Tuesday, 27 December 2016

एक अवैध प्रेम पर प्रहार ( कानूनी भ्रष्टाचार की बात ) { तरकश } डॉ लोक सेतिया

       भ्र्ष्टाचार हंस रहा है , प्रहसन चल रहा है , उसकी पहचान तक नहीं अभी उनको जिनको इसका अंत करना है। चलो घुमा फिरा कर नहीं सीधे बात करते हैं , संविधान को तो मानते ही होंगे सभी दल के सब नेता। मज़बूरी है उसको मानने से इनकार करें तो चुनाव ही नहीं लड़ सकते। तो उसी संविधान में तय किया हुआ है किसका क्या कर्तव्य है क्या अधिकार। विधायिका , संसद - विधानसभा , का काम है नियम कानून बनाना और निगरानी रखना उनका पालन किया जा रहा है। बजट बनाना आपका काम है अधिकार भी , मगर इक और अंग है सरकार का जिसको कार्यपालिका कहते हैं , बजट के अनुसार पैसे को खर्च करना विधायक या सांसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता संविधान में। तीसरा भाग सरकार का है न्यायपालिका जिसका कर्तव्य है न्याय करना , और न्याय सभी को मिले , हर विभाग को हर राज्य को , हर आम को हर ख़ास को। आपने देखा ही होगा जब भी किसी को लगता उसके साथ अन्याय हुआ वो अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है। इक रिवायत सी है कहने की मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। जब कि सब चाहते हैं न्याय उसी के पक्ष में हो , मगर न्याय भी मुफ्त नहीं मिलता है। बहुत ही महंगा है अपने देश में न्याय भी , जैसे स्वास्थ्य सेवा में मुंह मांगी फीस लेते हैं डॉक्टर उसी तरह वकील ही नहीं न्याय व्यवस्था में जुड़े सभी अंग। इस से उस अदालत तक पीड़ित भटकता है अपराधी को अपराधी साबित करने में। क्या क्या ज़िक्र करें छोड़ो विषय की बात करते हैं।
           सभी जानते हैं श्री नरसिंहराव जी ने सांसद निधि की शुरुआत की थी जब उनको अल्पमत की सरकार चलानी थी , अंधे की रेवड़ियां बंटनी शुरू क्या हुई सभी कतार में खड़े हो गये। हर नेता को रास्ता मिल गया खुद अपने हाथ से खाने का , फिर हर राज्य में विधायकों को भी कल्याण राशि मिलने लगी। उसी कल्याण राशि से सभी दलों के चुने विधायक-सांसद अपना अपना कल्याण करते आये हैं। ये तथाकथित कल्याण राशि अपनों को ही बांटी जाती है अग्रिम कमीशन लेकर , इस राज़ से कौन वाकिफ नहीं है। संसद को भी संविधान की भावना के विरुद्ध कानून बनाने का अधिकार नहीं , मगर ऐसा किया गया बार बार , संसद में विधानसभाओं में। जाने क्यों जनहित याचिका दायर करने वालों को ये ज़रूरी नहीं लगा कि अदालत जाते और सवाल उठाते क्या सांसद विधायक खुद देश जनता का धन खर्च कर सकते हैं। नहीं जा सके क्योंकि इन भृष्ट नेताओं ने पहले ही बीच का रास्ता निकाल लिया था , दिखाया जाता है कि राशि सरकारी विभाग खर्च करता है , मगर करता कैसे जैसे विधायक या सांसद आदेश देता है। चलो आपको उद्दाहरण से समझाते हैं , मेरे शहर में पिछले विधायक जी ने शहर की गलियों में टाइलें लगवाईं। जो सड़क ठीक थी उसे भी तोड़कर फिर बनाया गया , बनवाई भी हरियाणा शहरी विकास परारधिकरण ने। मगर टाइलें खुद विधायक जी की फैक्टरी से ऊंचे दाम खरीद कर। लो बिठा लो जांच कोई साबित नहीं कर सकता भ्र्ष्टाचार हुआ। मुझे लगता है ये शाकाहारी तरीका है किसी को कष्ट नहीं होता और उनको खाने को सब मिल भी जाता है। क्या काला धन और भ्र्ष्टाचार बंद करने वाली सरकार में साहस है इसको बंद करने का।
               अभी बात शुरू हुई है , देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला सामने आना बाकी है , क्या है वो। सरकारी विज्ञापन जिन पर रोज़ करोड़ों रूपये बर्बाद होते हैं इन नेताओं के सरकारों के झूठे प्रचार के। मीडिया वाले कभी इसकी चर्चा नहीं करते क्यों ? क्योंकि जिस जनता के पैसे की बर्बादी से आपको हिस्सा मिलता हो उसको बुरा कैसे बतायें। सच वही अच्छा जो मुनाफा देता है , घाटे वाला सच झूठ है। इक झूठ और भी , गांव को गोद लेने पर ज़ोर देते हैं। सब से पहले गोद लेते हुए लगता है गांव अनाथ है उसको माई बाप मिल गये। कल टीवी चैनेल कितने बड़े बड़े नाम वालों की गोद ली औलाद की बदहाली दिखा रहे थे। वास्तव में हमारे सभी नेता पाषाण हृदय और संवेदनारहित हैं जिनको अपने सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। जनता की भलाई का आडंबर करते हैं छल कपट और वोटों की खातिर। कोई अंत नहीं इनकी अधर्मकथा का।  बस दुष्यंत जी की ग़ज़ल के कुछ शेर कहता हूं।
                    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
                    घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
                   इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं
                  आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
                 रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें
                 इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार।

Friday, 23 December 2016

विष्णुलोक का टीवी चैनेल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             अगर आपने अभी तक नहीं लगवाया तो जल्द लगवा लें। जी नहीं ये आपके डी टी एच के सेटटॉप बॉक्स की बात नहीं है। ये विष्णुलोक का टीवी चैनल है जो अभी अभी शुरू किया गया है , बल्कि ये कहना चाहिये कि भगवान को करना पड़ा है। भगवान हाइटेक तो पहले ही हो चुके हैं , हर मंदिर हर पूजा स्थल पर सीसीटीवी कैमरे पहले ही लगवा चुके हैं , मगर नये हालात को देखते हुए इक कदम और आगे बढ़ाया है।
( सीसीटीवी कैमरे की बात विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो "शुभतारिका पत्रिका " के हरियाणा अंक में पढ़ें )
                नारद जी को आप पहचानते ही हैं , भगवान के विश्वस्त खबरी हैं और लोग चाहे उनको बदनाम करते हों इधर की उधर , उधर की इधर बात पहुंचाने का आरोप लगाकर , उनका काम ही मीडिया की तरह है। नारद जी आये हुए हैं भारतभूमि से विष्णुलोक टीवी का सीधा प्रसारण पहुंचाने को पूर्ण तथ्य सहित। इसको आप कोई धार्मिक चैनेल समझने की भूल नहीं करें। इस पर कोई धनलक्ष्मी यंत्र नहीं बेचा जायेगा न ही कोई भविष्यफल रोज़ का सप्ताह का वर्ष का राशियों के अनुसार बताया ही जायेगा। आपको कोई प्रवचन भी नहीं सुनाया जायेगा न ही किसी गुरु की दुकानदारी का हिस्सा विष्णुलोक का चैनेल बनेगा। फिर क्या करेगा ये नया चैनेल , आपने ठीक सवाल किया है। अभी तक बहुत चैनेल आपको बहुत कुछ दिखाने का काम करते आये हैं , ये चैनल भगवान बारे आपको नहीं आपके बारे भगवान को सही और सटीक जानकारी भेजने का काम करेगा। बिना कोई शुभ महूर्त निकले इसको शुरू किया गया है तो शुभः लाभ लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता। कोई हवन नहीं कोई यज्ञ नहीं कोई लाल फीता नहीं काटा गया , सीधे काम शुरू। शास्त्रों में साफ़ लिखा है शुभ कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए , पापकर्म करने से पहले विचार करना चाहिए , करें या नहीं करें।
                      टीवी कैमरा नज़र नहीं आता , नारद जी टीवी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। अभिवादन नमस्कार सभी एक सौ पचीस करोड़ भारतवासियों का भी और छतीस करोड़ देवी देवताओं का भी , नारद जी बोलते हैं अपनी जानी पहचानी मुस्कुराहट के साथ। आज विष्णु जी टीवी चैनल से बेतार द्वारा , इंटरनेट कहते जिसको , जुड़ चुके हैं और मैं नारदमुनि उनको यहां का हाल चाल बताता हूं , दिखलाता हूं। कैमरा भीड़ ही भीड़ दिखाता है तो भगवन पूछते हैं ये कैसी भीड़ है , क्या यहां कोई मंदिर है जहां प्रसाद बंट रहा है। जी नहीं प्रभु ये देश की जनता है जो बैंकों के सामने खड़ी है कतार में अपने खुद के जमा किये पैसे निकलवाने की जद्दोजहद में अपनी जान जोखिम में डालती। प्रभु हैरान होकर पूछते भला ऐसा क्यों। नारद जी बताते हैं भगवन आपने खुद भी देखा अपने मंदिरों का हाल , लोग जाकर माथा टेकते और दानपेटी में पैसे डालते हैं। कोई नहीं पूछता ये कैसा धन है मेहनत से कमाया हुआ अथवा चोरी लूट से जमा किया हुआ। गंगा नदी में गंदा नाला भी मिलता है तब भी गंगा पवित्र ही रहती है , उसी तरह राजनीतिक दलों को मिला चंदा और आपके नाम से चढ़ाया सारा धन भी पावन ही नहीं बताया जाता , ऐसा भी घोषित किया जाता है कि जितना दो और अधिक बढ़कर मिलना है। लोग दल को चंदा और भगवान के दर पे चढ़ावा इसी उद्देश्य से देते हैं। इन दोनों को दिया धन वापस कोई नहीं मांग सकता , कोई भूखा कभी मज़बूर होकर दानपेटी से पैसे निकाल ले तो पापी अधर्मी कहलाता है। अब उस धन दौलत पर संचालकों का अधिकार है वो जैसे भी चाहते उपयोग करते हैं।
                         नारद जी बोले प्रभु अभी समाचार देख लो चुप चाप  , उसके बाद चर्चा को बहुत समय होगा। हमने कोई विज्ञापन तो दिखाने नहीं हैं। असली काम की बात करनी है और आपको असलियत दिखानी है। प्रभु हुआ ये कि इक दल को पूर्ण बहुमत से जनता ने जिताया ताकि देश की जनता को उस द्वारा दिखाये अच्छे दिन हासिल हो सकें। मगर क्या यही वो अच्छे दिन हैं कोई नहीं जानता , लोग तो बदहाल हैं। आप ही बताओ आम आदमी क्या करे , आपके पंडित जी के बताये उपाय करता रहे आपका नाम जपता रहे या कोई नौकरी काम धंधा करे अपना पेट पालने को। भूखे भजन न होय गोपाला। अब सरकार कहती है सहयोग करो मगर कब तक , तब तक क्या भूखे मरें , सरकार तब तक देती जनता को सभी खुद तो बात थी। देना नहीं जानती देश की सरकार भी आपकी ही तरह , माफ़ करना प्रभु यहां जितना बेईमानी का काला धन है सब से अधिक आप ही के नाम जमा है तमाम धर्मों के नाम पर या इन्हीं दलों के पास। खुद को छोड़ सभी की तलाशी ली जबकि चोरी की माला पहनी अपनी गले में हुई है। प्रभु जो आपने अभी सोचा , मुझे पता चला , धर्म की बात पूछते हो आप। देखो प्रधानमंत्री जी कैसे उपहास करते हैं विपक्ष का मज़ाक नहीं है ये जीत का अहंकार है जिस ने उनको मर्यादा तक को भुलवा दिया है। हार जीत होती रही है , जीत कर  विनम्र होना साहस का कार्य और अहंकारी होना कमज़ोरी होती है। मगर इस नेता को लगा कि किसी मंदिर में करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी दान में देकर उसने भगवान को खुश कर लिया है , जबकि वो लकड़ी भी जनता के धन की थी उसकी अपनी कमाई की नहीं।  