Saturday, 1 October 2016

श्री रूप देवगुण जी ( प्रिय मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय मेरी नज़र से

           मेरा वो पहला शहर से बाहर कहीं जाकर कविता पाठ करने का अवसर था , यूं निमंत्रण तो पहले भी मिलते रहे थे मगर जाना संभव नहीं हो सका था , डॉक्टर होने और निजि प्रैक्टिस में होने से सदा मन मार कर इनकार कर दिया करता था। शायद तब भी वही होता अगर आयोजक मित्र ने खुद आकर मिलकर मुझे विवश नहीं किया होता ये कहकर कि अगर नहीं गया तो वो मुझ से नाराज़ हो जायेंगे। मित्र को नाराज़ करना मेरे लिये जुर्म की तरह था और आज भी है। उस दिन रतिया नगर में हमारी पहली मुलाकात हुई थी जो फिर हमेशा की मित्रता के मधुर संबंध में बदल गई। तब से हम हमेशा सम्पर्क में रहे और जब भी जैसे भी संभव हुआ मिलते भी रहे , धीरे धीरे मुझे सिरसा शहर अपना लगने लगा तो रूप देवगुण जी के कारण। क्या ख़ास बात है जो मुझे उनके इतना निकट ले आई है। बहुत मधुर स्वभाव , निश्छल मन , सभी को अपना समझने और बनाने की कला , और किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखने की आदत , शायद अच्छे इंसान में यही गुण ही होते हैं। और मुझे कब से ऐसे अच्छे इंसान की तलाश थी , जो मिलना आसान नहीं था , मुझे रतिया नगर का आभार प्रकट करना चाहिये रूप देवगुण जी जैसे सच्चे इंसान से मिलवाने के लिये। ऐसे व्यक्ति से परिचय होना भी खुशनसीबी की बात है और  मित्रता होना तो इक बेशकीमती दौलत का अधिकारी होना है। बहुत किताबें लिखी है सभी विधा की आपने , मगर पहचान अधिक लघुकथा लिखने को लेकर है। कविता में कुदरत से , समंदर से पहाड़ से प्रकृति के रंगों से जैसा संबंध कायम करना उनको आता है वो अनुपम है। सब से अच्छी बात मुझे उनकी आशावादिता लगती है , जीवन में भी और लेखन में भी। उनके व्यक्तत्व पर ही किताब लिखी हुई है तो मैं प्रयास कर के भी कितना बता सकता हूं , फिर भी मेरी नज़र में यही हैं मेरे प्रिय मित्र रूप देवगुण जी।  उनकी कुछ रचनाएं जो मुझे बेहद पसंद हैं , आज लिखता हूं इक पोस्ट पर।
                    ************************************************
                           ग़ज़ल
चमकती हैं बिजलियां
डर रही हैं बस्तियां।
हो गई कैसी नदी
मर गई सब मछलियां।
जब नहीं पानी रहा
क्या लगायें डुबकियां।
बाढ़ में देखो कहां
चल रही है कश्तियां।
खोजने मोती गये
ढूंढ लाये सीपियां।
***************
                   ग़ज़ल
क्यों उठी उंगलियां
हैं कहीं खामियां।
कब मिटेगा धुंआ
पूछती झुग्गियां।
फूल खिलने लगे
आ गई तितलियां।
आ रही रौशनी
खोल दो खिड़कियां।
प्यार के खेल में
किसलिए झिड़कियां।
****************
                दूसरा सच ( लघुकथा )
     घर के सदस्य गप्प शप्प मार रहे थे , अचानक पड़ोस के नवयुवक सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा , कितना भला है सुजीत , हमारे घर के सभी काम सहर्ष कर देता है।
   मां बोली थी , बहुत ही अच्छा है सुजीत , अपनी जेब से पैसे खर्च देता है और बहुत कहने पर भी वापस नहीं लेता है।
   छोटा भाई बोला था , सचमुच बहुत ही प्यारा है , मुझे अक्सर खिलोने भी दिला देता है।
    मगर बड़ी बेटी जो ये सब सुन रही थी , उठ कर बाहर चली गई थी। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में सुजीत उस से बहुत कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।
                                    **********************
                  चुप सा रोना  ( कविता )
एक पक्षी ,
रह गया है ,
अकेला ,
चांदनी रत में ,
वह भटक रहा है ,
इधर उधर ,
बोलता जा रहा लगातार ,
बिछुड़ गया है वह अपनों से।
उसका दर्द ,
उमड़ आया है ,
मेरे मन में क्योंकि ,
इक दिन ,
मुझ से कहा था ,
मेरी अर्धांगिनी ने ,
जब मैं नहीं रहूंगी , 
तब क्या हाल होगा तुम्हारा ,
उस समय मैं भी बन गया था ,
अपने साथी से बिछुड़ा पक्षी ,
चिल्लाया नहीं ,
पर रोया था भीतर भीतर।
लोग जब हो जाते हैं अकेले ,
दिखाई देते हैं ,
भले चंगे सबको ,
पर ठीक होते नहीं हैं वो ,
रहते हैं बाहर से खामोश ,
मगर ,
रोते हैं भीतर भीतर ,
यह चुप सा रोना ,
व्यथा है दुनिया भर की ,
यह कही जाती नहीं ,
अकथ है ,
यही कथा है।
 **********************
                 पूछा मैंने किसी पक्षी से ( कविता )
सर्दी है  ,
धुंआ उठ रहा है ,
हर तरफ ,
पक्षियों को देखता हूं ,
बेखौफ , बेपरवाह , बेधड़क ,
उड़े जा रहे हैं।
किधर ,
क्या है मृत्यु ,
शायद नहीं उनको खबर ,
बैठे हुए हैं ,
वृक्ष की सबसे ऊंची टहनी पर ,
और हम हैं ,
पनाह लिये दुबके हुए ,
सर्दी से घबरा कर ,
बिस्तर में रज़ाई में।
कैसी होती है ,
सर्दी  , गर्मी , तपती लू , बरसात ,
बादलों की धुंध ,
यह प्रश्न पूछा उस पक्षी से ,
और दिया उस ने उत्तर मुझे ऐसे ,
उड़ गया खुले गगन में ,
दूर बहुत ऊंचा ,
हो गया मेरी आंखों से ओझल।
   **********************
               मेरी लघुकथा ( कविता )
उसके पास ,
गया तो था ,
मैं अपने दुःख-दर्द ,
सुनाने को ,
मगर वो मुझे ,
सुनाती रही थी ,
अपनी ही दर्द भरी ,
दास्तां ,
समझा तब मैं ,
उसकी कहानी है ,
इक उपन्यास और ,
मेरी मात्र इक ,
लघुकथा।
************************
             घर आई बिटिया रानी ( कविता )
शीतल पवन आती है ,
मदमाती हुई इठलाती सी ,
उपवन में ,
झूम उठती हैं ,
लताएं ,
लहलहा उठते हैं पौधे ,
खिल उठते हैं फूल ,
जैसे करते हों अभिनंदन ,
उसी तरह जैसे ,
आज खुश हैं सभी ,
घर के सदस्य जब ,
बहुत दिन के बाद ,
अपने मायके आई है ,
हमारी बिटिया रानी।
**********************
              सलीका जीने का ( कविता )
सारी ज़िंदगी ,
रहा हूं भटकता ,
फिर भी ,
नहीं सीख पाया ,
दुनिया में जीने का ,
सलीका।
सीख जाता ,
अगर मैं तो ,
शायद नहीं लिखता ,
कविता कहानी।
*********************************

 

No comments: