जून 28, 2023

POST : 1686 ज़माने तुझे सच दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 ज़माने तुझे सच दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  ' तनहा ' 

ज़माने तुझे सच दिखाएं तो कैसे 
सियासत है कैसी बताएं तो कैसे । 
 
हुए हम भी बर्बाद बेचैन तुम भी 
ये इल्ज़ाम किस पर लगाएं तो कैसे । 
 
सभी मर चुके हैं कहां जी रहे हैं 
हैं अहसास मुर्दा जगाएं तो कैसे । 
 
चली तेज़ आंधी यहां नफरतों की 
सबक प्यार वाला पढ़ाएं तो कैसे । 
 
वो आवाज़ देने लगी फिर सुनाई 
उसे पास फिर से बुलाएं तो कैसे ।
 
नहीं भूल पाए मुहब्बत तुझे हम 
बताओ तुम्हें भूल पाएं तो कैसे । 
 
अकेले खड़े बीच बाज़ार  ' तनहा '   
है जाना किधर और जाएं तो कैसे । 
 

 



 

जून 27, 2023

POST : 1685 ख़्वाब में कौन मुझको है देता सदा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 ख़्वाब में कौन मुझको है  देता सदा  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

ख़्वाब में कौन मुझको है देता सदा 
है वफ़ा कुछ नहीं है जफ़ा का मज़ा । 
 
प्यार करना बड़ा जुर्म साबित हुआ 
बज़्म में लोग सारे हैं मुझसे खफ़ा । 
 
चारागर ज़ख्म पर ज़ख़्म देने लगे 
दर्द की कौन देता किसी को दवा । 
 
इस जगह मत करो बात इंसाफ़ की 
ज़ुल्म ढाती सियासत की हर इक अदा । 
 
कौन थे वो जिन्हें मंज़िलें मिल गईं 
सब रहे पूछते रास्तों का पता । 
 
क्या बताएं कि अच्छा बुरा कौन है
कह रहे हैं सभी हम यहां के ख़ुदा । 
 
फ़लसफ़ा ज़िंदगी का है ' तनहा ' नया 
हम वफ़ादार हैं आप सब बेवफ़ा ।  
 

 

जून 26, 2023

POST : 1684 सुनो गर दास्तां तुमको सुनाएं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     सुनो गर दास्तां तुमको  सुनाएं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

सुनो गर दास्तां तुमको सुनाएं  
तुम्हें हम मेहरबां अपना बनाएं ।

नज़र आये नया कोई  सवेरा   
डराने लग गई काली घटाएं ।
 
सभी इंसान हों इंसानियत हो   
यही मज़हब चलो अपना बनाएं ।  
                                           
है दिल ऊबा हुआ तनहाइयों से
कोई अपना मिले घर पर बुलाएं ।

हमें रुसवा नहीं करना है उनको  
किसी को ज़ख्म कैसे हम दिखाएं ।

चलेंगे साथ मिलकर ज़िंदगी भर  
सभी शिकवे गिले हम भूल जाएं ।

तुम्हारा साथ मिल जाए हमें तो
मुहब्बत क्या ज़माने को दिखाएं । 
 
   {  1973 की लिखी अपनी  पहली ग़ज़ल को सुधारा है फिर से   }




जून 22, 2023

POST : 1683 अंधेरों में शमां रौशन करेंगे हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  अंधेरों में शमां रौशन करेंगे हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

अंधेरों में शमां रौशन करेंगे हम 
चढ़ा दो आप सूली पर चढ़ेंगे हम । 
 
बड़ा ही बेरहम बेदर्द ज़ालिम है 
जो है क़ातिल मसीहा क्यों कहेंगे हम ।  

नहीं पीना दवा के नाम पर विष को 
नहीं बेमौत ऐसे तो मरेंगे हम । 

किसी आकाश से मांगे इजाज़त क्या 
परों को खोलकर अपने उड़ेंगे हम । 
 
समझने लग गया जैसे ख़ुदा तू है 
तुम्हारे इस सलीके पर हंसेंगे हम ।
 
है बढ़ते कारवां को रोकना मुश्क़िल 
जंज़ीरें तोड़ कर अपनी चलेंगे हम । 
 
नहीं तूफ़ान से डरता कभी ' तनहा '
बदलते मौसमों से क्या रुकेंगे हम ।   




 

जून 18, 2023

POST : 1682 कला के सौदागर ( बहती गंगा में नहाना ) डॉ लोक सेतिया

     कला के सौदागर ( बहती गंगा में नहाना ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने टीवी चैनेल पर खबरें देखना छोड़ दिया है , जब से उनका मकसद विज्ञापन और अनावश्यक राजनीति धर्म की बहस में उलझा कर दर्शकों को वास्तविकता से भटकाए रखना बन गया है । ' बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते  , सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते '। मेरी ग़ज़ल का मतला है  , कभी कभी कोई आपदा विपदा घटना दुर्घटना की जानकारी पाने को टीवी चैनेल पर नज़र चली जाती है कुछ ऐसा ही हुआ कल तो ख़बर पता चली कोई फ़िल्म बनी है भगवान राम को लेकर । एंकर और फ़िल्मकार लगा जैसे इक प्रियोजित बहस का आनंद उठा रहे हैं क्योंकि सबकी बोलती बंद करवाने वाली एंकर खुद थोड़ा नाप तोलकर बोलती दिखाई दी पहली बार । जिस पर फ़िल्म में अनुचित शब्दों का उपयोग करने के आरोप की चर्चा हो रही थी उसका रुख आक्रामक और चोर मचाए शोर की बात को चरितार्थ करता लगा । खुद ही अपना गुणगान करने लगे ये कहकर की उन्होंने क्या खूबसूरत गीत लिखे हैं पंक्तियां बोलीं तो हैरान हुआ कि कई बड़े पुराने गीतों में उपयोग किये शब्दों को अदल बदल कर अपने मौलिक घोषित करने की कोशिश है । अधिक सफाई देने वाले अक़्सर गुनहगार होने का आभास करवाते हैं । कोई बात नहीं ये कोई वास्तविक गंभीर विषय नहीं है असली बात कुछ और है कि वो जनाब अपनी फ़िल्म की आलोचना करने वालों को घोषित कर रहे थे ये वही लोग हैं जो भगवान राम को मानते नहीं हैं आदि आदि । अर्थात टीवी स्टुडियो में बैठ कर आप अपनी बात की सफाई नहीं दे कर आरोप लगाने वालों पर लांछन लगाने की बात कर रहे थे । उनको गर्व था जिस भी किरदार को महान या नीचा दिखाना चाहें उनका अधिकार है लेकिन उनको कोई ये नहीं पूछता कि फिर आप कोई नई कथा कहानी क्यों नहीं लिखते किसलिए पुरानी लिखी हुई कथाओं से जो जहां से आपको सुविधा जनक लगी उठा ली और कह दिया कथावाचकों से रामलीला से आपने ऐसा सुना हुआ है । ये कमाल की बात है अजीब तौर है कि आप आरोपी भी गवाह भी और वकालत से लेकर फैसला करने वाले न्यायधीश भी खुद ही बन बैठे । यही चलन सबसे ख़तरनाक है जो इधर चल पड़ा है ।  
 
आजकल बड़े बड़े कलाकार सत्ता की चौख़ट पर गर्दन झुकाए अनुकंपा की आस लगाए हैं मगर नहीं जानते कि सत्ता कभी किसी पर रहम नहीं करती है आज किसी की बारी है तो कल आपकी भी बारी आएगी । जो आज किसी शासक को बड़ा साबित करने को पिछले शासक को बौना साबित करने को साहित्य और इतिहास से छेड़छाड़ करते हैं क्या कल उनकी लिखी बात कोई बदलेगा कभी तो खुद वो भी शासक के साथ कटघरे में खड़े नज़र नहीं आएंगे । सच लिखना साहस का काम है चाटुकारिता तो ग़ुलामी की निशानी है । कला को बेचने वाले अभिनेता लेखक फ़िल्मकार खुद को बड़ा छोटा बना लेते हैं चंद सोने चांदी के सिक्कों या कोई ईनाम पुरूस्कार पद की लालसा में । वास्तविक मकसद छूट जाता है समाज को सही मार्गदर्शन देने का , क्या कल्पना लोक की कथाओं कहानियों जैसे झूठे किरदार दिखला कर दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं या उनको गुमराह कर रहे हैं । धार्मिक कथाओं ने लोगों को कायर बना दिया है और सभी अन्याय अत्याचार ख़ामोशी से सहते हैं ये मानकर कि कोई मसीहा आएगा उनको इंसाफ़ दिलाने और बचाने इक दिन । रावण की कमियां ढूंढना चाहते हैं तो राम को भी कसौटी पर खरा साबित करने की कोशिश करते , क्या पत्नी की अग्निपरीक्षा और त्याग करना  बन भेजना राजा या पति का न्याय होना चाहिए । आज इनकी उपयोगकिता कितनी है और आधुनिक संदर्भ में कितनी सार्थक है । अपने समय की बात को भूलकर पुरातन काल के यशोगीत गाना भविष्य को संवारता नहीं है जानते हैं इतना सभी लोकतंत्र में जनता की छोड़ शासक की बात करना किसी अपराध से कम नहीं है । कल्पनाशीलता का आभाव है जो आप अपने इस  समय की बात कहने का साहस तक नहीं करते और खुद भी उलझे हुए हैं सबको उलझाने की कोशिश करते हैं ।  
 
सबसे अधिक विडंबना की बात ये है कि अभिनेता खिलाड़ी धर्म-उपदेशक  फ़िल्मकार संगीत निर्देशक से समाजसेवक तक सभी पर्दे पर सार्वजनिक मंच पर जो किरदार दिखाई देता है वास्तविक जीवन में उस के विपरीत आचरण करते पाए जाते हैं तब भी शर्मसार नहीं होते है । कभी साहित्य राजनेताओं को गिरने से संभालता था सभी ने सुना होगा इक दिन इक बड़े राजनेता सत्ता के भवन की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते गिरने लगे तब इक जाने माने साहित्यकार ने उनको थाम लिया था , धन्यवाद करने लगे तो लिखने वाले ने कहा था ये तो उनका कार्य ही है जब भी राजनीति फ़िसलती है साहित्य उसको संभालता है । अब वो बात नहीं है शायद उल्टा होने लगा है राजनीति ने साहित्य को अपने माया जाल में उलझा दिया है । आधुनिक फिल्म टीवी सीरियल आपको आदर्शवादी नहीं बनाते बल्कि हिंसक और चरित्रहीन बनाने का कार्य करने लगे हैं । आजकल इनको नंगा होने पर शर्म नहीं आती नग्नता को अपनी पहचान बना उस पर गौरान्वित हैं । कभी किसी ने सोचा तक नहीं कि क्यों आधुनिक काल की वास्तविक समाजिक समस्याओं विसंगतियों विडंबनाओं पर कोई उपन्यास कोई कहानी कोई फिल्म कोई टीवी सीरियल बनाया नहीं जाता है । कितना बासी भोजन कब तक परोसा जाता रहेगा और देश समाज को और बीमार करते रहेंगे । 
 


 

जून 11, 2023

POST : 1681 ये दिल हर किसी को दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 ये दिल हर किसी को दिखाएं तो कैसे ( ग़ज़ल )

 डॉ  लोक सेतिया ' तनहा '

ये दिल हर किसी को दिखाएं तो कैसे
है वीरान कितना , बताएं तो कैसे ।

हमीं जब नहीं ख़ुद मुहब्बत के काबिल 
नज़र को नज़र से मिलाएं तो कैसे ।

कहां ढूंढते हो फ़रिश्ते ज़मीं पर 
ज़मीं आस्मां पास आएं तो कैसे ।
 
यही आख़िरी सांस हम जानते हैं 
किसी चारागर को बुलाएं तो कैसे । 
 
ख़ुदा से ख़ुदाई नहीं मांगते हम
हां उन से रसाई भी पाएं तो कैसे ।  

घड़ी आ गई जब विदा हो रहे हैं 
बताओ ज़रा मुस्कुराएं तो कैसे । 

जिसे भूलना लाज़मी शर्त ' तनहा '
कहानी वो सबको सुनाएं तो कैसे । 





जून 10, 2023

POST : 1680 ज़हर खुद ही आकर पिला दे कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   ज़हर खुद ही आकर पिला दे कोई  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

ज़हर खुद ही आकर पिला दे कोई
मुहब्बत करने की सज़ा दे कोई ।
 
नहीं कोई शिकवा ग़मों का फिर भी 
कहां रहती खुशियां बता दे कोई । 
 
गुज़ारी हमने उम्र हंसते गाते 
रहें चुप हम कैसे सिखा दे कोई । 
 
मेरे सीने में आग जलती कब से 
कभी आ कर उसको बुझा दे कोई । 
 
यही दिल की इक आरज़ू है बाक़ी 
मुझे गा कर लोरी सुला दे कोई । 
 
अंधेरों ने बर्बाद कर दी दुनिया 
बुझे सारे दीपक जला दे कोई । 
 
लिखा जो तुमने उम्र सारी ' तनहा '
नहीं कोई पढ़ता मिटा दे कोई । 
 

 
 


जून 08, 2023

POST : 1679 कौन किस तरह जीता , सोचता कोई नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   कौन किस तरह जीता , सोचता कोई नहीं ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया ' तनहा '  

कौन किस तरह जीता , सोचता कोई नहीं 
बदनसीब जनता को  , देखता कोई नहीं । 
 
हाथ जोड़ कर तुम सरकार से खैरात लो 
लूट को अमीरों की रोकता कोई नहीं । 
 
अब नहीं मिलेगा उनको खुला आकाश जब 
पर उड़ान भरने को खोलता कोई नहीं ।  

छटपटा रहे जकड़े बेड़ियों में लोग हैं
कुछ रिवायतों को अब तोड़ता कोई नहीं । 

कौम के मुहाफ़िज़ होते नहीं ऐसे कभी 
बेज़मीर सारे सच बोलता कोई नहीं । 
 
दौर नफ़रतों का ऐसी सियासत देश की 
चोर सब सिपाही हैं मानता कोई नहीं । 

देशभक्त होने का टांग तमगा जो लिया 
कौन दे गया  ' तनहा ' पूछता कोई नहीं । 




 

POST : 1678 ख़ुश्क आंखें हैं जुबां ख़ामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

ख़ुश्क आंखें हैं जुबां ख़ामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

ख़ुश्क आंखें हैं जुबां ख़ामोश है 
हो गई हर दास्तां ख़ामोश है । 
 
रात जैसे दिन हैं सभी लगने लगे 
हो गया अपना जहां ख़ामोश है । 
 
बात करने को कई दिल में अभी 
हम भी चुप वो मेहरबां ख़ामोश है । 
 
हैं बड़े साये नहीं आवाज़ पर 
चुप ज़मीं है आस्मां ख़ामोश है । 
 
सरसराहट सी सुनी हमने यहां 
हर गली हर इक मकां ख़ामोश है ।
 
धूल भी होने लगी बेचैन क्यों 
रास्ते का कारवां ख़ामोश है । 
 
तोड़ दिल को पूछते ' तनहा ' बता
हो गया क्यूं जानेजां ख़ामोश है ।     
 
 ख़ामोशी पर शायरी की २० मशहूर शेर | रेख़्ता


जून 07, 2023

POST : 1677 हुनर है अपना सभी नाज़ उठा लेते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 हुनर है अपना सभी नाज़ उठा लेते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

हुनर है अपना सभी नाज़ उठा लेते हैं 
कहीं भी कोई मिले दोस्त बना लेते हैं । 
 
हसीन वादी में हमसफ़र मिले कोई गर 
तो रेगिस्तान में फूल खिला लेते हैं । 
 
उठा दुआ के लिए हाथ नहीं कुछ मांगा 
नसीब बिगड़ा हुआ खुद ही बना लेते हैं । 
 
जिन्हें अकेले में जीने का सलीका आता 
वो लोग ख़्वाबों की दुनिया को सजा लेते हैं । 
 
कभी हमारी वफ़ा को भी परखना इक दिन 
रस्म मुहब्बत की हर एक निभा लेते हैं । 
 
कहीं किसी से मिलें मिल के मुस्कुराते हैं 
ये अश्क़ अपने ज़माने से छुपा लेते हैं । 
 
कभी भी बेदर्द मत तुम बन जाना ' तनहा '
यकीन करते हैं तुम से जो दवा लेते हैं । 
 
 बंजर रेगिस्तान में खिले इतने सारे दुर्लभ फूल, कुदरत का करिश्मा या वजह कुछ  और? - South Africa Dessert Namaqualand Flower Show In Dessert - Amar Ujala  Hindi News Live
 
 

जून 06, 2023

POST : 1676 दिल धड़कने को मुहब्बत नहीं कहते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 दिल धड़कने को मुहब्बत नहीं कहते  ( ग़ज़ल  ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा

दिल धड़कने को मुहब्बत नहीं कहते 
सर झुकाने को इबादत नहीं  कहते ।  
 
गर कभी तकरार हो दोस्ती में तब 
भूल जाते हैं अदावत नहीं कहते । 
 
दिल लगाना दिल्लगी मत समझ लेना 
साथ रहने को ही उल्फ़त नहीं कहते । 
 
बेक़रारी ख़त्म होती नहीं मिलकर 
चैन आ जाए तो राहत नहीं कहते । 
 
प्यार को दुनिया ख़ता मानती क्यों है 
है दिलों की उनकी चाहत नहीं कहते । 
 
दूर होने से वफ़ा और कम नहीं होती 
हो गई उनसे है नफ़रत नहीं कहते । 
 
ये मुहब्बत इक तराना सुनो ' तनहा '
हर फ़साने को हक़ीक़त नहीं कहते । 
 
 

जून 05, 2023

POST : 1675 एक दिन ज़िंदगी मुझे दे दे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

        एक दिन ज़िंदगी मुझे दे दे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

एक दिन ज़िंदगी मुझे दे दे 
पल दो पल की ख़ुशी मुझे दे दे । 
 
क्यों है रूठी नहीं पता मुझको 
कुछ तेरी बंदगी मुझे दे दे । 
 
प्यार बिन कुछ कभी नहीं मांगा 
सब नहीं इक वही मुझे दे दे । 
 
राह सच की नहीं है आसां पर 
चल सकूं दिल्लगी मुझे दे दे । 
 
लोग अपने हैं देश अपना सब 
आशिक़ी इक यही मुझे दे दे ।
 
जिस से सारा जहां रहे रौशन 
सुरखुरु रौशनी मुझे दे दे । 
 
सबको खुशबू सदा मिले जिस से
फूल सी ताज़गी मुझे दे दे ।
 
लोग मेरी हंसी उड़ाते हैं 
और दीवानगी मुझे दे दे । 
 
बस ये हसरत बची हुई ' तनहा ' 
कुछ न दे सादगी मुझे दे दे । 



 
 
 

जून 03, 2023

POST : 1674 बेख़बर हैं कुछ ख़बर ही नहीं ( ख़ामोश दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

  बेख़बर हैं कुछ ख़बर ही नहीं ( ख़ामोश दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

आज सुबह की ही बात है पार्क में सैर करते करते किसी को कहते सुना देश अमुक अमुक के शासन के बाद तरक़्क़ी करने लगा है नहीं तो उनसे पहले इतने सालों में कुछ भी नहीं किया गया था । उन्होंने जो संख्या बोली थी उसको नहीं शामिल किया क्योंकि खुद बोलने वाले को समझ नहीं थी कि कुछ साल उनकी घोषित गिनती के उन्हीं के शासन का भी कार्यकाल है जिनको वे अच्छे नहीं बल्कि इक वही अच्छे बाक़ी सब बेकार बताने की कोशिश कर रहे थे । बेशक उनकी उम्र अभी अधिक नहीं शायद चालीस के करीब होगी अर्थात उनको देश समाज की समझ साधारण तौर से अनुमान लगाएं तो पिछले बीस साल से खुद अपने अनुभव से हासिल हुई होगी उस से पहले की जानकारी उन लोगों से मिली होगी जिन से उनका मेल जोल और नाता रहा होगा । उनके जन्म लेने से पहले तीस या पैंतीस साल में देश आज़ादी के बाद किस तरह था और किस किस ढंग से कितनी मुश्किलों और कोशिशों से भविष्य की बुनियाद की कल्पना की गई और उसे साकार करने को देश की जनता सामान्य नागरिक से लेकर मज़दूर किसान शिक्षक वैज्ञानिक और कारीगर से सर पर बोझ उठाने वाले अनपढ़ लोगों डॉक्टर्स सभी स्वास्थ्य सेवा करने वाले वैद हकीम जैसे अनगिनत काम करने वालों की लगन और महनत का नतीजा है जिस देश में सुई तक नहीं बनती थी सब करना संभव हुआ तो कैसे । ये सब हुआ क्योंकि जो भी शासक लोकतांत्रिक व्यवस्था से निर्वाचित हुए उन्होंने अपना कर्तव्य यथासंभव निभाया और जो करने को उनको नियुक्त किया गया था उस पर सही साबित होने का भरसक प्रयास किया । गलतियां होती हैं और शासक हो या कोई भी प्रशासक सभी से होती हैं मगर उनको स्वीकार करना उनको ठीक करना एवं भविष्य में नहीं दोहराना ये ज़रूरी होता है समाज को बेहतर बनाने को । यहां इस बात का उल्लेख इस कारण किया जाना अतिआवश्यक है क्योंकि देश की आज़ादी से 1947 से 1975 तक सत्ता पक्ष की आलोचना उनकी नीतियों का विरोध करना कोई मुश्किल कार्य नहीं था बल्कि अधिकांश समय तक विपक्ष के विरोध की बात को आदर देना और महत्वपूर्ण समझना इक लोकतांत्रिक परंपरा थी । देश का प्रधानमंत्री संसद में खुद वरोधी दल की बात को सुनते थे और इतना ही नहीं जब कभी किसी जनसभा में भाषण देते तब उपस्थित जनता से अनुरोध किया करते थे कि भले हमारे विचार अलग अलग हैं लेकिन उनकी सभा में उनकी बात भी अवश्य जाकर सुनिए वो बड़े लाजवाब व्यक्ति हैं । आज शायद बहुत लोगों को इस पर विश्बास ही नहीं होगा लेकिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी बाजपेयी जी जैसे कितने नेताओं को लेकर ऐसा सदन में और चुनावी सभाओं में कहा जाता रहा है । आपको इस बारे में 11 साल पुरानी पोस्ट मिल जाएंगी जो आपको ये भी समझने को विवश करेंगी कि लेखक किसी का प्रशंसक या समर्थक नहीं है न ही किसी का विरोधी है समाज की बात कहता है  और जब जिस समय जैसा सामाजिक माहौल रहा उस पर निष्पक्षता से मत प्रकट करता रहा है । अब असली बात कब क्या हुआ और कब क्या नहीं हुआ होना चाहिए था बड़े संक्षेप में । 
 
1951 का जन्म है मेरा आज़ादी के करीब चार साल बाद का  1973  तक स्कूल कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म कर आयुर्वेदिक डॉक्टर बनकर दिल्ली में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी । बीस साल का युवक देश की राजधानी में रहते देश की समाज की बातों को समझने लगा और तमाम कारणों से कुछ बदलने की कोशिश करने की चाहत मन मस्तिष्क में आने लगी और पैसा नाम शोहरत की दौड़ को इक तरफ छोड़ अपनी अलग राह चल पड़ा । लेखक होना है ये सोचा ही नहीं जानता ही नहीं था बस विचार अभिव्यक्त करता कलम उठाता और कभी कोई पत्र किसी सामाजिक विडंबना पर किसी जनसमस्या पर लिख संबंधित विभाग को भेजता और कभी अपना काम छोड़ सामाजिक उद्देश्य से सरकारी दफ़्तर जाकर चर्चा करता शिकायत करता और तब तक लगा रहता जब तक कुछ ठीक नहीं हो जाता । ये कहना ज़रूरी था कि पढ़ लिख कर विवेकशील बन कर परिपक्व होने पर तर्कसंगत ढंग से आप सही और गलत की परख कर सकते हैं । सुबह सैर पर जिस ने कहा था पहले कुछ भी नहीं था , सुनते ही मैंने जवाब दिया था अच्छा मज़ाक है । पलटकर उस ने पूछा क्या मतलब , मैंने कहा बढ़िया है । मुझे नहीं पता वो कौन है कभी उनसे कोई परिचय हुआ हो ध्यान नहीं इसलिए अधिक कहना उचित नहीं था लेकिन घर आकर सोचना ज़रूरी लगा कि क्या वास्तव में इतने साल कोई उन्नति नहीं हुई और मैं डॉक्टर कोई इंजीनीयर कोई वैज्ञानिक कोई अर्थशास्त्री कोई वकील कोई सरकारी अफ़्सर कोई कितने बड़े उद्योग का मालिक बन सका । हम सभी की पढ़ाई लिखाई और कुछ बनने में देश और समाज का कितना बड़ा योगदान है शायद इस बेहद महत्वपूर्ण सवाल पर हमने विचार ही नहीं किया । मुझे याद है सरिता पत्रिका के संपादक विश्वनाथ पाक्षिक पत्रिका के हर अंक में यही सवाल उठाते थे , क्या आपको देश समाज ने जितना दिया आप उसे उतना तो क्या कुछ भी निःस्वार्थ लौटाना चाहते हैं । ये मेरा लेखन उसी दिशा में उठाया इक कदम है अपने देश समाज को संभव हो तो कुछ क़र्ज़ चुकाना कुछ कोशिश करना उसको बेहतर बनाने की । 
 
इक गांव में रहते थे जहां पहली बार इक स्कूल खुला था पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई और एक अध्यापक जिन्होंने अपना शहर छोड़ परिवार सहित गांव में सरकारी स्कूल के अध्यापक की नौकरी स्वीकार की जबकि ऐसा करना उनकी आर्थिक सामाजिक विवशता नहीं थी । मास्टर गुलाबराय जी अगर बहुत कठोर परिश्रम नहीं करते तो मुमकिन था हम जो डॉक्टर बैंक अधिकारी से न्यायधीश तक बन गए उस गांव में पढ़कर कभी नहीं संभव होता क्योंकि शायद ही शिक्षा का महत्व हमारे माता पिता समझते थे । जिस देश में शिक्षा का साधन नहीं कोई स्वास्थ्य सेवा नहीं पीने को पानी नहीं कोई सड़क नहीं बिजली नहीं कोई यातायात की सुविधा नहीं थी आज़ादी के बाद उन ऐसे लाखों गांवों का भारत देश अगर तमाम साधन सुविधाओं से और खेती की आधुनिक शैली साधन सुविधाओं से परिपूर्ण है अधिकांश तो क्या ये कोई आसान कार्य रहा होगा ये निर्माण करने का इक गरीब देश के लिए । हम देश की राजनीति के पतन की मूल्यविहीन और भ्र्ष्ट होने की चर्चा करते हैं लेकिन खुद अपने दायित्व की देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को सही बनाए रखने को अपने वांछित योगदान की बात पर विचार विमर्श नहीं करते । स्वीकार करना होगा कि हम जिसे सुधार सकते थे उसे बद से बद्त्तर बनाने में मूकदर्शक या सहभागी रहे हैं । और अभी भी हम देशसेवा और देशभक्ति और अपने शासकीय धर्म का पालन नहीं करने वाले सत्तालोभी राजनेताओं को महान घोषित कर झूठ को सिंहासन पर बिठाना चाहते हैं देश समाज से अधिक किसी दल या व्यक्ति को समझना देश की आज़ादी और संविधान की अवहेलना करना है । कोई बुद्धिहीन ही कह सकता है कि देश में कितने बड़े बड़े अस्पताल विश्वविद्यालय आई आई टी संसथान से बांध सड़कों और नहरों का जाल देश के हर राज्य के कोने कोने तक स्कूल कॉलेज कोई गणना नहीं परमाणु बंब से आधुनिक अस्त्र शस्त्र तक और तकनीकी तौर पर विश्व में सब देशों के बराबर प्रगति करने का काम हुआ ही नहीं । 
 
लेकिन सब अच्छा हुआ बढ़िया हुआ ऐसा नहीं कहा जा सकता है , गांधीवादी विचारधारा को छोड़ गांव के भारत को अनदेखा कर शहरीकरण को अपनाना सही नहीं था आसान लगा लेकिन कोई नहीं जानता उस की कितनी बड़ी कीमत हमने चुकाई है पर्यावरण से लेकर नदियों तक को प्रदूषित कर समाज को इक ऐसी दलदल में पहुंचा दिया है कि अब चाहें भी तो फिर से सब सही नहीं किया जा सकता है । राजनेताओं और सभी राजनैतिक दलों ने देश और संविधान के साथ जघन्य अपराध किया है देश की आधी आबादी की गरीबी भूख और धनवान लोगों उद्योगपतियों द्वारा उनके शोषण को बढ़ावा देने का कार्य करना अपराधी और धनवान लोगों की कठपुतलियां बनकर रह जाना । बुद्धिजीवी अख़बार टीवी चैनल से सिनेमा जगत और कलाकार तक समाज को आईना दिखाने उनको वास्तविकता से परिचित करवाने की जगह अपने स्वार्थों में लिप्त होकर इक और ही दिशा में दौड़ते भागते नज़र आते हैं । मार्गदर्शन करना छोड़ भटकाने का कार्य कर समाज को इक ऐसी गहरी खाई में ला खड़ा किया है जहां उनको खुद अपनी शक़्ल की पहचान नहीं होती है उनकी वास्तविकता छुपी हुई है और जो सामने दिखाई देता है वो झूठा कल्पनिक ऐसा किरदार है जीना उनके असली जीवन से कोई तअलुक्क ही नहीं है । समाजवाद की राह से भटक कर हमने पूंजीवादी व्यवस्था का पल्लू थाम लिया और इक कागज़ की नाव पर महासागर लांघने का ख़्वाब बुनने लगे हैं । सबको जगमगाती रौशनियां आकर्षित करती हैं लेकिन चकाचौंध रौशनी के पीछे कितना अंधेरा है कोई नहीं जानता जैसे मृगतृष्णा के शिकार हो गए हैं तमाम लोग चमकती रेत को पानी समझ दौड़ रहे हैं प्यास नहीं बुझेगी प्यासे मरने तक ये सिलसिला चलेगा ।   
 
 


  
 

जून 01, 2023

POST : 1673 फ़क़ीर से अमीर होने तक ( बेढंगी चाल ) डॉ लोक सेतिया

   फ़क़ीर से अमीर होने तक ( बेढंगी  चाल )  डॉ लोक सेतिया 

आपने हम सभी ने सोशल मीडिया पर अनगिनत वीडियो या अन्य संदेश देखे सुने पढ़े शायद समझे भी होंगे , किसी किताब में भूल जाने और क्षमा करने की भी बात अवश्य पढ़ाई गई होगी पर क्या वास्तव में ऐसा संभव है कोई नहीं जानता है । बचपन में जाने कौन सी किताब थी जिस में कुछ अलग ढंग से कहानी की तरह समझाया गया था कि सफलता पाने को लोभ लालच में अंधे होकर या विवेकहीन होने पर व्यक्ति उचित अनुचित की परवाह नहीं कर जो भी चाहते हैं हासिल करने को सब कर गुज़रते हैं । देश राज्य समाज में प्रतिष्ठा मिल जाती है लोग झुक कर सलाम करते हैं मगर कभी कभी दिन में इक पल को अथवा रात को नींद से जाग कर अनजाना सा डर सताता है । कभी सपना आता है जितना हासिल किया धन दौलत ज़मीन जायदाद सब जैसे किसी कारण समाप्त हो गए हैं और कभी ये सपना आता है जिन गुनाहों का किसी और को तो क्या खुद को पता नहीं था कि अपने कारण कितने लोगों की ज़िंदगी का सब सुःख चैन लुट गया उनका सबको पता चल गया और छुपते फिरते हैं जगह नहीं मिलती है । ये इक अपराधबोध होता है जिस के साथ जीना सर पर भारी बोझ की गठड़ी की तरह है जो अनुचित तरीके से कमाई है मूलयवान है फैंक नहीं पाते और साहस ताकत नहीं उठा इक कदम आगे बढ़ाने को क्योंकि आत्मा खुद को कचौटती रहती है । ज़िंदगी का सफ़र कुछ ऐसा ही है कोई फ़क़ीर से अमीर होना चाहता है फिर इक दिन अमीर से फ़क़ीर बनना भी चाहे तो ज़मीर पीछा नहीं छोड़ता है ।
 
बात को अन्यथा और व्यक्तिगत नहीं लें निवेदन है ये अधिकांश होता है मन अपने भीतर की भावनाओं से नज़रें चुराता है और व्यक्ति अपने स्वभाव के विपरीत आचरण करता है । किसी को लूटकर फिर धार्मिक कर्म दान करना धोखा दे कर किसी मंदिर मस्जिद जाकर भूल की माफ़ी मांगना वास्तव में सिर्फ आडंबर होता है क्योंकि फिर वही बार बार दोहराते हैं अपना स्वभाव नहीं बदलते हैं । विचार करें अगर मैंने आपको घायल किया हो अकारण आपका नुकसान किया हो अपनी किसी ज़रूरत की खातिर और आप बेबस हो सब चुपचाप सहते रहे हों तब मुझे धार्मिक अनुष्ठान मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे जा पूजा पाठ करते देख क्या अनुभव करेंगे । जिस को इंसान में ईश्वर नहीं दिखाई देता उसको धार्मिक विचार नैतिक आदर्श मूल्यों से कोई मतलब नहीं होता है । आस्तिक होने भगवान पर विश्वास रखने के लिए किसी पूजास्थल किसी तीर्थ यात्रा की आवश्यकता नहीं , सब जानते हैं मन चंगा तो कठोती में गंगा । विश्लेषण करें तो समझ आएगा जितना समाज में ईश्वर धर्म को लेकर दिखावा प्रचार प्रसार बढ़ रहा है उतना समाज का उत्थान या उद्धार नहीं दिखाई देता बल्कि पतन की ओर अग्रसर है हमारा समाज । सोशल मीडिया कोई पावन स्थान हर्गिज़ नहीं है गंदगी भरी पड़ी है क्या आप घर में किसी की तस्वीर उस जगह रखते हैं जहां दुनिया भर का कूड़ा रखा हो , नहीं करते तो देवी देवताओं की तस्वीर कहां नहीं होनी चाहिए बताने की आवश्यकता नहीं है । 
 
कुछ लोगों ने इस का उपयोग किया है नासमझ लोगों को गुमराह किया है कि उनकी शरण में आओगे तो आपको भवसागर से पार लगवा देंगे । आपने कभी कश्ती चलाने वाले को ऐसा कहते नहीं सुना होगा मांझी और पतवार तूफ़ान और मझधार सब से भरोसेमंद होता है खुद हौंसले से तैर कर पार जाना । आजकल नाख़ुदा कश्ती को खुद डुबोते भी हैं रहबर रास्ते से भटकाते भी हैं रहनुमा कारवां लुटाते भी हैं । हमने अभी सही गलत अच्छे बुरे को ठीक से पहचानना नहीं सीखा है जो हमारी मनचाही बातें करते हैं हम   उनके पीछे -  पीछे चलने लगते हैं और खबर ही नहीं होती कब किसी के चाहने वाले समर्थक प्रशंसक मानसिक दिवालियापन के शिकार हो कर तर्क से उचित अनुचित को समझना छोड़ भेड़चाल चलने लगते हैं । चाहे कोई व्यक्ति हो धर्म उपदेशक या कोई भी राजनैतिक विचारधारा सभी हमेशा सही नहीं होते हैं और जब बात समाज की धर्म की भगवान की या लोकतंत्र की हो तब सच को सच और झूठ को झूठ कहना हमारा कर्तव्य बन जाता है ख़ामोशी से अपराध का साथ देना किसी दिन अपराधबोध बन जाता है जब गुनहगार बच जाते हैं और बेगुनाह सूली चढ़ाए जाते हैं । आख़िर में इक ग़ज़ल इस विषय से मेल खाती हुई पेश है ।  

ग़ज़ल 

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते ।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।

जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते ।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा "
फैसले आखिरी नहीं होते । 
 


 

POST : 1672 पास रह के वो कितनी दूर रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  पास रह के वो कितनी दूर रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

               ( पुरानी डायरी से 2009 वर्ष की लिखी रचना )

दिल की धड़कन नज़र के नूर रहे 
पास रह के वो कितनी दूर रहे ।

प्यार करते मुझे सब लोग पता 
हुस्न वाले बड़े मगरूर रहे । 
 
बस यही बेख़्याली छाई रही 
चढ़ गया इक नशा सा था सुरूर रहे । 
 
रास बेशक मुहब्बत आ न सकी 
उसके किस्से कई मशहूर रहे । 

दर्द-मंद इक तुम्हीं ' तनहा ' तो नहीं 
मीर ग़ालिब कभी थे सूर रहे । 
 

 


मई 31, 2023

POST : 1671 मर के भी किसी के काम आएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     मर के भी किसी के काम आएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द ले सके तो ले उधार , किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है । अनाड़ी फ़िल्म थी जो पहली बनी थी 1959 में शैलेंद्र जी ने लिखा गीत उसका मुखड़ा है आखिर अंतरें में , कि मर के भी किसी को याद आएंगे , किसी के आंसुओं में मुस्कुराएंगे , कहेगा फूल है कली से बार बार जीना इसी का नाम है । सोचते थे भला कोई मर के भी किसी के काम आ सकता है हैरानी हुई ये पता चला जीते हुए कोई किसी काम आता हो चाहे नहीं मरने के बाद कितने ही लोगों के काम ही नहीं आता बल्कि बहुत लोगों का कारोबार रोज़ी रोटी ही नहीं शान बान और कितना कुछ उसे से चलता फलता फूलता है । मौत का इतना बड़ा कारोबार है व्यौपार है कि उसका ओर छोर पाना टेढ़ी खीर है । हम हो सकता है हैरान हो जाएं किस किस को जोड़ना है छोड़ना किसे है । मौत के सौदागर तो होते हैं कौन नहीं जानता और मौत के खिलाड़ी भी लेकिन उनका मरने तक तअल्लुक़ होता है बाद में उनका कोई सरोकार नहीं रहता है समझ गए अधिक विवरण की ज़रूरत नहीं है । आजकल मौत को लेकर अनुभवी लोग समझाते हैं सब काम क्या कैसे करना होगा । अर्थी उठाने मातम से शोक सभा आयोजित करने में कितने लोग बिना ढूंढे मिलते हैं जहां भी रहते हैं सब जगह जैसा चाहो सलाह मिलती है । जहां चाह वहां राह इसी को कहते हैं ।
 
याद आया इस की शुरुआत करते हैं जब कोई राजा मरता था तब शोक और जश्न इक साथ होते थे राजा की अर्थी उठने से पहले नये राजा की ताज़पोशी हुआ करती थी ये रिवायत अजीब लग सकती है पर लोकतंत्र का शासन होने पर भी चलन जारी है । शासकों की समाधियों की दर्दनाक कहानी है मुर्दों को ज़िंदा रखने की राजनीति कुछ उसी तरह है खाने वाले को मज़ा नहीं आया जनता वो बकरा है जिसकी जान जानी है । हर समाधि में दफ़्न कितने राज़ हैं ताजमहल की चाह में अभी तलक हर शाहंशाह है ढूंढता इक मुमताज है आपके हमराज़ हैं ख़ामोश हैं मगर दर्द भरी आवाज़ हैं धुन मधुर कैसे निकलते हैं क्या गुज़रती है जानते सिर्फ़ साज़ हैं । कुछ अशआर बड़े शायरों में इस मौज़ू पर बाद में पहले मेरा इक शेर है ' तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं मेरी अर्थी को उठाने वाले ' इक और ग़ज़ल है बस यही इक करार बाक़ी है , मौत का इंतज़ार बाक़ी है '। 
आधुनिक संदर्भ में जाँनिसार अख़्तर जी के शेर कुछ इस तरह से हैं  , ' किस की दहलीज़ पे ले जाके सजाएं इसको , बीच रस्ते पे कोई लाश पड़ी है यारो '। ' दिल का वो हाल हुआ है ग़में दौरां के तले , जैसे कोई लाश चटानों में दबा दी जाए '। ' कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है '। मुंशी प्रेमचंद जी की कहानी कफ़न में शब्द हैं ' जीते जी तन ढकने को कपड़ा नहीं , मरने पर नया कफ़न ऐसा कितना कुछ है साहित्य शायरी कहानियों में मगर यहां माजरा कुछ और ही है ।  
 
ज़िंदगी भर मौत का डर सताता है कुछ लोग हैं जिनको स्वर्ग नर्क जन्नत दोजख़ का खेल समझाना आता है बस इक कमाल है सबको उपदेश देने वाला खुद अपने समझाए उसूलों पर खुद नहीं खरा उतरता कभी मोह माया से बचने की राह दिखलाने वाला प्रवचन देने की फीस पाकर आयोजन स्थल पे आता है । सब कुछ छोड़ दिया बताता है रखता एक दो नंबर का खाता है । कौन उनको क्यों घर बुलाता है उनको मालूम है जो खोता है वही पाता है । दान दक्षिणा से चढ़ावा सब पर नज़र रखते हैं कैसा भरोसा कैसा यकीन अब लिख कर करार रखते हैं उनकी दुनिया में लाख पर्दे हैं कुछ भी बाहर से दिखाई नहीं देता पास से भी सुन नहीं सकते राज़ है जो सुनाई नहीं देता । मरने के बाद ख़ुद नहीं जाते अवशेष कोई पहुंचाता है ये भी करना बड़ा ज़रूरी है मुक्ति मोक्ष तभी पाता है उलझन कुछ नहीं सवाल कोई नहीं कौन डूबता है किस पार जाता है । किस किस शहर का नाम बताएं कोई गिनती नहीं हिसाब नहीं चुप चाप मान लेना अच्छा है छोटा मुंह बड़ी बात बोलने की औकात नहीं । जो समझाए समझ आ गया है कहो दिन तो दिन है नहीं है रात तो है रात नहीं । शर्म करो इक जनाज़ा है कोई बारात नहीं अश्क़ों की कीमत है ज़िंदगी को मिली सौग़ात नहीं । खूबसूरत इक दुनिया बनाने लगे हैं लोग श्मशान को इतना सजाने लगे हैं लोग किस किस बहाने से बुलाने लगे हैं यूं भी तक़दीर को बनाने को तदबीर बनाने लगे हैं । सोचा नहीं था सच होगी मेरी नज़्म वसीयत जश्न मरने का मनाया जाने लगा है । शायद इस विषय पर इतना बहुत है सजन रे झूठ मत बोलो ख़ुदा के पास जाना है , न हाथी है न घोड़ा है वहां पैदल ही जाना है । इसी बहाने अपनी तीन रचनाएं फिर से दोहरानी हैं जाते जाते आखिर में पेश हैं ।
 

ग़ज़ल 

 
राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं ।

बात करता है किस लोक की ये जहां
लोक -परलोक से हम तो डरते नहीं ।

हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं ।

आईने में तो होता है सच सामने
सामना इसका सब लोग करते नहीं ।

खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर
नाम के नाखुदा पार उतरते नहीं ।
 

नज़्म  

 
जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये ।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये ।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये ।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये ।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये ।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये । 
  

ग़ज़ल 

 
बस यही इक करार बाकी है
मौत का इंतज़ार बाकी है ।

खेलने को सभी खिलाड़ी हैं
पर अभी जीत हार बाकी है ।

दिल किसी का अभी धड़कता है
आपका इख्तियार बाकी है ।

मय पिलाई कभी थी नज़रों से
आज तक भी खुमार बाकी है ।

दोस्तों में वफ़ा कहां बाकी
बस दिखाने को प्यार बाकी है ।

साथ देते नहीं कभी अपने
इक यही एतबार बाकी है ।

हारना मत कभी ज़माने से
अब तलक आर पार बाकी है ।

लोग सब आ गये जनाज़े पर
बस पुराना वो यार बाकी है ।
 



मई 29, 2023

POST : 1670 भूखे पेट सब भजन करेंगे ( कुंवे में भांग ) डॉ लोक सेतिया

    भूखे पेट सब भजन करेंगे   ( कुंवे में भांग ) डॉ लोक सेतिया 

आपको शायद भरोसा नहीं होगा मगर ये सच है और मैं शपथ लेकर कहता हूं कि बड़ी उदासी और बेचैनी थी जब पोस्ट लिखने बैठा कि अचानक इक वीडियो को देखा तो महसूस हुआ उसी गंभीर विषय को हंसी मज़ाक  की तरह भी पेश किया जा सकता है । सरकार नेता अधिकारी फ़िल्मी जगत से पत्रकारिता करने वाले तक हमेशा से ही इसी ढंग से करते आये हैं , तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो । सुनते हैं मदहोशी का आलम ही कुछ और होता है नशा इक शराब में ही नहीं होता पैसे का ताकत का धन दौलत का नशा और सत्ता का नशा जो आदमी को ख़ुदा होने का गुरूर देता ज़रूर है पर जिस दिन होश आता है सत्ता के बगैर जीना दुश्वार लगता है । जंगल में सभी जानवर रहते हैं सब को पेट भरने को जो चाहिए मिलता ही है किसी न किसी तरीके से लेकिन जब मूड हो मस्ती करने झूमने का सब कुछ भुलाकर अपने में खोने का तब खोजते खोजते इक न इक पेड़ ढूंढ लेते हैं जिस का फ़ल स्वादिष्ट भी हो और नशीला असर भी दिखाए । हाथी सबसे बलवान होता है पेड़ पर चढ़ नहीं सकता तो उसे ज़ोर ज़ोर से हिलाकर झकझोर कर सभी फल नीचे धरती पर गिरा लेता है और खा कर मदहोशी में झूमता है । बंदर पेड़ पर चढ़ खूब खाता है मगर हाथी जब पेड़ को हिलाता है तब उसकी उछल कूद किसी काम नहीं आती । हाथी जितना खा सकता है खाकर चला जाता है उस के बाद सभी जंगली जानवर अपना अपना हिस्सा पा कर टुन हो जाते हैं । सुनते थे जब नशा चढ़ा हो तब खाने पीने की सुध बुध नहीं रहती है , इक बार गांव में रात को ख़ास महमान घर आते हैं तो नंबरदार की नंबरदारनी बताती है घर में बनाने को कुछ ख़ास नहीं बचा है । नंबरदार जी कहते हैं सुबह होते ही शहर से सब मंगवा लिया जाएगा घबराओ नहीं , मगर रात को क्या खिलाना पिलाना है घरवाली ने पूछा तो बोले उनको इतनी शराब पिलाएंगे कि खाना खाने की हालत नहीं रहेगी । वीडियो में देखना आनंद आएगा लेकिन ये पापी पेट का सवाल है उसकी बात छोड़ी नहीं जा सकती है क्योंकि जिनको नशा है उनको क्या खबर भूख क्या होती है विषय पर आते हैं । 
 
 देश किसी न किसी नशे में है कोई विकास के झूठे नशे का शिकार है तो बहुत लोग सोशल मीडिया पर बेसुध हैं कुछ भी होश नहीं क्या क्यों करते हैं । नशे की लत खराब होती है उस को छोड़ रहा नहीं जाता बेचैनी होती है । सच लिखना भी खराब नशा ही है नहीं छोड़ सकता लिखने वाला , तमाम लोग खफ़ा होते हैं मुझे क्या कुछ भी अच्छा नहीं लगता हमेशा नाख़ुश रहता हूं । क्या करूं मेरी आदत है ख़ुशी से घबराता है दिल , खुश रहना नहीं आया दुनिया खुशियां ढूंढ ही लेती है । सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है सोचता हूं परेशान होता हूं ये समझ नहीं आता कि आधुनिक महलों की शानदार ऊंची ऊंची बहुमंज़िला इमारतों बड़ी बड़ी सड़कों रौशनियों और कितने जश्न किसी न किसी बहाने रोज़ मनाने से देश की अधिकांश आबादी को मिलेगा क्या , दो वक़्त रोटी इक छत और चैन से बगैर किसी डर शांति से जीने की हसरत आज़ादी के 75 साल बाद भी इक सपना है । संसद भवन न्यायालय की बिल्डिंग या सरकारी सचिवालय ख़ूबसूरत चमकीले शीशे जैसे होने से जनता को समानता का अधिकार बुनियादी सुविधाएं सच में सुरक्षित वातावरण और अपराध मुक्त समाज कब मिलेगा और कब चोर डाकू लुटेरे गुंडे और बाहुबली लोग अपराध करते पकड़े और दंडित किये जाएंगे । अभी तो उनको सब करने की छूट ही नहीं उनके लिए सत्ता के गलियारे में लाल कालीन बिछाया जाता है । बड़े और छोटे में आम और ख़ास में इतना अंतर है जैसे चींटी और हाथी का भी शायद नहीं और बताते थे चींटी हाथी को पराजित कर सकती है । जनता रुपी चींटी भला सत्ता धनबल बाहुबल और कुछ लोगों को हासिल विशेष अधिकारों की लक्ष्मण रेखा लांघ भी सकती है , रावण कितने हैं बचाने को कोई नहीं आने वाला । शासकों ने समझौता किया हुआ है वार्ता की जा सकती है सीमा पार नहीं कर सकते ये करते हैं तब भी स्वीकार नहीं कर सकते समझौते का उलंघन होता है । 
 
परमाणु बंब बनाने से लेकर आधुनिक हथियार तक विदेशों से खरीदने का मकसद क्या है जब घोषित है ये विनाश कर सकता है मानवता ख़त्म हो जाएगी हम इनका उपयोग नहीं करेंगे । अगर ऐसा है तो इतना धन इस पर बर्बाद क्यों किया जाता रहा जबकि ज़रूरत थी उस से गरीबी भूख और सभी समस्याओं का निवारण कर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को कारगर बनाना । लेकिन ये खरीदारी बेचना खरीदना कुछ लोगों की भूख मिटाने को किया जाता है जो जंग के हथियार बनाते हैं और जिनको इन से दलाली मिलती है । जो नहीं करना था जनता की बुनियादी ज़रूरतों को पैसे वालों का हथियार बना इक कारोबार बनाना सेवाओं की जगह वो किया गया किया जाता रहा शिक्षा रोज़गार अस्पताल की खूब कमाई का धंधा निजी क्षेत्र के लिए बना दिया पेशा अलग बात है धंधा बिल्कुल अलग और फ़िल्मी डायलॉग है धंधा धंधा होता है गंदा हो तब भी । मुझ से नहीं होता है कि रोते बिलखते मायूस लोगों की तरफ नहीं देख कर शानदार जश्न और शानो शौकत का आडंबर देख कर दिल बहलाया जाए । हो सके तो कोई ऐसा नशा सबको पिलाया जाए जिस को पीने से भूखे नंगे भी सारे जहां से अच्छा गीत गाया जाये , देश को फ़रेब से बहलाया जाए । किसी दिन किसी रहनुमा को होश में लाया जाये , हक़ीक़त से मिलाया जाए सच और झूठ को तराज़ू के पलड़ों में रख आईना दिखाया जाये । सब पुराना बदला जाता है मुमकिन है नये संसद भवन को कुछ और खूबसूरत नाम दिया जाये ताकि शायद वहां चुन कर आने पर उनकी अंतरात्मा भी इक नया सवरूप ले ले जो खुद को छोड़ जनता की भलाई की बातें ही नहीं वास्तव में करने की ज़रूरत भी समझने लगें । ये बात सच नहीं हो सकती क्योंकि नशे में रात गई बात गई , कुछ नहीं बदलेगा बस चेहरे नाम बदलते रहेंगे आईने का क्या है उस के टुकड़े होते हैं सभी पत्थर दिल हैं चकनाचूर करते रहेंगे । कब तक सभी गहरी नींद सोते रहेंगे । सांसद विधायक सरकारी कर्मचारी कौन हैं देश की जनता देश की मालिक और ये जनता के सेवक हैं , मालिक को झौंपड़ी भी नहीं नसीब अधिकतर लोग बेघर भूखे बदहाल है लेकिन नौकर चाकर को शानदार महल जैसा घर दफ्तर चाहिए ये लोकराज है तो कैसा लोकतंत्र कैसी आज़ादी है । माहौल बोझिल है जाँनिसार अख़्तर के शेरों से दिल को समझाया जाये ।
 

इसी सबब से हैं शायद , अज़ाब जितने हैं 

झटक के फेंक दो दो पलकों पे ख़्वाब जितने हैं । 

वतन से इश्क़ ग़रीबी से बैर अम्न से प्यार 

सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं ।

समझ सके तो समझ ज़िंदगी की उलझन को 

सवाल इतने नहीं हैं जवाब जितने हैं ।





मई 28, 2023

POST : 1669 रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया 

कुलदील सलिल जी की बात से शुरुआत करते हैं और आखिर में उनकी लाजवाब ग़ज़ल भी पढ़ते हैं। 

                   सितम को जड़ से जो काटे उसे शमशीर कहते हैं 
                   जो पत्थर को भी पिघला से उसे तासीर कहते हैं ।
 
                     अमीरों का मुकद्दर तो बना होता है पहले ही 
                    गरीबों की जो बन जाए उसे तकदीर कहते हैं ।  
 
 गरीबी और भूख में जिस देश का स्थान खेदजनक हो उस की राजधानी और सचिवालय की जगमगाहट क्या वास्तविकता पर पर्दा डाल सकती है । क्या सब कुछ सबसे पहले उनको चाहिए जिनका कहने को मकसद देश सेवा जनता की सेवा और समाज कल्याण करना समझा जाता है लेकिन वास्तविक सोच और चाहत ख़ास बड़े लोग होकर मनमानी करना और नियम कानून का उपहास करने की रहती है । जब देश की साधारण जनता मालिक फुटपाथ पर और सांसद सेवक होकर शानदार महल में मौज मस्ती करे तब उसे लोकतंत्र नहीं कहना चाहिए । कुछ भी और कहने से पहले इक सीधा सा गणित है 1200 करोड़ खर्च कर नया शानदार भव्य संसद परिसर बनाने का अर्थ है देश की जनता 140 करोड़ संख्या है तो एक एक व्यक्ति 8 1/2 रूपये का खर्च होता है चिड़ी चोंच भर ले गई उनको लगता है लेकिन इसका अर्थ है जिनकी रगों में लहू बचा ही नहीं उनसे कितना और निचोड़ोगे । आपको चकाचौंध रौशनी मिले मगर गरीब का दिया बुझा कर कदापि नहीं होना चाहिए । दाने दाने को तरसते लोग जिनका कोई ठिकाना नहीं उनको ये देख कर महसूस हो सकता है कि उनकी बेबसी का मज़ाक है ज़ख्मों पर नमक छिड़कने की तरह । सोचना अवश्य चाहिए कितना महत्वपूर्ण था ये निर्माण करना सोचना होगा इस संसद में कितने अपराधी कितने धनबल के कारण और कितने इक तरह से किसी दल की अनुकंपा से बैठे मिलेंगे । संसद की पवित्रता उसकी मर्यादा की चिंता छोड़ आधुनिक साधन सुविधाओं की बात करना लगता है जैसे कोई कारोबारी व्यौपारी चर्चा को पांचतारा होटल का माहौल चाहिए । सच कहें तो मिट्टी से ज़मीन से नाता तोड़ कर कंकर पत्थर की ईमारत से मुहब्बत करना हमारे देश की मान्यताओं पर खरा नहीं उतरता और लगता है जैसे लोकतंत्र नहीं खानदानी महाराजाओं का कोई दरबार है । मुमकिन है सामन्य नागरिक की फरियाद आधुनिक संसद की दिवारों को लांघ ही नहीं पाये ।
संविधान की भावना की बात करना व्यर्थ है उसे लेकर उदासीनता साफ दिखाई देती है जाने कब से राजनेताओं सरकारों प्रशासन ने उसको ताक पर रख दिया है । 

   वैसे भी गरीबी महंगाई की बात करना भी कोई नहीं चाहता राजनेता से सोशल मीडिया टीवी चैनल तक सभी को हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है । प्राथमिकता बदल गई हैं जनता को दिखावे को योजनाएं जो कभी कामयाब नहीं होती और अधिकारी व्यौपारी वर्ग राजनेताओं की हर ज़रूरत पूरी होती है । अगर खज़ाना लबालब भरा था तो इतना पैसा देश में सबको शिक्षा स्वास्थ्य सेवाएं , बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर और भूख बेरोज़गारी से छुटकारा पाने पर निवेश किया जाता पहले देश की जनता में सभी को शानदार आवास और जीने को तमाम सुविधाएं उपलब्ध  करवाई जाती , तब संसद भवन की बारी आती तो लोक का कल्याण पहले होना चाहिए लगता सही है  । ये कीमत चुकाई है अथवा चुकानी होगी सभी देशवासियों को अगर ये क़र्ज़ ले कर घी पियो की बात है । मुझे नहीं पता जो अपनी हसरतें नाम शोहरत और शाहंशाही रहन सहन सैर सपाटे  अन्य कितने भव्य आयोजन नवाबी ढंग से शान बढ़ाने को करता है उसको देश की आधी से अधिक आबादी की बदहाली पर रत्ती भर भी एहसास है मानवीय संवेदना है । क्यों नहीं बड़े नेता अभिनेता जो करोड़ों रूपये बिना किसी शारीरिक मेहनत केवल टीवी पर विज्ञापन देने का धंधा कर बनाते हैं इस को महान घोषित करें जबकि वो फ़िल्म वाले टीवी वाले करते क्या हैं पैसा कमाने को दर्शकों को फ़िल्म टीवी सीरियल से समाचार तक की आड़ में गंदगी परोसना गुमराह करना और हिंसा को बढ़ावा देना । 
 
  जी यही उपलब्धि है पिछले तीस साल से इन सभी ने भगवान बना लिया है पैसे को और शैतान को इतना चमकदार किरदार बनाकर खड़ा कर दिया है कि अधिकांश हम लोग उसे स्वीकार ही नहीं पसंद करने लगे हैं । इस तथाकथित अभिजात्य वर्ग को देश समाज से जनता से ज़रा भी सरोकार नहीं है । आपसी भाईचारा है गुणगान करते हैं बदले में मनचाहा वरदान पाते हैं साफ शब्दों में ईमान बेच कर जागीर बनाना आसान है उनकी दुनिया में और सही मार्ग पर चल कर जीने की चाहत इक आफत की तरह है । उनको कितना चाहिए कोई हिसाब नहीं देश की आज़ादी और संविधान को कुछ लोगों ने अपना बंधक बना लिया है और आम जनता को बेबस और लाचार बना कर किसी भिखारी जैसी हालत कर दी है जबकि शोर इनके तमाशों का है जनता की आहों की आहट भी कहीं किसी को सुनाई नहीं देती है । सरकार को इतना तो बताना चाहिए कि इस पर किया खर्च क्या है कैसे हुआ है कितना जमापूंजी से कितना क्या क्या बेच कर कितना गिरवी रख कर विरासत को और कितना क़र्ज़ या उधार कितने सालों तक कौन चुकाएगा । ये विकास है देशभक्ति है तो मुझे ऐसा मंज़ूर नहीं कुलदीप सलिल ही नहीं दुष्यंत कुमार जी की पहली ग़ज़ल यही है , " कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए , कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए "। 

आखिर में कुलदीप सलिल जी की ग़ज़ल बहुत कुछ कहती है । 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं 
कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं । 

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर 
चांद बस्ती में ऊगा हो मुझे मंज़ूर नहीं । 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 
आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं । 

हूं मैं अगर आज कुछ तो हूं बदौलत उसकी 
मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं । 

खूब तू खूब तेरा शहर है , ता -उम्र 
एक ही आबो-हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं । 

सीख लें दोस्त भी कुछ अपने तज़रबे से कभी 
काम ये सिर्फ मेरा हो , मुझे मंज़ूर नहीं । 
 
हो चिरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर ' सलिल ' 
ग़ुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं ।

 


मई 25, 2023

POST : 1668 बुद्धूराजा की समझदारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     बुद्धूराजा की समझदारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

 पहले ठीक से पहचान को जान लेते हैं सभी बंदे एक समान होते हैं कुछ अनजान कुछ नादान होते हैं । दिमाग़ सभी का बराबर होता है अंतर होता है किस का दिमाग़ कैसे चलता है , जैसे किसी को ऊंचाई से डर लगता है कोई पहाड़ों की सैर को तरसता है । दिमाग़ की बात किसी मशीन जैसी है कोई कैसे घूमती चलती है कोई और तरह से काम करती है । चढ़ाई और फ़िसलन या ढलान पर हर शख़्स कदम संभल संभल कर रखता है कोई पहले बात को समझता परखता है कोई बिना चिंता जो चाहे करता है । बुद्धिमानों की परेशानी है उनको याद हमेशा रहती नानी की कहानी है इक दूजे से बहस करते हैं एकमत नहीं होते खुद को सही समझते हैं । मूर्खों की बात खूब होती है कोई दूजे को बड़ा छोटा नहीं समझता है अपनी अपनी मूर्खताओं पे सभी गर्व करते हैं बस बुद्धिमानों से ज़रा डरते हैं क्योंकि वही झगड़ा बढ़ाते हैं मूर्ख एकता बनाए रखते हैं अपनी मर्ज़ी से आगे चलते जाते हैं ।