आप जानते हैं जो नेता मेरे गरीब भाईयो की रट लगाता है उसको देश की आधी आबादी जो गरीब ही नहीं दलित और शोषित भी है से कोई सरोकार नहीं है। प्रभु को समझ नहीं आ रहा ये कैसी सरकार है जिसको इतना भी पता नहीं है कि किसान खेत में हल चलाये बीज बोये फसल की रखवाली करे या फिर बैंक की कतार में खड़ा रहे। नारद जी बता रहे हैं सरकार का विभाग मानता है वही फसल बिजवाता है और उसी के आंकड़ों से देश की जनता का पेट भरता है। सत्ता मिलते ही सभी नेता खुद को भगवान समझने लगते हैं और जनता को सोचते हैं जुमलों से बहला सकते हैं।
                        नारद जी ने अलग अलग क्षेत्रों की तमाम तस्वीरें प्रभु को दिखाकर बताया ये असली भारत की तस्वीर है। नंगे बदन बच्चे महिलाएं , भूख और बिमारी से हारे हुए निराश लोग जो जीते हैं मगर ज़िंदा लगते नहीं , उनको घर की छत तो क्या पीने को पानी भी साफ नहीं मिलता। शिक्षा की दशा इस कदर खराब है कि शिक्षा का अधिकार उपहास बनकर रह गया है। देश की आधी आबादी साठ करोड़ लोग किसी भी दल के किसी भी नेता के लिये मात्र वोट हैं जिनकी ज़रूरत पांच साल बाद पड़ती है। उन बदनसीब लोगों का दर्द उनको भला कैसे समझ आयेगा जो शहंशाहों की तरह रहते हैं। चलो आपको ये भी दिखला देते हैं। कैमरा लुटियन ज़ोन को दिखाता है जिस को देख आंखे चुंधिया जाती हैं। ये राष्ट्रपति भवन है जो शायद सौ एकड़ से अधिक जगह पर बना है गरीब देश के राष्ट्रपति का निवास। जब यहां सैंकड़ों कमरों में राजसी शानो-शौकत से रहने वाला कोई गरीबी की बात करता है तो समझ नहीं आता उस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाये , हंसा जाये कि रोया जाये। इस इक महल की देख रेख पर हर महीने करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं , अर्थात लाखों रूपये हर दिन। इसी देश की इक तिहाई आबादी की आय प्रतिदिन पचास रूपये भी नहीं है। इसका मतलब ये है कि एक आदमी के रहन सहन पर जितना धन खर्च होता है उसी से कितने लाख भूखे अपना पेट भर सकते हैं। दूसरे शब्दों में ये कुछ लोग खुद पर जितना धन जनता के पैसे का खर्च करते हैं वही अगर गरीब लोगों को दिया जाता तो आज देश में गरीबी का नामो-निशान नहीं होता। गरीबों का हितैषी होने का दावा करने वाले दरअसल उनकी गरीबी की वजह खुद हैं। इस लुटियन ज़ोन में ढाई ढाई एकड़ में इक इक बंगला बना है , जब किसी गरीब को घर देने की बात की जाती है तो पचास गज़ ज़मीन भी ज़्यादा लगती है। संविधान में सभी को समानता का अधिकार क्या इसी को कहते हैं।
                                 जो लोग अनपढ़ हैं अपने अधिकार की बात नहीं जानते उनको क्या कहें जब जो शिक्षित हैं सुविधा संपन्न हैं वो भी किसी दल किसी नेता की जय-जयकार किया करते हैं अपना स्वाभिमान भुला कर। गुलामी तमाम लोगों की मानसिकता बन गई है , हर किसी को भगवान बताने में कोई संकोच नहीं करता। कोई पूछे उनसे आप जिनको भगवान मानते हैं उन्होंने देश को दिया क्या है। हर दिन इनकी सभाओं को आयोजित करने पर ही कितना धन बर्बाद किया जाता है , कोई हिसाब नहीं बताता कैसे। सब से ज़रूरी बात , इस देश को माना जाता है धार्मिक लोग हैं , जबकि यहां अधर्म ही अधर्म दिखाई देता है। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर माथा टेकने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता , धार्मिक होते जो लोग वो अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं समाज को देश को लूट नहीं सकते। इस देश में न्याय की निष्पक्षता की कर्तव्य निभाने की आशा तक करना खुद को धोखे में रखना है। झूठ यहां का भगवान है और लूट यहां की नीति , धर्म की तो परिभाषा तक कोई नहीं जनता यहां। प्रभु ठीक से देख लो और समझ लो आप अगर भगवान हैं तो किन लोगों के भगवान हैं। इधर तो भगवान भी सभी लोग बदलते रहते हैं , सभी ने अपने अपने खुदा तराश लिये हैं जो उनको पाक साफ़ हैं का प्रमाणपत्र ही नहीं देते , मरने के स्वर्ग का आरक्षण भी देने की बात करते हैं।
               अभी का हाल इतना है , प्रभु को भी विश्राम करना होगा , शुभ -रात्रि।

