन। व्यवस्था जैसी थी वैसी चल रही है , नहीं बदला कुछ भी केवल नाम ही बदले हैं। आत्मा सोच कर आई थी मरने के बाद स्वर्ग नहीं तो नर्क ही मिलेगा , मगर यहां तो कुछ भी दिखता , भगवन से पूछा मुझे किधर भेजोगे बता तो दो। भगवान बोले मैंने तो दुनिया को स्वर्ग ही बनाना चाहा है हमेशा और ऐसा कैसे करना इंसानों को राह दिखलाने और समझाने को अवतार भी भेजता रहा , मगर लगता कलयुग में उनकी मति मारी गई जो अपना दायित्व भुला बैठे हैं। परमात्मा अंतर्ध्यान हो गये हैं , आत्मा खड़ी है अकेली अचरज में भगवन की बातें सोचती।

Thursday, 26 January 2017

कोई नन्हा फ़रिश्ता आज भी आ जाता ( बात फिल्मों-संगीत-साहित्य-कविता-कहानियों की ) डॉ लोक सेतिया

                     मैं , मेरी फ़िल्में , मेरे गीत , मेरी शिक्षा ( लोक सेतिया )
मुझ में अगर थोड़ा सा कोई अच्छा इंसान है , इंसानियत की समझ है , दूसरों के दर्द को समझने की संवेदना है , तो वो किसी शिक्षक किसी धर्म प्रवचक या किसी गुरु का दिया ज्ञान नहीं है। ये सब मुझे मिला है इक आदत से जो किसी ज़माने में अच्छी आदत नहीं समझी जाती थी। बचपन से संगीत का चाव और मेरी आवाज़ भले बहुत सुरीली नहीं हो तब भी हर दम गाने-गुनगुनाने का शौक। कॉलेज गया तो फिल्मों से जैसे इश्क़ ही हो गया। सोचता हूं अगर आज के इस युग में मैं पला बढ़ा होता तो कैसा बनता , कठोर हृदय मतलबी , चालबाज़ ,
खलनायक , या कोई ज़ालिम जो बदले की आग में कातिल बन गया। भगवान का शुक्र है मैं उस युग में पला और बढ़ा जिस में माफ करना और नफरत को प्यार से जीतना सिखाया जाता था। आज सुनते हैं किसी फिल्म ने कितने सौ करोड़ का कारोबार किया , मगर किस कीमत पर , इंसान को हैवान या शैतान बनाने की कीमत पर। आज मैं खुद लिखता हूं ग़ज़ल कविता कहानी , मगर मुझे अभी तक लगता नहीं कुछ भी वास्तविक सार्थक लेखन किया है मैंने। इतने साल कलम घिसाई ही की है , काश इक कविता इक ग़ज़ल इक कहानी ऐसी लिखता जो सच में संदेश देती मानवता का। थोड़ा प्रयास किया है , हिलती हुई दिवारें कहानी , औरत कविता , दोस्त बनाने चले हो ग़ज़ल , सत्ताशास्त्र जैसा व्यंग्य जैसी कुछ रचनाएं हैं जिनको मैं समझता हूं कुछ तो सोचने को विवश करती होंगी। मेरी पसंद की फिल्में कई हैं , सफर , ख़ामोशी , बहारें फिर भी आएंगी , नया दौर , नया ज़माना , सैकड़ों हैं। मगर इक फिल्म जिसकी मुझे लगता आज भी फिर से बनाने की या उसी को फिर से दिखाने की बेहद ज़रूरत है वो है " नन्हा फरिश्ता "।
                        हम सब अपने भीतर झांक कर देखें तो अपने अंदर इक डाकू इक ज़ालिम इंसान इक बेरहम लुटेरा मिल सकता है। इक छोटी सी बच्ची तीन डाका डालने आये डाकुओं को घर में अकेली मिलती है जिसे इक डाकू उठा साथ ले जाता है। और पूरी फिल्म झकझोर देती है भावनाओं को जब इक मासूम फरिश्ता उन खूंखार डाकुओं को अच्छे इंसान बना देता है। मुझे भी लगता है मैं आज भी बहुत बुरा हूं और चाहता हूं कोई उस जैसा नन्हा फरिश्ता मुझे बदल दे और मेरे भीतर से सारी बुराई को मिटा मुझे अच्छा आदमी बना दे। काश कोई फिल्म निर्माता दोबारा ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाये बेशक उस फिल्म से करोड़ों रूपये नहीं मिलें पर करोड़ों दिलों को बदल दे जो।
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Tuesday, 24 January 2017

