Thursday, 6 June 2013

कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

सभी धर्मों के ईश्वर ,
वहीं पर थे ,
सभी के सामने ,
लगी हुई थी ,
भक्तों की लंबी लंबी कतारें।

सभी बढ़ा कर हाथ ,
दे रहे थे अपने भक्तों को आशीष ,
खुश हो रहे थे ,
पा कर ढेर सारा चढ़ावा।

किसी को नहीं था मतलब ,
कौन है अच्छा और कौन बुरा ,
कोई नहीं दे रहा था ,
जैसे जिसके कर्म हों ,
उसको वैसा फल।

देख कर चुप नहीं रह पाया ,
आखिर को वो था इक पत्रकार ,
छोड़ सभी को पीछे ,
चला आया था वो सबसे आगे ,
बढ़ा दिया अपना कैमरा ,
सामने उन सभी भगवानों के।

और माइक पकड़ ,
पूछने लगा उन सब से ,
अपने सवाल ,
ये क्या देख रहा हूं मैं ,
क्या कर रहे हैं सभी आप ,
सोचते नहीं -देखते नहीं।

किसने किये कितने पुण्य ,
नहीं किसी को भी कह रहे ,
करते रहे कितने पाप।

मुस्कुराने लगे ,
सभी के सभी ईश्वर ,
सुन उसकी बात।

फिर समझाया उसको ,
किस युग की करते तुम बात ,
कलयुग में नहीं ,
लागू हो सकते नियम ,
सत्य युग वाले।

इस युग में खुली छूट है ,
लूट ले छीन ले ,
जैसे भी कमा ले ,
बस हर बार हमें याद रख ,
सर झुका चढ़ा चढ़ावा ,
खुश कर हमें।

और फलने फूलने का ,
हमसे आशीष पा ले ,
पत्रकार हो  इतना नहीं जानते।

कलयुग कैसे कलयुग रहेगा ,
अगर पाप ही नहीं रहेगा ,
पापियों के लिये ही है ये युग ,
इसमें पाप हमेशा ही बढ़ेगा।

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