Sunday, 25 October 2020

दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    मन की बात कोरोना की चर्चा को छोड़कर पहले मतलब की बात करते हैं। किसी भी विषय पर तीन पक्ष हो सकते हैं इक हमारा मत क्या है दूजा उनका मत जो हमसे सहमत नहीं हैं और एक मत सच का होता है। दुनिया वाले हर तथ्य को अपने अपने अलग अलग नज़रिए से देखते हैं अपनी जगह अपनी सुविधा से उचित अनुचित की व्याख्या समझते हैं समझाते भी हैं। कल जो कहते थे तब वो ठीक था आज जो उसके विपरीत कहते हैं आजकल वही ठीक है इसका उदाहरण सत्ता मिलने से पहले और सत्ता मिल जाने के बाद राजनेताओं की बदली सोच और विचारधारा को देखकर समझ सकते हैं। सत्ता खोने वाले भी वास्तविकता को समझ पाते हैं जब चिड़िया खेत को चुग गई होती है। ट्विटर की चिड़िया की भाषा बदलने का यही कारण है। आज ये भूमिका समझाने की ज़रूरत है क्योंकि चाहे जो भी हो आज का दशहरा पर्व रावण का ही है आज राम की कृष्ण की बात नहीं रावण की बात करते हैं। दशहरे में जब पिछले साल से और ऊंचा रावण बनाकर जलाने का उत्सव मनाते हैं तब राम और लक्ष्मण दोनों रावण की परिकर्मा करते हैं उसको आदर देते हैं ये शायद हमने समझा नहीं दस दिन रामलीला देखी सबक लिया नहीं कोई भी। राम जीते रावण हार गया और समाज जीतने वाले की जय बोलता है लिखने वाले विजयी का गुणगान करते हैं। युद्ध सीता माता को लेकर नहीं हुआ था लड़ाई का कारण लक्ष्मण का रावण की बहन की नाक काटना और रावण का राम की पत्नी का अपहरण करना था दोनों ने इक दूजे को अपमानित करने को इक महिला को औज़ार बनाया जो अभी भी किया जाता है। क्या नारी शक्ति की बात अभी भी खोखले स्लोगन तक है या अब महिला का महत्व और आदर बिना किसी पुरुष के नाम के साथ जुड़े भी होता है। महिला क्या खुद इक शख़्सियत बन गई है जिसे पिता भाई पति बेटे के रूप में किसी पुरुष की कोई आवश्यकता नहीं है। रावण को आज इस विषय पर संबोधित करना पड़ा है क्योंकि भगवान राम सीता की अग्निपरीक्षा लेकर भी उस को अपनाते नहीं हैं और उनका उपासक तुलसी साफ कहते हैं ढोल गंवार पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। अर्थात इनको जकड़ कर बंधन में बेड़ियों में कसकर रखना चाहिए इनको ढील देने से ये जाने क्या कर सकते हैं बिगड़ने का डर रहता है। 
 
   रावण जी मंच पर हैं माईक पकड़े और सभी कैमरे उनकी तरफ सीधा लाइव उदघोष की शुरुआत करने को तैयार। हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं अभिवादन सभी का जो जहां हैं मेरा अभिभाषण सुनने को व्यकुल हैं। शायद मुझे इसकी कल्पना नहीं थी कि सदियों बाद मेरा नाम ख्याति और मुझे आदर्श मानने वाले केवल लंका नहीं भारतवर्ष ही नहीं विश्व भर में इस कदर मुझे अपना समझ हर साल मुझे ज़िंदा रखने की कोशिश करते रहेंगे। जैसा कि आपको विदित है ये दुनिया ये समाज बहते पानी की तरह आगे बढ़ता रहता है रुकना थमना विनाश की निशानी होती है इसलिए मुझे आपको सदियों पहले वाले राम रावण के शासन और समाज वाले समय से आगे बढ़कर आधुनिक काल इस इक्कीसवीं सदी के रंग ढंग और सभ्यता के अनुसार समझने सोचने और जीने की बात कहनी है। आज किसी की बहन नाक कटवा कर घर वापस आती है तब कोई बिना समझे जाने जिसने नाक काटी उसको सज़ा देने नहीं चल पड़ेगा। जानेगा उसने जिन को पसंद किया उनसे प्यार का इज़हार किया वो क्या वास्तव में इतने अच्छे समझदार और गुणवान हैं और क्या उनके किसी के प्यार के अनुरोध को स्वीकार नहीं करने का कारण उनका केवल एक महिला से विवाह करने की परंपरा है। जब ये मालूम होगा कि दशरथ जी की चार रानियां थीं तब राम लक्ष्मण पर भी कोई रोक कदापि नहीं थी और सीता जी अपना पति स्वयंबर में चुन सकती हैं तो सभी महिलाओं को ये अधिकार होना चाहिए। कोई भी अस्वीकार कर सकता है प्यार या विवाह के अनुरोध को मगर इस के लिए अपमानित नहीं किया जा सकता है। 
 