Wednesday, 21 December 2016

पसीना गुलाब था ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                 अब इत्र भी लगाते हैं तो खुशबू नहीं आती
                                इक वक़्त था जब अपना पसीना गुलाब था।
शायर से माफ़ी चाहता हूं उनका नाम भूल गया और दूसरी बार माफ़ी मांगता हूं अगर शेर ठीक नहीं लिखा हो कोई शब्द इधर उधर हो गया हो। मैं खुद शायर हूं इसलिए इस बात का महत्व जानता हूं नहीं तो आजकल  लोग शब्द को ही इधर उधर नहीं करते , खुद भी इधर उधर हो जाते हैं और शायरी का ऐसा बुरा हाल करते हैं कि पूछो मत। लोग ऐसी बेहूदा शायरी पर तालियां बजाते हैं वाह वाह करते हैं। किसी का दर्द उपहास बन जाता है कॉमेडी शो में और कोई उसी से अपना धंधा चला धन कमाता है। इक क्लास है इलीट क्लास इंडिया वालों की जिन को देश की हर बात की समझ है और जिनका ध्येय है ज़िंदगी का मज़ा लूटना। ऐसे बड़े बड़े लोग नीरो से कम नहीं होते देश जलता रहे वो चैन की बंसी बजाते रहते हैं। मुझे क्या कौन कब कैसे किधर से किधर जाता किधर से भटकता हुआ कहां जा पहुंचा। अपने हंसाने वाले जुमलों से हर समस्या का हल बताने वाले अपनी मंज़िल ढूंढ लिया करते हैं। पंजाबी में कहावत भी है जिथे मिलण चोपड़ियां उथे लाईयां धरोकड़ियां। जहां से चुपड़ी मिले वहीं चले जाते हैं , मगर इक विरोधभास लगता है , आप जिधर से निकले थे अपनी ख़ुशी से वहां तो चुपड़ी भी मिलती थी मक्खन भी साथ मिलता था। आपको हज़म नहीं हुआ या आपकी भूख ही ज़्यादा है।
                 अभी तक आप जो समझे वो बात नहीं है , यहां किसी व्यक्ति विशेष की बात थी ही नहीं। वो तो शायरी की बात चली तो उनका ज़िक्र भी करना पड़ा जो शायरी नहीं जानते समझते फिर भी मशहूर हैं शायरी के कारण। अब बात सीधे उनकी करते हैं जिन पर रचना का शीर्षक है पसीना गुलाब था। आप फिर भटक जाते हैं सोचने लगे किसी हसीना की बात होगी , किसी हसीना को देखा है पसीना बहाते। पसीना मेहनतकश लोग मज़दूर गरीब बेघर लोग बहाते हैं धूप में , जिनका कभी शान से ज़िक्र किया जाता था। गुरु नानक को उसी की रोटी में दूध मिला था बाकी सभी अमीर लोगों की रोटी से खून की धारा बही थी। आज बातें होती हैं काले सफेद धन की हक की हलाल की मेहनत की कमाई की कोई नहीं करता। सोचा था इक गरीब बड़े ओहदे पर पहुंचा तो बात होगी गरीबी की रेखा की भूख की बेबसी की लाचारी की। कितने साल तक उन्हीं की बात की बदौलत सरकार बनती रही है , क्या अब इक चाय वाले को सब कुछ मिलने से सारे गरीब खुशहाल हो गये हैं। क्यों चाय वाले ने गरीबी की बात छोड़ अमीरी की चर्चा शुरू करवा दी , इस सवाल का जवाब भी है। हमें उतनी ख़ुशी अपने फायदे से नहीं होती जितनी दूसरे का नुकसान देखने से होती है। तभी सत्ता पाते जब आधा समय बीत गया और गरीबों को अच्छे दिन नहीं दिखा सके तो सोचा अमीरों को ही बुरे दिन दिखा देते हैं। अमीरों की खराब हालत देख गरीब खुश हो जायेंगे कि भगवान का शुक्र है हम पैसे वाले नहीं हैं। तभी फैसला करते ही भाषण देने लगे देखो करोड़पति लोगों को कतार में खड़ा करवा दिया मैंने। मगर करोड़पति घर बैठे उनका भाषण सुन हंसते रहे , वाह हमारी बिल्ली हमें ही मियाउं। चुनाव क्या मेहनत की कमाई से लड़ा था , चलो अगर ठान ही लिया था तो शुरुआत अपने घर से करते। सभी राजनीतिक दलों का धन काला धन नहीं है , आपकी सभाओं पर , अकेले इक नेता की नहीं सभी नेताओं की , कितना धन खर्च होता है सब पवित्र है। सब से अपवित्र कौन सा दल है जिस में सब से अधिक अपराधी सांसद हैं , अपने घर की सारी गंदगी कालीन के नीचे छुपा आप स्वच्छता अभियान चलाते हैं। देश के साठ प्रतिशत गांव में साफ पानी नहीं और आप शौचालय की बात ही नहीं करते ,  गरीबों को गुनहगार साबित कर अपमानित करते हैं। कहते हैं सभी दल एकमत हों तभी चंदे  की बात पर भी फैसला हो सकता है , सभी  गुनाहगार तौबा करें तभी हम भी छोड़ देंगे चंदा नकद लेना। लो जी कितने लोकतांत्रिक हैं प्रधानमंत्री जी बिना सभी दलों की सहमति कुछ नहीं करना चाहते। इसी को चोर चोर का भाईचारा कहते हैं।
                         हिसाब तो आपको देना था , आपने सत्ता मिलते ही हर महीने हिसाब देने की बात की थी। अपने जिस लोकतंत्र के मंदिर की चौखट पर माथा टेका था आज उसी में जाना आपको गवारा नहीं। कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित प्रधानमंत्री भाषण देता है मुझे सदन में बात नहीं रखने देते इसलिये मैंने जनसभा में अपनी बात कहने का विकल्प चुना है। इतना बहुमत इतनी ताकत इतना चौड़ा सीना और ऐसी कायरता की बात , मुझे जान से मरवा सकते हैं , कहते हैं। आप को इतनी सुरक्षा में अपनी जान की चिंता तो हम आम नागरिक किस पर भरोसा करें। मगर आपको जनता को भटकाना था , गरीबी की भूख की , शिक्षा की बदहाली और स्वास्थ्य सेवाओं की रोगग्रस्त होने की समस्याओं की बातों से पीछा छुड़ाना था। इक टकराव अमीर गरीब का करवा उस पर अपनी राजनीति करनी थी। क्या सफल हुई आपकी योजना , नहीं। आपने इक नया इतिहास रचा है , इक प्रधानमंत्री का बार बार यू टर्न लेने का।  शुरुआत की इक घोषणा से की कि अब कभी काले धन वालों को दोबारा अवसर नहीं दिया जायेगा और बीस दिन , केवल बीस दिन बाद इक नई स्कीम पचास प्रतिशत की। आपकी दोनों बातें इक दूसरे से उल्ट फिर भी सच , आपको अभी भी उपाधि मिल रही खुद अपने दल से ठीक उसी तरह जैसे पूर्व प्रधानमंत्री को मिली ईमानदार हैं की उपाधि। आपको शायद समझ नहीं आ रहा क्या किया और हुआ क्या , चलो आपकी दुविधा मिटाते हैं।
                         बिल्ली शेर की नानी है , आपने भी सुना होगा। कहते हैं बिल्ली ने ही शेर को शिकार करना सिखाया था , जब सीख गया तो जानते हैं क्या हुआ। इक कहावत ये भी है :-
                     बिल्ली ने शेर पढ़ाया , शेर बिल्ली नूं खावण आया।
यही हुआ आपको जिन्होंने चुनाव जिताया आप उन्हीं को बर्बाद करने चले , स्विस बैंक पर बस नहीं चला तो देश में काला धन खोजने चले। बिल्ली को जब शेर खाने को झपटा था तो वो कूद कर पेड़ पर जा चढ़ी थी , शेर बोला मौसी आपने मुझे ये सबक तो सिखाया ही नहीं। बिल्ली बोली इसी लिये कि किसी दिन मुझे ही नहीं खा जाओ। काले धन वाले आपकी पकड़ से बच गये और पेड़ पर बैठ कह रहे तू डाल - डाल  मैं पात-पात। देखा फिर वही हुआ जिनकी बात की जानी थी , गरीबों की उनकी छूट गई और बड़े चोर छोटे चोर की बात पर अटक गये हम। उधर टीवी पर वही बहस जारी है , तू तू मैं मैं। क्या राजनीति है कैसी पत्रकारिता है। कभी खबर हुआ करती थी गरीबी और बदहाली की आजकल लाखों करोड़ों की बातें सुन लगता है सब जैसा भी है बढ़िया है , भूख गरीबी और देश की गंदगी , आवारा बचपन , भटकी जवानी की बात तो बंद हुई। मुबारिक हो , आप कौन सा डिओ लगाते हैं , किस ब्रांड के कपड़े डालते हैं। देश की असली समस्या आजकल यही है।

