Monday, 25 April 2016

आप क्यों रोये ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ये क्या हुआ , कैसे हुआ , कब हुआ , ये ना पूछो। बस उनकी पलकें भरी सभा में छलक आईं। नेता जी परेशान हो  गये देखकर , कहना ही पड़ा आपकी आंखों में आंसू नहीं देख सकते। जल्द ही कोई समाधान आपकी समस्या का खोजेंगे मिल बैठ कर। 6 8 वर्षों से जनता रो रही उनको कभी कुछ नहीं हुआ , उनको रोता देखा तो परेशान हो गये। उस न्याय की देवी से इतना लगाव , बेबस डेमोक्रेसी की भी कभी सुध लेते आप जैसे नेता तो देश की जनता बदहाल नहीं होती। उनके आंसू खुद पौंछना चाहते हैं अपने हाथ से , अपने दामन से नेता जी। टुकड़े हैं मेरे दिल के ऐ यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई। तेरी आंख के आंसू पी जाऊं ऐसी मेरी तकदीर कहां , तेरे ग़म में तुझको बहलाऊँ ऐसी मेरी तकदीर कहां। ये सब देख कर हमसे भी रहा नहीं गया , पता लगाना ही पड़ा वो रोये तो क्योंकर रोये। जानकर वास्तव में दुःख हुआ। औरों को न्याय देने वालों को खुद किसी से उम्र भर न्याय नहीं मिला , और उस पर मज़बूरी ये कि कोई अदालत भी नहीं जहां जाकर फरियाद करते। जिसे आप समझ रहे थे कि काम के बोझ से परेशान हैं वो तो अपनी इकलौती पत्नी से पीड़ित निकले हर पति की तरह। बेबसी तो बहुत है न्याय देने वाले भी अन्याय सहते हैं ख़ामोशी से उम्र भर। बहुत कीमत होती है बड़े लोगों के आंसूओं की वो भी टीवी कैमरे के सामने। उसपर घर जाने पर पत्नी ने फिर ताना दिया , क्या ज़रा सी बात पर रोतेरहते हो पुरुष होकर भी। कितनी बार समझाया है कुछ तो समझो , पूरी उम्र समझती रह जाती हैं हम पत्नियां। बिना बात हमदर्दी मिल गई आपको , जानती हूं जो बोझ है आप पर , जो चिंता है। आपको क्या पता अन्याय क्या होता है , देश की गरीब जनता से पूछो कौन अन्याय करता है कौन न्याय। अपनी आंखों पर बंधी काली पट्टी खोलो तो नज़र आये सच क्या है। इस देश के नेताओं और सरकारी  अधिकारीयों को ही भरोसा है आप पर कि वो जो भी करते रहें आप उनको बचाते रहेंगे हर अदालत में , कितने घोटाले कितनी लूट , कितना भेदभाव इन्हीं की कृपा से होता रहा हो रहा और होता ही रहेगा , कौन चाहता रोकना।
       देश की जनता हर दिन रोती है खून के आंसू , किसी नेता को , किसी सरकार को दिखाई नहीं देते उसके बहते आंसू , आपकी आंख गीली हुई तो लगा जैसे पूरा देश ही बह जायेगा इस सैलाब में। जो खुद ही अपना रोना रोने लगे , सभी अधिकार हर सुख सुविधा पाकर , उसको दूसरों का दर्द ख़ाक पता चलेगा। बताओ कितने प्रतिशत लोग हैं जिनको वो सभी कुछ हासिल है जो आपको मिला है। आम लोगों के आंसू खुद कभी देख नहीं सके या देखना चाहे ही नहीं , काश इस बात पर रोते कि आपको जिनके आंसू पौंछने , वो नहीं पौंछ सके। इक आक्रोश होता तब आपकी बात में बेबसी नहीं। बुरा नहीं मानो मैं इनको मगरमच्छ वाले दिखावे के आंसू समझती हूं जो आप अपनी नाकामी को छुपाने को बहा रहे थे। क्या आपके आंसुओं को देख हम भूल जायें कि विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र में न्याय का मात्र तमाशा होता है न्याय किया नहीं जाता। आप किस के सामने रो रहे थे , जो बार बार अपनी सुविधा से क़ानून बदलते हैं अपने स्वार्थ के लिये। संविधान और न्याय के प्रति इन सभी दलों के नेताओं का रवैया एक जैसा है , खुद को क़ानून और संविधान से बड़ा मानते हैं। काश इसको लेकर भी कभी आपको आंसू आते और वो चाहते उनको पौंछना। दो तरह के आंसू होते हैं , एक जो खुद के दुःख दर्द में आते वो बस पानी होते हैं और दूसरे जो किसी और का दुःख दर्द देख कर आते वो मोती होते हैं। देश की गरीब जनता की भूख निराशा बदहाली और पल पल सत्ता की बेपरवाही का ज़ुल्म सहने से जो आंसू बहते रहते हैं उनको किसी नेता ने समझा ना ही आपने जिनका कर्तव्य ही यही था।  शोर मचा हुआ आपके रोने का , आपने जाने कितनो को रुलाया है , कोई नहीं सोचता , आप क्यों रोये ये चिंता हर किसी को सता रही है। मुझे मालूम है आप क्यों रोये , मगर क्या करूं किसी को बता भी नहीं सकती , मैंने आपकी राज़दार होने की शपथ ली हुई है , और सभी भूल सकते हैं मैं अपनी शपथ कभी नहीं भुला सकती।
( ये मेरी व्यंग्य रचना है , अप्रकाशित है , आज ही लिखी ब्लॉग पर। आप अख़बार में , पत्रिका में छाप सकते हैं )
डॉ लोक सेतिया , फतेहाबाद ( हरियाणा )

