Saturday, 20 April 2019

तमाशा बना दिया ( बदलता समाज ) डॉ लोक सेतिया

       तमाशा बना दिया ( बदलता समाज ) डॉ लोक सेतिया 

   मेरी इक छोटी बहन है आजकल कज़न या फुफेरी बहन कह सकते हैं पर हमारे समय में सभी बहनें होती थी सगी और चहेरी फुफेरी का भेद नहीं समझते थे। सुबह उसके दो संदेश जो यकीनन खुद उस के नहीं हैं फ़ॉरवड किये हुए हैं मिले। अच्छा लगता है मिलकर नहीं बात कर नहीं तो इस तरह से याद कर लेते हैं
रिश्तों को। जानता हूं मेरी भोली बहन ने ये सोचा भी नहीं होगा जो मुझे लगा उन दोनों संदेशों का इक विरोधाभास जैसा। पहले लिखे संदेश में बेटी पिता से घर के आंगन के पेड़ को आगे से उखाड़ कर पिछले बगीचे में लगाने को कहती है और पिता बताते हैं कुदरत किसी को ऐसी ताकत नहीं देती कि ऐसा कर सके मगर बेटियां हैं जो पलती बढ़ती हैं पिता के घर और फलती फूलती हैं ससुराल के घर पर जाकर। किसान जानते हैं धान की फसल ऐसी होती है जिस में पौध उखाड़ कर किसी और खेत में रौपी जाती है बेटियों की तरह शायद।
                   पढ़कर मन की भावना जगती है लेकिन जब साथ मिला वीडियो सुनते हैं तो लगता है कुछ भी कहना क्या हमारी आदत बन गई है। चुटकुले बनाने को बचा है यही , इक महिला भगवान से मांगती है सब कुछ अपने पति के लिए। आखिर में कहती है उसको ये सब दे देना आगे पति से छीनना मुझे आता है। सब जानते हैं और मैंने जवाब लिखा भी कि नारी पति का धन सुख सुविधा का उपयोग भी खुद के लिए नहीं पहले बाकी सदस्यों की खातिर बच्चों पति सास ससुर देवर जेठ हर रिश्ते निभाने को करती है। खुद उस के हिस्से बचता कितना है कोई नहीं समझता। मगर ये बात इतनी सी नहीं है हम आधुनिक बनते गये मगर इस में अपने संवेदनशीलता को खो रहे हैं। जो बात पढ़कर आंखे नम होती थीं आज हंसते हैं तो लगता है पाषाण बनते जा रहे हैं। समाज का बदलता स्वरूप हैरान करता है। बस इसी से बाकी हर समाज के भाग को देखने पर लगता है ये किधर जाते जा रहे हैं सभी लोग।

        चुनाव पहले भी होते रहे हैं मगर हर बार राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है। ये किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि सत्ता पाना और चुनाव जीतना देश के संविधान की मर्यादा को ताकपर रखने तक की नौबत ला सकता है। कीचड़ की होली खेलते खेलते नेता लोग अब गंदगी से खेलने लगे हैं और गटर के पानी की बदबू चरों तरफ फैलाई जा रही है। विचारधारा की बात कहीं नहीं है और नियम कानून को भाड़ में झौंक रहे हैं अचार सहिंता का उपहास कर दिया गया है बड़े बड़े पद पर आसीन लोग घटिया बातें स्वार्थ सिद्ध करने को राजनीति को गटर में नहला रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं को बर्बाद करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई। देशभक्ति देशसेवा शब्द लगता है कोई हथियार बन गया है मतलब पूरे करने का। जिसे चाहा जो करार दे दिया और जिसको चाहा उसके गुनाहों को दरकिनार कर दिया गया। बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा साबित करने को सोशल मीडिया को टीवी अख़बार को साधन बना लिया है। कोई भी संसद का चुनाव तय सीमा में खर्च कर नहीं लड़ना चाहता और ईमानदारी इक तमाशा बन गई है। इतना धन आया कहां से कोई हिसाब नहीं और जो सबसे बड़ा गुनहगार उसी दल का खर्च सबसे बढ़कर। काला धन सफ़ेद धन कोई भेद नहीं है और अगर धन बाहुबल ताकत जातिवाद धार्मिक उन्माद से चुनाव लड़ना जीतना है तो कोई भी जनता और देश का हितचिंतक नहीं है सभी डाकू लुटेरे हैं।

        इक नंगा नाच है सबके सामने हो रहा है। गाड़ियों के काफिले आम नागरिक को रौंदते हुए सड़क पर दहशत का माहौल बनाते हैं जिसे किसी फिल्म में घोड़ों की आहत गोलियों की गूंज सब को घर में कैद होने को विवश करती थी। जंगलराज का आधुनकीकरण है ये हाथ जोड़ रहे नेता भी भाषण देते हैं तो लगता है धमकी देने की बात है। नहीं ये लोकतंत्र के नाम पर धोखा है छल से रावण साधु बनकर सीता को हरण करने आये हैं। आपकी सीमा रेखा तय है और पार करते ही आपकी सुरक्षा समाप्त और रावण उठाकर ले जायेगा अपनी सोने की लंका में। देश की राजधानी दिल्ली बेरहम है आपकी आवाज़ वहां जाती नहीं है उनके दफ्तर शीशे की दीवारों से बने हैं साउंड प्रूफ हैं बाहर की चीख पुकार सुनाई नहीं देती है। हम कायर बनकर ये ख़ामोशी से देख रहे हैं और सभी दलों ने चुनावी व्यवस्था को तमाशा बना दिया है। गीता रामायण पढ़ते नहीं हैं हम उनकी झूठी शपथ उठाते हैं मगर नहीं जानते कि धर्मयुद्ध नहीं है कोई राम नहीं कृष्ण नहीं रावण कंस राम कृष्ण होने का दावा कर रहे हैं और जीत धर्म की नहीं अधर्म की होगी सब जानते हैं। किताबी बातें किताबों में बंद हैं संविधान की भावना का दम घुटता लगता है। जाते जाते इक मधुर गीत उचित तो नहीं मगर आजकल की वास्तविकता है।

         हम को तुम्हारे इश्क़ ने क्या क्या बना दिया , जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया। 

 मनोरंजन कोई मकसद नहीं है और स्मार्ट फोन का उपयोग विचारों का आदान प्रदान करने को किया जा सकता है वक़्त बर्बाद करने को नहीं। समय का उपयोग करना और समय की बर्बादी में बहुत बड़ा अंतर है।

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