Sunday, 18 December 2016

आंसूओं से लिखी दर्द की दास्तां ( देश की दुर्दशा की बात ) डॉ लोक सेतिया

आज जो लिखना है उसको कोई कलम किसी स्याही से लिख नहीं सकती , और पढ़कर जिसकी पलकें भीग नहीं जायें उसको समझ भी नहीं आ सकती ये बात। इक घना अंधेरा छाया हुआ लगता है चरों तरफ पर उसी को बताया जा रहा है यही भौर की रौशनी है। कितने साल हो गये लिखते लिखते अब ज़िक्र भी करने से कुछ भी हासिल नहीं है। शायद ही कभी किसी ने कल्पना की होगी कि इस देश की पूरी व्यवस्था इस कदर रसातल तक नीचे गिर सकती है।
      " इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। "
सच चालीस साल पहले ये कल्पना शायद दुष्यंत कुमार ही कर सकते थे। अपने समाज के दर्द को इस शिद्दत से कितनों ने महसूस किया है। आज देखो तो हर कोई बातें करता है राजनीति की समाज की धर्म की परंपरा की इतिहास की बदलाव की विचारधारा की आज़ादी की मानवता की साक्षरता की पर्यावरण की महिला अधिकारों की और देश की न्याय व्यवस्था की ही नहीं संविधान की भी। मगर वास्तविक जीवन में सभी की कथनी और करनी में अंतर ही नहीं विरोधाभास साफ दिखाई देता है। बातें सत्यमेव जयते की कर सच को खुले आम सरे-राह कत्ल किया जाता है प्रतिदिन पग पग पर। सत्य पराजित नहीं होता की बात आज सब से बड़ा झूठ है। सच ये है सच अपमानित होता है कलंकित किया जाता है और उसको इस तरह कत्ल किया जाता है कि कोई समझ नहीं पाता उसमें अभी जान बाकी है अथवा वो मर चुका है। सत्तर साल से हर सरकार और हर राज्य का शहर का गांव का प्रशासन सच को विवश करता रहा है कि सच ख़ुदकुशी कर ले। सच ज़िंदा है या मर चुका है कोई नहीं जानता , वो तो बिल्कुल भी नहीं जो सच ही का कारोबार करते हैं। उनकी दुकानों पर झूठ महंगे दाम बिकता है सच का लेबल लगाने के बाद।
                              अभी अभी की बात करें तो देश की सरकार नहीं इक नेता ने दावा किया है कि वो देश को अपराध भ्र्ष्टाचार और अभी तक चलती रही लूट से निजात दिलवा कर रहेगा। सभी चाहते हैं ऐसा हो , मगर कैसे हो कोई नहीं समझ पा रहा। इक बड़ा कदम लिया गया नोट बंदी का जो लगता है सफल नहीं हुआ या नहीं होने वाला , क्योंकि जब कोई ऐसा बदलाव करना चाहता है तो उसकी निष्ठा उस काम में पूर्ण होनी चाहिए। खेद है उसका आभाव साफ दिखाई दे रहा है , जिस दिन सवा सौ करोड़ जनता का प्रधानमंत्री ऐलान करता है कि बस बहुत हो चुका अब भविष्य में काला धन वालों को कोई अवसर नहीं दिया जायेगा , उसी से बीस ही दिन बाद इक और नई योजना घोषित की जाती है , पचास प्रतिशत जुर्माना भर काली कमाई को सफेद करने की। उसी दिन साफ हो गया था उनको मूल्यों से नैतिकता से लूट से मतलब नहीं है , उनको दो शिकार करने है एक तीर से। खुद के लिये गिरती या दिन पर दिन कम होती लोकप्रियता को ऊंचा करना और हर सत्ताधारी की तरह अधिक से अधिक पैसा ख़ज़ाने में लाना। कल आप नियम कानून ही बना दो चोर की चोरी माफ़ होगी अगर चोरी का आधा माल सरकार को दे दे। यही तो किया जा रहा है , जब तक लूट के दोषियों को सज़ा की जगह ऐसे ईनाम मिलता रहेगा लूट जारी रहेगी। अब लगता है उनको उचित अनुचित से कोई सरोकार नहीं है , गलत होने को रोकना उनका ध्येय नहीं गल्ती से फायदा उठाने की उनकी मंशा है या योजना का मकसद है। चालीस दिन बाद पता चल ही गया आपके प्रशासन का क्या हाल है बैंक तक शामिल हैं काले को सफेद करने में। किस किस को दोष दें , कोई भी दल तो बेदाग़ नहीं है , सभी के घर शीशे के हैं। संसद नहीं चलना ही गलत नहीं है , कोई प्रधानमंत्री जब कहता है मुझे संसद में बोलने नहीं दिया जाता तो मैंने जनसभा में बोलने का विकल्प चुन लिया है। तब इक खतरा दिखता है संसदीय लोकतंत्र को , शायद आप भूल गये अपने स्वार्थ में कि कोई शपथ ली थी आपने संविधान की रक्षा की। जब इक सदन का नेता पलायन करता है सदन से भागता है तो ये किसी एक व्यक्ति अथवा दल की बात नहीं रहती है। आप देश को इक अंधी सुरंग में धकेल रहे हैं जिस के पार का सिरा क्या है आपको भी नहीं मालूम। सब बाकी बातों को दरकिनार करते हैं और इक महत्वपूर्ण सवाल की बात करते हैं। देश का प्रधानमंत्री भरी सभा में अपनी जान को खतरा बताता है तो बात चिंता की है।
                       इस पहरे को छोड़ ऊपर की बात जारी करते हैं। आम आदमी की बात जब कोई प्रशासन कोई सरकार कोई संस्था नहीं सुने तब उसके पास क्या विकल्प है। नेताओं की तरह करोड़ों खर्च कर जनता को अपनी बात तो नहीं बता सकता न ही भाग सकता है कहीं इक जगह से दूसरी जगह। प्रधानमंत्री जी की हो या किसी मुख्यमंत्री जी की सभा , इक नया चलन देखा है , खबरों में सामने आया है कि प्रशासन निगाह रखता है कोई सभा में विरोध प्रकट ही नहीं कर सके। अर्थात जितने भी लोग हों सभी हाथ जोड़ने वाले हों , हाथ से तालियां बजाने वाले हों , सर उठाने वाला कोई भी नहीं हो। मेरे शहर में मुख्यमंत्री जी की सभा हुए तो जो काले रंग की जैकेट डाले थे उनसे उतरवा ली गई , काली जुराबें भी उतरवा ली गई , जो काले रंग के कपड़े पहने थे उनको प्रवेश नहीं करने दिया। क्या वो लोग काला धन वालों से अधिक खतरनाक थे , जिनको आज भी आप गले लगाना चाहते हैं अवसर पर अवसर देकर। और दावा किया जाता है लोकप्रिय होने का , जब आप लोकप्रिय हैं जनता खुश है तो काले रंग की या विरोध की चिंता क्यों। वास्तव में आज़ादी के बाद से कोई भी प्रशासन नहीं चाहता जनता का सीधा संवाद सत्ताधारी नेतओं से बड़े अधिकारियों से हो। क्योंकि इस से उनकी असलियत सामने आती है कि जो भी वो कागजों पर बताते हैं किया गया , हुआ होता ही नहीं। मगर हर नये सत्ताधारी की कमज़ोरी रही है कि उसने नौकरशाही पर कभी अंकुश नहीं लगाया ताकि जैसे पहले लोग उनका दुरूपयोग करते रहे हम भी करते रहें। रसोई का हर बर्तन साफ किया साग सब्ज़ी भी ताज़ी लाये दूध भी बासी नहीं फिर भी सब बना बनाया बिगड़ जाता है , कड़छी तो वही है उसको साफ करने का हौसला ही नहीं किया किसी ने। हम समझते हैं नेता शासन की बागडोर संभाले हैं जब कि सरकार को चलाते ही नहीं अपनी उंगलियों पे नचाते भी हैं अधिकारी बाबू से चपरासी तक। जब ऐसा हाल है तो सच बोलना अपराध ही है , देश के प्रधानमंत्री की जान को जब खतरा हो सकता है देश को काले धन के विरोध के कारण तो कोई आम नागरिक कैसे सुरक्षित हो सकता है किसी गैर कानूनी काम करने वालों के बारे सच बोल कर। शरीफ आम नगरिक को डरे सहमें जीना है और इसी को आज़ादी और लोकतंत्र मानना है। भारत माता कितनी बेबस है उसके आंसू कौन देखता है , कोई पौंछना भी चाहता है , किसे समझ आएगी उसकी दास्तां।