इक गुनाह है गरीबों से मज़ाक है ( जश्न कैसा ) डॉ लोक सेतिया

मना लो जश्न कि वतन आज़ाद है , कौन करता गरीबों से मज़ाक है , झांकियां देखना ताकतवर हैं हम , मत बताना किसी को कि भूखे हैं हम। हर साल ये बेरहमी का नज़ारा होता है , किसको मालूम गरीबी में कैसे गुज़ारा होता है। आज तक देश के रहनुमाओं से नहीं सवाल किया , अब बताओ तो क्या क्या है कमाल किया। कितना धन किया बर्बादी के सामान पर , कर सकते जंग पानी में और आसमान पर। जंग लड़नी थी भूख से गरीबी से ,
नहीं गिला हमको आपकी अमीरी से। चलो आज पूछते हैं उसी से जिसने बताया था सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा , आज देख लेता तो मिटा देता नहीं लिखता दुबारा। सबको याद उसका यही गीत रहा , कोई नहीं सोचता उसी ने था ये भी कहा।
                    उट्ठो मिरी दुनिया के गरीबों को जगा दो ,
                      काखे-उमरा के दरो-दीवार हिला दो।                     ( काखे-उमरा = अमीरों के महल )

                  जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोज़ी ,           ( दहकां = किसान )
                  उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो।          ( ख़ोशा-ए -गन्दुम = गेहूं की बाली )
आज तक किसी ने ये नज़्म आपको सुनाई , इसको शायर ने " फरमाने-ख़ुदा " शीर्षक दिया था। चलो आज उसी की ज़ुबानी सुनते हैं कुछ और भी जो कल भी सच था और आज भी सच है।
                 सुन तो ले मिरी फरियाद , ये भी इक़बाल जी का कलाम है , ज़रा दो शेर देखते हैं :-
                         असर करे न करे सुन तो ले मिरी फरियाद ,
                        नहीं है दादा का तालिब यह बन्दा -ए -आज़ाद।          ( वाह वाह चाहने वाला नहीं हूं मैं )
               
                       कसूरवार -ओ-गरीबउदयार हूं लेकिन ,
                     तिरा खराबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद।
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    कल जो नेता भाषण देंगे बड़ी बड़ी बातें कहेंगे देश की प्रगति की। हम कितने ताकतवर हैं , क्या क्या नहीं कर सकते अब। वही चुनाव में घोषणा कर रहे हैं मुफ्त में दाल रोटी से ज़रूरत का हर सामान तक। कैसा लोकतंत्र है कौन दाता है किसको भिखारी बना दिया है , लानत है ऐसी देश सेवा पर जो खुद ऐश आराम से राजा की तरह रहते और जनता को मालिक से गुलाम बना रहे और इसको भी उपकार समझते।  करोड़ों लोग भूख से और समस्याओं से मरते हों और आप हर दिन जश्न मनाते हैं इसको गुनाह ही समझना होगा। जाने कब इनके पापों का घड़ा फूटेगा।  क्या आप शामिल होंगे ऐसे आज़ादी के जश्न के आयोजन में , देश की बदहाली को अनदेखा कर के। सोचना ज़रूर।  

Monday, 23 January 2017

मोक्ष की चाह है सबको ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिये , ये हमारे वक़्त की सब से बड़ी पहचान है। दुष्यंत कुमार को तब भी पता था कुछ रस्ते आरक्षित हैं खास लोगों के लिये। मोदी जी से नासमझ लोग उम्मीद करते हैं कोई चमत्कार करेंगे , सब ठीक कर देंगे। परिवारवाद को खत्म करने , अपराधियों को राजनीति से निकाल बाहर करने की बातें क्या भाषण तक। अभी जिन राज्यों में चुनाव हैं उसकी असलियत क्या है ज़रा ध्यान देना। उम्र भर जो किसी ऐसे दल में था जिसको खुद मोदी जी इक घर की पार्टी बताते हैं , नब्बे साल की उम्र में अपने दल में शामिल कर क्या साबित करना चाहते हैं। सच तो ये है मछली जल में रहती है फिर भी बास अर्थात बदबू नहीं जाती , और ये राजनीति तो कभी का गंदा गटर बन चुकी है। आप विज्ञापनों से इश्तिहारों से उसको गंगा साबित नहीं कर सकोगे। आपके दल में तीस प्रतिशत उम्मीदवार बड़े बड़े राजनितिक परिवारों से जुड़े हैं , आपके गठबंधन में तमाम दल किसी एक नेता की जागीर हैं , आपने खुद तमाम बाहुबलियों को चुनाव में टिकट दिया है , कितने आपराधिक मुकदमें जिस पर दायर हैं उसको प्रधानमंत्री जी न केवल अपने मंच पर जगह देते हैं बल्कि उसका नाम लेते हैं सभा में आदर के साथ माननीय अमुक जी कहकर। मोदी जी जिस पर पर चलकर अभी तक सभी रसातल में जाते रहे हैं आप कैसे उसी पर चल आसमान को छू लेंगे। आपके दल में या बाकी दलों में ही जब कथनी और करनी में इतना विरोधाभास है तब होगा क्या। कितनी विडंबना की बात है कि आपने भी संविधान की भावना की कदर नहीं की , सभी नागरिक समान हों कैसे।
                     आप काला धन खत्म करना चाहते हैं ऐसा दावा करते हैं , आपकी सभाओं में अपार भीड़ है ये भी बताते हैं , मगर ये क्यों नहीं बताते कि हर सत्ताधारी की सभा में भीड़ क्यों और कैसे एकत्र की जाती है। मगर कहते हैं हवन करते हुए भी लकड़ी में जीव अगर होते हैं जल जाते हैं , हम शाकाहारी गोबर के उपले जलाते हैं मगर सोचते ही नहीं उसमें कितने जीव मर गये जलकर। हमारी पवित्रता की परिभाषा विचित्र है। ठीक उसी तरह नेताओं के मापदंड अपने लिये अलग औरों के लिये अलग होते हैं। उस दल का पापी अपने दल में आकर पुण्य आत्मा बन जाता है , आपने दल से जो दूसरे दल में चला गया वो पापी और स्वार्थी कहलाता है। कोई किताब है जो केवल नेताओं को पढ़नी आती है , जिस में अच्छा आरक्षण बुरा आरक्षण , अच्छा दलबदलू बुरा दलबदलू , और टिकट देने को अच्छा धनवान और बुरा धनवान , किसको समझते बताया हुआ है। आप जनता को झूठ से बहलायें तो देशहित और कोई और बहलाये तो दलगत स्वार्थ , शायद इसी को राजनेताओं का धर्म कहते हैं जिस में पाप ही पुण्य है और पुण्य भी पाप है। जीत वो मोक्ष है जिसकी चाहत सभी को है , मोक्ष जीते जी नहीं मिलता , जीत भी अपनी अंतरात्मा अपना ज़मीर और तमाम नैतिक मूल्यों को छोड़ कर ही मिलती है। राजनीति तभी कहते हैं वैश्या जैसी होती है , हर दिन बदलती है अपना रंग , अपना प्रेम का ढंग भी। 

