अपराध करने का अधिकार ( ग़ज़ब इंसाफ़ ) डॉ लोक सेतिया
संविधान में सभी एक समान हैं तो कायदे कानून नियम सभी पर समान लागू होने चाहिएं , बल्कि जिनको अदालत से सरकारी दफ़्तर तक में न्याय करना हो अगर वही किसी कारण गलत फ़ैसले करते हैं तब ऐसे में उनको सख़्त और अधिक सज़ा मिलनी चाहिए । टिप्पणी सुनकर हैरानी हुई कि निचली अदालत अथवा किसी विभाग के अधिकारी की एक समान आपराधिक घटना पर दो लोगों को अलग अलग निर्णय करने पर किसी राज्य के उच्चतम न्यायालय के बर्ख़ास्त करने के आदेश को अनुचित घोषित कर दिया । इतना ही नहीं बल्कि ये भी कहा गया कि सिर्फ गलत या त्रुटिपूर्ण फैसले से किसी न्यायधीश पर कोई विभागीय जांच या कोई करवाई नहीं की जा सकती है । सर्वोच्च न्यायालय को क्या इतना भी समझना ज़रूरी नहीं प्रतीत होता है कि देश में नीचे से ऊपर तक अदालतों से तमाम प्रशासनिक विभागीय अधिकारियों द्वारा मनमानी पूर्वक और विवादस्पद आदेशों से करोड़ों लोगों को न्याय नहीं मिलता बल्कि निर्दोष भी दोषी करार दिए जाते हैं और कैद में जीवन बिताते हैं । जबकि हमारी न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है जब ख़ास लोगों को गंभीर अपराध करने के बाद दोषी साबित होने पर भी ज़मानत से लेकर पैरोल तक बड़ी आसानी से मिलती रहती है । खेदजनक कड़वी वास्तविकता तो ये है कि बड़े लोगों ख़ास समझे जाने वाले वीवीआईपी वर्ग पर शिकायत दर्ज करवाने से लेकर जुर्म साबित करने तक कदम कदम पर अड़चनों और मुसीबतों से टकराना पड़ता है क्योंकि शुरू से आखिर तक यही लोग जांच सबूत गवाह सभी को मिटाने को सक्षम होते हैं । शायर कृष्ण बिहारी नूर जी का शेर है धन के हाथों बिके हैं सभी अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं ।
प्रशासनिक बड़े अधिकारियों से अदालती प्रणाली में शामिल सभी इक ऐसी व्यवस्था का अंग हैं जहां हर जगह रिश्वत से तारीख बढ़ाने से अन्य तमाम कामकाज होता है जिसे अनिवार्य समझ लिया गया है । देश की आज की बदहाली इन्हीं सभी शासक वर्ग की आपराधिक शैली की बदौलत है जिस में भ्र्ष्टाचारी खुले फिरते हैं और गरीब पिसते रहते हैं अपना सभी कुछ दांव पर लगाकर भी इंसाफ़ नहीं मिलता । सच बताऊं तो हमारे देश की प्रशासनिक प्रणाली विधायिका मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री सभी शपथ संविधान की उठाते हैं सभी के साथ समान रूप से निष्पक्ष होकर बिना अनुराग या बैर रखे विधि अनुसार न्याय करेंगे । लेकिन ऐसा होता कभी दिखाई नहीं देता है बल्कि सभी चोर चोर मौसेरे भाई की तरह आचरण करते हैं साधरण व्यक्ति को न्याय देना उनकी प्राथमिकता ही नहीं है मगर जिनको राहत देनी होती है उनके लिए सिर्फ रास्ते ही नहीं बनाये जाते बल्कि कायदे कानून ताक पर रखने तोड़ने से बदलने तक का कार्य निसंकोच किया जाता है । राजनीति में तो खैर अपराधी होना विशेषता समझा जाने लगा है , प्रशासन भी सत्ताधारी राजनेताओं से तालमेल बिठाकर खुद अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं । कितनी विडंबना है कि उच्च शिक्षा ऊंचे पदों पर बैठ कर भी देश समाज के प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करते हैं , विवेकशीलता का नितांत आभाव है । राजनेता अधिकारी फिल्म जगत के बड़े बड़े अभिनेता नायक फिल्म निर्माता तक सभी अपराध करते हैं राजनेताओं से मिलकर और कभी उनको सज़ा नहीं मिलती है । टेलीविज़न अख़बार में उनकी ऐसी खबरों को छुपाया जाता है अन्यथा जिनको लोग ख़ुदा या फ़रिश्ता समझते हैं उनकी छवि धूमल हो सकती है । टीवी सीरीज़ और कॉमेडी शो से खिलाड़ी तक जनता को गुमराह करते हैं सिर्फ पैसा कमाना उनका एक मात्र मकसद है ।
सबसे बड़ी अदालत को कभी चिंता ही नहीं हुई कि देश की न्याय व्यवस्था की शोचनीय दशा को कैसे सुधारा जा सकता है । जब न्यायधीश सेवामुक्त होने के बाद सांसद अथवा किसी अन्य संसथान में नियुक्ति पाकर शानो शौकत से राजसी जीवन बिताना अधिक महत्वपूर्ण समझते है इस से कि उनको समाजिक निस्वार्थ कार्यों को करना चाहिए जनकल्याण की भावना रखते हुए , तब बदलाव क्या होगा कैसे संभव है । बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी राजनेताओं सरकार से मेलजोल रख कर अपना कार्यकाल बढ़ाने से अन्य किसी पद पाने को लालायित रहते हैं किसी की चाहत मिटती ही नहीं है । आख़िर में अपनी इक ग़ज़ल से पहले आपको इक लोककथा की बात करते हैं । इक बादशाह ने देखा सड़क बहुत सारे गधे इक कतार में चल रहे हैं , बादशाह ने धोबी से पूछा ये इक कतार में सीधे कैसे चलते हैं । धोबी ने बताया जो कतार तोड़ता है मैं उसे सज़ा देता हूं । बादशाह ने पूछा क्या तुम मेरे राज्य में अमन कायम कर सकते हो , धोबी ने हामी भर ली । बादशाह ने उसे मुंसिफ़ अर्थात न्यायधीश बना दिया , शहर आकर न्यायधीश बन कर फ़ैसला करने का पद पाकर अदालत में सुनवाई करने लगा । इक चोर को पकड़ कर लाया गया जुर्म साबित हुआ , धोबी ने आदेश दिया इस चोर के हाथ काट दो । सज़ा देने वाले जल्लाद ने इशारा किया कि चोर वज़ीर का ख़ास आदमी है , धोबी ने फिर कहा उसका हाथ काट दो । तब वज़ीर ने सरगोशी की अपना आदमी है थोड़ा ख़्याल करो , धोबी ने इस बार ज़ोर से आदेश दिया कि चोर का हाथ और वज़ीर की ज़ुबान दोनों काट दो । कहते हैं ऐसे अमन कायम हो गया । आजकल ऐसे भाईचारा निभाने वाले राजनेता अधिकारी पुलिस से लेकर तभी धनवान उद्योगपति टीवी फिल्म धर्म उपदेशक हैं जिनका आपसी लेन देन का हिसाब है , ऐसे लोग अन्याय अत्याचार करते ही नहीं बल्कि नियम कानून संविधान को अपनी ठोकर पर रखते हैं । सभी जानते हैं उनको सज़ा कभी नहीं मिलती लेकिन अब चाहते हैं उनके अपराध को ही उनका कर्तव्य या अधिकार घोषित कर दिया जाना चाहिए ।
पहले सिर्फ देश के राष्ट्रपति को लेकर ऐसा सुनते थे क्योंकि उस पद पर आसीन व्यक्ति बेहद ईमानदार और काबिल हुआ करता था । आजकल तो उस पद की गरिमा भी बची नहीं है और लगता है कि जैसे वहां भी सत्ता धारी लोग अपनी कठपुतली बिठाने लगे हैं जो उनकी हर बात पर मोहर लगाने को विवश है । लेकिन लोकतंत्र में न्याय में भेदभाव कैसे हो सकता है , जिनके गुनाहों की सज़ा अधिक कड़ी होनी चाहिए उनको जुर्म करने की अघोषित छूट है कि उनको सुरक्षा कवच दिया जाए अपराधी होने पर भी उनकी कोई जांच तक ही नहीं हो सकती हो । ग़ज़ल पेश है :-
फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया "तनहा"
फैसले तब सही नहीं होतेबेखता जब बरी नहीं होते ।
जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।
गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।
क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।
हमको कोई नहीं है ग़म इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।
जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते ।
सोचना जब कभी लिखो " तनहा "
फैसले आखिरी नहीं होते ।
1 टिप्पणी:
आज के परिवेश में अदालती फैसलों पर बात करता आलेख। सच मे काफी समय से न्यायिक फैसले अचंभित करते है।खास के लिए अलग न्याय व्यवस्था आम लोगों के लिए अलग। कोई अदालत से सालों साल राहत नही पाता कोई बाबा जब मन करे पैरोल पा जाता है।
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