Monday, 17 February 2014

नकाब देवताओं की , पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास ) कविता १८ भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

कलयुग में होने लगी जब सत्य युग की बात ,
बस तभी बरसी बहुत नोटों की यहां बरसात ,
लगने लगे संतों के आश्रमों में सोने के भंडार ,
गली गली जो घूमते उनको मिलती नहीं खैरात।
प्रवचन दिये सदकर्म के खुद रहे करते कुकर्म ,
लेकिन नहीं आती है अब तलक किसी को शर्म ,
सब दिया उपदेश छोड़ो लोभ माया मोह , खुद ,
अंबार धन के जमा करना रहा है उनका धर्म।
जाने किधर से आ गये सच के नये अवतार ,
कहने लगे जनता तेरा करना हमें उद्धार ,
होने लगी सब तरफ जब उनकी जयजयकार ,
आम आदमी से बन गये सत्ता के दावेदार।
सब को बताया आपने सब के सब है शूल ,
इस जहां में इक हमीं हैं खुशबू वाले  फूल ,
बिना किसी नींव के लो कर दिया खड़ा महल ,
बिखर गया इक झौंके से अब उड़ रही है धूल।
दो दिन में आपके देखे हैं सबने अजब अंदाज़ ,
अंजाम जाने क्या होगा अच्छा नहीं आगाज़ ,
कल तक जिस जनता को मालिक थे बताते ,
अब छीन कर लेने लगे उसी के सर से ताज़।
देखलो बंदो में ही बंदे कुछ खुदा बन गये ,
हमने समझा आदमी हैं वो ये क्या बन गये ,
रात देखा इक डरावना सा हमने कोई ख्वाब ,
चेहरे बदल कर दानव सब देवता बन गये।

Sunday, 16 February 2014

खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

वो सच की बात कहने का दावा करते हैं। मगर सच क्या है ये वो भी जानते हैं। हर सच पूरा सच नहीं होता , उसके पीछे कोई और कहानी भी होती है जिसको सामने नहीं आने दिया जाता। कभी पत्रकारिता में बड़े ज़ोर शोर से चर्चा होती थी पीत पत्रकारिता की। अब ये विषय कभी सुनाई ही नहीं देता। देखा जाये तो आज की सारी की सारी पत्रकारिता ही पीलिया रोग से पीड़ित है। सावन के अंधों जैसे बन चुके हैं , सब ने किसी न किसी रंग का चश्मा लगाया हुआ है। इनकी वास्विकता को उजागर करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि इनकी खुद की परिभाषा क्या है। आज इनको याद दिलाना ज़रूरी है कि पत्रकारिता का पहला सबक क्या कहता है। खबर किसको कहते हैं ? " खबर वो सूचना है जिसको कोई छिपाना चाहता है , लोगों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहता , पत्रकार का काम है उसको खोजना उसको तलाश करना उसको ढूंढना और पता लगा कर लोगों तक पहुंचाना "। मगर आज के अखबार वाले और समाचार टीवी चैनल वाले तो वही बता रहे जिसको कोई खुद बताना चाहता है। कोई प्रैस नोट भेजता है कोई पत्रकार वार्ता करता है। बात ये भी नहीं कि इनको धृतराष्ट्र की तरह कुछ दिखाई नहीं देता हो , अफसोस तो इस बात का है कि इन्होंने खुद गंधारी की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। इनको अपना स्वार्थ ही नज़र आता है , कर्त्तव्य नहीं। टी आर पी , प्रसार संख्या और विज्ञापनों का मोह , ये सब के सब फंस चुके हैं इसी जाल में। सिनेमा वालों ने जिस तरह खलनायक को नायक बना प्रस्तुत किया और ऐसा संदेश समाज को देने लगे कि ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिये और बुराई का अंत करना है तो खुद भी बुरे बन जाने में कोई हर्ज़ नहीं। कोई आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करे तो उसको डराना , भयभीत करना प्यार है। आज जिनको आप नायक महानायक बता रहे हैं उन्होंने अपनी फिल्मों में यही उल्टी परिभाषा गड़ी है। क्या ये यही बताना चाहते हैं कि जो सच की राह पर चलते रहे तमाम मुश्किलों के बावजूद वो नासमझ थे। जो प्यार में त्याग किया करते थे वो मूर्ख थे। सच कहा जाये तो सिनेमा भी कब का सही मार्ग से भटक गया है। लेकिन हम बात पत्रकारिता की कर रहे थे , ये तो बीच में मिसाल याद आ गई।
                           अब देखा जाये पत्रकारिता का दावा करने वालों का असली चेहरा। चलो सब से पहले उस बात का ज़िक्र करते हैं जिसका शोर आये दिन किया करते है ये सभी। घोटालों की बात। आपको मालूम है कि आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है।  ज़रा सोचो क्या हो सकता है। ख़ास बात ये कि वो हमेशा से हो रहा है , हर दिन होता है , हमारे सामने होता है और शायद सदा होता ही रहेगा। क्योंकि उसकी बात कोई नहीं करता , करेगा भी नहीं। भला जिस के दम पर आपका वजूद टिका हो आप उसको समाप्त होने दोगे। ये सब दावा करते हैं सब से तेज़ दौड़ने का लेकिन इन सब को ज़रूरत है उन सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों की। यही है देश का आज तक का सब से बड़ा घोटाला। सरकार का धन किसी ऐसे कार्य पर खर्च करना जिस से जनता का कोई भला न हो केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाया जा सके , उसको भ्रष्टाचार ही कहते हैं।अभी एक नया विज्ञापन दिखाया जा रहा है बेघर लोगों को घर देने का , जिसमें विज्ञापन देख कर ही बस्ती में रहने वाले खुश को निकल पड़ते हैं झूमते गाते। गरीबी हटाओ खाने को अधिकार शिक्षा का अधिकार ईलाज का अधिकार सभी कुछ है सरकार के विज्ञापनों में। क्या ये सच है , पैसे लेकर हर झूठ का प्रचार करवा लो इन सच के झंडाबरदारों से। ये प्रयोजित कार्यकर्म दिखाते हैं अमीर बनने के यंत्र वाले , लोगों को अंधविश्वास के जाल में फसाते हैं चंद पैसों की खातिर। भूत प्रेत की डरावनी कहानियां , सनसनी फैलाने वाले किस्से , क्या बीमार मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे। अब तो इनका काम समाचार देना नहीं रह गया , ये खबर बनाने लगे हैं। बिना मतलब की चर्चा होती है पूरा दिन भर किसी भी विषय पर। नतीजा कुछ नहीं , पानी में मधानी मारना कहा जाता है इसे। कभी माखन नहीं निकलता इस काम से , मगर ये मलाई खा रहे इसी दम पर , दस मिंट की चर्चा में बीस मिंट का ब्रेक विज्ञापनों का। कभी कोई जानता नहीं था जिस राखी सावंत को , इनकी कृपा से बिग बॉस में और भी चर्चित होकर वो शख्सियत बन जाती है।
                                   इनको यही चाहिये कि कुछ चटपटा मसाला मिलता रहे लोगों को बांधे रखने को। क्या यही मकसद होना चाहिये मीडिया का। मनोरंजन का साधन नहीं है पत्रकारिता। ये नहीं जानते कि इन्होंने अपने निजि स्वार्थ के लिये देश और समाज का कितना नुकसान किया है। जिस तरह पिछले कुछ दिनों में एक व्यक्ति टीवी अखबार और सोशल मीडिया का उपयोग करके मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुंचा और खुद को हर कायदे कानून और संविधान से परे समझने लगा वो इनकी अपरिपक्वता की निशानी है। अगर आपका मकसद उचित है तो आपका रास्ता भी ईमानदारी का होना चाहिये। अन्यथा झूठे नारों से देश की जनता हमेशा ही छली जाती रही है। जो व्यक्ति सरकारी अधिकारी रहते राजनीतिक उदेश्यों के कार्य करता रहा , वेतन लेकर विदेश शिक्षा पाता रहा और वापस आने के बाद दो वर्ष नौकरी करना ज़रूरी है के नियम को ताक पर रख घर बैठा रहा छुट्टी लेकर , जो कर्ज़ लिया विभाग से उसको लौटने में आनाकानी करता रहा , हर बार कोई बात करने के बाद मुकरता रहा , सब के लिये सभ्यता को ताक पर रख अपशब्दों का प्रयोग करता रहा , अपने साथ वालों का गल्त आचरण देख कर भी चुप रहा और बाकी सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता रहा , क्या वही है आपकी नज़र में नायक। लोकतंत्र में कोई तो मर्यादा हो जिसका पालन अपने विरोधी का विरोध करते भी किया जाना चाहिये। ये पहली बार देखा कोई शीशे के घर में रहने वाला भी पत्थर मारता हो दूसरों को। क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे अन्य दल वाले किसी मुद्दे को सत्ता पाने का बहाना बनाते रहे हैं , ये भी भ्रष्टाचार को अपनी नैया बना चुनाव की गंगा पार करना चाहते हैं। क्या मीडिया वालों को अभी तक इतनी सी बात नहीं समझ आई , क्या ये आम आदमी का नाम लेकर कुछ खास लोगों की महत्वांक्षा पूरी करने की बात नहीं। कितने ख़ास लोग इनके दल में शामिल हो रहे हैं आजकल , क्या ये सांसद और विधायक बनने की चाह में नहीं आये। क्या ये भी आम आदमी को पीछे नहीं छोड़ देंगे।
                              ये सब इसलिये बताना पड़ा है क्योंकि पहले भी पत्रकारिता को दुरूपयोग कर लोग सत्ता की गली में प्रवेश पाते रहे हैं।  आज कोई अखबार जब कई कई बार पूरे पन्ने पर इनका साक्षात्कार छापता है तो पूछना पड़ता है कि क्या ये खबरों का अकाल है या फिर आपकी सोच ठहर गई है। बहुत हैरानी की बात है , इन के पास एक सौ बीस करोड़ लोगों की खबर नहीं है कोई भी दिखाने को न ही छापने को। एक और बेहद ज़रूरी बात है इनकी , ये हर दिन दावे किया करते हैं लोगों की राय जानने के। कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय भला पूरे देश का मानसिकता का पता दे सकती है। क्या ये जनता को गुमराह करने अथवा भ्रमित करने का काम नहीं है। मगर इनके लिये भी कोई सीमा निर्धारित नहीं उचित की अनुचित की। शायद यही चलन बन गया है आज का , सब दूसरों को आईना दिखाते हैं , खुद को कोई आईने में नहीं देखना चाहता। कभी अपने को आईने के सामने खड़े हो कर देखना चाहिये जो सब को सच का आईना दिखाने की बात करते हैं , जब कि वो आइनों का बाज़ार सजा उसका कारोबार करने लगे हैं। हां भाई भतीजावाद यहां भी छूटा नहीं है।  अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम भी खूब होता है इनके घर में जिसको ये अपना विशेषाधिकार मानते हैं।

Wednesday, 12 February 2014

देवी देवताओं का बाज़ार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

बहुत ही विकट समस्या खड़ी हो गई है। चित्रगुप्त जी ने धर्मराज जी से साफ कह दिया है कि वे अब सेवा निवृत होना चाहते हैं। अब उनसे पाप पुण्य का हिसाब संभाला नहीं जा रहा , धर्मराज कोई अन्य व्यवस्था के लें जितना जल्द हो सके। धर्मराज जी को आज तक वी आर एस जैसी किसी स्कीम की कोई जानकारी नहीं थी , जिसको आधार बना चित्रगुप्त जी ने अपनी अर्ज़ी दी है। धर्मराज चित्रगुप्त को समझा रहे हैं कि अगर आप सब के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब नहीं देखोगे तो उनको बहुत परेशानी होगी। ऐसे में वो न्याय नहीं कर पायेंगे। अब तक आप ये कार्य पूरी निष्ठा पूर्वक करते रहे हैं , ये अचानक आपको क्या सूझी है। चित्रगुप्त बता रहे हैं कि अब उनका काम करना बेहद कठिन हो गया है , क्योंकि सभी देवी देवता उनके कार्य में अनावश्यक रूप से दखलंदाज़ी करने लगे हैं। आये दिन कोई न कोई देवी देवता उनको सूचित किया करते हैं कि उन्होंने किसी के सब पाप और अपराध माफ कर दिये हैं , अपराधी उनके दर पर क्षमा मांगने आये थे चढ़ावा लेकर। ये तो सरासर रिश्वतखोरी है। भ्रष्टाचारी घोटालेबाज़ तक जब पकड़ में आते हैं तब इनकी शरण में पहुंच जाते हैं। इन बड़े लोगों को न कोई अदालत सज़ा दे पाती है न हम ही दे सकते हैं। क्या यहां भी छोटे छोटे चोर सज़ा पायेंगे और बड़े बड़े माफी पाते रहेंगे। धर्मराज भी ये जानकर चिंतित हो गये , सोचने लगे तभी धरती पर अपकर्म बढ़ता ही जा रहा है। ये तो देवी देवता अराजकता फैला रहे हैं दिल्ली की सरकार की तरह। आप अभी सब देवी देवताओं को सूचित कर कि वो ऐसा कोई काम नहीं करें जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। ये बात सपष्ट की जाती है कि किसी भी देवी देवता को अधिकार नहीं है अपने भक्तों के पाप और अपराध क्षमा करने का। किसी की शरण में जाने मात्र से कोई बच नहीं सकता अपने कर्मों का फल भोगने से। कोई धर्म गुरु कोई देवता अगर अपने अनुयायियों को गुमराह करता है ये कह कर कि वो उनके अपकर्मों को क्षमा करवा सकता है तो वो न केवल सृष्टि के नियमों का अनादर करता है बल्कि खुद भी उनके पापों का सहभागी है। भविष्य में ऐसा करने वाले लोगों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
                                 अब चित्रगुप्त कार्य करने को राज़ी हो गये हैं। सब देवी देवताओं को चित्रगुप्त जी का खुला पत्र मिला है एक चेतावनी के रूप में। निर्देश दिया गया है कि अब कोई अगर किसी के पाप और अपराध क्षमा करने का प्रस्ताव उनके पास भेजेगा तो उस पर कड़ी करवाई की जायेगी। ईश्वर तब निर्णय करेगा कि उनका देव पद पर रहना उचित है अथवा अनुचित। पत्र को पढ़ते ही खलबली मच गई है देवी देवताओं में , चिंता होने लगी है कि कहीं ये बात उनके भक्तों तक न पहुंच जाये कि उनके पास वरदान देने या किसी के कर्मों का फल नहीं मिलने देने का अधिकार ही नहीं है। ऐसे में तो उनके धर्मस्थलों के सामने लगने वाली कतारें ही नहीं रह जायेंगी। फिर तो हम केवल नाम को ही देव रह जायेंगे। सभी देवी देवता एक साथ मिल कर ईश्वर के पास गये हैं मांग पत्र लिये कि उनको ऐसा अधिकार होना चाहिये।
                                    ईश्वर उन सब को समझा रहे हैं कि आप सभी व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। क्या जो आपके भक्त हैं वो केवल आप पर भरोसा करते हैं , क्या वो कभी इस कभी उस तरफ डांवाडोल नहीं हुए रहते। आज के आपके भक्त तो बाज़ार के ग्राहक कि तरह हैं , किसी भी एक दुकानदार पर इनको भरोसा नहीं है। हर दुकानदार भी मुनाफा ही कमाता है , मगर मुफ्त उपहार और छूट का प्रलोभन देकर ग्राहकों को आकर्षित करता है। आपको भी ये बात समझनी होगी , आखिर ये भक्त आप में से ही किसी न किसी के दर पर ही तो आयेंगे। जैसे दुकानदार उपहार और छूट की बात कहते हैं लेकिन साधते खुद अपना आर्थिक हित ही हैं , उसी तरह आप भी क्षमा और वरदान का झूठा भ्रम बनाये चुपचाप सब देखते रहो। आपकी असलियत कोई भक्त कभी नहीं जान पायेगा। ये बात आपको भी जान लेनी ज़रूरी है कि कर्मों का फल तो आपको भी भोगना होगा , अगर आप पाप और अपराध को बढ़ावा देंगे तो देवी देवता नहीं रह जायेंगे। ईश्वर की बात सब समझ गये हैं , लेकिन ये भी जान गये हैं कि ये अंदर की बात है , किसी को कानोकान खबर न हो।

Monday, 10 February 2014

नया मदारी , नया तमाशा ( तरकश ) डा लोक सेतिया

राजनीती के खेल में इक नया मदारी आया है। उसने आकर बातों से सब को बहलाया है , भरमाया है। कोई नई छड़ी दिखाने को लाया है , राजधानी में जादू चलाकर दिखाया है। हर तरफ धूप में आता नज़र साया है। क्या बतायें हमने क्या खोया है और क्या पाया है। खाली हाथ आया है , कहता है सब ले आया है। अब नई कानून की इक छड़ी बनानी है , बस उसी से सब को सज़ा दिलानी है। उसके पास अलादीन की कोई निशानी है , चालीस चोरों वाली नई कहानी है। खुल जा सिम सिम नहीं होगा इस ज़माने में , काम आयेगी छड़ी कोई लोकपाल लाने में। उस छड़ी से गायब सब बलायें कर देगा , और झोली सबकी मोतियों से भर देगा। बस ज़रा सी मुश्किल पेश आई है , उसने सभा बस उस जगह बुलाई है। इक तरफ कुआं है सामने और पीछे भी खाई है। मान जाओ बात उसकी इस में ही अब भलाई है। भूख नहीं लगेगी , प्यास नहीं लगेगी , उसके मंत्र से पूरी ज़िंदगी चलेगी। खेल है मदारी का नया तमाशा है , बस सभी के मुंह में दे दिया बताशा है। बिजली मिलेगी पानी मिलेगा , अब किसी का कोई भी न मीटर चलेगा। इक छड़ी बनाने दो उसे ये कहता है , कुछ कोई न सोचो क्या क्या बना जो ढहता है। हर किसी टोपी अपनी जब पहनाता है , कल का शैतान भी भगवान कहलाता है। खुद को बताया नया इक अवतार है , जय जो उसकी बोले उसकी नैया पार है। गर ना मानी तुमने सामने मझधार है। नित  कोई बिसात वो शतरंज की बिछाता है , या कोई चौसर के खेल में बुलाता है। चाहे नज़र आता कोई भी पासा है , जीत वही जाता है , ताली बजाता है। अब सभी जगह बस उसी का राज होगा , इक मदारी के सर पर ही सजा ताज होगा। पर सभी को इस बात की खबर है , पल भर को रहता हर जादू का असर है। जब भी उसका खेल देख कर बाहर सब आते हैं , फिर वही पुरानी दुनिया सामने पाते हैं। खेल हर खिलाड़ी का इक सुहाना सपना है , सब उसी के पास रहता कुछ भी न हुआ अपना है। सोचते थे लोग सब थाली मिलेगी , कौन जानता था जेब खाली मिलेगी।
( अभी बात अधूरी है , बाद में पूरी की जायेगी वादा है )

Sunday, 9 February 2014

सपने देख कर खुश हो जाओ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सर्वेक्षण करना कोई कठिन कार्य नहीं है। आप किसी भी विषय पर कर सकते हैं सर्वेक्षण। कोई बंधन नहीं है। कोई सवाल नहीं कर सकता कि कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय देश की जनता की राय कैसे हो सकती है। ये कारोबार बहुत लोग सालों साल से सफलता पूर्वक कर रहे हैं। उन को पैसा शौहरत ही नहीं मिली बल्कि अब तो वो भी नेता कहलाने लगे हैं। कल तक जो बाकी लोगों को कहा करते थे कि नेता किसी बात पर कभी कुछ कभी कुछ बोलते हुए शर्मसार नहीं होते आज खुद वही करते हैं निसंकोच। इक नया शोध सामने आया है कि जागते हुए अच्छे अच्छे सपने देखना लाभकर होता है। अगर आपको भूख लगी है और घर में खाने को कुछ भी नहीं है तो आप रूखी सूखी रोटी खाने के नहीं हलवा पूरी के सपने देखो। जब सपनों से ही पेट भरना है तो जो मन को पसंद हो वही खाने का सपना देखें। रस मलाई खाओ रस गुल्ले खाओ। कोई बिल नहीं मांग सकता। बेरोज़गारी में किसी बड़े ओहदे के अफ्सर होने की कल्पना कीजिये , हो सके तो ये ख़्वाब देखो कि आप कंपनी के मालिक बन औरों को नौकरी दे रहे हैं। बेशक आपके पास साईकिल खरीदने को भी पैसे नहीं हों , आप मर्सिडीज़ कार खरीदने से कम के सपने क्यों देखें। देश के एक पूर्व राष्ट्रपति भी बड़े बड़े सपने देखने की बात कहते थे , उनका सपना था सन दो हज़ार बीस में भारत को महान शक्ति बनने का , छह साल बाद देखते हैं उसका क्या हुआ। अभी तो सब वो बात भूल चुके हैं। सपने बेचना ख़ास कर झूठे सपने बेचना राजनीति का काम रहा है। कुछ नये लोग नये सपने दिखला कर थोड़े ही दिन में सत्ता पर आसीन हो गये हैं।
           अगर आप भी देश की बदहाली देख देख कर परेशान रहते हैं तो आप भी कुछ ऐसे सुनहरे सपने देखा करें जैसे मैं देखता रहता हूं। मैं हर दिन कल्पना करता हूं कि सब कुछ बदल गया है , कहीं भी किसी बुराई का नाम तक बाकी नहीं रह गया है। सब देशवासी अपने बारे नहीं देश व समाज के बारे पहले सोचते हैं। सभी नेता पूरी तरह ईमानदारी से देश और जनता की सेवा करने लगे हैं , वे सादगी पूर्वक रहते हैं , जनता का एक पैसा भी व्यर्थ बर्बाद करना उनको घोर अपराध लगता है। प्रशासन खुद को शासक नहीं जनता का सेवक मानने लगा है और किसी भी काम में कोई बाधा नहीं है। अपना कर्त्तव्य निभाना ही हर अधिकारी को कर्मचारी को सच्चा धर्म लगता है। परिवारवाद और पूंजीवाद का अंत हो चुका है , अब वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो चुका है। देश में कोई भी गरीब नहीं है न ही किसी की तिजोरी में अरबों रुपये सड़ रहे हैं। राजनीति में अपराधियों को पवेश नहीं मिलता है , सांसद और विधायक जनता और देश पर बोझ नहीं हैं। अब उनके वेतन पर सुविधाओं पर सैर सपाटों पर धन बर्बाद नहीं किया जाता है। उन्होंने अपना सर्वस्व देश को अर्पित कर दिया है ताकि जनता की समस्याओं का अंत हो सके। अब कोई सफेद हाथी नहीं कहलाता है। किसी भी नेता के पास उसके परिवार के किसी भी सदस्य के नाम पर कोई फार्म हाउस या पैट्रोल पंप नहीं है। न ही कोई किसी सरकारी भूमि पर कब्ज़ा ही किये हुए है।
                       धर्म के नाम पर कोई कारोबार नहीं होता है अब। कोई भी आपसी भेदभाव की या नफरत फैलाने की बात नहीं करता है। किसी के पास भी धर्म के नाम पर अरबों की संपति जमा नहीं है , सब ने सारा का सारा धन दीन दुखियों की सहायता करने पर खर्च कर दिया है। साधू सन्यासी कोई कारोबार नहीं करते हैं। हर धर्म के अनुयाई सदाचार का पालन करते हैं , धार्मिक होने का झूठा आडंबर नहीं करता कोई भी। संत बन कर कोई अधर्म और पाप नहीं करता है। धर्म के नाम पर अंधविश्वास को कोई बढ़ावा नहीं  दे रहा है। उनके पास कोई कोठी कार बंगला नहीं है केवल एक गठड़ी है जिसमें दो जोड़ी वस्त्र हैं जिसको लिये कहीं भी गुज़र कर लेते हैं , कल की चिंता नहीं करते सब कुछ त्यागने वाले। पुलिस सभ्य बन चुकी है और चरित्रवान भी , रिश्वत का नाम तक नहीं लेता कोई पुलिस वाला। जनता को पुलिस से भय नहीं लगता है , लूट मार , चोरी बलात्कार ,का कोई अपराधी बच नहीं पाता है। कोई महिलाओं को बुरी नज़र से नहीं देख सकता , औरत पर अन्याय करने वाले को समाज स्वीकार नहीं करता है। लोग भी सचाई की राह पर चलते हैं और निडर हो कर रहते हैं। कोई भी किसी को धोखा नहीं देता , कोई हेराफेरी ठगी नहीं करता किसी से। भाई भाई का दुश्मन नहीं है। मीडिया वाले भी सही राह पर आ गये हैं , झूठ को सच साबित नहीं करते , न ही खुद को सब से बड़ा ही समझते हैं। सब तरफ अमन है चैन है सुख है शांति है। फूल ही फूल हैं सब तरफ बहार का मौसम है।
                       शोध करने वालों का निष्कर्ष है कि सुनहरे सपने देखना लंबी आयु प्रदान करता है , तंदरुस्त रखता है। मुंगेरी लाल बनना बुरा नहीं है। हसीन सपने देखने में कोई बुराई नहीं है। एक बार इन सर्वेक्षण वालों की बात पर अमल कर के अवश्य देखना। खराब से खराब हालात में भी आप खुश रह सकते हैं। अब शायद यही किया जा सकता है , कितनी बार दूसरों के दिखलाये सपने देख कर छले गये। अब खुद अपने सपने से अपने को छलना सीख लें।

Wednesday, 5 February 2014

खेलने में भी समझदारी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कभी खेल खेल में बात बन जाती है और कभी बिना बात खेल बिगड़ भी जाता है। हुस्न वाले तो दिलों से भी खेला करते हैं , उनका ये शौक बहुत ही अजीब है। राजनीति तो है ही खेल सत्ता का लेकिन कई बार खेलों में भी राजनीति होने लगती है। कभी खिलाड़ी राजनेता बन जाते है , कभी राजनेता खेल खिलाने लगते हैं। बात अगर धनवानों की करें तो उनके लिये हर बात पैसे का खेल है। शादी से लेकर रिश्ते नाते दोस्ती तक सब में कारोबार होता है। अध्यापकों के लिये शिक्षा भी किसी कारोबार से कम नहीं है , जो खूब फल फूल रहा है। मगर खेलों जैसा कारोबार दूसरा कोई नहीं है। खेलने वाले खिलाड़ी तक इक खिलौना हैं , असली खेल तो टीवी चैनल वालों , और अपना सामान बेचने वालों का है जो विज्ञापन देकर अपना धंधा करते हैं। उन्हें जीत या हार से नहीं , रोमांच से मतलब होता है ताकि दर्शक देखते रहें। ये खेलते हैं खिलाते हैं और हर हाल में जीतते हैं मुनाफा कमा कर। इनके लिये क्रिकेट हाकी फुटबाल टैनिस सब बराबर हैं , किसी में कम किसी में अधिक कमाई है।
                बात अब समझ आई है , वर्ना लोग हैरान होते थे कि क्रिकेट के खेल में एक खिलाड़ी के आऊट होते ही बाकी सब भी पीछे पीछे लाईन लगा चल देते हैं। देखने वाले निराश होकर पानी की खाली बोतलें मैदान में फैंकने लगते और कमेंटेटर उनके आचरण पर अफसोस जताते। ऐसे समय उन खिलाडियों को कोई अफसोस है ये नज़र नहीं आता था। तब हम से अनाड़ी भी कहते कि इस से बेहतर तो हमी खेल सकते थे , भला शून्य से कम में हमें कोई कैसे आऊट कर सकता था। हम भी उनकी तरह शान से अपना सर उठा कर चलते , हम भी अपनी पत्नी के साथ विदेश की सैर करते शॉपिंग करते। हमें श्रीमती के ताने नहीं सुनने पड़ते कि कभी विदेश भ्रमण पर नहीं ले जा सकते। अब जाकर पता चला है कि खिलाड़ी दोषी नहीं थे अच्छा नहीं खेलने के लिये , सारा का सारा दोष उन सट्टेबाज़ों का था जिन्होंने पहले ही तय कर दिया था कि किस किस को किस किस गेंद पर कैसे आऊट होना है। माया महाठगिनी सब जानी , माया का खेल है , खेल की माया है। बहुत साल बाद मालूम हुआ कि कभी दक्षिण अफ्रीका से श्रंखला हमने ऐसे ही जीती थी। ये तरीका अगर समझ लेते तो हम कभी कोई मैच नहीं हारते। कहा जाता है इस दुनिया में सब बिकता है अगर सही खरीदार मिल जाये। आदमी का ईमान तक बिकाऊ है तो टीम क्यों नहीं हो सकती। दक्षिण अफ्रीका की टीम अगर चार करोड़ थी तो दूसरों की कुछ कम या अधिक होगी। बड़ी मज़ेदार बातें होती होंगी खिलाड़ियों के बीच। कोई कहता होगा यार हारने के बाद वहां चलोगे , दूसरा जवाब देता होगा शाम चार बजे तक मैच निपटा दें तब मज़ा आयेगा। कभी एक पूर्व खिलाड़ी पर चुटकुला बना हुआ था , पत्नी को फोन पर कहते थे कि अब ज़रा बैटिंग करने जा रहा हूं , तुम चाय बना लो तब तक घर आता हूं। मुमकिन है कोई बैटिंग को जाने से पहले आधी बची शीतल पेय की बोतल साथी को देते हुए बोले के पकड़े रखना अभी वापस आकर पीता हूं। सच पूछो तो मज़बूरी है इनके लिये खेलना , नहीं खेलें तो नाम नहीं मिलता विज्ञापन नहीं मिलते , न फिल्मों का आफर मिलता है न टीवी पर साक्षात्कार। जब ये सब मिलता है तब खेलना एक गले पड़ा ढोल होता है जिसको बजाना ही पड़ता है। हर कोई वही रोज़ रोज़ करते उकता जाता है , नेता समाज सेवा से , अफसर फाइलों से , वकील मुव्वकिल से , डॉक्टर मरीज़ से। लेकिन पैसे का मोह विवश करता है काम करने को। खिलाड़ी लोग समझते हैं सेंचरी बनाने के रनों के ही रेकॉर्ड बनाते हैं , मगर वो सोचते हैं इस साल एक होटल एक बंगला एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बना लिया है। एक शीतल पेय कंपनी का विज्ञापन है जिसमें एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी का मुखौटा पहन खेलने चला जाता है। ये सच में भी हो सकता है कभी जब मामला फिक्स हो। जीत हार तो खेल का हिस्सा हैं। अच्छा खेलने के लिये जितने मिलते हैं उससे अधिक पैसे खराब खेलने के लिये मिलते हों तो अच्छा खेलना बेवकूफी होगी। खराब खेलना भी समझदारी हो सकती है। केवल डिटरजेंट खरीदना ही समझदारी का काम नहीं है। 

Monday, 3 February 2014

गिरती हुई दीवार है , ठोकर मत लगाना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सुना था समझदार लोग बहुत ही खतरनाक होते हैं। अपनी साहूलियत के लिए सच को झूठ साबित कर सकते हैं और झूठ को सच भी। इतिहास भरा पड़ा है , जिन पढ़े लिखे लोगों ने ग्रंथ लिखे , उन्होंने खुद को सुरक्षित रखने को हर बात के दोहरे मापदंड भी निसंकोच घोषित कर डाले। साथ में ये भी लिख डाला कि इस सब पर सवाल उठाना पाप है नास्तिकता है। हम धर्म भीरू लोग सोचना तक नहीं चाहते कि क्या जो जो हमें पढ़ाया और समझाया जाता है जा रहा है वो सही भी है या नहीं। आज का बुद्धिजीवी समाज भी वही सब दोहरा रहा है। ये सब शायद मुझे ध्यान नहीं आता अगर मैं आज की एक नई नई चली राजनीति की बातों को गौर से नहीं देखता। अभी तक देखते रहे हैं कि जो नेता चुनाव में सत्ता धारी लोगों की कमियां बता कर सत्ता पाते थे उनको लगता था कि अब हमें वो सब नहीं दोहराना है बल्कि अपना ध्यान जनता की समस्याएं दूर करने और अपनी नीतियां लागू करने पर देना चाहिये। जो लोग बदले की भावना से राजनीति करते रहे हैं वो कभी सफल नहीं हुए। दिल्ली में जब से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है तब से उनका पूरा ध्यान ही नकारात्मक कार्यों पर ही रहता है। नई बात इस सरकार के दो ऐसे नये कदम हैं जिनको उसके नेता बड़े ही गर्व से महान घोषित कर रहे हैं। पहला काम पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र देना। यहां एक बात को जान लेना ज़रूरी है कि चुनाव में प्रलोभन देना भले अनुचित हो फिर भी सरकार को काम बंद करने को नहीं कहा जा सकता है। महीनों तक सरकार और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती। हां अगर कोई सत्ता का दुरूपयोग करके चुनाव जीतता है तो आप अदालत जा सकते हैं। शायद यहां ये याद करना भी ज़रूरी है कि देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक इसके लिए कटघरे में खड़ी हो चुकी है किसी समय। आम आदमी पार्टी के नेताओं से पूछा जाना चाहिये कि जिन अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र दिये गये क्या उनका अस्तित्व नहीं था , अगर वे वहां थी और ये प्रमाणपत्र उनको इसलिये दिया गया ताकि कल उनके होने पर ही कोई सवाल नहीं खड़ा करे। कोई उस जगह को अधिकृत नहीं कर सके , गरीबों का घर छीना न जा सके। अब चाहे तब सरकार ने ऐसा लोगों को खुश कर वोट पाने को ही किया हो तब भी ये जन विरोधी काम तो कदापि नहीं था। और क्या आप उन अवैध कालोनियों का अस्तित्व नकार सकते हैं। सच तो ये है कि ये खुद जानते हैं कि जो वो करने जा रहे हैं वो फज़ूल की अदालती जंग है जिसका हासिल कुछ भी नहीं होना। बस ये कर आम आदमी पार्टी दिखाना चाहती है कि वो पिछली सरकार के गलत कामों का हिसाब कर रही है , जबकि जहां खुद उसने भ्रष्टाचार की जाँच करनी है उससे बच रही है। क्योंकि जिसकी बैसाखी थाम कर आप चल रहे हो उसको ठोकर लगायेंगे तो उससे पहले खुद गिर जायेंगे। और वास्तव में यही तो कर रहे है ये तथाकथित आम आदमी पार्टी के लोग , नैतिक तौर पर ये रसातल में जाते जा रहे हैं। दूसरी बात जो वो कर रहे हैं वो है दिल्ली में लोकपाल कानून विधानसभा में लाने की। आम आदमी पार्टी न किसी नियम को मानती है न प्रक्रिया का ही पालन करती है , बार बार मनमानी कर कोई सत्ता धारी सरकार खुद अराजकता को बड़ा रही है। लेकिन इतना तो उनको भी मालूम है कि संविधानिक प्रक्रिया का पालन किये बिना अगर वे कोई विधेयक पारित भी करते हैं और कोई उसको अदालत में चुनौती नहीं भी देता और वो लागू भी हो जाता है तब भी अगर किसी पर भी ऐसा लोकपाल करवाई करेगा तब पहला सवाल उसके खुद के औचित्य पर खड़ा होगा। अवैध कालोनियों की तरह का एक प्रमाणपत्र आपके लोकपाल को हासिल हो सकता है। सच तो ये है कि ये सचाई भी जानते हैं आम आदमी पार्टी वाले , मगर ये सोचते हैं कि इस सब की नौबत आने से पहले उनको लोकसभा चुनाव में इन कदमों का लाभ मिल चुका होगा। दूसरे शब्दों में जिस बात का दोषी पूर्व मुख्यमंत्री को मानते है वही बात खुद भी कर रहे हैं। इन आम आदमी के पैरोकारों से कोई तो पूछेगा कि आपको अब खास लोग क्यों प्रिय लगने लगे हैं , जाने माने लोग , कल तक के सरकारी अधिकारी क्या यही आम आदमी की पहचान बनेंगे कल। कोई अपने वजूद को ऐसे ही मिटाता हो तो किसी अन्य को ज़रूरत ही क्यों होगी कुछ भी करने की। गिरती हुई दीवार की तरह है , इसको कोई ठोकर न लगाना।