Sunday, 17 April 2016

तुझसे कि खुद अपने आप से ( गुज़ारिश ) 117 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सारी उम्र यही होता रहा ,
मुझे क्या पता ,
कौन करता रहा।
हर कदम ,
निराशा , हताशा ,
इक जंग किसी तरह जीने को।
जाने ये क्या है ,
मेरी नाकामी मेरी काबलियत की कमी ,
अथवा मेरी बदनसीबी।
ज़िंदगी में कभी भी ,
कुछ भी जो चाहा मैंने ,
मिला नहीं मुझे।
प्यार नहीं पैसा नहीं ,
नाम नहीं शोहरत नहीं।
इक उम्मीद फिर भी ,
जगाता रहा मैं किसी न किसी तरह ,
कि एक दिन सब बदलेगा ,
बदलना है मुझे।
बहुत किया विश्वास ,
मांगी हर दिन दुआ भी ,
करता रहा प्रार्थना परमात्मा से।
नहीं सुनी जाने क्यों ,
तुमने मेरी कभी फरियाद ,
नहीं हुआ मुझ पर कभी दयालु तू।
माना नहीं जीता कभी मैं ,
मगर मानी नहीं कभी हार भी ,
बिना तकदीर के सहारे भी जिया हूं मैं।
शायद मुझे छोड़ देनी चाहिए ,
अब जीने की हर इक उम्मीद ,
मगर नहीं टूटी अभी भी मेरी आशा।
मेरी कहानी में ,
बेशक नहीं होगा कोई सबक ,
जंग जीतने का ,
लेकिन मेरी जंग कभी ,
थमी नहीं होगी जीते जी।
कोई आगाज़ नहीं था मेरा ,
कुछ भी नहीं रहा बीच में ,
विस्तार या ऊंचाई ,
फिर भी इक अंत ,
ज़रूर होगा मेरा जानता हूं।
शायद कोई नहीं जानता ,
जीने के लिये कैसे खुद को और सभी को ,
छलता रहा हूं मैं ,
जो नहीं वो होने का आडंबर करके।
अगर तू है विधाता कहीं पर कोई ,
तो तू समझता होगा ,
मेरी हर परेशानी ,
जो मेरे सिवा नहीं समझा कोई भी दुनिया में।
ये मेरी शिकायत है या प्रार्थना ,
तुझ से है या फिर ,
खुद अपने आप से ,
नहीं मालूम मुझे ,
क्या मालूम है तुझे ऐ खुदा।

