अप्रैल 20, 2021

POST : 1487 ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ज़िंदगी , तू बेवफ़ा क्यों है 
मौत मुझसे ही ख़फ़ा क्यों है । 
 
बेगुनाही की भी है पादाश    
ये जहां का फ़लसफ़ा क्यों है । 
 
( पादाश :  सज़ा )  
 
ऐ मेरे क़ातिल , बता तू ही 
मुझ को तुझ से ही वफ़ा क्यों है ।  
 
क्यों इनायत है रकीबों पर 
तेरी हम से ही ज़फ़ा क्यों है । 
 
कर के वादा फिर मुकर जाना  
यूं ही करता हर दफ़ा क्यों है ।  

 
ज़िंदगी से , मौत सस्ती है  
इस ख़सारे में , नफ़ा क्यों है ।  
 
( ख़सारा : नुकसान ) 
 
प्यार लिखना था जहां ' तनहा '
रह गया ख़ाली सफ़ा क्यों है ।  
 
 

 

 

2 टिप्‍पणियां:

कुन्नू सिंह ने कहा…

बहुत सुकून मिला आपका ब्लॉग देख कर| पुराने दिनों की याद आ गई जब चिटठाजगत नाम का वेबसाइट भी हुवा करता था|


दिल को छू देने वाला लेख|

Sanjaytanha ने कहा…

Wahh 👌👍