Thursday, 19 January 2017

विकास हो रहा है ( कविता ) 125 भाग दो - डॉ लोक सेतिया

धीरे धीरे चली हवा , सत्ता को आया नहीं पूरा मज़ा ,
और तेज़ करनी है रफ्तार , कहती रही हर सरकार ,
हवा बन गई इक दिन आंधी , आंधी से बनी तूफ़ान ,
उड़ा ले गई झुग्गी झौपड़ी , तबाह होते गये किसान ,
बाहर रौशनी भीतर अंधकार , है ऐसा भारत महान।
इक राक्षस की नई कहानी , सुन लो आज मेरी ज़ुबानी ,
फैला इतना विकास देखो , विनाश की बन गया पहचान ,
जाने की राह चले हम , सोच सोच होते अब हैरान ,
कितने ऊंचे ऊंचे महल बने , कितने छोटे हैं इंसान।
किस को भगवान बनाया , किस को कहते शैतान ,
ऊंची ऊंची हैं दुकानें सत्ता की , फीके हैं सारे पकवान ,
इस राक्षस को मिली सुरक्षा , इसकी बड़ी निराली शान ,
पाया जनता ने क्या उससे , भाग भाग बचाई है जान।

Saturday, 14 January 2017

बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                 " कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं , बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। "
आज महत्व ब्रांड होने का है , ब्रांड होना ऊंचे दाम बिकना है। लोग अपने नेता को ब्रांड बता रहे हैं , उनकी शान बढ़ा रहे हैं। सच गांधी जी कोई ब्रांड नहीं थे , शुक्र है उनको लाख प्रयास कर के भी कोई बाज़ार में बिकता ब्रांड नहीं बना पाया। कभी वो लोग महान समझे जाते थे जिनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था , जो किसी भी दाम बिकने को तैयार नहीं होते थे। अब तो माना जाता है सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है बस मोल अपना अपना है। गरीब दो रोटी में बिक जाता है , मज़बूरी इक मां को दो हज़ार में बच्चा बेचने को विवश कर देती है , और गरीब की गरीबी और जनता की बदहाली की बातें कहकर कोई राजनीति करते हुए ब्रांड बन जाता है। कोई दूसरा ब्रांड योग और आयुर्वेद से लेकर हर शुद्ध वस्तु को बेच मालामाल हो जाता है , जबकि उसके पास आयुर्वेद की कोई शिक्षा ही नहीं है। वो अपने विज्ञापनों में कहता है " मेरा विश्वास है जो योग करेगा और दो घूंट रोज़ पियेगा वो रोगों के कुचक्र में ही नहीं फंसेगा। " आपको मालूम है इसका अर्थ , विश्वास है भगवान है , मगर विश्वास है ऐसा करने से रोग नहीं होंगे , में अंतर है। विज्ञान मात्र विश्वास पर नहीं चलता , आयुर्वेद भी इक चिकित्सया शास्त्र है कोई धर्मकथा नहीं। मुझे नहीं पता इस तरह किसी बात को बेचने को क्या कहा जाये , मगर इतना जनता हूं ऐसा कर किसी ने न आयुर्वेद न ही योग की भलाई की है। फिर भी अगर आप सवाल करें तो आपको बताना ज़रूरी है विज्ञान तथ्य और प्रमाण पर आधारित होता है। किसी भी दावे को परखा जाता है ये जांच कर के कि उसके उपयोग से कितनों को क्या लाभ हुआ। किसी की दुकान गली गली खुल गई इतना काफी है उसके व्योपार की सफलता के लिये , मगर कितने प्रतिशत रोग कम हुए या लोग तंदरुस्त हुए पहले से ये कौन बतायेगा।  स्वास्थ्य विभाग और डब्ल्यू एच ओ नहीं मानता देश में रोग या रोगी कम हुए।
      असली सवाल बाकी है , क्या बिकना और ब्रांड होना गर्व की बात है। उनके नाम से मुनाफा होता है उनके दल वालों को लगता है , फिर तो उनकी तस्वीर हर जगह लगवा दो , कुछ आधुनिक संत अपनी तस्वीर अपने अनुयायियों को कुछ हज़ार में अपने हाथ से आशिर्वाद के साथ देते हैं , चोखा धंधा है। कुछ अभिनेता भी अपनी फोटो किसी के साथ भी करवाते हैं पैसे लेकर , उनकी कमाई होती है इसी तरह। कभी लोग बाज़ारी होना अपमान समझते थे , आज बाज़ार बताता है आपका मोल कितना है। इक और दल के नेता का उपहास किया जाता है कि उसका खरीदार कोई नहीं , यहां कल क्या हो जाये क्या पता। कल वही सत्ता पर काबिज़ हो जाये तो लोग जनता क्या मीडिया तक उसका गुणगान करेंगे , उसके फोटो भी विज्ञापन में दिखाई देंगे नित नई योजना की घोषणा के साथ। अब समय आ गया ही शेयर बाज़ार में राजनीति के शेयर भी दर्ज हों और उनका भाव भी बढ़ता गिरता नज़र आता रहे। जब यही सब से बड़ा कारोबार है जिस में आकर सभी अरबपति बन जाते हैं तो इसको खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्था में शामिल करना ज़रूरी है। कब तक आम आदमी दूर से तमाशा देखता रहेगा , सभी को सत्ता की भागीदारी की इजाज़त मिलनी चाहिए। जो चाहे जिस राजनितिक दल के शेयर खरीद सके और जब वो दल सत्ता में आये तब अपने शेयर मनचाहे भाव पर बेच सके। सरकार इसको गरीबी की योजना में शामिल कर सकती है। अजीत जोगी और जूदेव जैसे महात्मा पहले ही राजनीति में धन के महत्व पर प्रवचन दे चुके हैं। आज इंसान भी इक वस्तु बन चुका है और उसकी कीमत लगाई जाती है , विधायक और सांसद भी बिकते खरीदे जाते हैं ये भी अब राज़ की बात नहीं है। बड़े बड़े उद्योगपति हर दल को चंदा देने की तरह हर दल के शेयर खरीदा करेंगे और जिस दिन उनके पास इतना धन होगा की बहुमत संख्या के विधायक खरीद सकें सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। जो अभी तक परदे के पीछे होता आया चोरी से अब कानूनी तौर पर खुलेआम होगा। इधर इक दलाल बता रहा है कि राजनीति में ईमानदारी की कीमत माइनस में आ गई है और बेईमानी को मुंह मांगी कीमत मिलने लगी है। आप कुछ शेयर बेईमानी के खरीद कर और कुछ हेरा फेरी दल के भी साथ फ्री पाकर शुरुआत तो करो , इसमें सभी ब्रांड उपलब्ध हैं , लाल , भगवा , नीला  , हरा , अब तो काला भी शामिल हो चुका है , बहुरंगी तो है ही।
             ऊपर स्वर्ग लोक में बहस चल रही है , एक अंग्रेज़ की आत्मा भारतीय आत्मा से कह रही है , तुम क्या समझते थे हम देश को लूट रहे हैं , हमें बाहर निकाल दिया था। क्या शिक्षा दी थी तुमने चरित्र निर्माण की , आज हर बात को बेचा जा रहा खरीदा जा रहा , मूल्य आदर्श भी तोले जा रहे सत्ता के तराज़ू पर।  और  देख लिया झूठ का पलड़ा भारी है सब उधर झुके हुए हैं , सच की कद्र कुछ नहीं उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है। तुम सत्य अहिंसा की पुजारी थे , तुम्हारी समाधि पर फूल चढ़ाने वाले तुम्हारी सोच को कत्ल करते हैं। खुद विदेशी कम्पनियों को बुलाते हैं , स्वदेशी की बात कोई नहीं करता। गांव में देश बसता है तुम मानते थे , अब गांव भी गांव जैसे नहीं हैं , चरखा आज मिलता ही नहीं कहीं। आपको पता है लोग मन्नत मांगते हैं बहुत सालों से मांगते आये हैं और मन्नत पूरी होने पर चरखा लोहड़ी में जलाया करते थे , आज चरखा नहीं मिलता बस इक मॉडल छोटा सा बिकता है रस्म निभाने को। 2 अक्टूबर 3 0 जनवरी को रस्म निभाते हैं नेता। सत्तर साल हो गये हैं अभी तक देश के अंतिम आदमी के आंसू कोई पौंछता  क्या देखता तक नहीं है।

Friday, 13 January 2017

भीतर मिट्टी बाहर चूना , दिल्ली शहर नमूना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

ये अंदर की बात है , बाहर दिन का उजाला है भीतर अंधेरी रात है। इंसानियत का सूखा पड़ा है ये कैसी बरसात है। सत्ता के खेल में मोहरे हैं सब लोग , राजनेताओं की शह है कभी मात है। कमल उनका हाथ उनका उनका हाथी उनकी साईकिल उनकी हँसिया हथौड़ा और तारा है जनता को मिली सभी से पीठ पर उनकी लात है। कहने की नहीं है बस समझने की बात है। बाहर किसी को नहीं बतानी ये अंदर की बात है। ये हमारा समाज है जो अपने हर गुनाह को किसी गलीचे के नीचे दबा कर छुपा कर रखता है। कभी कोई खिड़की खुलती है और कोई तेज़ हवा या आंधी आती है जो सारे परदे हटा देती है बिछे कालीन उतार फैंकती है और सब नंगा दिखने लगता है। कमाल ये है तब भी हम तथाकथित सरकार प्रशासन और आला अधिकारी अपनी करतूतों पर शर्मसार नहीं होते इस बात पर कि हमारे भीतर कितना गंद भरा है , बल्कि हम सोचते हैं ये क्यों हुआ और फिर सच सामने नहीं आये इसका उपाय करते हैं। ये कहना कि जिसके साथ अन्याय हो उसको बाहर किसी को नहीं बताना चाहिए हमारे पास आकर रोना चाहिए। जब कि न पहले उनको किसी का दर्द समझ आया न आगे कभी दिखाई देना ही है। सरकार की सभी योजनाओं की हक़ीक़त यही है , दिल्ली शहर नमूना अंदर मिट्टी बाहर चूना। और ये कहावत आज की नहीं पुरानी है। महलों में युगों से अत्याचार ऐसे ही होते आये हैं , विरोध को दीवारों में ज़िंदा चुनवा दिया जाता है। आज भी शासक चाहते हैं अंदर की घुटन कोई बाहर नहीं आने दे , घुट घुट के मरना अनुशासन है। तानाशाही का मतलब यही होता है , अन्याय करने वाला ही इंसाफ भी करता है। फिर लोकतंत्र क्या है , सच बोलने की आज़ादी नहीं है तो सत्यमेव जयते को हटा दो जहां कहीं लिखा है।
             सवाल सर्फ सेना और सुरक्षाबलों का नहीं है। घर में बहु पर अत्याचार करने वाले भी यही चाहते हैं बहु खामोश ही रहे , परिवार की लाज के नाम पर गुलाम बनी रहे। इतना ही नहीं सभी संगठन यही चाहते हैं , उनकी असलियत किसी को पता नहीं चले। राजनीति तो है ही इसी का नाम , बाहर दिखाने को लोकतंत्र है , भीतर किसी की मनमानी या किसी की तानाशाही। कोई भी दल अपने आम कार्यकर्ता क्या विधायक सांसद तक को अपनी राय बताने की आज़ादी नहीं देता , व्हिप का चाबुक उनको भेड़ बकरी की तरह जिधर आदेश उधर चलने को मज़बूर करता है। और हम कहते हैं हम आज़ाद हैं , तो आज़ादी है क्या।  जनता की आज़ादी वहीं तक है जहां तक सरकार को कोई चुनौती नहीं दिखाई दे।
                   आपको तमाम योजनाओं की जानकारी दी जाती है , मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया , रोज़ इक नया नाम। भीतर की बात अभी भी भीतर छुपी हुई है , गरीबी मिटानी तो है मगर कैसे , कुछ ऐसे कि गरीब मिट जायें मर जायें और उनका नामोनिशान तक नहीं रहे ताकि ये अभिशाप खत्म हो। न बचेगा कोई गरीब न बाकी रहेगी गरीबी। इस योजना पर काम जाने कब से चल रहा है , हालात बनाये जाते रहे हैं ताकि गरीब ज़िंदा ही नहीं रहे मर जायें सभी गरीब। ख़ुदकुशी का सामान खुद सरकार देती है सस्ते दाम पर , मौत सस्ती है ले लो , ज़िंदगी बहुत महंगी है उस पर अमीरों का नेताओं का अफसरों का धन्ना सेठों का हक है। सरकार की मज़बूरी है इस योजना को खुलेआम नहीं बता सकती। बस इतना ही करती है कि समस्या को हल ही नहीं करो , बनाये रखो उस सीमा तक जब लोग तंग आकर खुद ही मौत को चुन लें। किसी शायर का इक शेर है :--
                                   वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,
                                  तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवायें नहीं दीं।
सरकार ज़ालिम है पापी नहीं , आपका ईलाज नहीं करती मगर आपको ज़हर भी नहीं दे सकती।

Wednesday, 11 January 2017

( बेदाग़ लोग मत पढ़ें )***--- दाग़ मिटाने का शर्तिया उपाय ( हास्य कविता ) 2 0 भाग तीन -- डॉ लोक सेतिया