Sunday, 10 April 2016

भगवान की भी सुनो ( इक विचार ) डॉ लोक सेतिया

इक मंदिर में हादसा हो गया , आग लगी और लोग जल कर मर गये , कितने ही तड़प रहे दर्द से। क्या भगवान की यही मर्ज़ी थी। यही सवाल किया उसकी मूर्ति के सामने जाकर , क्या तुम थे वहां मंदिर में या कहीं और मस्ती कर रहे थे अपने परिवार और देवी देवताओं संग। क्या तुम बचा नहीं सकते थे अपने पास आये भक्तों को। क्या तुमने उनको खुद कोई सज़ा दी उनके पापों की ऐसे अपने ही मंदिर में। देखा भगवान की मूर्ति भी आंसू बहा रही है। मैंने कहा अब पछताने से क्या फायदा , पहले ही ये सब नहीं होने देना था। इक आवाज़ सुनाई दी , बस करो मुझे और परेशान न करो मैं पहले ही बहुत दुखी हूं। तुम लोग हर बात के लिए मुझे ही दोषी ठहराते हो , खुद क्यों नहीं सोचते क्या सही क्या गलत। जब खुद मंदिर का प्रशासन देखने वाले जो नहीं किया जा सकता वो करते हैं तो ये होना ही था , क्या भगवान ने कभी ऐसा कहा है कि नियम कायदे का पालन नहीं करो। अब जिस जगह ऐसे कायदे कानून की अनदेखी होती हो उस जगह कभी भगवान हो सकता है। लोग बेकार भटक रहे हैं इधर उधर , भला भगवान को उन सभी जगहों से क्या लेना देना जहां धन संम्पति की , सोने चांदी की , हीरे जवाहरात की , चढ़ावे की बात की जाती हो। मेरा कोई बाज़ार नहीं है , बिकता नहीं हूं मैं। तुम जहां खोजते वहां नहीं हूं मैं। देखना चाहते हो तो कहां नहीं हूं मैं। बस जहां समझते , वहां नहीं हूं मैं।

Sunday, 3 April 2016

साक्षात्कार भगवान श्री राम का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