Sunday, 2 February 2014

सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने को खुद अमल करके नहीं दिखाना होता। स्कूलों में तो ऐसा भी होता है कि अध्यापक वो विषय भी पढ़ा रहे होते हैं जिसके बारे वे कुछ भी नहीं जानते। अध्यापकों को इसमें कोई परेशानी नहीं होती , कम ही होता है कि कोई छात्र समझ सके कि जो पढ़ाया जा रहा है वो सही है अथवा गलत। आजकल राजनीति में भी धर्म की तरह उपदेशक नज़र आने लगे हैं , सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं। कोई नहीं पूछता आपने कब पढ़ा है , आप खुद हर बात पर मुकर जाते हैं। उनका झूठ झूठ नहीं होता उनके पास तर्क होते हैं , कोई नहीं मानता अगर तो कुतर्क भी देने में रत्ती भर संकोच नहीं किया जाता। उनके अनुसार उन्हें छोड़ सब के सब भ्रष्ट हैं , उन्हें कोई कारण नहीं बताना होता , जब कह दिया तो मानना ही पड़ेगा आपको। अपने सर पर ईमानदारी का ताज और सीने पर तमगा लगाये घूमते हैं रात दिन। शायद आपको यकीन नहीं आये कि मैंने सरकारी असप्ताल में डेंटिस्ट को इमरजेंसी में ड्यूटी करते देखा है , कारण ये नहीं कि डॉक्टर नहीं होता , बल्कि इसलिये कि उसने खुद कमाई करने को सिफारिश से ये करवाया था।
           सरकार का हर मंत्री भाषण देता है जनता को कायदे कानून का पालन करने के , लेकिन खुद पर कभी कोई नियम लागू नहीं करते। सरकार जो भी करती है उसी में जनता की भलाई है , ये सबक जनता क्यों भूल जाती है। सरकार टैक्स लगाये , दाम बढ़ाये तो समझना चाहिये कि ऐसा करना ज़रूरी होता है। चुपचाप मान जाना चाहिये , विरोध नहीं करना चाहिये। मान लेना चाहिये कि जब हमने ही चुना है तो अपनी गल्ती की सज़ा भी कबूल करनी ही होगी। सरकार आपको किफायत करने का पाठ पढ़ाने के साथ साथ खुद जनता का धन बर्बाद कर सकती है। जनता को रोटी पानी नहीं मिले पैसे की कमी के कारण तो कोई बात नहीं , सरकार की हर दिन की मीटिंग में सजावट पर , जलपान पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना अनुचित नहीं होता। जनता को बताया जाता है रोज़ इतने रुपये कमाते हो तो गरीब नहीं हो , खुद उतने में रहने की बात भला सरकार कैसे सोच सकती है। जनता जनता है सरकार सरकार है। सरकार बनते ही हर दल को चंदा जमा करना ज़रूरी लगता है आने वाले कई सालों तक का चुनाव खर्च का प्रबंध करने के लिये। और ऐसा होते देर नहीं लगती , पर जब जनता की सुविधाओं के खर्च का सवाल आता है तब वे नहीं जानते कि धन आये तो कहां से आये।
                     सरकार चाहती है कि पुलिस और प्रशासन उसकी मर्ज़ी से काम करे न कि उचित अनुचित को देख कर निर्णय ले। जो किसी सत्ताधारी नेता की राह में अड़चन डाले उसको पद से हटाना सरकार का अधिकार है चाहे नियम ऐसा करने की इजाज़त देता हो चाहे न देता हो। जनता ने इनको जनसेवा के लिये थोड़ा वोट डाला था , इनसे संविधान और न्यायपालिका का सम्मान करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। ये सब तो बने ही नेताओं द्वारा खिलवाड़ करने के लिये हैं। पहले एक दल के नेता कर रहे थे अब दूसरे दल के , बस यही बदलाव बहुत है। हम लोग अब तक किसी पुराने युग में जी रहे हैं जो सत्ता के दुरूपयोग को कुर्सी के मोह को , शासन के अंधे अहंकार को एक रोग मानते हैं। नेता लोग ईमानदारी को सब से बड़ा रोग समझते हैं , वे खुद को इससे जितना भी मुमकिन हो दूर ही रखते हैं। जनता को ईमानदारी की राह पर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि खुद सरकार जो चाहे कर सके। अर्थशास्त्र का सूत्र है एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा , ये तभी तक सब कुछ कर सकते जब तक लोग इनके बराबर नहीं बन सकते। जनता को जनता का धन भी खैरात की तरह देने का नाम है लोकतंत्र में सरकार चलाना। लोगों का , इनको छोड़ बाकी सब का ईमानदार बनना आवश्यक है , इनके शासन करने के लिये। जैसे साधू लोग अपने अनुयायिओं को त्याग का उपदेश देते हैं , लेकिन चाहते हैं उनका चढ़ावा बढ़ता ही रहे। ये दोनों बातें एक दूसरे की पूरक हैं , इसको विरोधाभास नहीं समझना चाहिये। बस इतनी सी बात है।