परेशान क्यों होते हैं जनाब , बुरे नहीं होते सभी दाग़ ,
आप जैसे भी हैं सच्चे हैं , आप पर लगे दाग़ अच्छे हैं।
आप से पहले भी आये लोग , हमने सभी के मिटाये दाग़ ,
लोग कहते रहें उनको चोर , फैसला हमने किया कर गौर ,
झूठ अपराध का नहीं निशान , बस इसी से बढ़ गई थी शान ,
बरी जो हुआ वो नहीं गुनहगार , फिर से बन गई थी सरकार।
सुन जो आज इनकी भी बात , अदालत को नहीं भाया सबूत ,
आप मान लो नहीं ली घूस , हुई नहीं कभी ऐसी करतूत !
कल तलक यही कहते थे औरों को , घोटालों के हो गुनहगार ,
उन पर भी किसी अदालत ने अभी , दिया क्या कोई निर्णय सरकार।
चारा घोटाला , हवाला घोटाला या , चाहे कोई भी हुआ घोटाला ,
नहीं साबित हुआ आज तक किसी का अपराध सुनो रे लाला।
बस अदालत जब कहती नहीं हैं काफी सबूत जुर्म होने के ,
समझो दिन ख़ुशी के हैं अब नहीं आजकल दिन रोने के ,
बड़े बड़े वकील छोटी से बड़ी अदालत तक का लंबा सफर ,
डिटरजेंट बहुत मिल जाते हैं हर किसी के दाग़ धोने के।
जनता बेशक कभी किसी को आरोप मुक्त करती नहीं ,
सच ये है सज़ा किसी को भी मिलती अभी तक नहीं।
बातें बहुत मगर तुम्हें कहना नहीं कुछ सिवा शब्द तीन ,
अभी नहीं आया निर्णय , मुझे अदालत पर है पूरा यकीन।
सोचो अगर अभी तक जिन जिन घोटालों में नहीं हुआ फैसला ,
क्या यही समझ लिया जाये वो सब सच में नहीं हुआ।
जांच आयोग कितने खुद ही बिठाये नेताओं ने बार बार ,
खोदा पहाड़ कितना निकाली मरी चुहिया ही सरकार।

Monday, 9 January 2017

आपका आदेश है , हमारी आज़ादी नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पिता कहते हैं मैं ऐसा चाहता हूं , बच्चों को मानना पड़ता है , अपनी मर्ज़ी नहीं चलती। मगर पिता की हर बात सही हो ये भी ज़रूरी नहीं , जब अनुचित बात माननी पड़ती है तभी एक हद के बाद विद्रोह होता ही है। पिता की समझदारी इसी में है कि उस हद तक मनमानी नहीं करे। सरकार चाहती है अब लोग अपना पैसा अपनी सहूलियत से नहीं खर्च करें , नकद खरीदारी नहीं कर कार्ड से या चेक से भुगतान करें। सरकार को काले धन को रोकना है मगर रोक काले धंधों पर नहीं लोगों पर लगाना चाहती है। नहीं समझे , कल थानेदार आपको आदेश दे घर में पैसा सोना या कीमती सामान नहीं रखो ताकि चोर चोरी नहीं कर सके। उसका सीधा मतलब यही है कि चोरों पर पुलिस का बस नहीं चलता इसलिए शरीफ लोगों पर ही हुक्म चलाते हैं , आपकी गलती है आप सभी रात को सो जाते हो। अगर कोई न कोई जागता होता तो खुद ही चोर को पकड़ लेते , भाई ये नया चौकीदार यही तो चाहता है "जागते रहो "। सोना मना है इस राज में , चैन से सोना तो गुनाह है। अब आप आज़ाद हैं मगर आपको आज़ादी उतनी ही मिलेगी जितनी सरकार चाहेगी। पैसा आपका है मगर आपको सप्ताह में कितना निकालना है ये आपकी मर्ज़ी क्या ज़रूरत पर भी निर्भर नहीं। आप आज़ाद हैं उसी तरह जैसे खूंटे से बंधा जानवर , उसकी रस्सी जितनी है उतनी दूर तक आजा सकता है। तो ये नया तरीका है जनता को खूंटे से बांध नेता लोग छुट्टे सांड की तरह घूमेंगे , उन पर कोई बंदिश नहीं। प्रशासन और सरकार जब जैसे सुविधा हो नियम बदल सकती है , आम नागरिक ही कुछ नहीं कर सकता अपनी सुविधा से। लोकतंत्र मैं और तानाशाही में अब कोई अंतर नहीं रहा , बस जो भी आदेश है आपकी भलाई में है। स्वीकार करना लाज़मी है।
                  कल ऐसा भी मुमकिन है सरकार का बयान आये वो चाहती है लोग शाम होते ही घर में बंद होकर खिड़की दरवाज़े बंद रखें अपनी सुरक्षा की खातिर। अर्थात वो जनता को सुरक्षा देने में नाकाम है। किसी भी अपराध को रोकने का ऐसा तरीका उचित नहीं है। आप अपनी नाकामी या कर्तव्य नहीं निभाने को इस तरह जनता पर अनुचित प्रतिबंध लगा सही नहीं साबित कर सकते। आपको भ्र्ष्टाचार रोकना है , अंकुश उन पर लगाना था जो घोटाले करते हैं , हर काम में रिश्वत खाते हैं , या जो अवैध धंधे करते हैं। आम नागरिक पर अनावश्यक रोक लगा आप अपनी हार मान रहे हैं कि बदमाशों को पकड़ना मुश्किल है तो शरिफ को ही समझाते हैं खुद बदमाश से बचकर रहो। यही आपका तरीका है पुलिस हवालदार वाला , जो सभ्य नागरिक को ही कहता है आप अपराधी के अपराध की बात किसी प्रशासन को मत बताओ। सच है , जिस देश में प्रधानमंत्री का दफ्तर ही ऐसा हो , जिसे कोई सत्येंद्र दुबे जैसा ईमानदार अफ्सर पत्र लिखे भ्र्ष्टाचार की सूचना देने को , और ये जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंच जाये और उसका कत्ल कर दिया जाये , उस देश में और क्या हो सकता है। चुप रहने में भलाई है , सच बोलना मौत को बुलावा देना है। मैंने भी खुद देखा है झेला है इसी शासन में। अंधेर नगरी चौपट राजा , सुना था अब देख भी लिया है।