  नासमझ और मूर्ख अलग अलग होते हैं मूर्ख अपनी मूर्खता पर गर्व का अनुभव करते हैं नासमझ को समझाना मुमकिन है मूर्खों को मनाना दुश्वार है । मूर्खों की अपनी दुनिया है उनका अपना कारोबार है बड़ी मुद्दत बाद बन सकी उनकी सरकार है । ये चर्चा बेकार है कौन कितना बड़ा मूर्ख है कौन कितना बड़ा समझदार है । बुद्धूराजा कोई और नहीं मूर्खों का सरदार है । दुनिया में समझदार और बुद्धिमान हमेशा संख्या में कम होते हैं मगर शासन हमेशा उन्हीं का रहता था । बुद्धिमान मूर्खों को बड़ी आसानी से खुद पर उनका शासन करने को राज़ी कर लेते थे । लेकिन भाग्य रेखा में राजयोग अंकित था इसलिए अधिकांश मूर्खों ने बुद्धिमान लोगों को पछाड़ अपने बीच से सबसे मंदबुद्धि को अपना राजा चुन लिया था । बुद्धूराजा ने पहला काम यही किया कि सब मूर्खों को आदेश दे दिया कि आपको कुछ भी नहीं करना है सिर्फ दो बातें करते रहना है पहली जितने बुद्धिमान शासक हुए हैं उन सब को बुरा साबित करना बदनाम करना और दूसरा मुझे सबसे अच्छा और काबिल घोषित कर मेरा गुणगान करना । सबने धार्मिक कथाओं में ऐसा पढ़ा था कि देवी देवता भी यही समझाते थे जो मेरा शिष्य बन मुझ पर आस्था रखेगा और मेरे नाम का जाप कर माला फेरेगा दिन रात उन लोगों का कल्याण होगा सब मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी । बुद्धिमान लोगों की मज़बूत बुनियाद पर निर्मित ऊंची इमारतों को और ऊपर करने को उनकी बुनियाद को ही हटाने की आवश्यकता है ये बात बुद्धूराजा ने अपने सभी चाहने वालों को समझाई । सभी महलों भवनों के नीचे से कोई सुरंग खुदवाना शुरू कर दिया बुनियाद खोखली होती गई इमारतें ध्वस्त होती रहीं और बुद्धूराजा के प्रशंसक विकास हो रहा है बताकर अपने शासक की बढ़ाई करते रहे । सोशल मीडिया पर चूहादौड़ का खेल जारी है कोई नहीं जानता खुद कितना बीमार है यही समस्या है चाटुकारिता गुलामी इक लाईलाज मानसिक बिमारी है । मसीहा कहलाता है वही अत्याचारी है चोर पुलिस कानून अदालत सभी की इक दूजे से यारी है सबका धर्म एक है सबकी आदत करना मक्कारी है । अपनी जान सब को प्यारी है । 

  बुद्धूराजा ने ऐलान किया है मूर्खों का कद बढ़ाना है सिर्फ एक शहर एक राज्य एक देश नहीं सब दुनिया पर अपना झंडा फहराना है । समझदारों से पिंड छुड़ाना है अपना सिक्का चलाना है समझदारी का खोटा सिक्का निपटाना है जब अपने हाथ खज़ाना है फिर किस बात को शर्माना है । रोज़ कुछ अनचाहा घटता और हर बार बुद्धूराजा इक जश्न मनाता और कहता कि जो भी होता है अच्छे के लिए होता है विनाश करने से अनुभव मिलता है विकास का अर्थ मालूम पड़ता है । बुद्धूराजा के समर्थक कुछ भी तर्कसंगत ढंग से विचार नहीं करते जो उनका शासक कहता उसे ही सच मानते । बुद्धूराजा झूठ पर झूठ बोलने का कीर्तिमान बनाता रहा और बर्बादी का भी जश्न मनाते रहा । ये बात खुद उसी ने बताई है बुद्धूराजा ने अपनी आत्मकथा लिखवाई है बात बिल्कुल पक्की है खीर अभी कच्ची है दोनों हाथ घी में सर है कढ़ाई में कौन तीन में है कौन ढाई में फर्क होता है कागज़ की नाव में और काली कलम की स्याही में । दुनिया मूर्खों का सबसे बड़ा बाज़ार है शासक भले मूर्ख है पर बड़ा होशियार है उसका अपना संविधान है कोई उस के बराबर नहीं वो सबसे महान है सभी कमज़ोर हैं इक वही बलवान है । दुनिया शोर को सच मानती है शोर की यही पहचान है चोर संग दोस्ती साहूकार संग भाईचारा भी नादान हर इंसान है । मूखों ने बुद्धिमानों की राह से विपरीत जाना है देश को मूर्खों का स्वर्ग बनाना है समझदारी बुद्धिमानी सोच समझ सभी से पीछा छुड़ाना है । नया ज़माना लाना है टके सेर भाजी टके सेर खाजा का इतहास दोहराना है हर मुसीबत को घर बुलाना है हर पेड़ की डाल डाल शाख शाख पर मूर्खों को बिठाना है उल्लू राज का युग वापस लाना है । समझदारी है आजकल यही सबको बुद्धू बनाना है हमने मौज मनाना है अपना सच्चा याराना है मिल बांट कर खाना है बस इक यही वादा निभाना है ।

 

 

मई 24, 2023

POST : 1667 बातें हैं बातों का क्या ( चिंतन मनन ) डॉ लोक सेतिया

     बातें हैं बातों का क्या ( चिंतन मनन )  डॉ लोक सेतिया

   सिर्फ़ आप ही नहीं अन्य कितने ही लोग दोस्त संबंधी हैं जिनको मैं इसलिए नापसंद हूं क्योंकि उनकी आरज़ू है मुझे भी अपने जैसा बनाने की , शायद उनको चाहत तो थी खुद ही मुझ जैसा बनने की , लेकिन ये उनसे संभव नहीं हुआ तो सोचा जो खुद चाह कर नहीं हो पाये मुझे ही वैसा नहीं रहने दें । बस आपकी और मेरी दुनिया में यही फर्क है जिसे सब मिटाना चाहते हैं मिटा पाते नहीं हैं । सवाल सही गलत अच्छे बुरे का बिल्कुल नहीं है सही बात तो सब जानते हैं दुनिया में ज़िंदा कोई अच्छा नहीं होता और मरने के बाद सभी को लेकर पता चलता है कि उसकी कमी कोई कभी पूरी नहीं कर सकता है । थोड़े दिन की बात है फिर किसी के नहीं होने से कुछ भी रुकता नहीं सब दुनिया का हर कारोबार चलता रहता है । ज़रा सी बहुत छोटी सी बात है खुद अपने ढंग से जियो और सबको उनकी मर्ज़ी से जीने दो । किसलिए आपको अन्य सभी के जीवन की तमाम बातों में रूचि है और दखल देना चाहते हैं जबकि सच है कि आपको किसी की परेशानी में कोई मदद नहीं करनी सिर्फ ज़ख्मों को कुरेदना है और कोई अपना खुश है चैन से रहता है तो आपको ये भी अच्छा नहीं लगता है । ऐसे रिश्ते निभाने से अच्छा है उनसे दूर अलग रहना और अपने हालात को खुद समझना किसी से सुःख दुःख बांटने का ज़माना अब नहीं है । किसी की शोक सभा में भी आजकल लोग सामान्य ढंग से अपने मतलब की बातें करते हैं कुछ मिंट भी अपनी व्यक्तिगत बातों को छोड़ नहीं सकते इस से बढ़कर अन्य कोई असंवेदनशीलता की मिसाल नहीं हो सकती है । 
 
कहने को ईश्वर धर्म और पूजा पाठ को लेकर बड़ी अच्छी बातें करते हैं अधिकांश लोग लेकिन वास्तविक जीवन और आचरण में लोभ लालच अहंकार और दुनिया भर की झूठी सच्ची बुराई की बातों से निकल नहीं पाते हैं । गीता कुरआन बाईबल रामायण गुरुग्रंथसाहिब पढ़ कर सुन कर समझा कुछ भी नहीं सिर्फ सर झुकाने से कुछ हासिल नहीं हो सकता है । हमने ईश्वर धर्म आस्था और सामाजिक व्यवस्था को बेहतर बनाने को साधु संतों महात्माओं के बताए दिखलाए मार्ग को समझने अपनाने की जगह उनका आडंबर करना शुरू कर दिया है । जिस रास्ते पर चलना था उसे त्याग कर जिधर नहीं जाना था उसी तरफ चलते जा रहे हैं । सच्चाई ईमानदारी और सबकी भलाई की शिक्षा भूलकर खुदगर्ज़ी का सबक पढ़ बैठे और सब अपकर्म करने पर भी चाहते हैं अच्छे सच्चे धर्मात्मा कहलाना । कोई सच कहता है तो हम उसको अपना विरोधी ही नहीं दुश्मन मानने लगते हैं और अपनी असलियत छुपाने को सच कहने वाले की बुराई करने उसको नीचा दिखाने लगते हैं । ये कोई धर्म नहीं सिखलाता है ये रास्ता भटकना है जो भी भटक गया कभी कहीं नहीं पहुंचा । आपकी राह अलग है मुझे अपनी राह पर चलना है क्या कभी मैंने आपको विवश किया उधर नहीं जाओ इधर चलो मेरे साथ । मुझे अकेले अपनी राह चलना है भीड़ में कभी उस कभी इस ओर भटकना नहीं है । दो कविताएं हैं विषय को परिभाषित करने की कोशिश है । 

जाना था कहां आ गये कहां ( कविता )

