Sunday, 23 June 2013

बिना मंजिल का सफ़र है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बिना मंज़िल का सफर है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

दौड़ रहे हैं
सभी दौड़ रहे हैं
क्यों  किसलिये
नहीं जानते
कहां जा रहे हैं
क्यों जा रहे हैं
फुर्सत नहीं है 
किसी को सोचने की
बस हर किसी को
यही  डर है
कहीं पीछे न रह जायें हम
सभी को सब से
आगे निकलना है।

कौन सी मंज़िल है
कौन सा रास्ता
किसका साथ है
छूट गया क्या क्या कैसे
नहीं जानता कोई भी
अपना अंजाम
बस भाग रहे हैं
तेज़ और तेज़
वक़्त से आगे
निकलना है सभी को
जीवन भर
भागते जाना है
बेमकसद
इस अंधी दौड़ में
छूट गया जीवन भी
हासिल कर लिया बहुत
बहुत अभी करना है
अंत में मिलनी है
हर किसी को
दो गज़ ज़मीन
भागते भागते
निकल जानी है
किसी दिन जान।

विकास के नाम पर
विनाश की ओर जा रहे
मानवता के मूल्यों को
लोग सब बिसरा रहे
भौतिकता में
उलझे हैं हम
सुबह से शाम तक
रात को सुबह बताते
दिन को रात बता रहे
जानते हैं
समझते हैं
सही नहीं दिशा हमारी
मगर नासमझने को
समझदारी मानते
जो नहीं आया
खुद को भी अभी तक समझ
वही सबक लोग सब
औरों को समझा रहे।

चल रहे हैं लोग
ऐसी राह पर
जिस पर नहीं है
कोई भी मंज़िल कहीं
ख़त्म हो सकती नहीं
ज़िंदगी की दूरियां
चाहते हैं सभी खोजना
अपनी अपनी ज़िंदगी
हो रहे हर पल
मगर हैं दूर सभी लोग 
अपनी ज़िंदगी से। 

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