Monday, 17 February 2014

नकाब देवताओं की , पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास ) कविता १८ भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

कलयुग में होने लगी जब सत्य युग की बात ,
बस तभी बरसी बहुत नोटों की यहां बरसात ,
लगने लगे संतों के आश्रमों में सोने के भंडार ,
गली गली जो घूमते उनको मिलती नहीं खैरात।
प्रवचन दिये सदकर्म के खुद रहे करते कुकर्म ,
लेकिन नहीं आती है अब तलक किसी को शर्म ,
सब दिया उपदेश छोड़ो लोभ माया मोह , खुद ,
अंबार धन के जमा करना रहा है उनका धर्म।
जाने किधर से आ गये सच के नये अवतार ,
कहने लगे जनता तेरा करना हमें उद्धार ,
होने लगी सब तरफ जब उनकी जयजयकार ,
आम आदमी से बन गये सत्ता के दावेदार।
सब को बताया आपने सब के सब है शूल ,
इस जहां में इक हमीं हैं खुशबू वाले  फूल ,
बिना किसी नींव के लो कर दिया खड़ा महल ,
बिखर गया इक झौंके से अब उड़ रही है धूल।
दो दिन में आपके देखे हैं सबने अजब अंदाज़ ,
अंजाम जाने क्या होगा अच्छा नहीं आगाज़ ,
कल तक जिस जनता को मालिक थे बताते ,
अब छीन कर लेने लगे उसी के सर से ताज़।
देखलो बंदो में ही बंदे कुछ खुदा बन गये ,
हमने समझा आदमी हैं वो ये क्या बन गये ,
रात देखा इक डरावना सा हमने कोई ख्वाब ,
चेहरे बदल कर दानव सब देवता बन गये।