संपादक जी के घर की कॉलबेल बजी , दरवाज़ा खोला तो देखा सामने बजरंग बली जी खड़े हैं। संपादक जी ने पूछा हनुमान जी आप , लगता है गलती से यहां आ गये हैं , मैं तो सभी धर्मों का आदर करने वाला हूं , मगर किसी देवी देवता का उपासक नहीं हूं। मैं अपने आप को सेकुलर मानता हूं और चाहता भी हूं कि मुझे सेकुलर ही समझा जाये। हनुमान जी बोले , महोदय मैं तो आपके लिये प्रभु श्री राम का संदेश लाया हूं  , आपको बुलाया है मिलने को। भगवान का बुलावा अर्थात मौत , सोचने लगे संपादक जी , तो बजरंग बली जी ने समझाया कि वो बुलावा नहीं , मैं तो आपको श्री राम के साक्षात दर्शन को ले जाना चाहता हूं और सकुशल वापस भी छोड़ जांऊगा। प्रभु को आपसे कुछ ख़ास बात करनी है , वो खुद भी आ सकते थे मगर इसलिए नहीं आये ताकि आपकी सेकुलर होने की छवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़े। संपादक जी सोचने लगे बेशक वो सेकुलर ही हैं और सभी धर्मों को समान समझते हैं , मगर किसी धर्म के ईश्वर का साक्षात्कार छापने वाले पहले पत्रकार वो हो सकते हैं , ऐसा अवसर कभी छोड़ नहीं सकते। इसलिए अवसर को गंवाना नहीं चाहते और बजरंग बली जी से जल्द ले चलने को कह दिया। कागज़ कलम साथ लिये चल दिये हनुमान जी के साथ , हनुमान जी ने उनको अपनी हथेली पर बिठाया और उड़ कर सीधे राम दरबार में जा पहुंचे।
        संपादक जी ने देखा कोई सुरक्षा जांच नहीं , कोई परिचय पत्र नहीं , अपॉइंटमेंट नहीं , जो भी चाहे आ सकता खुले दरबार में अपनी बात कहने को। कोई प्रशासन का अधिकारी नहीं रोक सकता , कुछ बताने की ज़रूरत नहीं पहले से कि कोई शिकायत है या कुछ मांगना है या कोई अन्य काम है। पहुंचते ही श्री राम संपादक जी के अभिवादन का जवाब देते हुए कहने लगे , आपका हार्दिक स्वागत है , आपको यहां आने का कष्ट देना पड़ा कुछ बात ही ऐसी थी। आप जनता तक सभी की बात पहुंचाते हो , शायद हमारी भी लोगों को समझा सको , वर्ना हमें नहीं लगता हमारी बात लोग समझना भी चाहते हैं। संपादक जी को लगा शायद भगवान पूरे पेज का विज्ञापन अख़बार में देना चाहते हैं , अपनी बात का प्रचार करने को। संपादक जी बोले भगवान आपकी सेवा का अवसर पाकर हमें ख़ुशी होगी , हमारी विज्ञापन की दरें और भी कम हो गई हैं , हमारी प्रसार संख्या करोड़ों में है देश भर में , सभी सरकारी विभाग हमें विज्ञापन देते हैं। श्री राम बोले महोदय आप गलत समझ रहे हैं , हमने कोई विज्ञापन नहीं देना है न ही कोई शुल्क ही आपको मिल सकेगा , हमें पता चला आप जनता की बात लिखते हैं अपने कॉलम में और पाठकों की बात में भी , हम चाहते आप हमारी भी बात लोगों तक पहुंचा दो , जनहित की बात समझ कर। संपादक जी भांप गये कि भगवान का इंटरव्यू छपना है , कागज़ कलम लेकर बोले आपसे कुछ सवाल करूंगा जिनके जवाब आप देना ताकि आपकी बात ठीक से समझी जा सके। श्री राम बोले ठीक है।
                संपादक जी बोले मेरा पहला सवाल अयोध्या में आपके मंदिर को लेकर है , क्या आपको उसके अभी तक नहीं बन पाने से दुःख है या बन जाने से ख़ुशी होगी। श्री राम बोले यही बात तो उनको कहनी है , मुझे किसी ईमारत में कैद नहीं होना है , हम तो अपने भक्तों के मन में बसते हैं। हमारे परम भक्त हनुमान ने अपना सीना चीर कर दिखा दिया था , आपने रामायण नहीं भी पढ़ी हो तो टीवी सीरियल तो देखा ही होगा। मैं तो कण कण में बसता हूं कोई देखना चाहे अगर तो , मेरा मंदिर तो कभी हर घर में हुआ करता था , लोग सुबह शाम राम राम किया करते थे , अब जब कोई भी किसी मर्यादा का पालन नहीं करता तब मेरे भव्य मंदिर बनाने से मुझे क्या प्रसन्नता हो सकती है। भगवान उदास हो गये अपनी बात करते करते। संपादक जी बोले आपको नहीं पता लोगों ने अपने वस्त्रों पर आपका नाम लिखवा रखा है , पत्थरों पर आपका नाम लिख रहे हैं। राम बोले मुझे सब पता है , आह भर कर कहने लगे , मेरे नाम की चादर ओढ़ने से , मेरे नाम की माला जपने से कोई मुझे नहीं पा सकता है। मैं तो तुम सभी के अंदर रहता हूं , मुझे और किसी जगह मत खोजो , जिसको अपने भीतर नहीं मिलता उसको बाहर भी नहीं मिलेगा कोई भी ईश्वर। आप सभी तक मेरा ये संदेश पहुंचा सको तो बहुत अच्छा होगा। लोग अपने घरों में गलियों में , गांव में शहर में मेरे रहने लायक थोड़ी जगह बनायें , अपने आस पास सभी दीन दुखियों की सहायता करें , मैं उन्हीं में रहता हूं। पत्थरों में नहीं बसता हूं मैं। कम से कम मेरे नाम पर , मेरे नाम पर मंदिर बनाने की बात पर कोई राजनीति नहीं करें। मैंने कभी राज-पाठ का लोभ नहीं किया था ,
हमेशा जनता की भावनाओं का आदर ही किया , तभी इक धोबी के झूठे आरोप पर अपनी पत्नी देवी सीता का त्याग कर दिया। कोई ऐसा नहीं कह सके कि नियम क़ानून राज परिवार पर लागू नहीं होते। अब तो राम राज्य की बात करने वाले खुद शाही ठाठ से राजा बनकर रहते हैं जब लोग गरीबी और भूख से तड़पते हैं। क्या ये मेरे अनुयायी हो सकते हैं ?
         संपादक जी बोले भगवान आपकी बात शत प्रतिशत सही है , जब आपको लगता है यहां कितना बुरा हाल है तो फिर से अवतार लेकर सभी पापियों रावणों से लोगों को निजात क्यों नहीं दिला देते। श्री राम बोले संपादक जी रावण तो महापंडित था , ज्ञानी दुश्मन अच्छा होता है मूर्ख दोस्तों से। और ये खुद को मेरे भक्त कहने वाले कितने समझदार हैं तुमसे छिपा नहीं है। समझदार दुश्मन लाख अच्छा होता है नासमझ दोस्तों से।
                  अचानक संपादक जी की नींद खुल गई और वो अपने सपने के बारे सोचने लग गए , कि राम की बात को कहां जगह दें अख़बार में। संपादकीय में या पाठकों की बात में। सेकुलर इमेज की चिंता के साथ कट्टर-पंथियों के नाराज़ होने का भी डर है। "मानो या ना मानो " शीर्षक कॉलम में ही छापना सही होगा।
                             ( पांच सौवीं पोस्ट है ये मेरे ब्लॉग की )