Sunday, 8 January 2017

काठ की हांडी से लेकर हाथी के दांतों तक की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    अभी की बात है इक रियल्टी शो में कुछ लोगों को पहले चुना गया फिर जब उनमें से आधों को आगे शो में रखना था तब उन सभी को एक साथ बाहर कर दिया गया। जब लिया था तब उनको आम भाग लेने वालों से अधिक बेहतर बताया गया क्योंकि उन सभी में कोई न कोई शारीरिक कमी थी जिसके बावजूद उनकी पतिभा हारी नहीं उनका हौसला टूटा नहीं। कुछ बातें कैमरे पर की जाती हैं कुछ सच ऑफ दि रिकॉर्ड बताई जाती हैं , ऑफ दि रिकॉर्ड सच ये है कि उनको लिया ही इक मकसद से गया था। वो मकसद पूरा हो गया एक बार दर्शकों की वाहवाही लूट कर कि कितने संवेदनशील हैं जज करने वाले लोग। ये हर टीवी शो में कभी न कभी होता है , मगरमच्छ के आंसू बहा दिखलाते हैं। कौन बनेगा करोड़पति में भी यही दर्शाया जाता था कि वो कितने गरीबों की भलाई करते हैं। लोग तो करोड़पति नहीं बने आयोजक और प्रायोजक से संचालक तक अरबपति होते गये। नेता हमेशा से गरीबों की गरीबी दूर करने की बात करते आये हैं और खुद सत्ता पाकर मालामाल होते आये हैं। आज भी जो सत्ता में है उसकी सभाओं की भीड़ और शान मुफ्त की नहीं है , हर सभा करोड़ों रूपये खर्च कर आयोजित की जाती है। क्या उनके पास कोई पेड़ है जिस पर नोट बंदी के बावजूद भी नोट उगते ही हैं , जी हां उनको चंदा बेहिसाब मिलता है। मगर चंदा देने वाले गणित में कमज़ोर नहीं होते , सब हिसाब पहले गिना करते हैं।
                    तो अब ये चुनाव सत्ताधारी दल उस बात का ज़िक्र बिना किये लड़ना चाहते हैं , जिस बात से उनको जीत मिली थी , अच्छे दिन आने वाले हैं। अब बात होने लगी है गरीबों की गरीबी की , खुदा खैर करे , गरीब डरते हैं ये सुनकर। जब जब गरीबी की बात हुई गरीब और गरीब हुए हैं। बात दरअसल हाथी के दांतों की है , गरीबी की बात दिखाने वाले दांत हैं , खाने वाले हाथी के मुंह में छुपे रहते हैं। आज तक किसी दल के किसी नेता ने ऐसा कभी नहीं कहा कि उनकी सरकार बनी तो हर नागरिक को न्यूनतम इतनी आय देने को वो परिबद्ध होगी जिस से आम नागरिक की मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें। और जिसकी इतनी आय नहीं उसको हर महीने इतने पैसे सीधे मिलते रहेंगे ताकि लोग जीवनयापन कर सकें। संविधान में सभी को समानता का अधिकार है का इतना तो अर्थ है कि सब को दो वक़्त रोटी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा एक समान मिल सके अधिकार पूर्वक न कि सबसिडी की भीख जो केवल अपमानित करती है। मगर नेता जो खुद अपने लिये लाखों नहीं करोड़ों की सुविधायें चाहते हैं कि उनका हक है पाना , आम नागरिक को न्यूनतम भी देना ज़रूरी नहीं समझते। इनकी सारी सहानुभूति झूठी है मतलब की है , असल में ये सभी सफेद हाथी हैं जो चुप चाप देश का धन खुद अपने पर विलासिता पूर्वक रहन सहन पर उड़ाते हैं। इक बोझ हैं ये सभी , चाहे किसी भी दल के हैं।
             कभी धर्म की बात , कभी समान नागरिक सहिंता की बात , कभी किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं होने की बात , कौन करता था। सब छोड़ दिया तो इस बात को भी जीत कर निभायेंगे  कैसे यकीन करें , लगता है नेता इस बात का फायदा उठाते हैं कि हर बार कोई नई बात सुन लोग पुरानी को भूल जाते हैं। अर्थात ये किसी विचारधारा को नहीं मानते केवल अवसरवादी हैं। बार बार नया तमाशा दिखा जनता से खिलवाड़ करते हैं। कभी माना जाता था काठ की हांडी एक बार चढ़ती है। मगर यहां तो उनको हर बार काठ की हांडी चढ़ानी आती है। हर बार इक नई बात की नई हांडी बनाते हैं और चढ़ाते हैं। इस बार की हांडी पर रंग चढ़ाया हुआ है गरीबी दूर करने का। देखते हैं ये हांडी क्या पकाती है , इसी रंग की हांडी कभी पहले भी किसी ने सफलता पूर्वक चढ़ाई थी। गरीबी और गरीब दोनों आज तक पहले से भी बुरी हालत में हैं।