ढूंढते पहचान अपनी
दुनिया की निगाह में , 

खो गई मंज़िल कहीं 
जाने कब किस राह में , 

सच भुला बैठे सभी हैं
झूठ की इक चाह में ।

आप ले आये हो ये
सब सीपियां किनारों से ,
 
खोजने थे कुछ मोती
जा के नीचे थाह में ,
 
बस ज़रा सा अंतर है 
वाह में और आह में ।

लोग सब जाने लगे
क्यों उसी पनाह में ,
 
क्यों मज़ा आने लगा
फिर फिर उसी गुनाह में
 
मयकदे जा पहुंचे लोग 
जाना था इबादतगाह में । 
 

आस्था ( कविता ) 

 
सुलझे न जब मुझसे
कोई उलझन
निराशा से भर जाये
जब कभी जीवन
नहीं रहता
खुद पर है जब विश्वास
मन में जगा लेता
इक तेरी ही आस ।

नहीं बस में कुछ भी मेरे
सोचता  हूं है सब हाथ में तेरे
ये मानता हूं और इस भरोसे
बेफिक्र हो जाता हूं
मुश्किलों से अपनी
न घबराता हूं ।

लेकिन कभी मन में
करता हूं विचार
कितना सही है
आस्तिक होने  का आधार
शायद है कुछ अधूरी
तुझ पे मेरी आस्था
फिर भी दिखा देती है
अंधेरे में कोई रास्ता । 
 

 

मई 23, 2023

POST : 1666 तिजोरी के सिक्के की खनक ( तीर निशाने पर ) डॉ लोक सेतिया

    तिजोरी के सिक्के की खनक ( तीर निशाने पर ) डॉ लोक सेतिया 

   ये इक पहेली है कौन किसी का यार दिलदार कौन अपना बेली है किसकी पड़ोसन किस की सहेली है । बस इक वही भाग्यवान है संग पिया जिसकी होली है । धन दौलत पैसा रुपया सब माया आनी जानी है तिजोरी और सिक्के की सच्ची मुहब्बत की अमर कहानी है । लोग समझदार थे पहले आजकल चतुर सुजान हो गए हैं सबको खबर थी हमको पता नहीं था सुनकर हैरान हो गए हैं । दोस्त पुराने दोस्तों से पिंड छुड़ाने को यही तरीका आज़माने लगे हैं फोन नंबर बदल कर आपस की दूरी बढ़ाने लगे हैं सब नया है तो घर नया दुल्हन नई विज्ञापन को सच कर दिखाने लगे है । नहीं मिल सकते कल फिर मिलेंगे बेकार बहाने पुराने लगे हैं ताल्लुक रखना लाज़मी है कुछ इस तरह से निभाने लगे हैं । मेरा देश बदल रहा सब लोग गुनगुनाने लगे हैं उनका हिसाब बराबर है दुश्मन सारे ठिकाने लगे हैं । 

  फिर वही रोग फिर वही अचूक दवा सब दोहराने लगे हैं बड़े नोटों से नोट बदलवाने लगे हैं । सवाल जवाब से बचने कतराने लगे हैं । सब खज़ाने वाले तिजोरी की तलाशी लेने लगे हैं कागज़ी नोटों को तबादला कर इधर उधर भिजवाने लगे हैं बड़ी कीमत वाले नोट अपनी हालत पर अश्क़ बहाने लगे हैं इसे देख चांदी के सौ साल पुराने सिक्के चुटकुले सुनाने लगे हैं मिलकर ठहाके लगाने लगे हैं बड़े नोटों की खिल्ली उड़ाने लगे हैं । हमको यहां रहते कितने ज़माने लगे हैं चार दिन के महमान थे आप कागज़ के नोट रद्दी के भाव बिक जाने लगे हैं । कौन खरा है कौन खोटा है वक़्त वक़्त की बात है चांद है चांदनी रात है और क्या चाहिए तू अगर साथ है । हवेली हुआ करती थी हवेली में तहख़ाना तहख़ाने में तिजोरी तिजोरी में सोने चांदी के ज़ेवर हीरे जवाहरात मोती सब खामोश रहते थे बस खनकता था तो चांदी का एक रूपये का सिक्का क्योंकि उस की अहमियत उसकी ज़रूरत हमेशा पड़ती थी ।
 
 लाख रूपये हों चाहे हज़ार रूपये एक का साथ शुभ मंगलमय समझा जाता था । विवाह के शुभ अवसर पर दो समधी मिलते तो एक रूपये का सिक्का उपहार में मिलता बड़ी शान बढ़ाता था बड़े बज़ुर्गों से पूछना कितना मन भाता था । मुझे याद आया हम जब होने वाली दुल्हन को देखने उनके घर पहुंचे तो सासु मां और ताया जी दरवाज़े पर आमने सामने थे खड़े बेटी की मां ने सीधा यही सवाल किया था आपकी मांग है कोई तो पहले अभी बताओ , समझे आप लालच है तो वापस लौट जाओ । ताया जी बोले इक मांग तो है एक रुपया और गुड़ बस कुछ भी और नहीं । यकीन करें रिश्ता बिना देखे दिखाए पक्का हो गया था हम से नहीं पूछा न उनसे उनके माता पिता ने और हम दोनों को समझाया गया आपका उनका भविष्य निर्धारित हो गया है । 

 भगवान भी एक है और रुपया पैसा भी वास्तव में एक ही से शुरू होता है बाद में शून्य का अंक जुड़ता है तो कद ऊंचा होता जाता है लेकिन एक को मिटाने से जितने शून्य साथ खड़े हों हिसाब कम अधिक नहीं शून्य कहलाता है । सरकारी बजट भी इक बही-खाता है गैरों पर करम अपनों पे सितम ढाता है सरकारी लोगों राजनेताओं को हंसाता और जनता को खून के आंसू रुलाता है । रूपये और पैसे का अंतर किसी किसी को समझ आता है रुपया घर बनाता है जब पैसा दौलत बन कर इतराता है तो ग़ज़ब दिखलाता है । खज़ाने की तिजोरी उदास है बंद है कितना धन मालिक ख़ास है चाबी खो गई है तिजोरी तोड़ना अपराध है । घोड़े को मिली खाने को ऐसी घास है कि बढ़ती गई घुड़सवार की प्यास है । उनको प्यास बुझानी है मगर समंदर है और खारा पानी है , पढ़ी हुई इक पुरानी कहानी है ये नहीं मालूम क्या मानी है । धरती का रस  नाम से इक कहानी है चार दिन की ज़िंदगानी है चार रूपये की ज़रूरत है अधिक की चाह रखना बड़ी नादानी है । आजकल राजनीति है अनीति है हमने नीति की बात पर पुरानी नीति कथा याद दिलानी है । 

                             धरती का रस ( नीति कथा )  

   एक बार इक राजा शिकार पर निकला हुआ था और रास्ता भटक कर अपने सैनिकों से बिछड़ गया । उसको प्यास लगी थी , देखा खेत में इक झौपड़ी है इसलिये पानी की चाह में वहां चला गया । इक बुढ़िया थी वहां , मगर क्योंकि राजा साधारण वस्त्रों में था उसको नहीं पता था कि वो कोई राह चलता आम मुसाफिर नहीं शासक है उसके देश का । राजा ने कहा , मां प्यासा हूं क्या पानी पिला दोगी । बुढ़िया ने छांव में खटिया डाल राजा को बैठने को कहा और सोचा कि गर्मी है इसको पानी की जगह खेत के गन्नों का रस पिला देती हूं । बुढ़िया अपने खेत से इक गन्ना तोड़ कर ले आई और उस से पूरा गलास भर रस निकाल कर राजा को पिला दिया । राजा को बहुत ही अच्छा लगा और वो थोड़ी देर वहीं आराम करने लगा । राजा ने बुढ़िया से पूछा कि उसके पास कितने ऐसे खेत हैं और उसको कितनी आमदनी हो जाती है । बुढ़िया ने बताया उसके चार बेटे हैं और सब के लिये ऐसे चार खेत भी हैं । यहां का राजा बहुत अच्छा है केवल एक रुपया सालाना कर लेता है इसलिये उनका गुज़ारा बड़े आराम से हो जाता है । राजा मन ही मन सोचने लगा कि अगर वो कर बढ़ा दे तो उसका खज़ाना अधिक बढ़ सकता है । तभी राजा को दूर से अपने सैनिक आते नज़र आये तो राजा ने कहा मां मुझे इक गलास रस और पिला सकती हो । बुढ़िया खेत से एक गन्ना तोड़ कर लाई मगर रस थोड़ा निकला और इस बार चार गन्नों का रस निकाला तब जाकर गलास भर सका । ये देख कर राजा भी हैरान हो गया और उसने बुढ़िया से पूछा ये कैसे हो गया , पहली बार तो एक गन्ने के रस से गलास भर गया था । बुढ़िया बोली बेटा ये तो मुझे भी समझ नहीं आया कि थोड़ी देर में ऐसा कैसे हो गया है । ये तो तब होता है जब शासक लालच करने लगता है तब धरती का रस सूख जाता है । ऐसे में कुदरत नाराज़ हो जाती है और लोग भूखे प्यासे मरते हैं जबकि शासक लूट खसौट कर ऐश आराम करते हैं । राजा के सैनिक करीब आ गये थे और वो उनकी तरफ चल दिया था लेकिन ये वो समझ गया था कि धरती का रस क्यों सूख गया था । सैकड़ों साल पुरानी लोककथाओं नीतिकथाओं को हम ने भुला दिया है जो पानी का प्यासा था उसे मीठा रस पिला दिया है शासकों ने वफ़ा का यही सिला दिया है अर्थव्यवस्था की बुनियाद तक को हिला दिया है । अपना क्या है यही कहते हैं ' नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई , है अपनी जेब तक ख़ाली कहीं पर घर नहीं कोई '।  ये इक ग़ज़ल का मतला है अब इक पूरी ग़ज़ल भी पेश है ।

 ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया

सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था
कोई भी अब तो पहला-सा नहीं था ।

गिला इसका नहीं बदला ज़माना
मगर वो शख्स तो ऐसा नहीं था ।

खिला इक फूल तो बगिया में लेकिन
जो हमने चाहा था वैसा नहीं था ।

न पूछो क्या हुआ भगवान जाने
मैं कैसा था कि मैं कैसा नहीं था ।

जो देखा गौर से उस घर को मैंने
लगा मुझको वो घर जैसा नहीं था ।