Friday, 16 December 2016

सावधान ! गोरे या गोरियां मत पढ़ना ( काला शाह काला - हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

चलो शुरू करते हैं बात , सबसे पहले यही बताना चाहता हूं कि मामला काले धन का हर्गिज़ नहीं है , बात काले रंग की ही है। इक पंजाबी लोकगीत है , काला शाह काला , नी मेरा काला ऐ सरदार , गोरियां नू दफा करो।
गायिका कहती है मेरा सरदार ( मेरा पति ) काला है बहुत ही काले रंग वाला है , मुझे यही पसंद है , जिनका गोरा रंग है उनको परे करो मुझे नहीं पसंद गोरा रंग। स्कूल में इक सहपाठी जो बहुत ही गोरे रंग का था , आज भी है बेहद गोरा और सुंदर , उसका नाम माता पिता ने काला रख दिया था घर का प्यार का नाम। कहते हैं इस से नज़र नहीं लगती , बच्चों को काले रंग का टीका भी तभी लगाया जाता है। गोरी महिलाएं काजल यही समझ लगती हैं कि कजरारी काली काली आंखें उनके गोरे रंग को और निखार देती हैं। काला रंग कुछ लोगों को बेहद पसंद होता है , मेरी श्रीमती जी के भाई को भी पसंद है और विवाह के समय उसने इक साड़ी काले रंग की भी खरीद ली थी। मगर मेरी ताई जी को पता चला तो उन्होंने साफ बोल दिया था काले रंग का कोई कपड़ा नहीं देना हमारी बहु को। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा था उस बात से , मगर ताई जी को पता नहीं था कि मैंने अपनी बहन जी के साथ इक बेहद कीमती कपड़ा मैक्सी बनवाने को लिया था जिस का रंग भी काला था मगर उस पर कई रंग के गोल गोल रंग बिरंगे डॉट्स थे जो सभी को अच्छे लगे थे।
                   काले रंग में जाने क्या बात है जो नेता लोग इस से डरते हैं। मुख्यमंत्री जी की जनसभा थी और अगले दिन खबरों में इक महत्वपूर्ण खबर इस को लेकर थी कि सुरक्षा कर्मियों ने उनको भीतर ही जाने दिया जो काले रंग के कपड़े पहने थे। जिनको जैकेट काली थी या जुराबें काली वो उतरवा कर रख ली थी। क्या काला रंग सुरक्षा के लिये खतरा है , जी नहीं उस से भी अधिक बड़ी बात है। प्रशासन नहीं चाहता था कोई मुख्यमंत्री जी को विरोध दिखाने को काले कपड़े का उपयोग करे। मुझे तो ये मालूम नहीं काली पट्टी या काले झंडे दिखाने की विरोध की परंपरा किस ने कब और क्यों शुरू की , मगर मुझे इस शांतिप्रिय विरोध में कोई खतरे की बात नहीं लगती है। एक तरफ आप जनता को भाषण देते हैं सरकार के किसी अंग से घूस की शिकायत हो तो निसंकोच बताने की बात और दूसरी तरफ कोई आपकी नापसंद की बात कहने वाला सभा ने दाखिल तक नहीं हो पाये ऐसी व्यवस्था करते हैं। जब दावा है लोग बेहद खुश हैं आपसे तो फिर डर किस बात का।  कोई बता रहा था मुख्यमंत्री जी भगवान हैं बिना मांगपत्र समझते हैं क्या देना है। भाई वाह आपने तो चाटुकारिता को और ऊंचे आकाश पर पहुंचा दिया , ईनाम का हक तो बनता है।
                                   चलो काले रंग और कालिख के डर की बात को किनारे कर पहले यही चरचा करते हैं , कौन दाता है कौन भिक्षुक। क्या जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि जनता का धन जनता पर ही खर्च करता है तो दानवीर है दाता है भगवान है। ज़रा गहराई से समझते हैं इतिहास में मिसाल मिलती हैं कुछ तो। इक दोहा इक कवि का सवाल करता है और इक दूसरा दोहा उस सवाल का जवाब देता है। पहला दोहा गंगभाट नाम के कवि का जो रहीम जी जो इक नवाब थे और हर आने वाले ज़रूरतमंद की मदद किया करते थे से उन्होंने पूछा था :
                                                  सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन
                                                  ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन।
अर्थात नवाब जी ऐसा क्यों है आपने ये तरीका कहां से सीखा है कि जब जब आप किसी को कुछ सहायता देने को हाथ ऊपर करते हैं आपकी आंखें झुकी हुई रहती हैं। रहीम जी ने जवाब दिया था अपने दोहे में :
                                              देनहार कोउ और है देत रहत दिन रैन
                                              लोग भरम मो पे करें या ते नीचे नैन।
अर्थात देने वाला तो कोई और है ईश्वर है जिसने मुझे समर्थ बनाया इक माध्यम की तरह , दाता तो वही है पर लोग समझते कि मैं दे रहा तभी मेरे नयन झुके रहते हैं। आज तक किसी नेता ने देश या जनता को दिया कुछ भी नहीं सत्ता मिलते ही शाही अंदाज़ से रहते हैं और गरीबी का उपहास करते हैं।
                     अब वापस विषय की बात , क्या लोकतंत्र इसी का नाम है। आप किसी को काले रिब्बन या काली पट्टी लगाने पर परिबंध लगा सकते हैं , ऐसा तो आपात्काल में भी नहीं देखा था। आप एक तरफ इतने साल बाद उनको सुविधा देने की बात करते हैं जो इमरजेंसी में जेल में बन्द रहे दूसरी तरफ विरोध करने की आज़ादी बिना घोषणा किये छीन रहे हैं। किधर जा रहे हैं जनाब। मुझे इक पुरानी बात याद आई इक नेता जी की , उनको जब काले झंडे दिखाने की बात हुई तो बोले थे मेरी मां का घाघरा इतने गज़ काले कपड़े से बना होता था , मुझे ये छोटा सा काले रंग का कपड़ा क्या रोक सकता है। जी नहीं मैं न इनकी न उनकी बात का पक्ष लेना चाहता हूं , मुझे खेद होता है इस देश के प्रशासन के रंग ढंग देख कर  , जो हर सत्ताधारी को ऐसे ही ठगता है असलियत से दूर रख कर। अगर लोग किसी मंत्री की सभा में विरोध करेंगे तो किस बात का , यही कि आपका प्रशासन सही काम करता नहीं है। अर्थात जो काले कपड़े वालों को भीतर नहीं जाने दे रहे थे उनको किसी बात का डर था , तभी उन्होंने ऐसा अनुचित काम किया लोगों की पोशाक पहनने की आज़ादी का हनन , संविधान क्या कहता है उनको पता है।
                      क्या काला रंग अशुभ है , क्या तभी नेता श्वेत वस्त्र पहनते हैं कालिख के काम करते समय भी ,
हां इक बात है काले रंग पे लगा धब्बा अधिक चमकता भी है और उसको मिटाना भी कठिन होता है। बाकी किसी रंग वाले कपड़े पर दाग़ लगे तो उसको काले रंग में रंगने से वो नहीं रहता। ये ज्ञान मुझे इक पुरानी फिल्म से मिला था जिस में नायक इक काल गर्ल से प्रेम करता है और चिंतित होता है क्या करुं। तभी उसकी इक कमीज़ पर लगा काला दाग़ नहीं मिटने पर धोबी सलाह देता है साहब इसको इसी रंग में रंगवा लो। अभी शनि देव जी की चर्चा है कि वो खराब नहीं हैं न्यायकारी हैं भाग्यफ़लदाता हैं। अब शनिदेव से या काले रंग से डरने की ज़रूरत नहीं हैं। शनि की पूजा किया करें काला धन या काला कपड़ा आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता। ऐसा मुझे अज्ञानी पंडित जी का अभिमत है।

Monday, 5 December 2016

क्या चरित्र निर्माण ऐसे किया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया है सिनेमाघर में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगीत को सुनाने और दिखाने को और सभी दर्शकों को खड़े होकर आदर पूर्वक सुनने का। भला इस को कोई अनुचित बता सकता है या इसकी आलोचना कर सकता है , मगर ये जान कर अचरज होता है कि हालत ऐसी आ गई है। अब लोगों को देशभक्त भी कानून द्वारा बनाया जाना पड़ेगा , देश से प्यार की भावना भीतर से नहीं जाग सकती जो बाहर से करने को बाध्य किया जायेगा। शायद हमें बहुत गहराई से समझना होगा कि समस्या क्या है और उसकी जड़ कहां है। कानून बनाकर अभी तक जनता को बराबरी के सभी अधिकार तक नहीं मुहैया करवा पाये हम , शिक्षा और स्वास्थ्य की बात क्या जब बाल मज़दूरी और दहेज का दानव तक विकराल रूप धारण कर चुके हैं। मात्र मुख्य न्यायधीश का ये कहना कि न्यायधीशों के पद खाली हैं काफी नहीं है , न्यायपालिका को भी चिंतन करना होगा उसमें खामियां क्या हैं और क्यों हैं। अवमानना की तलवार से कोई समस्या खत्म नहीं होगी , भले लोग देख कर खामोश रहें डर से। काश सभी अपने अपने विशेषाधिकार की लड़ाई से इतर जनता की भलाई की चिंता करते। सत्यमेव जयते , लिखने मात्र से सत्य अपराजित नहीं होता जैसा माना जाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता है। बहुत बार उसको कत्ल कर दिया जाता है ज़िंदा जलाया जाता है बेगुनाहों को और कातिल छूट जाते हैं कानूनी दांव पेच से। फिर भी आज इस विषय पर विचार विमर्श करने की ज़रूरत तो है।
          क्या आपको मालूम है किसी बैंक में कोई नियम है हर सुबह प्रार्थना करने का , जी बैंक ऑफ़ बड़ोदा में ऐसा ही है। मुमकिन है बाकी बैंकों में भी ऐसा हो , इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो ना , हम चलें नेक रस्ते पे हम से भूल कर भी कोई भूल हो ना। आशा की जा सकती है उस का थोड़ा असर तो रहता ही होगा दिन भर कर्मचारियों में। मगर सवाल ये है सिनेमा देखने वालों को ही देशभक्त बनाना बहुत है , यूं  भी आजकल फिल्म देखना काफी महंगा मनोरंजन है और शायद बेहद कम प्रतिशत जनता सिनेमा हाल जाती है। शायद चरित्र निर्माण की आवश्यकता सारे देश में है , तो क्यों नहीं शुरुआत वहीं से की जाये जहां सब से ज़्यादा ज़रूरत है। संसद और विधानसभाओं में कोई प्रार्थना ईमानदारी का सबक सिखाने वाली अगर हर दिन हर अधिवेशन में गाई जाये तो बेईमानी करने वालों को थोड़ी शर्म शायद आ ही जाये। वरना कौन उनको ये पाठ पढ़ा सकता है जो सभी को सबक पढ़ाना नहीं सिखाना अपना अधिकार समझते हैं। बस जनता ने निर्वाचित किया तो जो चाहे करने की छूट मिल गई उनको , इसे लोकतंत्र कदापि नहीं कह सकते।
          मुमकिन है आपको ध्यान नहीं भी हो सभी सरकारी दफ्तरों में साल में इक दिन ईमानदारी की भ्र्ष्टाचार नहीं करने की रिश्वत नहीं मांगने की बाकायदा शपथ दिलाई जाती है वो भी धूम धाम से समारोह आयोजित करके। नतीजा बताने की ज़रूरत ही नहीं है। जिस देश में सभी खुद को धार्मिक समझते हैं और नियमित मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं , बुरे कर्म छोड़ सद्कर्म करने का उपदेश सुन के आते हैं उस देश में पाप नफरत हिंसा बैर भाव और घिनोने अपराध कैसे हैं। आखिर उन उपदेशों का असर हो भी कैसे जब उपदेशक और धर्म का पाठ पढ़ाने वाले ही लोभ मोह अहंकार ही नहीं अधिक से अधिक चढ़ावा चढ़ने को ही धर्म मान रहे हों , ज़रूरत से अधिक मत जमा करो का उपदेश देकर खुद करोड़ों अरबों जमा करें और उसको इक कारोबार ही बना लें। बचपन में सभी प्रतिदिन प्रार्थना सभा में कोई न कोई प्रार्थना बोलते और सुनते आये हैं , किताबों में भी अच्छाई और भलाई की बातें ही पढ़ाई जाती हैं। इंसानियत का पाठ पढ़ा तो हर किसी ने मगर याद कितनों को रहा है। बड़े होते होते किताबी शिक्षा भुला ज़िंदगी से मिली शिक्षा मन मसितष्क में बैठ जाती है। बच्चे वही समझते और सीखते हैं जो बड़े आचरण करते नज़र आते हैं। चोर से कोई ईमानदारी का सबक नहीं सुनना चाहता।
                            चरचा से क्या होगा , सवाल है कि राष्ट्र में चरित्र निर्माण कौन करे और कैसे। अध्यापक और माता पिता पहला पाठ उनको बातों से नहीं अपने आचरण से पढ़ाना होगा। लेखक कथाकार कवि शायर भी विवेक को जागृत करने का दायित्व निभा सकते हैं अपने स्वार्थ को दरकिनार कर निष्पक्ष सच्चाई की बातें लिखकर। बड़े स्तर पर सिनेमा अपना वास्तविक फ़र्ज़ निभा सकता है ऐसे कहानियों पर फ़िल्में बनाकर जो दर्शक को केवल मनोरंजन ही नहीं दें अपितु शिक्षित भी करें। किसी समाजिक सरोकार पर जागरुकता पैदा करें , मात्र धन कमाना ही सफलता का पैमाना नहीं हो। खेद की बात है नग्नता और अंधविश्वास को बढ़ावा देने जैसे काम सिनेमा ने किये हैं , टीवी सीरियल भी जैसे बुराई को बढ़ावा देने की दौड़ में लगे हुए हैं। कहने को समाचार चैनेल या अख़बार हैं मगर विज्ञापनों ने सभी कोई अंधा कर दिया है। पत्रकारिता का पतन धर्म और राजनीति की तरह हर सीमा लांघ चुका है।  देश की चिंता किसे है , सभी को अपने अपने हित साधने हैं , मगर किस कीमत पर। नैतिकता कोई बाज़ार से खरीद कर नहीं ली या दी जा सकती औरों को , उसको पालन करने को बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है जो अनुचित नहीं भी कहलाये या गैर कानूनी नहीं भी हो पर अनैतिक हो। देश में चरित्र निर्माण करना शायद नहीं यकीनन बेहद ज़रूरी है।

Thursday, 1 December 2016

जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

         गरीब जनता को ही त्याग करने को कहा जाता है  हर बार , कभी किसी राजनेता से किसी ने नहीं कहा त्याग करने को। जनता को समझा रहे हैं इस में तुम्हारी भलाई है , अभी थोड़े से काम चला लो कुछ दिन फिर सब अच्छा हो जायेगा। भाषण में बार बार पूछते हैं सरकार काला धन बंद होना चाहिए या नहीं , फिर उस सवाल को दोहराते हैं , आप तैयार हैं थोड़ा कष्ट झेलने को। जनता को कितना चाहये भला सत्ता तय करती है , दो हज़ार बहुत है ए टी एम से रोज़ निकलवाने को , सप्ताह में चौबीस हज़ार क्या काम हैं। मान लिया जो भी आपने हुक्म दिया पर किसी को कभी तो लगता ऐसा ही परिबंध जनता के सेवक कहलाने वालों पर भी लगाया जाये जिनको हर महीने तमाम तरह से वेतन भत्ते और सुविधाओं के रूप में लाखों नहीं करोड़ों बिना मांगे मिलते हैं। प्रधानमंत्री जी आप बताओ क्या उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए या नहीं , अगर जनता को आदेश देते हैं कि कुल मुद्रा के 1 6 प्रतिशत से काम चला लो तो खुद अपने भी खर्चे इतने न सही एक चौथाई कर काम चला लेने की बात करते। मगर किसी सांसद किसी विधायक किसी मंत्री पर कोई रोक नहीं लगी , आपको ढाई ढाई एकड़ के बंगले चाहिएं , तमाम सुरक्षकर्मी भी जनता के धन से और अपनी मर्ज़ी से निजि स्टाफ भी देश के ख़ज़ाने से। मोदी जी किसी भाषण में ये सवाल भी पूछते तो जनता बार बार दोहराती जी सरकार लोकतंत्र के नाम पर सभी लुटेरों की लूट अब तो बंद हो। कभी तो ये फैसला हो कि देश की आम जनता की आमदनी और मंत्रियों जनप्रितनिधयों पर खर्चे में कोई अनुपात रखा जाये। क्यों नहीं आप सभी पर इक शर्त लगाई जाये कि आपको सभी साधन सुविधाएं तभी मिलेंगी अगर जनता को जितना ज़रूरी उतना मिल सके ऐसा प्रबंध आप कर सकें। अगर आप में काबलियत ही नहीं देश की जनता की हालत को सही करने की तो कब तक मुफ्त में आपका बोझ सहती रहे जनता। आज आपको बताता हूं आपने किया क्या है।
                इक पुरानी कहानी नये ढंग से लिखनी पड़ेगी मुझे। सूरज ने वादा किया था मछलियों से उनको मगरमच्छ से सुरक्षित रखने का , बताया गया कि उसको बस में  करने का उपाय है 8 0 प्रतिशत पानी को सुखाने का।  थोड़ी सी परेशानी होगी कुछ दिन प्यास सतायेगी फिर सब ठीक हो जायेगा , सूरज का शासन था उसको सब करने का अधिकार मिल गया था।  अपनी ताकत की गर्मी से उसने तमाम पानी सुखा दिया और जिस जिस तालाब या नदी नाले के पास पानी था उसको जल्द ही वापस सरकार के समंदर में डालने का हुक्म सुना दिया जिस का पालन नहीं करना अपराध था। धीरे धीरे मछलियां मरती गई लेकिन मगरमच्छ को कुछ नहीं हुआ। आखिर सूरज को लगा मगरमच्छ को भी जीने का अधिकार है , और निर्णय किया गया आधा पानी मगरमच्छ को मिले और आधा सरकार के समंदर में भेंट कर अपने सारे अपकर्मों से मुक्त हो जाये। मछलियां अभी भी मर रही हैं पर मगरमच्छ सरकार की बात मानते हैं या नहीं कोई नहीं जानता।
           सीमा पर भी जैसा दावा किया गया था दुश्मन को समझ आ गई है वैसी बात दिखाई नहीं दे रही। यही तो सत्तर साल से होता आया है हर सरकारी दावा खोखला साबित होता रहा है। हर बार इक नई योजना पुरानी की जगह उसी की तरह और नाम से।  आज तक हर सरकार ने देश की जनता की तकलीफ को बढ़ाया ही है कम नहीं किया है। मोदी जी शायद अगले चुनाव में यही सवाल खुद से करेंगे जो किया नहीं पांच साल तक वो करना चाहिए था कि नहीं।  पर जवाब नहीं मिल सकेगा लगता है , मिल सकेगा फिर कोई नया नारा।