Tuesday, 3 January 2017

डरने की क्या बात है , जब पिया साथ है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    अरी पगली काहे को डरती हो , पिया चाहते हैं तुझे जब भरोसा है तो सज संवर लिया फिर धड़कन इतनी क्यों बढ़ी हुई है दिल काहे घबराता है। सखी समझाती है अब तो घड़ी है पिया आयेंगे बरात लेकर। मोदी जी और भाजपा जब आप जानते हैं आपने नोट बंदी जनता की भलाई के लिये की और देश से भ्र्ष्टाचार मिटाने को काला धन समाप्त करने को लिया ये कदम , इतना भी जानते जनता खुश है आपके साथ है फिर चुप किसलिए। जिन राज्यों में चुनाव हैं खुद कहें हमने पहली बार इतना सफल कार्य किया है। नये साल की पूर्व-संध्या को प्रधानमंत्री जी का संबोधन सुना सभी ने। कितने उपहार दिये उनहोंने हर नेता की तरह , किसे मिलते नहीं मिलते , कैसे मिलेंगे की फ़िक्र क्या। घोषणा करने से हमेशा सब होता रहा है , ये भी हो ही जायेगा , नहीं भी होगा तब भी आपको चुनाव जिता फायदा तो देगा ही। सभी नेताओं का ध्येय यही तो है , उसके बाद छाती ठोक कहना जनता ने सही समझा तभी जिताया है। बस चुनाव जीतो और जीत को प्रमाणपत्र बना लो अपनी हर बात का। बाकी दल यूं भी उलझे हुए हैं अपनी अपनी उलझनों में , आपका गणित खराब नहीं कर सकते। अब लोग आपकी सभाओं में भाषण ही सुन सकते हैं , सवाल तो नहीं कर सकते , तालियां बजा सकते हैं। कोई काले कपड़े तक पहन आपकी सभाओं में नहीं आ सकता आपकी सुरक्षा का ऐसा प्रबंध होता ही है , ताकि कोई काले झंडे नहीं दिखा सके विरोध प्रकट करने को। जब आपके लोकतंत्र में विरोध की आज़ादी ही नहीं तो किसकी मज़ाल है जो अपनी जान मुफ्त में गवाये। मर भी गये सौ लोग भीड़ में तो क्या हुआ , देश में आपके प्यारे सवासौ करोड़ बाकी तो हैं , हाज़िर हैं जनाब। आपका आदेश सर माथे।
               गर्भवती महिलाओं को पूरे छह हज़ार वो भी उस महिला के बैंक खाते में , सभी का खाता खुलवा दिया आपने। जिनका नहीं खुला वो जाने , मगर उन पैसों को निकाल सकती हैं ऐसी हालत में आज के हालात में गर्भवती महिलायें। बस पैसे हैं तो सब हो जाना है , हॉस्पिटल नहीं हैं दूर दूर तक , साफ पानी भी नहीं और आप इन पैसों से उनको जीवन देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री हैं तो देश की दशा से वाकिफ ही होंगे क्या हाल है देश में स्वस्थ्य सेवाओं का , आपकी प्राथमिकता ही नहीं है। आप नेतओं के लिये स्वास्थ्य के लिए करोड़ों हैं और देश की जनता के लिये कितना कौन सोचता है , विश्व में हेल्थ पर सब से कम बजट देने वालों में हैं आपकी सरकार। आपकी सब से भली बात क्या थी भाषण में जानना चाहते हैं , सब को ईमानदार होने का पाठ पढ़ाने वाले कहते हैं राजनैतिक दलों से खुद अपने आप खुद को मुक्त करो जैसे पहले भी सभी दल ऐसा प्रयास करते रहे हैं। ये क्या था भद्दा मज़ाक गरीबों के साथ , अपने घर को छोड़ बाकी को साफ सफाई रखने को लताड़। पर आपका करिश्मा आपकी वाणी कितनी मधुर है , जनता मुग्ध है आप चिंता नहीं करें। जब पिया साथ तब डरने की क्या बात है , मुहावरा तो ठीक है , मगर पिया कौन हैं और डर किसको है यही समझना है !!
    ( बात अधूरी है , बाद में पूरी की जाएगी )