Saturday, 1 February 2014

नौ सौ चूहे खाकर बिळी हज को चली ( तरकश ) डा लोक सेतिया

आज अपने प्रिय अख़बार में एक साक्षात्कार पढ़ा किसी दल के नेता का। सोचा इनकी बात पढ़कर जाने कितने लोग इनके समर्थक बन जाएंगे बिना जाने कि इनकी कथनी और करनी में कितना भेद है। चलो बात शुरू करता हूं अन्ना जी के अंदोलन से। मोबाईल पर संदेश मिला पत्रकार मित्र का शामिल होने के लिये लाल बत्ती चौक पर आने का। भ्रष्टाचार का विरोध करते उम्र बीती है तो चला गया था। वहां जो देखा हैरान करने वाला था। कोई बेहद असभ्य भाषा का उपयोग कर रहा था किसी महिला नेता के बारे में उसकी निजि ज़िंदगी को लेकर। मुझे लगा यहां बैठना उचित नहीं। उठ कर जाने लगा तो एक व्यक्ति ने रुकने और कुछ बोलने को कहा , मैंने निवेदन किया कि शायद जो मुझे लगा और कहना चाहता हूं वो आपको पसंद नहीं आये। वो जानते थे मैं निडर हो अपनी बात कहता हूं। जब उन्होंने कहा कि आप ज़रूर बोलें , शहर के जाने माने साहित्यकार हैं , तब बोलना ही पड़ा और मैंने पूछा वहाँ बैठे लोगों से कि अभी जो सज्जन बोल रहे थे क्या वो उचित था। तब सब बोले कि नहीं वो गलत था , मैंने पूछा तब आपने एतराज़ क्यों नहीं किया। खैर मैं अपनी बात कह कर चला आया था , दुःख हुआ कि गांधी जी की तस्वीर लगा कर क्या क्या हो रहा है। जो बात वहां नहीं कह सका तब वो और भी ज़रूरी है , जो लोग मंच पर विराजमान थे वे वही थे जो खुद रिश्वतखोर थे और अधिकारियों के दलाल थे। समझ गया कि जैसे जे पी के अंदोलन में शामिल लोग बाद में सत्ता पाकर अपना घर भरते रहे और समाजवाद की नई परिभाषा घड़ते रहे अपने परिवार को भी राज परिवार बनाने का काम करते रहे , शायद वही फिर दोहराया जा सकता है। वास्तव में कुछ लोग नाम शोहरत और राजनीति में प्रवेश के लिये अवसर तलाशते रहते हैं , उनको किसी मकसद से किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं होता है। देश भर में अन्ना की लहर थी जिसे मैं भी देख रहा था , पर सोचता था काश इस बार कुछ अच्छा हो। उसके बाद की बात सभी जानते हैं , वो सब पीछे रह गया है और इक नया दल सत्ता में आया एक राज्य में और अब उसको पूरे देश में दोहराना चाहता है। क्या सत्ता पाना मात्र ही सब का मकसद होना चाहिए या सत्ता पाकर उसको बदलना चाहिए जिस से तंग आकर जनता ने आपको चुना है। एक दौड़ शुरू हो गई सदस्य बनाने की , क्या जानते हैं जो आपके सदस्य बन रहे उनका ध्येय क्या है , अभी तक कहां थे क्या कर रहे थे। आपके दल के महत्वपूर्ण सदस्य ऐसे हैं जो सरकारी नौकरी करते थे , वेतन लेते थे लेकिन कभी काम नहीं करते थे , अपना कोई कारोबार चलाते थे। आज ये सब ईमानदार हो गये , दूध के धुले और आप सूचि जारी करते हैं बाकी दलों में भ्रष्ट लोगों की। विडंबना यही है कि सब को दूसरों के चेहरे के दाग़ नज़र आते हैं , अपने आप को कोई नहीं देखता आईने में। एक बात और बताना चाहता हूं , मेरे घर के पास एक दुकानदार कुछ दिन पहले इनकी टोपी पहन कर बैठता था , औरों को सदस्य बनाने का काम करता था। जब देखा उसको बिना टोपी के और पूछा तो उसने बताया कि इनकी वास्विकता समझ चुका है और अब किसी दल से कोई मतलब नहीं है उसका। मालूम नहीं इनकी जो संख्या है दस रुपये में सदस्य बने लोगों की उनमें कितने अपना मन बदल चुके हैं और कितने इनके आचरण को देख बदल सकते हैं। आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते हैं , सब को हमेशा के लिये नहीं , ये सब जानते हैं। और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब को पहचानती है।