Sunday, 2 February 2014

सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने को खुद अमल करके नहीं दिखाना होता। स्कूलों में तो ऐसा भी होता है कि अध्यापक वो विषय भी पढ़ा रहे होते हैं जिसके बारे वे कुछ भी नहीं जानते। अध्यापकों को इसमें कोई परेशानी नहीं होती , कम ही होता है कि कोई छात्र समझ सके कि जो पढ़ाया जा रहा है वो सही है अथवा गलत। आजकल राजनीति में भी धर्म की तरह उपदेशक नज़र आने लगे हैं , सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं। कोई नहीं पूछता आपने कब पढ़ा है , आप खुद हर बात पर मुकर जाते हैं। उनका झूठ झूठ नहीं होता उनके पास तर्क होते हैं , कोई नहीं मानता अगर तो कुतर्क भी देने में रत्ती भर संकोच नहीं किया जाता। उनके अनुसार उन्हें छोड़ सब के सब भ्रष्ट हैं , उन्हें कोई कारण नहीं बताना होता , जब कह दिया तो मानना ही पड़ेगा आपको। अपने सर पर ईमानदारी का ताज और सीने पर तमगा लगाये घूमते हैं रात दिन। शायद आपको यकीन नहीं आये कि मैंने सरकारी असप्ताल में डेंटिस्ट को इमरजेंसी में ड्यूटी करते देखा है , कारण ये नहीं कि डॉक्टर नहीं होता , बल्कि इसलिये कि उसने खुद कमाई करने को सिफारिश से ये करवाया था।
           सरकार का हर मंत्री भाषण देता है जनता को कायदे कानून का पालन करने के , लेकिन खुद पर कभी कोई नियम लागू नहीं करते। सरकार जो भी करती है उसी में जनता की भलाई है , ये सबक जनता क्यों भूल जाती है। सरकार टैक्स लगाये , दाम बढ़ाये तो समझना चाहिये कि ऐसा करना ज़रूरी होता है। चुपचाप मान जाना चाहिये , विरोध नहीं करना चाहिये। मान लेना चाहिये कि जब हमने ही चुना है तो अपनी गल्ती की सज़ा भी कबूल करनी ही होगी। सरकार आपको किफायत करने का पाठ पढ़ाने के साथ साथ खुद जनता का धन बर्बाद कर सकती है। जनता को रोटी पानी नहीं मिले पैसे की कमी के कारण तो कोई बात नहीं , सरकार की हर दिन की मीटिंग में सजावट पर , जलपान पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना अनुचित नहीं होता। जनता को बताया जाता है रोज़ इतने रुपये कमाते हो तो गरीब नहीं हो , खुद उतने में रहने की बात भला सरकार कैसे सोच सकती है। जनता जनता है सरकार सरकार है। सरकार बनते ही हर दल को चंदा जमा करना ज़रूरी लगता है आने वाले कई सालों तक का चुनाव खर्च का प्रबंध करने के लिये। और ऐसा होते देर नहीं लगती , पर जब जनता की सुविधाओं के खर्च का सवाल आता है तब वे नहीं जानते कि धन आये तो कहां से आये।
                     सरकार चाहती है कि पुलिस और प्रशासन उसकी मर्ज़ी से काम करे न कि उचित अनुचित को देख कर निर्णय ले। जो किसी सत्ताधारी नेता की राह में अड़चन डाले उसको पद से हटाना सरकार का अधिकार है चाहे नियम ऐसा करने की इजाज़त देता हो चाहे न देता हो। जनता ने इनको जनसेवा के लिये थोड़ा वोट डाला था , इनसे संविधान और न्यायपालिका का सम्मान करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। ये सब तो बने ही नेताओं द्वारा खिलवाड़ करने के लिये हैं। पहले एक दल के नेता कर रहे थे अब दूसरे दल के , बस यही बदलाव बहुत है। हम लोग अब तक किसी पुराने युग में जी रहे हैं जो सत्ता के दुरूपयोग को कुर्सी के मोह को , शासन के अंधे अहंकार को एक रोग मानते हैं। नेता लोग ईमानदारी को सब से बड़ा रोग समझते हैं , वे खुद को इससे जितना भी मुमकिन हो दूर ही रखते हैं। जनता को ईमानदारी की राह पर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि खुद सरकार जो चाहे कर सके। अर्थशास्त्र का सूत्र है एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा , ये तभी तक सब कुछ कर सकते जब तक लोग इनके बराबर नहीं बन सकते। जनता को जनता का धन भी खैरात की तरह देने का नाम है लोकतंत्र में सरकार चलाना। लोगों का , इनको छोड़ बाकी सब का ईमानदार बनना आवश्यक है , इनके शासन करने के लिये। जैसे साधू लोग अपने अनुयायिओं को त्याग का उपदेश देते हैं , लेकिन चाहते हैं उनका चढ़ावा बढ़ता ही रहे। ये दोनों बातें एक दूसरे की पूरक हैं , इसको विरोधाभास नहीं समझना चाहिये। बस इतनी सी बात है।