   राजनीति हो या फिर शादी संबंध बनाने की बात जल्दबाज़ी करना सही नहीं होता है। मुझे घटनास्थल पर जाकर देखना समझना सोचकर निर्णय करना उचित लगा। ऐसा संभव था कि राम या लक्ष्मण मुझे अपनी बहन के योग्य लगते तो उनको अपहरण कर लाता अपनी बहन से क्षमा मंगवा कर विवाह करवाता। लेकिन आप खुद सोचकर बताना कि बनवास में कोई पत्नी सोने का हिरण पाने की चाहत करती है तो इसका क्या मतलब है। महिलाओं को अपने पति से असंभव को संभव करने की उम्मीद रखने का अंजाम यही होता है , हर पति को भी अपनी जीवन संगिनी से ये कहने का साहस होना चाहिए कि कोई भी किसी की सभी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है भगवान देवी देवताओं तक कभी अपने जीवन साथी अपने भक्तजन अपने चाहने वाले अपने उपासकों को सब नहीं दे सकते थे। और अगर कभी किसी ने बिना विचारे सोचे समझे बगैर कोई वरदान दे दिया तो क्या क्या नहीं होता रहा। आपको जो करना था वो आपने समझा ही नहीं हमारी कथाओं कहानियों और क्या करने से क्या अंजाम होगा जैसे सबक सीखने की जगह आपने वही गलतियां दोहराने का काम किया है। 
 
     मेरा इक भाई कुंभकर्ण था आजकल आप कितने लोग जागते नहीं कोई लाख जगाने की कोशिश करता रहे। जानकर अपनी आंखें बंद रखते हैं सामने सच होता है आप नहीं स्वीकार करते। मैंने किसी की सही सलाह नहीं मानी थी अपने अहंकार में चूर था आप कब किसी की सुनते हैं हर शासक मनमानी करता है तब वो मेरा ही शागिर्द है राम का नहीं हो सकता है। मैंने कभी राम कहलाना नहीं चाहा लेकिन अब हर शासक किरदार रावण का निभाता है चाहता है उसको राम कहा समझा माना जाये। राम नाम सत्य है ये हर कोई अर्थी को उठाते समय ही कहता है वास्तविक जीवन में झूठ बोलते हैं सत सरी अकाल शब्द को समझते कब हैं। विभीषण को कोई लाख रामभक्त बताता रहे ऐसा भाई घर का भेदी लंका ढाये यही माना जाता है। कभी किसी ने अपनी संतान को विभीषण नाम देना स्वीकार नहीं किया है। 
 
  जब मैंने देखा कि सीता जी के कहने पर राम सोने का हिरण लाने चले गए और लक्ष्मण भी सीता जी के कहने पर उनकी तलाश को चले गए तब मुझे लगा कि इस महिला को भी उसकी भूल की सज़ा मेरी नासमझ बहन की
हठ करने की सज़ा जैसे ही मिलनी नारी जगत के लिए सबक हो सकता है। बाल हठ नारी हठ और राज हठ सभी का अंजाम समझना चाहिए और किसी की ज़िद को मानकर अनुचित असंभव कार्य करना साहस की बात नहीं बल्कि मूर्खता की निशानी है। ये तो कितनी बार कहते हैं सुना है सभी ने कि राम भी रावण भी हम सभी के मन में रहते हैं और हमको अपने भीतर के रावण का अंत करना चाहिए न कि किसी रावण का पुतला जलाकर उसको और ऊंचा बनाते जाना चाहिए। आखिर में आर पी महरिष जी का इक शेर याद आता है। रावण अपनी बात कह कर चले गए हैं शेर मेरे गुरूजी का है। 

                      " ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी

                     आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह "।