जुलाई 30, 2019

आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  कुछ दिन पहले जो अख़बार टीवी चैनल सब बढ़िया है का गुणगान करते शोर मचाते थकते नहीं थे अचानक उनको देश की समाज की बदहाली का सच नज़र आने लगा है। जिन से कीमत पाकर झूठ को सच साबित करते रहे थे उनका मकसद हल होने के बाद शायद उन्हीं से पूछकर सच कहने का आडंबर करना शुरू किया है। अब ऊंची आवाज़ में सरकार की नाकामी की ही नहीं नेताओं के संगीन अपराधों में सरकारी विभाग पुलिस
का गुनहगार को बचाने से आगे उनके गुनाह पर पर्दा डालने साथ देने तक बेशर्मी की खबर बताने लगे हैं। जो राज्य से अपराध मिटाने की बात करते थे खुद उनके विधायक गंभीर अपराध करते हैं पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती बल्कि जिस के साथ बलात्कार हुआ उसके परिवार के लोगों को बंद करती है मारपीट करती है और हद से बढ़कर जब ऊपरी अदालत जांच एजेंसी आदेश देते हैं गुनहगार को पकड़ते हैं पीड़ित को सुरक्षा देने का दायित्व मिलता है मगर फिर भी पीड़िता को सड़क दुर्घटना की शक्ल देकर घायल और चश्मदीद गवाह को मार दिया जाता है गलत दिशा से आते ट्रक द्वारा जिस का नंबर कालिख पोत कर छिपाया गया था ये सब हालात गवाही देते हैं शक पैदा करते हैं हादिसा नहीं हुआ करवाया गया है मगर जो सुरक्षाकर्मी साथ होने थे नहीं होते इतना सब पुलिस को सामन्य दिखाई देता है। टीवी वाले भी चुनाव से पहले इस तरह की खबर को सुर्ख़ियों में नहीं आने देते और राजनीती की बहस में उलझाने का अपना काम करते रहते।

    मीडिया बदला नहीं है पहले सरकारी बिकाऊ भौंपू बना हुआ था अब चेहरा बदल मुखौटा लगाया है सच की जनहित की बात करने का जबकि विवशता है अपने होने को अस्तित्व को बचाये रखना है तो दिखावे को ही सही आंखे बंद रख कर नहीं चलते रह सकते। सरकार से सवाल करने से पहले इन सभी से सवाल पूछना ज़रूरी है आप को पहले ये घना अंधेरा रौशनी क्यों लगता था अंधे नहीं थे अपनी आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बांधी हुई थी। सत्ताधारी दल के तथाकथित साहसी नेता अपने दल के अपराधी को अभी भी दल से बाहर नहीं निकाल पाए हैं और उल्टा बेशर्मी से भगवाधारी साधु बनकर संसद का चुनाव जीतने वाले जेल जाकर उनका आभार व्यक्त करते हुए उनकी तारीफ करते हैं। मतलब साफ है सत्ता धारी दल के लोगों के गुनाह अपराध नहीं उनका अधिकार बन गए हैं।

     अब कोई शक की बात नहीं है कि जो भी दल सत्ता में होता है न्याय कानून और सुशासन की बात नहीं अन्याय करने लूटने अत्याचार करने को अपना हक मानता है। पुलिस जनता की सुरक्षा नहीं नागरिक को डराने दहशत फैलाने और दमन करने का काम करती है ठीक किसी आपराधिक गिरोह की तरह। जो दल आजकल सत्ता में है मनमानी करने में कोई लाज संकोच नहीं करता है। अपने नेताओं को समर्थकों को खुली छूट दे राखी है कानून हाथ में लेकर दंगे फसाद कत्ल करने की। अच्छे दिन यही होते हैं क्या उनसे सवाल कौन करे क्योंकि उनको जवाब देने की आदत नहीं है हर किसी को बुरा बताने से आप अच्छे साबित नहीं हो सकते हैं। देश की वास्तविक समस्याओं की बात कोई नहीं करता सरकार हर दिन कोई नया तमाशा करती है बहलाये रखने को। पुलिस न्यायपालिका अपना काम कम बातें अधिक करते हैं। आम नगरिक को मिले अधिकार वापस लेने और उन पर अंकुश लगाने को रोज़ नये तरीके नये बहाने खोजने को लगे रहते हैं। सरकारी इश्तिहार बताते हैं सब बढ़िया है मीडिया वास्तिक देश की समस्याओं से किनारा कर चुका है। खुद को सच के पैरोकार झंडा बरदार बताने वाले झूठ को सच बताने का काम करते हैं मगर खुद को संविधान का स्तंभ बताते नहीं थकते ये उपाधि उनको मिली नहीं उन्होंने खुद छीन कर हासिल की हुई है जबकि इसके काबिल वो नहीं बन सकते। उनको दौलत शोहरत ताकत चाहिए जो सच कहने से नहीं झूठ का साथ देने से हासिल होती है।

    ये दर्पण टूटा हुआ है और धुंधली तस्वीर दिखाई देती है खुद उनको अपना ही चेहरा नज़र नहीं आता है। इस आईने को फैंकने का समय आ गया है। 
 

 

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